विशेष

उसने पीछे से गोली मेरी पिंडली पर मारी मगर मैंने अपना पेटीकोट नहीं उतारा : ज़रूर पढ़ें!

Mohd Ahmad
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【निजीकरण और सरकारी पर एक विचार】

【सरकारी कर्मचारी पढ़ें जरूर】

पहले दूध में केवल पानी मिलाया जाता था,फिर मलाई मारी जाने लगी और अब यूरिया और डिटर्जेंट वाला दूध मिलता है।थोड़ा बहुत अपवाद छोड़ दें तो

आपके हमारे घर में भी यही दूध आता है और ये दूध सरकारी कर्मचारी नहीं बेचता।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से अरुणाचल तक ट्रेनों में यूरिया वाली जहरीली चाय कोई सरकारी कर्मचारी नहीं बेचता।

200 घन फ़ीट का दावा करके 150 घनफीट बालू आपके हमारे घर में कोई सरकारी कर्मचारी नहीं पहुंचाता।
सड़कें कोई सरकारी ठेकेदार नहीं बनाता,

पेट्रोल पंप पर मिलावटी तेल भी कोई सरकारी कर्मचारी नहीं बेचता।

पेट्रोल पंप पर मिलावट के विरुद्ध कार्यवाही करने वाले सरकारी अधिकारी मंजूनाथ षणमुगम को भी मारने वाला पेट्रोल पंप के मालिक सरकारी आदमी नहीं था।

बड़ी बड़ी पंचसितारा इमारतों में हर दिन पैसा सोखने वाले निजी स्कूलों का संचालन सरकारी लोग नहीं करते।

करोड़ों रुपये लेकर देश छोड़ कर भाग जाने वाले माल्या,नीरव मोदी या मेहुल चौकसी सरकारी अधिकारी नहीं थे।

बिना सोचे समझे निजीकरण के पैरोकार और सरकारी कर्मचारी को नकारा साबित करने वाले लोग क्या कभी इन लोगों से कोई प्रश्न कर पाएंगे? जब देश का पैसा लूटकर पूजीपति बने इन पूजीपतियो की आम जनता के प्रति कोई जवाबदेही नही तो निजीकरण कैसे सही होगा। निजीकरण के बाद दिवालिया होकर भाग जाने वालो से जनता के पैसे कौन वापस दिलायेगा।

और निजीकरण इतना ही सफल है तो उस दौर में जब स्मार्टफोन की सबसे ज्यादा आवश्यकता महसूस की जा रही थी तब माइक्रोमैक्स और karbonn जैसी मोबाइल कंपनियां क्यों फ्लॉप हो गई?

जब हवाई यात्रा लोगो मे लोकप्रिय हो चुकी है तब किंगफिशर व जेट एयरवेज जैसी कम्पनी दिवालिया कैसे हो गयी ?
सोचिए जब इन कम्पनियो का ये हश्र हो सकता है तो कल सरकारी उपक्रमो की जगह लेने वाली कम्पनी का भी तो हो सकता है। अंततः इसका दुष्परिणाम किसे भुगतना होगा?

बड़े गंभीर प्रश्न हैं और ऐसे प्रश्नों की फेहरिश्त काफी लंबी है, बीते समय की बात है गरीबी चरम पर थी लेकिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, इतने सारे सरकारी उद्यम खड़े किए गए,आज बताया जा रहा है कि हम 500 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं पिछले साल HPCLक़ो बेचा गया वो तो गनीमत रही कि ONGC को दिया गया और अब BPCL को बेचने की बात चल रही है जबकि BPCLने पिछले वित्तीय वर्ष में 2600करोड़ का मुनाफा कमाया है, स्थिति समझ से परे है,,, कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी को एक ही बार में खत्म कर देने मे समझदारी है या फिर प्रतिदिन सोने के अंडे प्राप्त करने में।

निजीकरण कर सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है और इसके गंभीर दुष्परिणाम आम जनता को भुगतने के लिए छोड़ दे रही है।

आज के समय के सबसे गंभीर चिंतन वाले विषय हैं ये। आप विशिष्ट मित्रों से निवेदन है कि खाली समय में इसपर अपने विचार जरुर प्रेषित करें ।
समय देने के लिये
धन्यवाद!


Mustafa Sherwani
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From the wall of my son Mujtaba Sherwani
१ महिला अस्मा उर्फ़ सुहेला खान पत्नी मुज़फ्फर, जिसको शक्ति नगर, थाना छेत्र इंदिरा नगर मैं 06.08.2020 को उसके देवर द्वारा गोली मारी गयी थी और 22 घंटे तक उसका इलाज सिर्फ इसलिए नहीं किया गया क्यूंकि कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट नहीं आयी थी, अभी शाम को उस महिला का किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज मैं देहांत हो गया है, महिला के 3 छोटे छोटे बच्चे भी हैं.
अभियुक्त अभी भी फरार है, ना ही महिला का सही समय पे इलाज हुआ और ना ही अभी अभियुक्त पकड़ा गया, अस्मा उर्फ़ सुहेला को इन्साफ कब मिलेगा?
कब क़ातिल पकड़ा जाएगा?
और कब उन डॉक्टरों के खिलाफ कार्यवाही होगी जिनकी लापरवाही से महिला का देहांत हो गया?


Joher Siddiqui
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4 साल पहले की बात है…
एक Dopadi Singhar नाम की बेनाम आईडी एकाएक फेसबुक पर छा गई थी, आप में से कुछ लोग शायद उसे भूल बैठे होंगे, पर ये नाम और उसकी लिखी एक एक कविता अब भी मेरे पास मौजूद है, जिसे मैं वक़्त वक़्त पर अक्सर पड़ता हूँ।
वो कौन थी, कहाँ से आई थी, किसी को नहीं पता, कहाँ चली गई, कोई नहीं जानता पर आज 4 साल बाद भी उसकी एक एक कविता यहां उसका दर्द बयान कर रही है, जो अकेले सिर्फ़ उसका दर्द नहीं है बल्कि एक पूरे तबके के दर्द है जिसे समझने की जहमत तक, हम आज के वक़्त में नहीं करना चाहते है।
अगर आपको भी द्रोपदी याद है, तब उसे याद करते हुए उसकी इस कविता को पढिये और महसूस कीजिये, उसने कितने दर्द को सहते या देखते हुए इस कविता को लिखा होगा…
“पेटीकोट”
नहीं उतारा मैंने अपना पेटीकोट
दरोगा ने बैठाये रखा
चार दिन चार रात
मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी तीन साल की बच्ची अब तक मेरा दूध पीती थी
भूखी रही घर पर
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी चौसठ साल की माँ ने दिया उस रात
अपना सूखा स्तन मेरी बिटिया के मुंह में
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट.
नक्सल कहकर बैठाया रखा चार दिन चार रात
बोला, ‘बीड़ी लेकर आ’
बीड़ी का पूड़ा लेके आई
‘चिकन लेके आ रंडी’
चिकन ले के आई
‘दारू ला’
दारू लेके आई.
माफ़ करना मेरी क्रांतिकारी दोस्तों
मैं सब लाई जो जो दरोगा ने मंगाया
मेरी बिटिया भूखी थी घर पर
दरोगा ने माँगा फिर मेरा पेटीकोट
मैं उसके मुंह पर थूक आई
भागी, पीछे से मारी उसने गोली मेरी पिंडली पर
मगर मैंने उतारा नहीं अपना पेटीकोट।

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