विशेष

ब्राह्मणवाद : कपड़े से कोढ़ नहीं छुपता

Rajkamal Goswami

Former DIG Stamp at Govt. of U.P.

From Lucknow, Uttar Pradesh

==============
ब्राह्मणवाद ,
इस देश की सारी समस्याओं की जड़ में ब्राह्मण है । सारा देश कोल भील किरात की तरह रह रहा होता । एक शिकार पर दो तीर लग जाते तो शिकारियों में किरातार्जुनीयम् की तरह युद्ध से ही निर्णय होता ।

बिना कार्य वितरण के न घर परिवार चल सकता है न दफ्तर और न समाज । भले ही औरतें आटा पिसा लायें मगर यह काम पुरुषों का ही है । पशुपालन कृषि जीवनयापन में पुरुष को आगे बढ़ जिम्मेदारी उठानी पड़ती है और बालकों की शिक्षा ? वह कौन देगा ? उसके लिये समाज ने जिम्मेदारी दी ब्राह्मणों को । ब्राह्मण ने पीढ़ियों द्वारा अर्जित ज्ञान के संचय और वितरण का काम सम्हाला । वह गुरुकुल चलाता था वह और उसके विद्यार्थी समाज की दी हुई भिक्षा पर पलते थे ।

कार्य का वितरण इतनी कुशलता से किया गया था कि भारत का लगभग हर गाँव आत्मनिर्भर था । क्षत्रियों का काम रक्षा करना करना था उनके बच्चों को उसी तरह की शिक्षा दी जाती थी और चूँकि ज्ञान का न्यासी ब्राह्मण होता था तो धनुर्वेद और शस्त्र संचालन की शिक्षा भी वही देता था । वैश्य समाज की अर्थव्यवस्था संभालता था । वे श्रेष्ठ कहलाते थे । इसके अलावा एक बहुत बड़ा वर्ग आजकल के मध्यम वर्ग की तरह था जो शूद्र कहलाता था । यह या तो नौकरीपेशा होता था या स्वरोजगार चलाता था । बढ़ई की हर घर को जरूरत होती थी लुहार की भी मिस्त्री की भी जुलाहे की भी और किसान तो अन्न उपजाता था ।

भारत का इंच इंच जंगलों से पटा हुआ था । किशोरावस्था में मेरे सामने तक गाँवों के दूर के खेतों हिरन भेड़िये सियार और कभी कभी शेर तक दिखाई दे जाते थे । ग्रामीण भारत इन्हें उपयोग में लाता था ठाकुर साहब शेर भले ही मार लायें परन्तु चर्मशोधन का पूरा एक कुटीर उद्योग हुआ करता था । भारत आज भी दुनिया का सबसे बड़ा पशुधन आबादी वाला देश है और अनुसूचित जाति में चर्मकारों की संख्या भी सबसे अधिक है । अंग्रेज अपने साथ शिकार का शौक लाये तो उसकी खाल में भूसा भरने वाला टैक्सीडर्मिस्ट भी अपने साथ लाये । मृगछाला, सिंहचर्म का उद्योग ठप हो गया । उनका बाटा कम्पनी का मालिक हो गया और हमारा चर्मकार उनका नौकर ।

संत थांमस ज़ैवियर ने कभी कहा था कि जब तक भारत में ब्राह्मण हैं तब तक ईसाई मिशनरी का सफल होना संभव नहीं है । तो सबसे पहले ब्राह्मण को खलनायक बना कर पेश करो । इंगलैंड से मैक्समूलर आये उन्होने तमाम वैदिक वाङ्मय का अध्ययन और अनुवाद किया और इस तरह से पेश किया कि ब्राह्मण ने बड़ा अत्याचार किया है । कहा गया शूद्र अगर वेद सुन ले तो उसके कान में पिघला सीसा डाल दो । अब बताइये आप लोगों ने कभी सुना किसीइतिहास या पुराण में कि किसी शूद्र के कान में पिघला सीसा डाल दिया गया हो ? और वेद , वेद तो जब पढ़े जाते हैं तो सस्वर और जोर जोर से पढ़े जाते हैं । दशाश्वमेध
घाट पर वेद पाठ होगा तो क्या आवाज बराबर में मणिकर्णिका घाट पर डोमराजा के घर नहीं जायेगी।
अपनी सामाजिक व्यवस्था के कारण भारत अंग्रेजों के आने से पहले दुनिया की नम्बर एक अर्थव्यवस्था थी ।

राजकमल गोस्वामी
क्रमश:

Rajkamal Goswami
============

ब्राह्मणवाद २
ब्राह्मणों पर सबसे बड़ा आरोप अस्पृश्यता के प्रचार प्रसार का लगता है लेकिन हिंदुओं की एक बड़ी संख्या बाली द्वीप में रहती है । वहाँ आज भी चातुर्वर्ण व्यवस्था लागू है लेकिन वहाँ के हिंदू जानते ही नहीं हैं कि अस्पृश्यता क्या होती है । मंदिरों के पुजारी वहाँ शूद्र भी होते हैं ।

https://en.m.wikipedia.org/wiki/Balinese_caste_system तो फिर भारत में ऐसा क्या हो गया कि अस्पृश्यता ने घर कर लिया । इसका जवाब अगली कड़ी में खोजते हैं । फिलहाल बाली की वर्ण व्यवस्था को देखें । वहाँ चारों वेद मौजूद हैं और कुंभ मेले में प्रतिभाग करने बाली से हिंदू तीर्थयात्री भारत आते हैं ।
वे लोग अपने नेत्र उन्मीलित कर लें जो यह पढ़ कर जवान हुऐ हैं कि ब्राह्मणवाद छुआछूत का जनक है ।

Rajkamal Goswami
===============

ब्राह्मणवाद ३
जब १८६१ में अंग्रेजों ने पहली जनगणना की तो बहुत प्रयास किया कि हिंदुओं को वर्ण व्यवस्था के हिसाब से बाँट दिया जाये लेकिन देश में इतनी सारी जातियों में किन्हें किस वर्ण में रखा जाये समझ में ही नहीं आया । इतने विशाल देश में अगर कहीं कोई जाति शूद्र प्रतीत होती भी थी तो वही जाति कहीं राज्य कर रही होती थी ।

पिछली पोस्ट में हमारे मित्र कह रहे थे कि ऋग्वेद में प्रक्षिप्त पुरुष सूक्त को छोड़ कहीं शूद्रों का उल्लेख नहीं है । शूद्र बाद में जोड़े गये हैं लेकिन अंग्रेजों को देश में शूद्र खोजे नहीं मिले । फिर भी उन्हें हिन्दू समाज के ताने बाने को तोड़ना था । इसलिये इतिहास लेखन और जातिगत जनगणना के अलावा श्रमजीवी वर्ग को रोज़गार विहीन कर देने का मार्ग चुना गया । जिन जातियों को उन्होंने निम्न वर्ण में चिह्नित किया उनके राजवंशों के नाम देखिये ,
मल्हार राव होलकर – धनगर जाति- इंदौर नरेश
महारानी गायत्री देवी— कोच राजवंशी अनुसूचित जनजाति
मेदिनी राय — गोंड— राजा पलामू
श्रीमंत जयाजीराव सिंधिया — ग्वालियर
सर सयाजी राव गायकवाड, —- बड़ौदा

लिस्ट बहुत लंबी है और अतीत में प्राचीन भारत में भी शूद्र राजवंशों ने राज्य किया है । महापद्म नंद, धनानंद और एक मतानुसार चंद्रगुप्त मौर्य भी शूद्र ही थे । इससे स्पष्ट है कि वर्ण का निर्धारण अंग्रेजों के आने से पूर्व तक कर्मों से होता था ।

गुलॹार के मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल का एक दृश्य है जिसमें ग़ालिब अपनी पत्नी की थाली से निवाला उठाना चाहते हैं और पत्नी अपनी थाली खींच लेती है । ग़ालिब बड़े ख़ुलूस से पूछते हैं कि क्या बेगम हमारी थाली अलग कर दी तो बेगम कहती हैं कि नहीं मैंने अपनी थाली अलग कर ली । पंजवक़्ता नमाज़ी उमराव बेगम अपने शराबी जुआरी शौहर से अपनी थाली अलग कर लेती है । ठीक इसी तरह एक अंग्रेज़ ने ऋषि दयानंद सरस्वती से हाथ मिलाना चाहा तो उन्होंने हाथ खींच लिया और कहा कि आप गोभक्षक हैं मैं आपसे हाथ नहीं मिला सकता ।

अस्पृश्यता प्राचीन भारत में कहीं नहीं दिखती । कर्ण के बारे में दलित चिंतकों का भारी आक्षेप है पर सूतरपुत्र होते हुए भी दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बना दिया इस पर किसी ने भी आपत्ति नहीं की अपितु मद्रनरेश शल्य ने तो उसका रथ भी हाँका । रामायण महाभारत में कहीं अछूत का उल्लेख नहीं है ।
जब यवन हूण आदि म्लेच्छों के आक्रमण भारत में हुए जो अपने देश के संस्कार अपने साथ लाये थे तो अस्पृश्यता के अस्त्र का प्रयोग सबसे पहले उन्हीं पर हुआ । मुस्लिम आक्रमण के बाद तो ब्राह्मणों ने उनका तिरस्कार कर दिया । होंगे आप विजेता तो राज कीजिये हमारे मुल्क पर , पर दिलों पर राज नहीं कर पायेंगे । तुम्हारा छुआ पानी तक नहीं पियेंगे । समाज की सभी जातियों ने अपनी जाति के बंधन और दृढ़ कर लिये । मुसलमानों के आठ सौ साल के शासन के बावजूद ब्राह्मणों ने अपनी पवित्रता को बचा कर रखा । वेदों पुराणों और उनिषदों को बचा कर रखा । लेकिन इसके कारण घृणित अस्पृश्यता का जन्म हुआ जिससे मुक्ति पाने के लिये एक अलग आंदोलन चलाने की आवश्यकता पड़ी ।

मित्रों से निवेदन है कि यह विशुद्ध अकाडमिक चिंतन है । समाज की समास्यायों को उनकी सींग पकड़ चुनौती देनी होती है । कपड़े से कोढ़ नहीं छुपता । कारण विवेचन और निवारण का एक क्रम होता है । कृपया स्वस्थ विमर्श करें ।

राजकमल गोस्वामी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *