इतिहास

भारत का इतिहास : वैदिक काल- 1500–500 ई.पू : आर्यो का आगमन काल : पार्ट 7

वैदिक काल
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सिंधु सभ्यता के पतन के बाद जो नवीन संस्कृति प्रकाश में आयी उसके विषय में हमें सम्पूर्ण जानकारी वेदों से मिलती है। इसलिए इस काल को हम ‘वैदिक काल’ अथवा वैदिक सभ्यता के नाम से जानते हैं। चूँकि इस संस्कृति के प्रवर्तक आर्य लोग थे इसलिए कभी-कभी आर्य सभ्यता का नाम भी दिया जाता है। यहाँ आर्य शब्द का अर्थ- श्रेष्ठ, उदात्त, अभिजात्य, कुलीन, उत्कृष्ट, स्वतंत्र आदि हैं। यह काल 1500 ई.पू. से 600 ई.पू. तक अस्तित्व में रहा।

ऋग्वैदिक काल 1500-1000 ई.पू.
स्रोत- ऋग्वैदिक काल के अध्ययन के लिए दो प्रकार के साक्ष्य उपलब्ध हैं-

– पुरातात्विक साक्ष्य
– साहित्यिक साक्ष्य

पुरातात्विक साक्ष्य
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इसके अंतर्गत निम्नलिखित साक्ष्य उपलब्ध प्राप्त हुए हैं-

चित्रित धूसर मृदभाण्ड
खुदाई में हरियाणा के पास भगवान पुरा में मिले 13 कमरों वाला मकान तथा पंजाब में भी प्राप्त तीन ऐसे स्थल जिनका सम्बन्ध ऋग्वैदिक काल से जोड़ा जाता है।

बोगाज-कोई अभिलेख / मितल्पी अभिलेख (1400 ई.पू- इस लेख में हित्ती राजा शुब्विलुलियुम और मित्तान्नी राजा मत्तिउआजा के मध्य हुई संधि के साक्षी के रूप में वैदिक देवता इन्द्र, मित्र, वरुण और नासत्य का उल्लेख है।

साहित्यिक साक्ष्य
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ऋग्वेद में 10 मण्डल एवं 1028 मण्डल सूक्त है। पहला एवं दसवाँ मण्डल बाद में जोड़ा गया है जबकि दूसरा से 7वाँ मण्डल पुराना है।

आर्यो का आगमन काल
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आर्यो के आगमन के विषय में विद्धानों में मतभेद है। विक्टरनित्ज ने आर्यो के आगमन की तिथि के 2500 ई. निर्धारित की है जबकि बालगंगाधर तिलक ने इसकी तिथि 6000 ई.पू. निर्धारित की है। मैक्समूलर के अनुसार इनके आगमन की तिथि 1500 ई.पू. है। आर्यो के मूल निवास के सन्दर्भ में सर्वाधिक प्रमाणिक मत आल्पस पर्व के पूर्वी भाग में स्थित यूरेशिया का है। वर्तमान समय में मैक्सूमूलन ने मत स्वीकार्य हैं।

आर्यो के क़बीले
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डॉ. जैकोबी के अनुसार आर्यो ने भारत में कई बार आक्रमण किया और उनकी एक से अधिक शाखाएं भारत में आयी। सबसे महत्त्वपूर्ण कबीला भारत था। इसके शासक वर्ग का नाम त्रित्सु था। संभवतः सृजन और क्रीवी कबीले भी उनसे सम्बद्ध थे। ऋग्वेद में आर्यो के जिन पांच कबीलों का उल्लेख है उनमें- पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रुह्म प्रमुख थे। ये पंचयन के नाम से जाने जाते थे। चदु और तुर्वस को दास कहा जाता था। यदु और तुर्वश के विषय में ऐसा माना जाता था कि इन्द्र उन्हे बाद में लाए थे। यह ज्ञात होता है कि सरस्वती दृषद्वती एवं आपया नदी के किनारे भरत कबीले ने अग्नि की पूजा की।

आर्यो का भौगोलिक क्षेत्र
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भारत में आर्यो का आगमन 1500 ई.पू. से कुछ पहले हुआ। भारत में उन्होंने सर्वप्रथम सप्त सैन्धव प्रदेश में बसना प्रारम्भ किया। इस प्रदेश में बहने वाली सात नदियों का ज़िक्र हमें ऋग्वेद से मिलता है। ये हैं सिंधु, सरस्वती, शतुद्रि (सतलुज) विपशा (व्यास), परुष्णी (रावी), वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चिनाब) आदि।

कुछ अफ़ग़ानिस्तान की नदियों का ज़िक्र भी हमें ऋग्वेद से मिलता है। ये हैं- कुभा (काबुल नदी), क्रुभु (कुर्रम), गोमती (गोमल) एवं सुवास्तु (स्वात) आदि। इससे यह पता चलता है कि अफ़ग़ानिस्तान भी उस समय भारत का ही एक अंग था। हिमालय पर्वत का स्पष्ट उल्लेख हुआ है। हिमालय की एक चोटी को मूजदन्त कहा गया है जो सोम के लिए प्रसिद्व थी। इस प्रकार आर्य हिमालय से परिचत थे। आर्यों ने अगले पड़ाव के रूप में कुरूक्षेत्र के निकट के प्रदेशों पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम ‘ब्रह्मवर्त’ (आर्यावर्त) रखा। ब्रह्मवर्त से आगे बढ़कर आर्यो ने गंगा-यमुना के दोआब क्षेत्र एवं उसके नजदीक के क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम ब्रह्मर्षि देश रखा। इसके बाद हिमालय एवं विन्ध्यांचल पर्वतों के बीच के क्षेत्र पर क़ब्ज़ा कर उस क्षेत्र का नाम ‘मध्य प्रदेश’ रखा। अन्त में बंगाल एवं बिहार के दक्षिण एवं पूर्वी भागों पर क़ब्ज़ा कर समूचे उत्तर भारत पर अधिकार कर लिया, कालान्तर में इस क्षेत्र का नाम ‘आर्यावत’ रखा गया। मनुस्मृति में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच के प्रदेश को ब्रह्मवर्त पुकारा गया।

समुद्र- ऋग्वेद में समुद्र की चर्चा हुई है और भुज्य की नौका दुर्घटना वाली कहानी में जलयात्रा पर प्रकाश पड़ता है। वैदिक तौल की ईकाई मन एवं वेबीलोन की इकाई मन में समानता से भी समुद्र यात्रा पर पड़ता है। ऋग्वेद के दो मन्त्रों (9वें ओर 10वें मण्डल के) में चार समुद्रों का उल्लेख है।

पर्वत – ऋग्वैदिक आर्य हिमालय पहाड़ से परिचित थे। परन्तु विन्ध्य या सतपुड़ा से परिचित नहीं थें। कुछ महत्त्वपूर्ण चोटियों की चर्चा है, यथा जैसे हिमवंत, मंजदंत, शर्पणावन्, आर्जीक तथा सुषोम।

मरुस्थल- ऋग्वेद में मरुस्थल के लिए धन्व शब्द आया है। आर्यो को सम्भवतः मरुस्थल का ज्ञात था, क्योंकि इस बात की चर्चा की जाती है कि पर्जन्य ने मरुस्थल को पर करने योग्य बनाया।

क्षेत्र- प्रारम्भिक वैदिक साहित्य में केवल एक क्षेत्र ‘गांधारि’ की चर्चा है। इसकी पहचान आधुनिक पेशावर एवं रावलपिण्डी ज़िलों से की गई है।


ऋग्वेद में नदियों का उल्लेख
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ऋग्वेद में 25 नदियों का उल्लेख है, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण नदी सिन्धु नदी है, जिसका वर्णन कई बार आया है। यह सप्त सैन्धव क्षेत्र की पश्चिमी सीमा थी। क्रुमु (कुरुम),गोमती (गोमल), कुभा (काबुल) और सुवास्तु (स्वात) नामक नदियां पश्चिम किनारे में सिन्धु की सहायक नदी थीं। पूर्वी किनारे पर सिन्धु की सहायक नदियों में वितास्ता (झेलम) आस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), शतुद्र (सतलज), विपासा (व्यास) प्रमुख थी। विपास (व्यास) नदी के तट पर ही इन्द्र ने उषा को पराजित किया और उसके रथ को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। सिन्धु नदी को उसके आर्थिक महत्व के कारण हिरण्यनी कहा गया है। सिन्धु नदी द्वार ऊनी वस्त्रों के व्यवसाय होने का कारण इसे सुवासा और ऊर्पावर्ती भी कहा गया है। ऋग्वेद में सिन्धु नदी की चर्चा सर्वाधिक बार हुई है।

आर्यो का संघर्ष
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आर्यो का संघर्ष गैरिक मृदभांण्ड एवं लाल और काले मृदभाण्ड वाले लोगों से हुआ।

आर्य निम्नलिखित कारणों से विजयी होते रहे।

– घोड़े चलित रथ
– काँसे के अच्छे उपकरण
– कवच (वर्म)

आर्य सम्भवतः विशिष्ट प्रकार के दुर्ग का प्रयोग करते थे। इसे पुर कहा जाता था। वे धनुष-वाण का प्रयोग करते थे। प्रायः दो प्रकार के बाणों में एक विषाक्त एवं सींग के सिरा (मुख) वाला तथा दूसरा ताँबा के मुख वाला होता था। इसके अतिरिक्त बरछी, भाला, फरसा और तलवार का प्रयोग भी करते थे। पुरचष्णि शब्द का अर्थ था- दुर्गों को गिराने वाला।

दास एवं दस्यु आर्यो के शस्त्रु थे। दस्यु को अनसा (चपटी नाक वाला), अकर्मन (वैदिक कर्मो में विश्वास न करने वाला) एवं शिश्नदेवा (लिंगपूजक) कहा जाता था। पुरु नामक कबीला त्रास दस्यु के नाम से जाना जाता था।

भरत जन को विश्वामित्र का सहयोग प्राप्त था। इसी सहयोग के बल पर उसने व्यास एवं शुतुद्री को जीता। किन्तु शीघ्र ही भरतों ने वशिष्ठ को अपना गुरु मान लिया। अतः क्रुध होकर विश्वामित्र ने भरत जन के विरोधियों को समर्थन दिया। परुष्णी नदी के किनारे 10 राजाओं का युद्ध हुआ। इसमें भरत के विरोध में पाँच आर्य एवं पाँच अनार्य कबीले मिलकर संघर्ष कर रहे थे। आर्यो के पाँच कबीले थे – पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म, और अनु। पाँच अनार्य कबीले थे- अलिन, पक्थ, भलानस, विसाणिन और शिव। इसमें भरत राजा सुदास की विजय हुई। दश राजाओं का युद्ध पश्चिमोत्तर प्रदेश में बसे हुए पूर्वकालीन जल तथा ब्रह्मवर्त के उत्तर कालीन आर्यो के बीच उत्तराधिकार के प्रश्न पर लड़ा गया था।


ऋग्वेद में क़रीब 25 नदियों का उल्लेख मिलता है जिनमे महत्त्वपूर्ण नदी सिंधु का वर्णन कई बार आया है। उनके द्वारा उल्लिखित दूसरी नदी है सरस्वती जो अब राजस्थान के रेगिस्तान में तिरोहित हो गयी है। इसकी जगह अब घग्घर नदी बहती है। ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘नदीतमा’ (नदियों में प्रमुख) कहा गया है। इसके अतिरिक्त गंगा का ऋग्वेद में एक बार एवं यमुना का तीन बार ज़िक्र आया है। ऋग्वेद में केवल हिमालय पर्वत एवं इसकी चोटी मोजवंत का उल्लेख मिलता है।

राजनीतिक व्यवस्था
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सर्वप्रथम जब आर्य भारत में आये तो उनका यहाँ के दास अथवा दस्यु कहे जाने वाले पाँच लोगों से संघर्ष, अन्ततः आर्यो को विजय मिली। ऋग्वेद में आर्यो के पांच कबीले के होने की वजह से पंचजन्य कहा गया। ये थे पुरु, यदु, तुर्वश, द्रुह्म और अनु। भरत, क्रिव एवं त्रित्सु आर्य शासक वंश के थे। भरत कुल के नाम से ही इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। इनके पुरोहित थे वशिष्ठ। कालान्तर में भरत वंश के राजा सुदास तथा अन्य दस जनों, पुरु, यदु, तुर्वश, अनु, द्रह्म अकिन, पक्थ, भलानस, विषणिन और शिव के मध्य दाशराज्ञ यु़द्ध परुष्णी (रावी) नदी के किनारे लड़ा गया जिसमें सुदास को विजय मिली। कुछ समय पश्चात् पराजित राजा पुरु और भरत के बीच मैत्री सम्बन्ध स्थापित होने से एक नवीन कुरु वंश की स्थापना की गयी।

प्रशासनिक इकाई
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ऋग्वैदिक काल में प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल या गृह था। उसके ऊपर ग्राम था। उसके ऊपर विश था। सबसे ऊपर जन होता था। ऋग्वेद में जन शब्द का उल्लेख 275 बार हुआ है, जबकि जनपथ शब्द का उल्लेख एक बार भी नहीं हुआ है। विश शब्द का उल्लेख 170 बार हुआ है।

ऋग्वैदिक भारत का राजनीतिक ढाँचा आरोही क्रम में- कुल > ग्राम > विशस > जन > राष्ट्र
इसमें कुल सबसे छोटी इकाई थी । कुल का मुखिया कुलप था। ग्राम का शासन ग्रामणी देखता था। विश ग्राम से बड़ी प्रशासनिक ईकाई थी। इसका शासक विश्पति कहा जाता था। जन काबीलाई संगठन था। इनका शासन प्रमुख पुरोहित हुआ करता था। इन्हीं के नाम पर आगे जनपद बने। राष्ट्र शासन की सबसे बड़ी ईकाई थी। इसका शासक राजा होता था।

न्याय व्यवस्था
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न्याय व्यवस्था धर्म पर आधारित होती थी। राजा क़ानूनी सलाहकारों तथा पुरोहित की सहायता से न्याय करता था। चोरी, डकैती, राहजनी, आदि अनेक अपराधों का उल्लेख मिलता है। इसमें पशुओं की चोरी सबसे अधिक होती थी जिसे पणि लोग करते थे। इनके अधिकांश युद्ध गाय को लेकर हुए हैं। ऋग्वेद में युद्ध का पर्याय गाविष्ठ (गाय का अन्वेषण) है। मुत्यु दंड की प्रथा नहीं थी। अपराधियों को शरीरदण्ड तथा जुर्माने की सज़ा दी जाती थी। वेरदेय (बदला चुकाने की प्रथा) का प्रचलन था। एक व्यक्ति को शतदाय कहा जाता था क्योंकि उसके जान की कीमत 100 गाय थी। हत्या का दण्ड द्रव्य के रूप में दिया जाता था। सूद का भुगतान वस्तु के ऊपर में किया जाता था। दिवालिए को ऋणदाता का दास बनाया जाता था। पुत्र सम्पत्ति का अधिकारी होता था।

सामाजिक जीवन
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ऋग्वैदिक समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल होती थी। ऋग्वेद में ‘कुल’ शब्द का उल्लेख नहीं है। परिवार के लिए ‘गृह’ शब्द का प्रयुक्त हुआ है। कई परिवार मिलकर ग्राम या गोत्र तथा कई ग्राम मिलकर विश का निर्माण एवं कई विश मिलकर जन का निर्माण करते थे। ऋग्वेद में जन शब्द लगभग 275 तथा विश शब्द 170 बार प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वैदिक समाज पितृसत्तात्मक समाज था। पिता ही परिवार का मुखिया होता था। ऋग्वेद के कुछ उल्लेखों से पिता के असीमित अधिकारों की पुष्टि होती है। ऋजाश्व के उल्लेख से पता चलता है कि उसके पिता ने एक मादा भेड़ के लिए सौ भेड़ों का वध कर देने के कारण उसे अन्धा बना दिया था। वरूणसूक्त के शुनः शेष के आख्यान से ज्ञात होता है कि पिता अपनी सन्तान को बेच सकता था। किन्तु उद्धरणों से यह तात्पर्य कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि पिता-पुत्र के संबंध कटुतापूर्ण थे। इसे अपवादस्वरूप ही समझा जाना चाहिए। पुत्र प्राप्ति हेतु देवताओं से कामना की जाती थी और परिवार संयुक्त होता था।

आर्थिक जीवन
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ऋग्वेद में आर्यो के मुख्य व्यवसाय के रूप में पशुपालन एवं कृषि का विवरण मिलता है जबकि पूर्व वैदिक आर्यो ने पशुपालन को ही अपना मुख्य व्यवसाय बनाया था। ऋग्वैदिक सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस वेद में ‘गव्य एवं गव्यति शब्द चारागाह के लिए प्रयुक्त है। इस काल में गाय का प्रयोग मुद्रा के रूप मे भी होता था। अवि (भेड़), अजा (बकरी) का ऋग्वेद में अनेक बार ज़िक्र हुआ है। हाथी, बाघ, बतख,गिद्ध से आर्य लोग अपरिचित थे। धनी व्यक्ति को गोपत कहा गया था। राजा को गोपति कहा जाता था युद्ध के लिए गविष्ट, गेसू, गव्य ओर गम्य शब्द प्रचलित थे। समय की माप के लिए गोधुल शब्द का प्रयोग किया जाता था। दूरी का मान के लिए गवयतु।

कृषि
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ऋग्वैदिक काल में राजा भूमि का स्वामी नहीं होता था। वह विशेष रूप से युद्धकालीन स्वामी होता था। ऋग्वेद में दो प्रकार के सिंचाई का उल्लेख है-

खनित्रिमा (खोदकर प्राप्त किया गया जल)
स्वयंजा (प्राकृतिक जल)

धर्म
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वैदिक धर्म पूर्णतः प्रतिमार्गी हैं वैदिक देवताओं में पुरुष भाव की प्रधानता है। अधिकांश देवताओं की अराधना मानव के रूप में की जाती थी किन्तु कुछ देवताओं की अराधना पशु के रुप में की जाती थी। अज एकपाद और अहितर्बुध्न्य दोनों देवताओं परिकल्पना पशु के रूप में की गई है। मरुतों की माता की परिकल्पना चितकबरी गाय के रूप में की गई है। इन्द्र की गाय खोजने वाला सरमा (कुत्तिया) स्वान के रूप में है। इसके अतिरिक्त इन्द्र क कल्पना वृषभ (बैल) के रूप में एवं सूर्य को अश्व के रूप में की गई है। ऋग्वेद में पशुओं के पूजा प्रचलन नहीं था। ऋग्वैदिक देवताओं में किसी प्रकार का उँच-नीच का भेदभाव नहीं था। वैदिक ऋषियों ने सभी देवताओं की महिमा गाई है। ऋग्वैदिक लोगों ने प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया है। इस समय ‘बहुदेववाद’ का प्रचलन था। ऋग्वैदिक आर्यो की देवमण्डली तीन भागों में विभाजित थी।

आकाश के देवता – सूर्य, द्यौस, वरुण, मित्र, पूषन्, विष्णु, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत्, आदिंत्यगग, अश्विनद्वय आदि।
अन्तरिक्ष के देवता- इन्द्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एकपाद, आप, अहिर्बुघ्न्य।
पृथ्वी के देवता- अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति, तथा नदियां।


इस देव समूह में सर्वप्रधान देवता कौन था, यह निर्धारित करना कठिन है ऋग्वैदिक ऋषियों ने जिस समय जिस देवता की स्तुति की उसे ही सर्वोच्च मानकर उसमें सम्पूर्ण गुणों का अरोपण कर दिया। मैक्स मूलर ने इस प्रवृत्ति की ‘हीनाथीज्म’ कहा है। सूक्तों की संख्या की दृष्टि यह मानना न्यायसंगत होगा कि इनका सर्वप्रधान देवता इन्द्र था।

ऋग्वेद में अन्तरिक्ष स्थानीय ‘इन्द्र’ का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में किया गया है, ऋग्वेद के क़रीब 250 सूक्तों में इनका वर्णन है। इन्हे वर्षा का देवता माना जाता था। उन्होंने वृक्ष राक्षस को मारा था इसीलिए उन्हे वृत्रहन कहा जाता है। अनेक किलों को नष्ट कर दिया था, इस रूप में वे पुरन्दर कहे जाते हैं। इन्द्र ने वृत्र की हत्या करके जल का मुक्त करते हैं इसलिए उन्हे पुर्मिद कहा गया। इन्द्र के लिए एक विशेषण अन्सुजीत (पानी को जीतने वाला) भी आता है। इन्द्र के पिता द्योंस हैं अग्नि उसका यमज भाई है और मरुत उसका सहयोगी है। विष्णु के वृत्र के वध में इन्द्र की सहायता की थी। ऋग्वेद में इन्द्र को समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। उसका प्रिय आयुद्ध बज्र है इसलिए उन्हे ब्रजबाहू भी कहा गया है। इन्द्र कुशल रथ-योद्धा (रथेष्ठ), महान् विजेता (विजेन्द्र) और सोम का पालन करने वाला (सोमपा) है। इन्द्र तूफ़ान और मेध के भी देवता है । एक शक्तिशाली देवता होने के कारण इन्द्र का शतक्रतु (एक सौ शक्ति धारण करने वाला) कहा गया है वृत्र का वध करने का कारण वृत्रहन और मधवन (दानशील) के रूप में जाना जाता है। उनकी पत्नी इन्द्राणी अथवा शची (ऊर्जा) हैं प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में इन्द्र के साथ कृष्ण के विरोध का उल्लेख मिलता है।

ऋग्वेद में दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता ‘अग्नि’ था, जिसका काम था मनुष्य और देवता के मध्य मध्यस्थ की भूमिका निभाना। अग्नि के द्वारा ही देवताओं आहुतियाँ दी जाती थीं। ऋग्वेद में क़रीब 200 सूक्तों में अग्नि का ज़िक्र किया गया है। वे पुरोहितों के भी देवता थे। उनका मूल निवास स्वर्ग है। किन्तु मातरिश्वन (देवता) न उसे पृथ्वी पर लाया। पृथ्वी पर यज्ञ वेदी में अग्नि की स्थापना भृगुओं एवं अंगीरसों ने की। इस कार्य के कारण उन्हें ‘अथर्वन’ कहा गया है। वह प्रत्येक घर में प्रज्वलित होती थी इस कारण उसे प्रत्येक घर का अतिथि माना गया है। इसकी अन्य उपधियाँ जातदेवस् (चर-अचर का ज्ञात होने के कारण), भुवनचक्षु (सर्वद्रष्टा होने के कारण), हिरन्यदंत (सुरहरे दाँव वाला) अथर्ववेद में इसे प्रातः काल उचित होने वाला मित्र और सांयकाल को वरुण कहा गया है। तीसरा स्थान वरुण का माना जाता है, जिसे समुद्र का देवता, विश्व के नियामक और शासक सत्य का प्रतीक, ऋतु परिवर्तन एवं दिन-रात का कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य का निर्माता के रूप में जाना जाता है। ईरान में इन्हे ‘अहुरमज्द’ तथा यूनान में ‘यूरेनस’ के नाम से जाना जाता है। ये ऋतु के संरक्षक थे इसलिए इन्हे ऋतस्यगोप भी कहा जाता था। वरुण के साथ मित्र का भी उल्लेख है इन दोनों को मिलाकर मित्र वरूण कहते हैं। ऋग्वेद के मित्र और वरुण के साथ आप का भी उल्लेख किया गया है। आप का अर्थ जल होता है। ऋग्वेद के मित्र और वरुण का सहस्र स्तम्भों वाले भवन में निवास करने का उल्लेख मिलता है। मित्र के अतिरिक्त वरुण के साथ आप का भी उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद मे वरुण को वायु का सांस कहा गया है। वरुण देव लोक में सभी सितारों का मार्ग निर्धारित करते हैं। इन्हे असुर भी कहा जाता हैं। इनकी स्तुति लगभग 30 सूक्तियों में की गयी है। देवताओं के तीन वर्गो (पृथ्वी स्थान, वायु स्थान और आकाश स्थान) में वरुण का सर्वोच्च स्थान है। वे देवताओं के देवता है। ऋग्वेद का 7 वाँ मण्डल वरुण देवता को समर्पित है। दण्ड के रूप में लोगों को ‘जलोदर रोग’ से पीड़ित करते थे।

वैदिक काल या वैदिक सभ्‍यता

वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक काल खंड है. उस दौरान वेदों की रचना हुई थी. हड़प्पा संस्कृति के पतन के बाद भारत में एक नई सभ्यता का आविर्भाव हुआ. इस सभ्यता की जानकारी के स्रोत वेदों के आधार पर इसे वैदिक सभ्यता का नाम दिया गया.

 वैदिक काल में वेदों की रचना हुई थी

वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक काल खंड है. उस दौरान वेदों की रचना हुई थी. हड़प्पा संस्कृति के पतन के बाद भारत में एक नई सभ्यता का आविर्भाव हुआ. इस सभ्यता की जानकारी के स्रोत वेदों के आधार पर इसे वैदिक सभ्यता का नाम दिया गया.

(1) वैदिक काल का विभाजन दो भागों ऋग्वैदिक काल- 1500-1000 ई. पू. और उत्तर वैदिक काल- 1000-600 ई. पू. में किया गया है.

(2) आर्य सर्वप्रथम पंजाब और अफगानिस्तान में बसे थे. मैक्समूलर ने आर्यों का निवास स्थान मध्य एशिया को माना है. आर्यों द्वारा निर्मित सभ्यता ही वैदिक सभ्यता कहलाई है.

(3) आर्यों द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी.

(4) आर्यों की भाषा संस्कृत थी.

(5) आर्यों की प्रशासनिक इकाई इन पांच भागों में बंटी थी: (i) कुल (ii) ग्राम (iii) विश (iv) जन (iv) राष्ट्र.

(6) वैदिक काल में राजतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी.

(7) ग्राम के मुखिया ग्रामीणी और विश का प्रधान विशपति कहलाता था. जन के शासक को राजन कहा जाता था. राज्याधिकारियों में पुरोहित और सेनानी प्रमुख थे.

(8) शासन का प्रमुख राजा होता था. राजा वंशानुगत तो होता था लेकिन जनता उसे हटा सकती थी. वह क्षेत्र विशेष का नहीं बल्कि जन विशेष का प्रधान होता था.

(9) राजा युद्ध का नेतृत्वकर्ता था. उसे कर वसूलने का अधिकार नहीं था. जनता अपनी इच्‍छा से जो देती थी, राजा उसी से खर्च चलाता था.

(10) राजा का प्रशासनिक सहयोग पुरोहित और सेनानी 12 रत्निन करते थे. चारागाह के प्रधान को वाज्रपति और लड़ाकू दलों के प्रधान को ग्रामिणी कहा जाता था.

(11) 12 रत्निन इस प्रकार थे: पुरोहित- राजा का प्रमुख परामर्शदाता, सेनानी- सेना का प्रमुख, ग्रामीण- ग्राम का सैनिक पदाधिकारी, महिषी- राजा की पत्नी, सूत- राजा का सारथी, क्षत्रि- प्रतिहार, संग्रहित- कोषाध्यक्ष, भागदुध- कर एकत्र करने वाला अधिकारी, अक्षवाप- लेखाधिकारी, गोविकृत- वन का अधिकारी, पालागल- राजा का मित्र.

(12) पुरूप, दुर्गपति और स्पर्श, जनता की गतिविधियों को देखने वाले गुप्तचर होते थे.

(13) वाजपति-गोचर भूमि का अधिकारी होता था.

(14) उग्र-अपराधियों को पकड़ने का कार्य करता था.

(15) सभा और समिति राजा को सलाह देने वाली संस्था थी.

(16) सभा श्रेष्ठ और संभ्रात लोगों की संस्था थी, जबकि समिति सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व करती थी और विदथ सबसे प्राचीन संस्था थी. ऋग्वेद में सबसे ज्यादा विदथ का 122 बार जिक्र हुआ है.

(17) विदथ में स्त्री और पुरूष दोनों सम्मलित होते थे. नववधुओं का स्वागत, धार्मिक अनुष्ठान जैसे सामाजिक कार्य विदथ में होते थे.

(18) अथर्ववेद में सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियां कहा गया है. समिति का महत्वपूर्ण कार्य राजा का चुनाव करना था. समिति का प्रधान ईशान या पति कहलाता था.

(19) अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग विशेषज्ञ थे. होत्री- ऋग्वेद का पाठ करने वाला, उदगात्री- सामवेद की रिचाओं का गान करने वाला, अध्वर्यु- यजुर्वेद का पाठ करने वाला और रिवींध- संपूर्ण यज्ञों की देख-रेख करने वाला.

(20) युद्ध में कबीले का नेतृत्व राजा करता था, युद्ध के गविष्ठ शब्द का इस्तेमाल किया जाता था जिसका अर्थ होता है गायों की खोज.

(21) दसराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद के सातवें मंडल में है, यह युद्ध रावी नदी के तट पर सुदास और दस जनों के बीच लड़ा गया था. जिसमें सुदास जीते थे.

(22) ऋग्वैदिक समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र में विभाजित था. यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था. ऋग्वेद के 10वें मंडल में कहा गया है कि ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जांघों से और शुद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए हैं.

(23) एक और वर्ग ‘ पणियों ‘ का था जो धनि थे और व्यापार करते थे.

(24) भिखारियों और कृषि दासों का अस्तित्व नहीं था. संपत्ति की इकाई गाय थी जो विनिमय का माध्यम भी थी. सारथी और बढ़ई समुदाय को विशेष सम्मान प्राप्त था.

(25) आर्यों का समाज पितृप्रधान था. समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार थी जिसका मुखिया पिता होता था जिसे कुलप कहते थे.

(26) महिलाएं इस काल में अपने पति के साथ यज्ञ कार्य में भाग लेती थीं.

(27) बाल विवाह और पर्दाप्रथा का प्रचलन इस काल में नहीं था.

(28) विधवा अपने पति के छोटे भाई से विवाह कर सकती थी. विधवा विवाह, महिलाओं का उपनयन संस्कार, नियोग गन्धर्व और अंतर्जातीय विवाह प्रचलित था.

(29) महिलाएं पढ़ाई कर सकती थीं. ऋग्वेद में घोषा, अपाला, विश्वास जैसी विदुषी महिलाओं को वर्णन है.

(30) जीवन भर अविवाहित रहने वाली महिला को अमाजू कहा जाता था.

(31) आर्यों का मुख्य पेय सोमरस था. जो वनस्पति से बनाया जाता था.

(32) आर्य तीन तरह के कपड़ों का इस्तेमाल करते थे. (i) वास (ii) अधिवास (iii) उष्षणीय (iv) अंदर पहनने वाले कपड़ों को निवि कहा जाता था.
संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ आर्यों के मनोरंजन के साधन थे.

(33) आर्यों का मुख्य व्यवसाय खेती और पशुपालन था.

(34) गाय को न मारे जाने पशु की श्रेणी में रखा गया था.

(35) गाय की हत्या करने वाले या उसे घायल करने वाले के खिलाफ मृत्युदंड या देश निकाला की सजा थी.

(36) आर्यों का प्रिय पशु घोड़ा और प्रिय देवता इंद्र थे.

(37) आर्यों द्वारा खोजी गई धातु लोहा थी.

(38) व्यापार के दूर-दूर जाने वाले व्यक्ति को पणि कहा जाता था.

(39) लेन-देन में वस्तु-विनिमय प्रणाली मौजूद थी.

(40) ऋण देकर ब्याज देने वाले को सूदखोर कहा जाता था.

(41) सभी नदियों में सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र नदी मानी जाती थी.

(42) उत्तरवैदिक काल में प्रजापति प्रिय देवता बन गए थे.

(43) उत्तरवैदिक काल में वर्ण व्यवसाय की बजाय जन्म के आधार पर निर्धारित होते थे.

(44) उत्तरवैदिक काल में हल को सीरा और हल रेखा को सीता कहा जाता था.

(45) उत्तरवैदिक काल में निष्क और शतमान मु्द्रा की इकाइयां थीं.

(46) सांख्य दर्शन भारत के सभी दर्शनों में सबसे पुराना था. इसके अनुसार मूल तत्व 25 हैं, जिनमें पहला तत्व प्रकृति है.

(47) सत्यमेव जयते, मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है.

(48) गायत्री मंत्र सविता नामक देवता को संबोधित है जिसका संबंध ऋग्वेद से है.

(49) उत्तर वैदिक काल में कौशांबी नगर में पहली बार पक्की ईंटों का इस्तेमाल हुआ था.

(50) महाकाव्य दो हैं- महाभारत और रामायण.

(51) महाभारत का पुराना नाम जयसंहिता है यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है.

(52) सर्वप्रथम ‘जाबालोपनिषद ‘ में चारों आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम का उल्लेख मिलता है.

(53) गोत्र नामक संस्था का जन्म उत्तर वैदिक काल में हुआ.

(54) ऋग्वेद में धातुओं में सबसे पहले तांबे या कांसे का जिक्र किया गया है. वे सोना और चांदी से भी परिचित थे. लेकिन ऋग्वेद में लोहे का जिक्र नहीं है.
दिशा


वैदिक काल में लोग कैसे अपना नेता या प्रधानमंत्री चुनते थे

वैदिक राज्य व्यवस्थान में राजतंत्र न होकर गणतांत्रिक व्यवस्था थी। कहना चाहिए कि लोकतंत्र की धारणा वैदिक युग की ही देन है। लोकतंत्र की अवधारणा वेदों की देन है। गणतंत्र शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में चालीस बार, अथर्व वेद में 9 बार और ब्राह्माण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है।

महाभारत में भी लोकतंत्र के इसके सूत्र मिलते हैं। महाभारत के बाद बौद्धकाल में (450 ई.पू. से 350 ई.) में भी चर्चित गणराज्य थे। जैसे पिप्पली वन के मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु के शाक्य, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी का नाम प्रमुख रूप से लिया जा सकता है। इसके बाद अटल, अराट, मालव और मिसोई नामक गणराज्यों का भी जिक्र किया जाता है। बौद्ध काल में वज्जी, लिच्छवी, वैशाली, बृजक, मल्लक, मदक, सोमबस्ती और कम्बोज जैसे गंणतंत्र संघ लोकतांत्रिक व्यवस्था के उदाहरण हैं। वैशाली के पहले राजा विशाल को चुनाव द्वारा चुना गया था। वैदिक युग में कैसे लोग अपना नेता या प्रधानमंत्री चुनते थे। आओ जानते हैं इस बारे में संक्षिप्त जानकारी।

सभा और समिति करती थी नेता का चयन-
ऋग्वेद में सभा और समिति का जिक्र मिलता है जिसमें राजा, मंत्री और विद्वानों से विचार-विमर्श करने के बाद ही कोई फैसला लेता था। वैदिक काल में इंद्र का चयन भी इसी आधार पर होता था। इंद्र नाम का एक पद होता था जिसे राजाओं का राजा कहा जाता था। हालांकि भारत में वैदिक काल के पतन के बाद राजतंत्रों का उदय हुआ और वे ही लंबे समय तक शासक रहे। यह संभवत: दशराज्ञा के युद्ध के बाद हुआ था। इंद्र नाम का एक पद होता था जिसे राजाओं का राजा कहा जाता था। हालांकि भारत में वैदिक काल के पतन के बाद राजतंत्रों का उदय हुआ वे ही लंबे समय तक शासक रहे थे। यह संभवत: इसके बाद तब हुआ जब दशराज्ञा का युद्ध हुआ था।

।। त्रीणि राजाना विदथें परि विश्वानि भूषथ: ।।-ऋग्वेद मं-3 सू-38-6

भावार्थ : ईश्वर उपदेश करता है कि राजा और प्रजा के पुरुष मिल के सुख प्राप्ति और विज्ञानवृद्धि कारक राज्य के संबंध रूप व्यवहार में तीन सभा अर्थात- विद्यार्य्यसभा, धर्मार्य्य सभा, राजार्य्यसभा नियत करके बहुत प्रकार के समग्र प्रजा संबंधी मनुष्यादि प्राणियों को सब ओर से विद्या, स्वतंत्रता, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।

।। तं सभा च समितिश्च सेना च ।1।- अथर्व-कां-15 अनु-2,9, मं-2
भावार्थ : उस राज धर्म को तीनों सभा संग्रामादि की व्यवस्था और सेना मिलकर पालन करें।

सब सेना और सेनापतियों के ऊपर राज्याधिकार, दंड देने की व्यवस्था के सब कार्यो का अधिपत्य और सब के उपर वर्तमान सर्वाधिकार इन चारों अधिकारों में संपूर्ण वेद शास्त्रों में प्रवीण विद्यावाले धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सुशील जनों को स्थापित करना चाहिए अर्थात मुख्य सेनापति, मुख्‍य राज्याधिकारी, मुख्य न्यायाधीश, प्रधान और राज्य ये चार सब विद्याओं में पूर्ण विद्वान होने चाहिए।।1।।- मनुस्मृति

1.सभा : धर्म संघ की धर्मसभा, शिक्षा संघ की विद्या सभा और राज्यों की राज्य सभा।
2.समिति : समिति जन साधरण की संस्था है। सभा गुरुजनों की संस्था अर्थात गुणिजनों की संस्था।
3.प्रशासन : न्याय, सैन्य, वित्त आदि ये प्रशासनिक, पदाधिकारियों, के विभागों के नाम है। जो राजा या सम्राट के अधिन है।

राजा : राजा की निरंकुशता पर लगाम लगाने के लिए ही सभा ओर समिति है जो राजा को पदस्थ और अपदस्थ कर सकती है। वैदिक काल में राजा पद पैतृक था किंतु कभी-कभी संघ द्वारा उसे हटाकर दूसरे का निर्वाचन भी किया जाता था। जो राजा निरंकुश होते थे वे अवैदिक तथा संघ के अधिन नहीं रहने वाले थे। ऐसे राजा के लिए दंड का प्रावधान होता है। राजा ही आज का प्रधान है। इति।


वैदिक सभ्यता

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पूर्व वैदिक काल
Early Vedic Culture (1700-1100 BCE)
Geographical range भारतीय उपमहाद्वीप
Period कांस्य युग भारत

उत्तर वैदिक काल
Late Vedic Culture (1100-500 BCE).png
Geographical range भारतीय उपमहाद्वीप
Period लौह युग भारत
Dates ल. 1100
Preceded by प्रारंभिक वैदिक काल
Followed by हर्यक वंश, महाजनपद

प्राचीन भारत दक्षिण एशिया तथा देवासं

सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) के पश्चात भारत में जिस नवीन सभ्यता का विकास हुआ उसे ही आर्य(Aryan) अथवा वैदिक सभ्यता(Vedic Civilization) के नाम से जाना जाता है। इस काल की जानकारी हमे मुख्यत: वेदों से प्राप्त होती है, जिसमे ऋग्वेद सर्वप्राचीन होने के कारण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वैदिक काल को ऋग्वैदिक या पूर्व वैदिक काल (1500 -1000 ई.पु.) तथा उत्तर वैदिक काल (1000 – 600 ई.पु.) में बांटा गया है।वैदिक काल, या वैदिक समय (c. 1500 – c.500 ईसा पूर्व), शहरी सिंधु घाटी सभ्यता के अंत और उत्तरी मध्य-गंगा में शुरू होने वाले एक दूसरे शहरीकरण के बीच उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में अवधि है। सादा c. 600 ई.पू. इसका नाम वेदों से मिलता है, जो इस अवधि के दौरान जीवन का विवरण देने वाले प्रख्यात ग्रंथ हैं जिन्हें ऐतिहासिक माना गया है और अवधि को समझने के लिए प्राथमिक स्रोतों का गठन किया गया है। संबंधित पुरातात्विक रिकॉर्ड के साथ ये दस्तावेज वैदिक संस्कृति के विकास का पता लगाने और अनुमान लगाने की अनुमति देते हैं।

वेदों की रचना और मौखिक रूप से एक पुरानी इंडो-आर्यन भाषा बोलने वालों द्वारा सटीक रूप से प्रेषित की गई थी, जो इस अवधि के शुरू में भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में चले गए थे। वैदिक समाज पितृसत्तात्मक और पितृसत्तात्मक था। आरंभिक वैदिक आर्य पंजाब में केंद्रित एक कांस्य युग के समाज थे, जो कि राज्यों के बजाय जनजातियों में संगठित थे, और मुख्य रूप से जीवन का एक देहाती तरीका था। चारों ओर सी। 1200–1000 ई.पू., वैदिक आर्य पूर्व में उपजाऊ पश्चिमी गंगा के मैदान में फैल गए और उन्होंने लोहे के उपकरण अपना लिए, जो जंगल को साफ करने और अधिक व्यवस्थित, कृषि जीवन को अपनाने की अनुमति देते थे। वैदिक काल के उत्तरार्ध में भारत, और कुरु साम्राज्य के रूढ़िवादी यज्ञ अनुष्ठान के लिए एक जटिल सामाजिक विभेदीकरण, शहरों, राज्यों और एक जटिल सामाजिक भेदभाव के उद्भव की विशेषता थी। इस समय के दौरान, केंद्रीय गंगा मैदान एक संबंधित लेकिन गैर-वैदिक इंडो-आर्यन संस्कृति का प्रभुत्व था। वैदिक काल के अंत में सच्चे शहरों और बड़े राज्यों (महाजनपद कहा जाता है) के उदय के साथ-साथ asramaśa आंदोलनों (जैन धर्म और बौद्ध धर्म सहित) में वृद्धि हुई, जिसने वैदिक रूढ़िवाद को चुनौती दी।

वैदिक काल में सामाजिक वर्गों के वर्णानुक्रम का उदय हुआ जो प्रभावशाली रहेगा। वैदिक धर्म यज्ञ परक था तथा इस काल की वर्ण व्यवस्था कार्यानुसार थी।

वैदिक सामग्री संस्कृति के चरणों से पहचानी जाने वाली पुरातात्विक संस्कृतियों में गेरू की कब्र संस्कृति, काले और लाल वेयर संस्कृति और चित्रित ग्रे वेयर संस्कृति में गेरू रंग की बर्तनों की संस्कृति शामिल है।

वेदों के अतिरिक्त संस्कृत के अन्य कई ग्रंथो की रचना भी 4-5 ई.पू काल में हुई थी। वेदांगसूत्रौं की रचना मन्त्र ब्राह्मणग्रंथ और उपनिषद इन वैदिकग्रन्थौं को व्यवस्थित करने मे हुआ है। अनन्तर रामायण, महाभारत,और पुराणौंकी रचना हुआ जो इस काल के ज्ञानप्रदायी स्रोत मानागया हैं। अनन्तर चार्वाक , तान्त्रिकौं ,बौद्ध और जैन धर्म का उदय भी हुआ।

इतिहासकारों का मानना है कि आर्य मुख्यतः उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में रहते थे इस कारण आर्य सभ्यता का केन्द्र मुख्यतः उत्तरी भारत था। इस काल में उत्तरी भारत (आधुनिक पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा नेपाल समेत) कई महाजनपदों में बंटा था। आर्यों का आगमन मध्य एशिया से हुआ।

नाम और देशकाल
वैदिक सभ्यता का नाम ऐसा इस लिए पड़ा कि वेद उस काल की जानकारी का प्रमुख स्रोत हैं। वेद चार है – ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद। इनमें से ऋग्वेद की रचना सबसे पहले हुई थी। ऋग्वेद में ही गायत्री मन्त्र है जो सविता(सूर्य) को समर्पित है।

ऋग्वेद के काल निर्धारण में विद्वान एकमत नहीं है। सबसे पहले मैक्स मूलर ने वेदों के काल निर्धारण का प्रयास किया। उसने बौद्ध धर्म (550 ईसा पूर्व) [3]से पीछे की ओर चलते हुए वैदिक साहित्य के तीन ग्रंथों की रचना को मनमाने ढंग से 200-200 वर्षों का समय दिया और इस तरह ऋग्वेद के रचना काल को 1200 ईसा पूर्व के करीब मान लिया पर निश्चित रूप से उसके आंकलन का कोई आधार नहीं था।

वैदिक काल को मुख्यतः दो भागों में बांटा जा सकता है- ऋग्वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल। ऋग्वैदिक काल आर्यों के आगमन के तुरंत बाद का काल था जिसमें कर्मकांड गौण थे पर उत्तरवैदिक काल में हिन्दू धर्म में कर्मकांडों की प्रमुखता बढ़ गई।

== ऋग्वैदिक काल ==(1500-1000 ई.पू.)

इस काल की तिथि निर्धारण जितनी विवादास्पद रही है उतनी ही इस काल के लोगों के बारे में सटीक जानकारी। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस समय तक केवल इसी ग्रंथ (ऋग्वेद) की रचना हुई थी। मैक्स मूलर के अनुसार आर्य का मूल निवास मध्य ऐशिया है।आर्यो द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक काल कहलाई। आर्यो द्वारा विकसित सभ्य्ता ग्रामीण सभ्यता कहलायी। आर्यों की भाषा संस्कृत थी।

मैक्स मूलर ने जब अटकलबाजी करते हुए इसे 1200 ईसा पूर्व से आरंभ होता बताया था (लेख का आरंभ देखें) उसके समकालीन विद्वान डब्ल्यू. डी. ह्विटनी ने इसकी आलोचना की थी। उसके बाद मैक्स मूलर ने स्वीकार किया था कि ” पृथ्वी पर कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो निश्चित रूप से बता सके कि वैदिक मंत्रों की रचना 1000 ईसा पूर्व में हुई थी या कि 1500 ईसापूर्व में या 2000 या 3000 “।

ऐसा माना जाता है कि आर्यों का एक समूह भारत के अतिरिक्त ईरान (फ़ारस) और यूरोप की तरफ़ भी गया था। ईरानी भाषा के प्राचीनतम ग्रंथ अवेस्ता की सूक्तियां ऋग्वेद से मिलती जुलती हैं। अगर इस भाषिक समरूपता को देखें तो ऋग्वेद का रचनाकाल 1000 ईसापूर्व आता है। लेकिन बोगाज-कोई (एशिया माईनर) में पाए गए 1400 ईसा पूर्व के अभिलेख में हिंदू देवताओं इंद, मित्रावरुण, नासत्य इत्यादि को देखते हुए इसका काल और पीछे माना जा सकता है।

बाल गंगाधर तिलक ने ज्योतिषीय गणना करके इसका काल 6000 ई.पू. माना था। हरमौन जैकोबी ने जहाँ इसे 4500 ईसापूर्व से 2500 ईसापूर्व के बीच आंका था वहीं सुप्रसिद्ध संस्कृत विद्वान विंटरनित्ज़ ने इसे 3000 ईसापूर्व का बताया था।


प्रशासन
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। एक कुल में एक घर में एक छत के नीचे रहने वाले लोग शामिल थे। परिवार के मुखिया को कुलुप कहा जाता था। एक ग्राम कई कुलों से मिलकर बना होता था। ग्रामों का संगठन विश् कहलाता था और विशों का संगठन जन। कई जन मिलकर राष्ट्र बनाते थे। ग्राम के मुखिया को ग्रामिणी, विश का प्रधान विशपति ,

जन का शासक राजन् (राजा) तथा राष्ट्र के प्रधान को सम्राट कहते थे। आर्यों की प्रशासनिक संस्थाएं काफी सशक्त अवस्था में थी। प्रारंभ में राजा का चुनाव जनता के द्वारा किया जाता था बाद में उसका पद धीरे-धीरे पैतृक होता चला गया परंतु राजा निरंकुश नहीं होता था वह जनता की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी लेता था इस सुरक्षा व्यवस्था के बदले में लोग राजा को स्वैच्छिक कर देते थे जिसे बलि कहा जाता था। ऋग्वैदिक आर्यों की दो महत्वपूर्ण राजनैतिक संस्थाएं थीं जिन्हें सभा और समिति कहा जाता था-

१.”सभा-” इसे उच्च सदन भी कहा जा सकता है यह समाज से आए हुए बुद्धिमान और अनुभवी व्यक्तियों की संस्था थी। सभा के सदस्यों को सभेय अथवा सभासद कहा जाता था और सभा का अध्यक्ष सभापति कहा जाता था सभा के सदस्यों को पितर कहा जाता था जिससे पता लगता है कि ये बुजुर्ग और अनुभवी लोग थे।

२. “समिति-” समिति आम जनमानस की संस्था थी उसके सदस्य समस्त नागरिक होते थे इसमें सामान्य विषयों पर चर्चा होती थी । उसके अध्यक्ष को ईशान कहा जाता था। प्रारंभ में समिति में स्त्रियां भी आती थी और उसमें आकर ऋक नामक गान किया करती थी। आर्यों की सबसे प्राचीन संस्था को जनसभा थी उसे “विदथ” कहा जाता था।

धर्म
ऋग्वैदिक काल में प्राकृतिक शक्तियों की ही पूजा की जाती थी और कर्मकांडों की प्रमुखता नहीं थी। ऋग्वैदिक काल धर्म की॑ अन्य विशेषताएं • क्रत्या, निऋति, यातुधान, ससरपरी आदि के रूप मे अपकरी शक्तियो अर्थात, राछसों, पिशाच एवं अप्सराओ का जिक्र दिखाई पडता है। इस समय में मूर्ति पूजन नहीं होता था और ना ही मंत्रोचार किया जाता था। कर्मकांड जैसे पूजा-पाठ, व्रत,यज्ञ आदि इस काल में नहीं होते थे।

उत्तरवैदिक काल
(१०००-६०० ई०पू०)

ऋग्वैदिक काल में आर्यों का निवास स्थान सिंधु तथा सरस्वती नदियों के बीच में था। बाद में वे सम्पूर्ण उत्तर भारत में फ़ैल चुके थे। सभ्यता का मुख्य क्षेत्र गंगा और उसकी सहायक नदियों का मैदान हो गया था। गंगा को आज भारत की सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इस काल में विश् का विस्तार होता गया और कई जन विलुप्त हो गए। भरत, त्रित्सु और तुर्वस जैसे जन् राजनीतिक हलकों से ग़ायब हो गए जबकि पुरू पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ नए राज्यों का विकास हो गया था, जैसे – काशी, कोसल, विदेह (मिथिला), मगध और अंग।

ऋग्वैदिक काल में सरस्वती नदी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ग॓गा का एक बार और यमुना नदी का उल्लेख तीन बार हुआ है। इस काल मे कौसाम्बी नगर मे॓ पहली बार पक्की ईटो का प्रयोग किया गया। इस काल मे वर्ण व्यवसाय के बजाय जन्म के आधार पे निर्धारित होने लगे।


वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य में चार वेद एवं उनकी संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदों एवं वेदांगों को शामिल किया जाता है।
वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद विश्व के प्रथम प्रमाणिक ग्रन्थ है।
वेदों को अपौरुषेय कहा गया है। गुरु द्वारा शिष्यों को मौखिक रूप से कंठस्त कराने के कारण वेदों को “श्रुति” की संज्ञा दी गई है।

ऋग्वेद
1. ऋग्वेद देवताओं की स्तुति से सम्बंधित रचनाओं का संग्रह है।

2. यह 10 मंडलों में विभक्त है। इसमे 2 से 7 तक के मंडल प्राचीनतम माने जाते हैं। प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए हैं। इसमें 1028 सूक्त हैं।

3. इसकी भाषा पद्यात्मक है।

4. ऋग्वेद में 33 प्रकार के देवों (दिव्य गुणो से युक्त पदार्थो) का उल्लेख मिलता है।

5. प्रसिद्ध गायत्री मंत्र जो सूर्य से सम्बंधित देवी गायत्री को संबोधित है, ऋग्वेद में सर्वप्रथम प्राप्त होता है।

6. ‘ असतो मा सद्गमय ‘ वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।

7. ऋग्वेद में मंत्र को कंठस्त करने में स्त्रियों के नाम भी मिलते हैं, जिनमें प्रमुख हैं- लोपामुद्रा, घोषा, शाची, पौलोमी एवं काक्षावृती आदि।

8. इसके पुरोहित के नाम होत्री है।

यजुर्वेद
यजु का अर्थ होता है यज्ञ। इसमें धनुर्यवीद्या का उल्लेख है।
इसके पाठकर्ता को अध्वर्यु कहते हैं।
यजुर्वेद वेद में यज्ञ की विधियों का वर्णन किया गया है।
इसमे मंत्रों का संकलन आनुष्ठानिक यज्ञ के समय सस्तर पाठ करने के उद्देश्य से किया गया है।
इसमे मंत्रों के साथ साथ धार्मिक अनुष्ठानों का भी विवरण है, जिसे मंत्रोच्चारण के साथ संपादित किए जाने का विधान सुझाया गया है।
यजुर्वेद की भाषा पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों है।
यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद।
कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं हैं- मैत्रायणी संहिता, काठक संहिता, कपिन्थल तथा संहिता। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- मध्यान्दीन तथा कण्व संहिता।
यह 40 अध्याय में विभाजित है।
इसी ग्रन्थ में पहली बार राजसूय तथा वाजपेय जैसे दो राजकीय समारोह का उल्लेख है।

सामवेद
सामवेद की रचना ऋग्वेद में दिए गए मंत्रों को गाने योग्य बनाने हेतु की गयी थी।

इसमे 1810 छंद हैं जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में उल्लेखित हैं।
सामवेद तीन शाखाओं में विभक्त है- कौथुम, राणायनीय और जैमनीय।
सामवेद को भारत की प्रथम संगीतात्मक पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।

ब्राह्मण
वैदिक मन्त्रों तथा संहिताओं को ब्रह्म कहा गया है। वहीं ब्रह्म के विस्तारित रुप को ब्राह्मण कहा गया है। पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेय, शतपथ, पंचविश, तैतरीय आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने मन्त्र सहित ब्राह्मण ग्रंथों की उपदेश आदित्य से प्राप्त किया है। संहिताओं के अन्तर्गत कर्मकांड की जो विधि उपदिष्ट है, ब्राह्मण मे उसी की सप्रमाण व्याख्या देखने को मिलता है। प्राचीन परम्परा में आश्रमानुरुप वेदों का पाठ करने की विधि थी अतः ब्रह्मचारी ऋचाओं ही पाठ करते थे, गृहस्थ ब्राह्मणों का, वानप्रस्थ आरण्यकों और संन्यासी उपनिषदों का। गार्हस्थ्यधर्म का मननीय वेदभाग ही ब्राह्मण है।

यह मुख्यतः गद्य शैली में उपदिष्ट है।
ब्राह्मण ग्रंथों से हमें बिम्बिसार के पूर्व की घटना का ज्ञान प्राप्त होता है।
ऐतरेय ब्राह्मण में आठ मंडल हैं और पाँच अध्याय हैं। इसे पंजिका भी कहा जाता है।
ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक के नियम प्राप्त होते हैं।
तैतरीय ब्राह्मण कृष्णयजुर्वेद का ब्राह्मण है।
शतपथ ब्राह्मण में १०० अध्याय,१४ काण्ड और ४३८ ब्राह्मण है। गान्धार, शल्य, कैकय, कुरु, पांचाल, कोसल, विदेह आदि स्थलों का भी उल्लेख होता हैशतपथवर्ती ब्राह्मण गोपथ है।

आरण्यक
आरण्यक वेदों का वह भाग है जो गृहस्थाश्रम त्याग उपरान्त वानप्रस्थ लोग जंगल में पाठ किया करते थे | इसी कारण आरण्यक नामकरण किया गया।

इसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय रहस्यवाद, प्रतीकवाद, यज्ञ और पुरोहित दर्शन है।
वर्तमान में सात अरण्यक उपलब्ध हैं।
सामवेद और अथर्ववेद का कोई आरण्यक स्पष्ट और भिन्न रूप में उपलब्ध नहीं है।


उपनिषद
उपनिषद प्राचीनतम दार्शनिक विचारों का संग्रह है। उपनिषदों में ‘वृहदारण्यक’ तथा ‘छान्दोन्य’, सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इन ग्रन्थों से बिम्बिसार के पूर्व के भारत की अवस्था जानी जा सकती है। परीक्षित, उनके पुत्र जनमेजय तथा पश्चात कालीन राजाओं का उल्लेख इन्हीं उपनिषदों में किया गया है। इन्हीं उपनिषदों से यह स्पष्ट होता है कि आर्यों का दर्शन विश्व के अन्य सभ्य देशों के दर्शन से सर्वोत्तम तथा अधिक आगे था। आर्यों के आध्यात्मिक विकास, प्राचीनतम धार्मिक अवस्था और चिन्तन के जीते-जागते जीवन्त उदाहरण इन्हीं उपनिषदों में मिलते हैं। उपनिषदों की रचना संभवतः बुद्ध के काल में हुई, क्योंकि भौतिक इच्छाओं पर सर्वप्रथम आध्यात्मिक उन्नति की महत्ता स्थापित करने का प्रयास बौद्ध और जैन धर्मों के विकास की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ।

कुल उपनिषदों की संख्या 108 है।
मुख्य रूप से शास्वत आत्मा, ब्रह्म, आत्मा-परमात्मा के बीच सम्बन्ध तथा विश्व की उत्पत्ति से सम्बंधित रहस्यवादी सिधान्तों का विवरण दिया गया है।
“सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से लिया गया है।
मैत्रायणी उपनिषद् में त्रिमूर्ति और चार्तु आश्रम सिद्धांत का उल्लेख है।

वेदांग
युगान्तर में वैदिक अध्ययन के लिए छः विधाओं (शाखाओं) का जन्म हुआ जिन्हें ‘वेदांग’ कहते हैं। वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंग, तथापि इस साहित्य के पौरूषेय होने के कारण श्रुति साहित्य से पृथक ही गिना जाता है। वेदांग को स्मृति भी कहा जाता है, क्योंकि यह मनुष्यों की कृति मानी जाती है। वेदांग सूत्र के रूप में हैं इसमें कम शब्दों में अधिक तथ्य रखने का प्रयास किया गया है।

वेदांग की संख्या 6 है

शिक्षा- स्वर ज्ञान
कल्प- धार्मिक रीति एवं पद्धति
निरुक्त- शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र
व्याकरण- व्याकरण
छंद- छंद शास्त्र
ज्योतिष- खगोल विज्ञान

सूत्र साहित्य
सूत्र साहित्य वैदिक साहित्य का अंग है तथा यह उसे समझने में सहायक भी है।

ब्रह्म सूत्र-श्री वेद व्यास ने वेदांत पर यह परमगूढ़ ग्रंथ लिखा है जिसमें परमसत्ता, परमात्मा, परमसत्य, ब्रह्मस्वरूप ईश्वर तथा उनके द्वारा सृष्टि और ब्रह्मतत्त्व वर गूढ़ विवेचना की गई है। इसका भाष्य श्रीमद् आदिशंकराचार्य जी ने भगवान व्यास जी के कहने पर लिखा था।

कल्प सूत्र- ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण। वेदों का हस्त स्थानीय वेदांग।

श्रोत सूत्र- महायज्ञ से सम्बंधित विस्तृत विधि-विधानों की व्याख्या। वेदांग कल्पसूत्र का पहला भाग।

स्मार्तसूत्र – षोडश संस्कारों का विधान करने वाला कल्प का दुसरा भाग।

शुल्बसूत्र- यज्ञ स्थल तथा अग्निवेदी के निर्माण तथा माप से सम्बंधित नियम इसमें हैं। इसमें भारतीय ज्यामिति का प्रारम्भिक रूप दिखाई देता है। कल्प का तीसरा भाग।

धर्म सूत्र- इसमें सामाजिक धार्मिक कानून तथा आचार संहिता है। कल्प का चौथा भाग

गृह्य सूत्र- परुवारिक संस्कारों, उत्सवों तथा वैयक्तिक यज्ञों से सम्बंधित विधि-विधानों की चर्चा है।


राजनीतिक स्थिति
ऋग्वैदिक काल मुख्यतः एक कबीलाई व्यवस्था वाला शासन था जिसमें सैनिक भावना प्रमुख थी। राजा को गोमत भी कहा जाता था।

वैदिक काल में राजतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी। इसमें शासन का प्रमुख राजा होता था।
राजा वंशानुगत तो होता था परन्तु जनता उसे हटा सकती थी। वह क्षेत्र विशेष का नहीं बल्कि जन विशेष का प्रधान होता था।

राजा युद्ध का नेतृत्वकर्ता था। उसे कर वसूलने का अधिकार नही था। जनता द्वारा स्वेच्छा से दिए गए भाग से उसका खर्च चलता था।

सभा, समिति तथा विदथ नामक प्रशासनिक संस्थाएं थीं।

अथर्ववेद में सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है। समिति का महत्वपूर्ण कार्य राजा का चुनाव करना था। समिति का प्रधान ईशान या पति कहलाता था। विदथ में स्त्री एवं पुरूष दोनों सम्मलित होते थे। नववधुओं का स्वागत, धार्मिक अनुष्ठान आदि सामाजिक कार्य विदथ में होते थे।

सभा श्रेष्ठ लोंगो की संस्था थी, समिति आम जनप्रतिनिधि सभा थी एवं विदथ सबसे प्राचीन संस्था थी। ऋग्वेद में सबसे ज्यादा बार उल्लेख विदथ का 122 बार हुआ है।

सैन्य संचालन वरात, गण व सर्ध नामक कबीलाई संगठन करते थे।

शतपथ ब्रह्मण के अनुसार अभिषेक होने पर राजा महँ बन जाता था। राजसूय यज्ञ करने वाले की उपाधि राजा तथा वाजपेय यज्ञ करने वाले की उपाधि सम्राट थी।

स्पर्श, गुप्तचरों को और पुरूप, दुर्गापति को कहा जाता था।

राजा का प्रशासनिक सहयोग पुरोहित एवं सेनानी आदि 12 रत्निन करते थे। चारागाह के प्रधान को वाज्रपति एवं लड़ाकू दलों के प्रधान को ग्रामिणी कहा जाता था।

12 रत्निन
पुरोहित- राजा का प्रमुख परामर्शदाता,

सेनानी- सेना का प्रमुख,

ग्रामीण- ग्राम का सैनिक पदाधिकारी,

महिषी- राजा की पत्नी,

सूत- राजा का सारथी,

क्षत्रि- प्रतिहार,

संग्रहित- कोषाध्यक्ष,

भागदुध- कर एकत्र करने वाला अधिकारी,

अक्षवाप- लेखाधिकारी,

गोविकृत- वन का अधिकारी,

पालागल- राजा का मित्र।

विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ
होत्र- ऋग्वेद का पाठ करने वाला।

उदगाता- सामवेद की रचनाओं का गान करने वाला।

अध्वर्यु- यजुर्वेद का पाठ करने व

ब्रह्मा- संपूर्ण यज्ञों की देख रेख करने वाला।


सामाजिक स्थिति
ऋग्वेद के दसवें मंडल में चार वर्णों का उल्लेख मिलता है। वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी। दसवें मंडल को परवर्ती काल माना जाता है।

समाज पितृसत्तात्मक था। संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी।

परिवार का मुखिया ‘कुलप’ कहलाता था। परिवार कुल कहलाता था। कई कुल मिलकर ग्राम, कई ग्राम मिलकर विश, कई विश मिलकर जन एवं कई जन मिलकर जनपद बनते थे। अतिथि सत्कार की परम्परा का सबसे ज्यादा महत्व था।

एक और वर्ग ‘ पणियों ‘ का था जो धनि थे और व्यापार करते थे।

भिखारियों और कृषि दासों का अस्तित्व नहीं था। संपत्ति की इकाई गाय थी जो विनिमय का माध्यम भी थी। सारथी और बढई समुदाय को विशेष सम्मान प्राप्त था।

अस्पृश्यता, सती प्रथा, परदा प्रथा, बाल विवाह आदि का प्रचलन नहीं था।

शिक्षा एवं वर चुनने का अधिकार महिलाओं को था। विधवा विवाह, महिलाओं का उपनयन संस्कार, नियोग, गन्धर्व एवं अंतर्जातीय विवाह प्रचलित था।

वस्त्राभूषण स्त्री एवं पुरूष दोनों को प्रिय थे।

जौ (यव) मुख्य अनाज था। शाकाहार का प्रचलन था। सोम रस (अम्रित जैसा) का प्रचलन था।

नृत्य, संगीत, पासा, घुड़दौड़, मल्लयुद्ध, शुइकर आदि मनोरंजन के प्रमुख साधन थे।

अपाला, घोष, मैत्रयी, विश्ववारा, गार्गी आदि विदुषी महिलाएं थीं।

ऋग्वेद में अनार्यों (मुर्ख या दस्यु) को मृद्धवाय (अस्पष्ट बोलने वाला), अवृत (नियमों- व्रतों का पालन नहीं करने वाला), बताया गया है।

सर्वप्रथम ‘जाबालोपनिषद ‘ में चारों आश्रम ब्रम्हचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रम का उल्लेख मिलता है।

आर्थिक स्थिति
अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार पशुपालन एवं कृषि था।

ज्यादा पाल्तुपशु रखने वाले गोमत कहलाते थे। चारागाह के लिए ‘ उत्यति ‘ या ‘ गव्य ‘ शब्द का प्रयोग हुआ है। दूरी को ‘ गवयुती ‘, पुत्री को दुहिता (गाय दुहने वाली) तथा युद्धों के लिए ‘ गविष्टि ‘ का प्रयोग होता था।

राजा को जनता स्वेच्छा से भाग नजराना देती थी।

आवास घास-फूस एवं काष्ठ निर्मित होते थे।

ऋण लेने एवं देने की प्रथा प्रचलित थी जिसे ‘ कुसीद ‘ कहा जाता था।

बैलगाड़ी, रथ एवं नाव यातायात के प्रमुख साधन थे।

कृषि
सर्वप्रथम शतपथ ब्राम्हण में कृषि की समस्त प्रक्रियाओं का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के प्रथम और दसम मंडलों में बुआई, जुताई, फसल की गहाई आदि का वर्णन है। ऋग्वेद में केवल यव (जौ) नामक अनाज का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के चौथे मंडल में कृषि का वर्णन है।

परवर्ती वैदिक साहित्यों में ही अन्य अनाजों जैसे- गोधूम(गेंहू), ब्रीही (चावल) आदि की चर्चा की गई है। काठक संहिता में 24 बैलों द्वारा हल खींचे जाने का, अथर्ववेद में वर्षा, कूप एवं नाहर का तथा यजुर्वेद में हल का ‘ सीर ‘ के नाम से उल्लेख है। उस काल में कृत्रिम सिंचाई की व्यवस्था भी थी।

पशुपालन
पशुओं का चारण ही उनकी आजीविका का प्रमुख साधन था। गाय ही विनिमय का प्रमुख साधन थी। ऋग्वैदिक काल में भूमिदान या व्यक्तिगत भू-स्वामित्व की धारणा विकसित नही हुई थी।

व्यापार
आरम्भ में अत्यन्त सीमित व्यापार प्रथा का प्रचलन था। व्यापार विनिमय पद्धति पर आधारित था। समाज का एक वर्ग ‘पाणी’ व्यापार किया करते थे। राजा को नियमित कर देने या भू-राजस्व देने की प्रथा नहीं थी। राजा को स्वेच्छा से भाग या नजराना दिया जाता था। पराजित कबीला भी विजयी राजा को भेंट देता था। अपने धन को राजा अपने अन्य साथियों के बीच बांटता था।

धातु एवं सिक्के : ऋग्वेद में उल्लेखित धातुओं में सर्वप्रथम धातू, अयस (ताँबा या कांसा) था। वे सोना (हिरव्य या स्वर्ण) एवं चांदी से भी परिचित थे। लेकिन ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नहीं है। ‘ निष्क ‘ संभवतः सोने का आभूषण या मुद्रा था जो विनिमय के काम में भी आता था।

उद्योग : ऋग्वैदिक काल के उद्योग घरेलु जरूरतों के पूर्ति हेतु थे। बढ़ई एवं धूकर का कार्य अत्यन्त महत्वपूर्व था। अन्य प्रमुख उद्योग वस्त्र, बर्तन, लकड़ी एवं चर्म कार्य था। स्त्रियाँ भी चटाई बनने का कार्य करतीं थीं।

धार्मिक स्थिति
आर्य एकईशवर पर विश्वास करते थे।मैक्समूलर के अनुसार आर्य हेनोथीज्म परंपरा का पालन करते थे।
यहाँ प्राकृतिक मानव के हित के लिये ईश्वर से कामना की जाती थी। वे मुख्य रूप से केवल बर्ह्मान्ड को धारण करने वाळे एकमात्र परमपिता परमेश्वर के पूजक थे। वैदिक धर्म पुरूष प्रधान धर्म था। आरम्भ में स्वर्ग या अमरत्व परिकल्पना नहीं थी।
वैदिक धर्म पुरोहितों से नियंत्रित धर्म था। पुरोहित ईश्वर एवं मानव के बीच मध्यस्थ था। मनुष्य एवं देवता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले देवता के रूप में अग्नि की पूजा की जाती थी। वैदिक देवताओं का स्वरुप महिमामंडित मानवों का है। ऋग्वेद में 33 प्रकार के तत्वों (दिव्य गुणो से युक्त पदार्थो) का उल्लेख है।

उत्तर वैदिक कालीन राजनीतिक विस्तार

इस काल में पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार तक आर्यों का विस्तार (सदानीरा नदी से गंडक नदी तक था)।

तथा दक्षिण में विदर्भ (महाराष्ट्र) तक आर्यों का विस्तार।

आर्यावर्त

उत्तर वैदिक काल तक आर्यों के निवास वाला संपूर्ण क्षेत्र आर्यावर्त ही था।

राजनीतिक विस्तार में जितना योगदान उत्साही राजाओं का (लौहे के औजारों से) था, उतना ही योगदान ब्राह्मणों ( अग्नि के द्वारा जंगलों को साफ किया गया)का था ।

इस काल में जन जनपद बन गए। अर्थात क्षेत्रीय राज्य की स्थापना हुई। भरत जन + पुरु जन = कुरुजन पद बना। (गंगा-यमुना के ऊपरी दोआब में स्थिति)

आर्यों के अधीन क्षेत्र-

कुरु जनपद –
कुरु जनपद की प्रारंभिक राजधानी सासंदीवाद थी।

कुरु जनपद में 950 ई.पू. में कौरव– पांडव के मध्य महाभारत का युद्ध हुआ था।
कुरु जनपद के प्रमुख शासक- बाहलिक प्रतिपीय, परीक्षित(अथर्ववेद में नाम), जन्मजेय, निचक्षु।
निचक्षु के समय हस्तनापुर बाढ से नष्ट हो गया था अतः कोशांबी को नई राजधानी बनाया गया था।

पांचाल जनपद-
(क्रीवी + तुर्वस) यह जनपद बरेली, बदायूं , रुहेलखंड तक विस्तृत था।
पांचाल जनपद के प्रमुख शासक- प्रवाहन (विद्वानों के संरक्षक शासक ),जैबाली, आरुणिश्वेतकेतु(उच्च कोटी के दार्शनिक ) ।
आरुणिश्वेतकेतु ने पांचाल में परिषद का आयोजन किया था जिसमें याज्ञवलक्य विजेता बने थे।
शतपथ ब्राह्मण में कुरु,पांचाल जनपदों को वैदिक सभ्यता का प्रतिनिधि कहा गया है।
आरुणिश्वेतकेतु ने अपने गुरु राहुल गण की सहायता से अग्नि के द्वारा नए क्षेत्र प्राप्त किये थे।यह एक दार्शनिक राजा था।

कोसल जनपद-
सरयू नदी के तट पर स्थित (यू . पी.) । रामकथा से जुङा हुआ स्थल ।

काशी जनपद-
वरणवती नदी(गंगा की धारा)के तट पर स्थित। वाराणसी इसकी राजधानी थी। काशी जनपद के प्रमुख राजा- अजातशत्रु (दार्शनिक राजा)।

मत्स्य जनपद–
अलवर, भरतपुर, जयपुर तक का क्षेत्र मत्स्य जनपद कहलाता था। इसकी राजधानी विराटनगर थी।

विदेह-
विदेह की राजधानी मिथिला थी। यह जनपद सदानीरा (गंडक) नदी के तट पर स्थित था। शासक– जनक, विदेह माधव (दार्शनिक शासक – जिन्हें वेदों का ज्ञान हो वह राजा।)

गांधार–
यह जनपद सिंधु नदी के तट पर स्थित । यहाँ की राजधानी तक्षशिला थी।

मद्र जनपद–
यह जनपद भी सिंधु नदी के तट पर स्थित था। यहाँ की राजधानी पंजाब-स्यालकोट के निकट स्थित थी।

कैकेय जनपद–
यह जनपद (गांधार -व्यास के बीच स्थित था।) शासक- अश्वपति कैकेय(दार्शनिक राजा)

ऐसे क्षेत्र जो आर्यों के अधीन नहीं थे –

उत्तरवैदिक काल में राजा की शक्ति में वृद्धि हुई, क्योंकि अब लोहे का उपयोग युद्ध के रूप में होने लगा था। राजा की शक्ति में वृद्धि पता साहित्यों से भी चलता है। इस काल में राजा के साथ अनेक धार्मिक अनुष्ठान जुङ गए । उदा. के तौर पर – राजाभिषक संस्कार, अश्वमेघ यज्ञ, राजसूय यज्ञ।

राजा अनेक उपाधियाँ लेने लगा जैसे – सम्राट, स्वराट, प्रकराट आदि।
ऐतरेय ब्राह्मण में अलग-2 क्षेत्र के राजाओं द्वारा अलग-2 उपाधि

लिए जाने का उल्लेख मिलत है। ऐतरेय ब्राह्मण में राजत्व सिद्धांत का उल्लेख मिलता है और प्रतिष्ठा में वृद्धि को स्पष्ट करता है।

प्रमुख यज्ञ- उत्तरवैदिक काल में यज्ञ की प्रतिष्ठा बहुत उच्च स्थान तक पहुँच गई थी।

1.अश्वमेघ यज्ञ-
यह यज्ञ राज्य विस्तार हेतु किया जाता था।
इसमें 4 रानियाँ,4 रत्निन/वीर(अधिकारी), 400 सेवक । इन सबके अलावा 1हाथी, 1 श्वेत बैल, 1 श्वेत घोङा, 1श्वेत छत्र आवश्यक होता था।
3दिन तक यह यज्ञ चलता था।
साल भर बाद अभिषिक्त घोङे की यज्ञ में 600 बैलों (सांड) के साथ बलि दी जाती थी।

2.राजसूय यज्ञ–
राजा की प्रतिष्ठा एवं सम्मान बढाने हेतु आयोजित होता था।
1 वर्ष से अधिक समय तक चलता था।
17 नदियों का जल आवश्यक था। (जिसमें सरस्वती नदी का जल प्रधान माना जाता था। )
12 अधिकारी , 1 रानी की उपस्थिती आवश्यक थी।
इस यज्ञ के दौरान अक्षक्रिडा (पासे का खेल),गोहरन(गाय को हांक कर लाना) आदि खेलों में राजा को विजेता बनाया जाता था।

3.वाजपेय यज्ञ-
वाजपेय यज्ञ का उद्येश्य राजा की शारीरिक और आत्मिक शक्ति में वृद्धि करना और उसे नवयौवन प्रदान करना था।
रथ धावन (रथों की दौङ) का आयोजन होता था। जिसमें राजा को विजेता बनाया जाता था।
इस यज्ञ को वैदिक काल का ओलंपिक भी कहा जाता है।

अधिकारियों की संख्या में बढोतरी (20) हो गई थी । इनमें से 12 स्थायी अधिकारी थे जो इस प्रकार थे-

12) स्थाई अधिकारी-
युवराज
महिषी(पटरानी)
ग्रामणी
सूत(राजा का साथी)
क्षतृ/प्रतिहारी(द्वारपालों का प्रमुख)
संग्रहित्री(राजकोष का प्रमुख)
पालागल(विदूषक राजा का मित्र, संदेशवाहक)
अक्षवाय(पासे के खेल में राजा का सहयोगी)
गोनिकर्तन(शिकार में राजा का सहयोगी)
भागयुद्ध(कर संग्रहकर्ता)
सेनानी
पुरोहित

इस काल में चारों वर्णों का प्रतिनिधित्व मिलता है।

अधिकारियों को रत्नानी ( वीर)कहा जाता था ।

अस्थाई अधिकारी-

उत्तर वैदिक काल की अन्य विशेषताएँ

विदथ का उल्लेख बहुत कम बार मिलता है (अथर्ववेद में 22 बार)

सभा और समिति का पहले की तुलना में महत्त्व बढा। यह राजा पर नियंत्रण का कार्य करती थी। अथर्ववेद में सभा का 7 बार तथा समिति का 13 बार प्रयोग किया गया है।

इस काल में कर प्रणाली नियमित हुई।(स्थायी कर व्यवस्था)
बलि (दैनिक उपयोग की वस्तुएँ) नामक कर प्रणाली भी स्थाई हो गयी थी।
भाग, भोग, शुल्क नामक कर भी उत्पन्न हुये।
भाग– भूराजस्व कर
भोग– हमेशा दैनिक उपभोग की वस्तुएँ
शुल्क – व्यापारिक कर (चुंगी) ये सभी कर अनिवार्य थे।

राजकोष कुछ समृद्ध हुआ। फिर भी राजा की स्थायी सेना और रक्त संबंध से पृथक नौकरशाही का विकास इस काल में भी नहीं हो पाया था। कारण- इस काल में भी अर्थव्यवस्था निर्वाह रूप में बनी हुई थी। अधिशेष– उत्पादन सिमित था। क्योंकि कृषि के प्रमुख पेशा बनने पर भी अब भी कृषि कर्म मुख्यतः काँसे एवं ताँबे के उपकरणों से होता था। लोहे के कृषि उपकरण बहुत कम मिले हैं। अतः कृषि उत्पादन में वृद्धि नहीं हो पायी थी।

 

वैदिक-काल के सामाजिक-संघर्ष

मानव सभ्यता के इतिहास का पुनर्पाठ करते हुए प्रेमकुमार मणि बता रहे हैं कि वैदिक काल के दौरान आर्यों-हिन्दुओं के अलावा आर्यों के विभिन्न समूहों के बीच भी सामाजिक और सांस्कृतिक दोनों तरह के संघर्ष हुए। इन संघर्षों के कारण जहां एक ओर आर्य और हिन्दू दोनों के बीच समन्वय की स्थिति बनी तो दूसरी ओर वर्ण व्यवस्था ने भी जन्म लिया

BY – PREMKUMAR MANI
प्रेमकुमार मणि

with thanks _ forward press

जन-विकल्प
वैदिक-काल से मेरा तात्पर्य उस काल से है, जिसमें वेदों की रचना हुई। विद्वानों के अनुसार यह समय अनुमानतः ईसापूर्व 1500 वर्ष से लेकर 1000 ईस्वीपूर्व तक का था। कुछ अतीतजीवी लोग समझते हैं कि वैदिक-काल की बोल-चाल की भाषा संस्कृत थी और उन दिनों सम्पूर्ण भारत पर आर्यजन ही रहते थे। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं था। संस्कृत रचना की भाषा थी। कुछ विशिष्ट किस्म के लोग ही इसमें पारंगत थे; और स्वाभाविक है, उन्हें इस बात का थोड़ा गुमान भी रहा होगा। जैसे आर्थिक रूप से संपन्न लोग अपने बनाये दुर्ग में रहते हैं, वैसे ही ये विशिष्ट लोग अपनी भाषा की गुफा में रहते थे।

हाँ, इनकी जीवन-शैली और दृष्टिकोण शेष लोगों से भिन्न थे। मैंने पहले ही बतलाया है, आर्यजन तत्कालीन भारतीय समाज के एक बहुत ही छोटा हिस्सा थे। अनार्य समाजों से इनका धीरे-धीरे मिलना स्वाभाविक था। ये मिले और फिर एक मिश्रित समाज बना। लेकिन आर्यों का प्रभाव भारतीय समाज पर जबरदस्त रूप से पड़ा। इसका कारण यह रहा कि राजसत्ता पर उनका प्रभाव बढ़ गया था।

आर्यों का जीवन-यापन कैसा था, इसकी कुछ सूचना हमें ऋग्वेद से ही मिलती है। घोडा, आरा वाले पहिये का रथ, यज्ञ, अग्निवेदी, सोम-पान और दाहकर्म उनकी ऐसी विशेषता थी, जो उन्हें अनार्य-जातियों से विलग करती थीं। सिन्धु-सभ्यता में घोड़े की उपस्थिति नहीं मिलती। अपवाद में लोथल में मिली घोड़े की मृण्मयी मूर्तियां हैं। लेकिन यह उत्तर सिंधु काल के समय की हैं। सिन्धुवासी व्यापार के लिए बाहर जाते रहते थे और घोड़े से उनका परिचित होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसे में उनकी मूर्तियां भी बन सकती हैं, जैसे हम अपने घरों में शेर की मूर्तियां रखते हैं। हाँ, घोड़ा यहां घरेलु पशु नहीं था, जैसे कि गाय। हड़प्पा की मोहरों पर सांढ़ की उपस्थिति गाय को उनके जीवन के लिए जरुरी होना सिद्ध करता है। बैल से हड़प्पावासी वही काम लेते थे, जो घोड़े से आर्य लेते थे। आर्यों का जीवन तो पूरी तरह घोड़ा-केंद्रित था। गाय दूसरे स्थान पर थी। ऋग्वेद में 250 स्थानों पर घोड़े का उल्लेख है, तो 176 स्थानों पर गौ के। बैल की उपस्थिति नगण्य है। हाँ, अनार्य समाज में गाय और बैल दोनों महत्वपूर्ण थे, क्योंकि घोड़े का इस्तेमाल वहां नगण्य था। अनार्य देवता महादेव की सवारी बैल है।

डॉ. लाल रत्नाकर की एक पेंटिंग। इस पेंटिंग में हिन्दुओं के रहन-सहन को दिखाया गया है।

आर्यों की दूसरी खास चीज थी रथ, जिसमें आरावाला पहिया (चक) लगा होता था। आरा लग जाने के कारण पहिये का वजन हल्का हो गया, परिणाम-स्वरुप गति बढ़ गयी। इस रथ ने आर्यों को अपने प्रसार में बहुत मदद की। इसके बूते वे हिन्दुओं पर भारी पड़ने लगे। इसलिए स्वाभाविक था, वह धार्मिक रूप से भी उनके लिए महत्वपूर्ण बन जाय।

यज्ञ भी आर्यों की खास पहचान थी। आर्य-संस्कृति का अर्थ ही था यज्ञ की संस्कृति। इसके नेता या पुरोहित ऋत्विज कहे जाते थे। यज्ञ से जुड़े लोग यज्ञमान (जजमान) होते थे। जैसे-जैसे यज्ञ और यज्ञमान बढ़ते गए आर्यों का विस्तार और वर्चस्व बढ़ता चला गया। इन यज्ञों के साथ पशु-बलि, हवन-होम और सोम-पान आवश्यक रूप से जुड़े थे। अश्व-मेघ यज्ञ अत्यंत महत्वपूर्ण था, जिसे कोई राजा अपने प्रभुत्व के प्रदर्शन के लिए करता था। इस यज्ञ में अनुष्ठान-पूर्वक एक घोड़े को योद्धाओं के साथ छोड़ दिया जाता है। घोडा जहां तक बे-रोक-टोक जाता था, वह सब भूमि राजा की हो जाती थी। यज्ञ से लौटे हुए घोड़े को नग्न रानी (राजा की पत्नी) के साथ सहवास का स्वांग करना पड़ता था। तदन्तर उस घोड़े की बलि दे दी जाती थी।

अग्निवेदी में हवन-कार्य आर्य-जीवन की एक और खास पहचान थी। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह हवन-कार्य केवल पुरोहितों और राजन्यों में ही प्रचलित था। आर्यों का बड़ा हिस्सा पशुचारक था। वे कभी-कभार तो हवन कार्य से जुड़ते होंगे, लेकिन उनके जीवन की उलझनों के कारण इस कार्य में नियमित होना उनके लिए सम्भव नहीं था। हाँ, खास अवसरों पर इस अनुष्ठान में वे भाग लेते रहे होंगे। इन्ही अनुष्ठानों के साथ सोमयाग अथवा सोमपान का जश्न भी होता था।


आर्यों और हिन्दुओं के बीच समन्वय को प्रदर्शित करती एक पेंटिंग

आर्यों का जीवन पुरुष प्रधान था। लेकिन स्त्रियों की स्थिति ऋग्वैदिक-काल में ख़राब नहीं थी। उस समय आर्यों के आर्थिक ढांचे में स्त्रियों की स्थिति ख़राब होने का सवाल भी नहीं था, क्योंकि व्यक्तिगत संपत्ति अस्तित्व में अभी नहीं आयी थी। व्यक्तिगत संपत्ति के उत्तराधिकार मामले से ही स्त्रियों की शुचिता और तदन्तर पराधीनता का प्रसंग आरम्भ होता है। उषा आदि देवियों की पूजा से पता चलता है कि नारी के प्रति आरंभिक दौर में आर्यों का दृष्टिकोण नकारात्मक नहीं था। यम-यमी संवाद और उर्वशी-पुरुरवा संवाद में स्त्री स्वतंत्रता के भाव स्पष्ट होते हैं। स्त्रियों के बिना परिवार की कल्पना नहीं हो सकती थी। बालिका का जन्म लेना अच्छा माना जाता था, क्योंकि वही दुहिता (दूध दुहने वाली ) होती थी। इस रूप में कन्यायें आर्थिक ढाँचे यानी उत्पादन का हिस्सा भी होती थीं। ऐसा लगता है, आर्यों ने कृषि आरम्भ कर दिया था, लेकिन अभी पशुपालन ही उनका मुख्य पेशा था। गायों की रक्षा के लिए वे तत्पर रहते थे। यह ऐसा पशु था, जो आर्यों और हिन्दुओं दोनों समाजों में पाला जाता था। इसलिए घोड़े के लूटने का प्रसंग कम आता है। गौएं लूट या चुरा ली जाती थीं। इसलिए इसे बचाने की कवायद करनी होती थीं। ताकतवर होने पर ये आर्य दूसरों की गायें चुराने का भी मिजाज रखते थे। गोत्र, गोष्ठी, गवेषणा, गोप, गोतिया जैसे शब्द गाय से ही जुड़े हैं। भैस को गवली, गौरी या महिष कहा जाता था। बाद के समय में तो कुछ देवताओं को, महिष की बलि ही पसंद थीं। यह पसंद आज भी जारी है।

आर्यों की एक और विशेषता मृत्यु के बाद शव के दाह कर्म की थीं। दाह-कर्म किसी मृतात्मा की मुक्ति के लिए आवश्यक समझा जाता था। अब तक स्वर्ग की व्यवस्था नहीं बनी थीं, लेकिन जैसे ही बनी यह स्वर्गारोहण के लिए आवश्यक हो गया। विवाह की तरह ही विधि-पूर्वक अंत्येष्टि कर्म अनिवार्य होता चला गया। इन संस्कार कर्मों से आर्यों की एकता को बल मिला।

आर्यों का समाज मुख्यतः पशुचारक था, इनके वंशज मौजूदा भारत में प्रायः उन जातियों में पाए जाते हैं जो केंद्रीकृत ब्राह्मणवादी समाज रचना के हाशिये पर हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार जाट, पाल, अहीर और चरमन (चर्मकार) आदि जातियों में आर्य-रक्त अधिक है। जाटों के बड़े हिस्से ने सिक्ख और इस्लाम धर्म स्वीकार लिया है, लेकिन जितने हैं, वे प्रभावशाली संख्या में हैं। अहीर एक ऐसी जाति है, जो लगातार घुमन्तु बनी रही और पूरब व दक्खिन के इलाकों में पसरती-फैलती चली गयी। इनका सीधा सम्बन्ध वैदिक आभीरों से है, जिसका एक तबका पुरोहित बन गया था। लेकिन यही एक आर्य जाति है, जिनका स्थानीय हिन्दुओं से मेल-जोल सब से अधिक बढ़ा। असुर और दस्यु इनसे इतने अधिक घुल-मिल गए कि बाद में इनके बीच प्रभेद करना मुश्किल हो गया। दरअसल पेशे के हिसाब से आभीर और असुर दोनों पशुचारक थे। इनका मेल-जोल स्वाभाविक था। पशुओं के साथ रहते हुए इन लोगों का उनके साथ रागात्मक संबंध बन जाना सहज था। फिर यह स्वाभाविक था कि ये लोग पशु बलि का तीव्र विरोध करते। कृषि से जुडी अन्य जातियों के लिए भी गाय, बैल, भैंसें आवश्यक पशु धन थे। इनके खात्मे से कृषि का विकास रुक जाता या कम से कम प्रभावित तो जरूर होता। अतएव इन पशुचारक और कृषक समाज ने यज्ञों और बलि का कभी समर्थन नहीं किया। जब ये शक्ति संपन्न हुए तब व्यवस्थित रूप से इसका विरोध किया। यह मान लेना कि यज्ञ और बलि वैदिक जमाने की आम चीज थीं, एक गलत अवधारणा है। न केवल हिन्दुओं, बल्कि आर्यों के बड़े समूह ने भी कभी यज्ञों, हवन और बलि का बहुत समर्थन नहीं किया। यह पुरोहितों और अधिक से अधिक राजन्यों तक सीमित रहा। आर्यों के बीच तो वणिक तबका अभी था ही नहीं, लेकिन हिन्दुओं के पणि-दास तबके ने भी इन संस्कार-अनुष्ठानों का कभी समर्थन नहीं किया। बल्कि इनके विरुद्ध व्यवधान खड़े करते रहे। कालांतर में अहीरों का कुलनायक देवकी कृष्ण इस विरोध का बड़ा नायक हुआ। पुरोहित आर्यों से इन आभीर आर्यों की कभी नहीं बनी। पुरोहितों के मुख्य देवता इंद्र के विरुद्ध कृष्ण ने एक सांस्कृतिक युद्ध की घोषणा कर दी और बलपूर्वक उनकी पूजा बंद करवा दी। हालांकि बाद में इसी कृष्ण ने पुरोहितों के वर्ण-धर्म को स्वीकार लिया। इसी मेल-जोल में इनका संस्कृतिकरण यदु या यादव रूप में हुआ। कृष्ण के समय को लेकर विवाद है। अधिक संभावना इसी की है कि इंद्र की भाँति कृष्ण भी एक पद बन गया था। ऐसे में यह तो कहा ही जायेगा कि कम से कम देवकी कृष्ण को यादवेश विरुद पसंद था . ये पशुचारक अब राजन्य घोषित हो चुके थे।

आर्यों का समाज तत्कालीन भारत के देसी लोगों के साथ तो लड़ ही रहा था, अपने भिन्न कुलों के बीच भी लड़ता-झगड़ता रहता था। ऋग्वैदिक सूचना के अनुसार इनके कोई तीस घराने थे। पुरु और भरत सब से पुराने और दब-दबे वाली जनजाति थीं। इन दोनों में आरम्भ में मित्रता और कालांतर में शत्रुता के संकेत मिलते हैं। एक अन्य घराना पंचजन, पंचमानुष, या पंचकृष्टं है जो वस्तुतः यदु, पुरु, तुर्वश, अनु और हह्यु का एक संघ है। महाभारत कथा में ये नाम ययाति के पुत्रों के भी हैं। इन सब की संरचना इतनी जटिल है कि इन्हें स्पष्ट करने के लिए बहुत समय चाहिए। मूल बात इतनी है कि आर्यों के अपने घराने भी धीरे-धीरे उलझने लगे। इससे आर्यों और हिन्दुओं के बीच का संघर्ष थम गया। संघर्ष शिथिल हो जाने से समन्वय के अवसर विकसित हुए। ऐसा समय भी आया जब आर्यों और अनार्यों के बीच एकता के भी भाव बने।

ऋग्वेद में एक बड़े युद्ध का वृतांत है, जिसे ‘दाशराज्ञ’ अथवा दस राजाओं का युद्ध कहा गया है। यह वृतांत सातवें मंडल में है। बता चुका हूँ, दूसरा से लेकर सातवां मंडल तक ऋग्वेद के सब से पुराने हिस्से हैं और इन्हें कुल-मंडल कहा जाता है। प्रथम, अष्टम, नवम और दशम मंडल बाद में रचे गए। दाशराज्ञ युद्ध में पैजवन वंश के दिवोदास के पौत्र सुदास ने दस जनों के एक संघ के साथ युद्ध किया। सुदास भरत जन के थे। दाशराज्ञ अर्थात दस जनों में पुरु भी एक थे, जो पहले भरतों के सहयोगी रह चुके थे। परुष्णी, जिसे अब रावी कहा जाता है, के किनारे लड़ा गया यह युद्ध कुछ मामलों में ऐतिहासिक है। इसमें भरतों की जीत हुई। इस लड़ाई में भरतों ने नदी के बांध को तोड़ दिया, जो संभवतः शत्रु पक्ष को नुकसान पहुंचाने वाला था। इस युद्ध का विश्लेषण हमें कई नयी जानकारियां देता है। पहला तो यह कि ऋग्वैदिक काल में ही इंद्र का प्रभुत्व धीरे-धीरे कम होने लगा था। ऐसा लगता है, आर्य कबीलों की संख्या अनेक हो चुकी और उनके मुखियाओं ने इंद्र विरुद धारण करने से अब इंकार कर दिया था। जनों के नए मुखिया या राजा अपने बूते और अपने नाम पर संघर्ष करना बेहतर समझते थे। संभव है ये राजा युद्ध के समय इंद्र की पूजा एक देवता के रूप में करते हों। लेकिन, इंद्र इस युद्ध में सीधे तौर पर अनुपस्थित है। इस युद्ध में एक तरफ सुदास है, तो दूसरी तरफ दस राजाओं का संयुक्त मोर्चा। इसे मिनी महाभारत भी कहा जा सकता है। सुदास ने इस युद्ध में विश्वामित्र को अपने पुरोहित पद से हटा दिया और वशिष्ठ को पुरोहित रख लिया। डॉ आंबेडकर ने अपनी किताब “हु वे’र द शूद्राज” में इस कथा को ही अपने विचार का आधार बनाया है। सुदास में दास जुड़ा है। दास हिन्दू है, आर्य नहीं। ये दस्यु और पणि के बीच का वर्ग प्रतीत होता है। आर्य इन दासों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। ऐसे में सुदास क्या है? आर्य-अनार्य मिश्रण का कोई आर्य राजा या फिर दासों का ही नेता? कहा गया है, वह भरत जनों का राजा है। भरत जन आर्य हैं। इसीलिए यही सम्भव है कि भरत जनों और दासों की इतनी एकता हो गयी थी कि आर्य भी दास विरुद धारण करने में संकोच नहीं करने लगे थे। ऐसे में यह सुदास आर्यों और अनार्यों की सामाजिक-सांस्कृतिक एकता का प्रतीक था। उसका पौरोहित्य वशिष्ठ द्वारा स्वीकार लिया जाना और विश्वामित्र की पुरोहित पद से छुट्टी कई नए विकसित सामाजिक समीकरणों के संकेत देती है। विश्वामित्र और वशिष्ठ में एक लम्बा संघर्ष चला है। आर्यों का एक स्वभाव अपनी हर बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहने का होता था। जो बात साल भर में हुई हो, वे उसे सौ साल कहेंगे और जो कुछ सालों में हुई है, उसे हजारों साल का बताएंगे। विश्वामित्र और वशिष्ठ की लड़ाई भी हजारों साल चली, यही पौराणिक ब्यौरा है। लेकिन कुछ समय तक तो यह संघर्ष जरूर चला होगा। वशिष्ठ ने सुदास का पौरोहित्य क्यों स्वीकार किया; या सुदास ने इन्हे अपना पुरोहित क्यों बनाया? यह एक प्रश्न है। कुशिक (उल्लू) गोत्र के विश्वामित्र में वशिष्ठ के मुकाबले आर्यत्व अधिक है। वशिष्ठ की जन्मकथा बताती है कि वह विषम परिस्थितियों की संतान हैं। उनके पिता का नाम स्पष्ट नहीं है। इस से ऐसा प्रतीत होता है वह ऐसे कुल से थे जिनमें मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी। ऐसे कुलों से आये संतानों को आर्यों की पितृसत्तात्मक संस्कृति में शामिल करने के लिए कुम्भज (कुम्भ से उत्पन्न) कथा का प्रयोग होता था। वशिष्ठ की कथा भी ऐसी ही है। उनका जन्म दो वैदिक देवताओं मित्र और वरुण के वीर्य को एक कुम्भ में रख दिए जाने से हुआ। उन्हें ‘उर्वश्या मनसोधिजात’ -अर्थात उर्वशी के मन से जन्मा भी बताया गया है। प्रतीत होता है, उर्वशी की वह कुक्षि थी जहाँ मित्र और वरुण के वीर्य शामिल हुए। यह स्पष्ट करना जब मुश्किल हुआ कि वशिष्ठ किस खास देवता के वीर्य से हुए, तब दोनों देवताओं के नाम पिता रूप में दे दिए गए। एक खास ऋतु-चक्र में उक्त दोनों देवताओं ने उर्वशी से संबंध स्थापित किये होंगे और यह तय करना संभव नहीं हुआ होगा कि वास्तविक पिता कौन है। ऐसा वशिष्ठ जो पितृसत्तात्मक आर्य संस्कृति में शामिल हुआ है, स्वाभाविक है अधिक समावेशी चेतना का होगा। राजा सुदास की स्थिति भी ऐसी ही है। ऐसे में विशुद्ध आर्य विश्वामित्र की जगह संस्कारित आर्य वशिष्ठ का पौरोहित्य तत्कालीन समाज के मनोविज्ञान की एक झलक देता है।

दामोदर धर्मानंद कोसंबी इस मामले को इस प्रकार देखते हैं – “आरम्भ काल में एक आर्य राजा के नाम के साथ ‘दास’ शब्द का जुड़ जाना यह सूचित करता है कि 1500 ईस्वीपूर्व के तुरंत बाद ही आर्यों और अनार्यों में कुछ मेल-मिलाप हो चुका था। पता चलता है कि सुदास भरत जन के या संभवतः भरतों की एक विशिष्ट शाखा त्रित्सु के मुखिया थे। आज हमारे देश का जो भारत नाम है, उसका अर्थ है ‘भरतों का देश’। भरत निश्चय ही आर्य थे। परन्तु प्रारंभिक आर्यों के लिए जातीय शुद्धता कोई अर्थ नहीं रखती थी। यहां के आदिवासी तत्वों को ग्रहण करना उनके लिए सहज संभव था। और उन्होंने इन्हें ग्रहण भी किया।” ( प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता ,पृष्ठ 108 )

इन दस राजाओं में विभिन्न कुलों-कबीलों का वर्णन है। इसमें सब के सब अनार्य ही नहीं थे। भृगु कबीले के लोग भी थे, जो प्रतीत होता है कुछ ही समय पूर्व भारत-भूमि पर आये थे। पक्थ कबीला, जिसे कोसंबी पख्तून या पठान का संस्कृत रूप बतलाते हैं, इसमें से एक था। अलिन, मत्स्य और शिग्रु लोग भी थे। ये सब के सब आर्य थे। फिर कुछ अनार्य राजा भी थे। आर्यों-अनार्यों का इस तरह एक छत्र के नीचे इकठ्ठा होना केवल इस बात का परिचायक है कि आर्यों का तेजी से हिन्दुकरण हो रहा था।

यही वह समय था, जब पौरोहित्य का काम ब्राह्मणों के लिए सिमटने लगा था, अथवा ब्राह्मणों ने इस पर एकाधिकार बढ़ाना शुरू कर दिया था। ब्राह्मण आर्यों का ही कोई कुल था ऐसा प्रतीत नहीं होता। भारतीय आर्यों के मूल स्थान ईरान में उन दिनों पुरोहित होते थे जिन्हे अथ्रवन कहा जाता था। मंत्रोचार के लिए ‘होता’ नामक सहायक पुरोहित होते थे। ये ‘होता’ जेंद-अवेस्ता के पदों के पाठ करते थे। लेकिन ब्राह्मण शब्द वहां नहीं था। आर्य जाति यूरोप और एशिया के दूसरे हिस्सों में भी गयी और उनके साथ कई शब्द गए, जिसके आधार पर भारोपीय भाषा परिवार की अवधारणा बनी। लेकिन ब्राह्मण शब्द कहीं नहीं मिलता। न ही पुरोहितों का ऐसा वर्चस्व दुनिया की किसी आर्य-संस्कृति में देखने को मिलती है। आरंभिक भारतीय आर्यों के समाज में भी ब्राह्मणों की प्रभावशाली उपस्थिति नहीं है। कम से कम ऋग्वेद ब्राह्मण प्रभुत्व से आक्रांत नहीं है। ब्राह्मणों के मूल तक जाने के लिए हम सीधे-सीधे इतिहासकार रामशरण शर्मा को उद्धृत करना चाहेंगे – “ऋग्वेद में ब्राह्मणवाद का जोर नहीं मालूम पड़ता है। इस में सात प्रकार के पुरोहित पाए जाते हैं, जिनमें ब्राह्मण भी एक है। उत्तर वैदिक काल के आरम्भ में सोलह प्रकार के पुरोहित मिलते हैं, जिनमें ब्राह्मण एक प्रकार है। पर उत्तर वैदिक काल का अंत होते-होते सोलह प्रकार के पुरोहितों में ब्राह्मण सर्वे-सर्वा बन जाता है। दान-दक्षिणा में उसका आधा हिस्सा होता है और बाकी आधे में और लोगों के हिस्से बनते हैं। बिना ब्राह्मण की उपस्थिति के कोई भी यज्ञ या अनुष्ठान संपन्न नहीं हो सकता है। यह अद्भुत घटना कैसे हुई? ऐसा क्यों हुआ कि अनेक देशों में हिन्द-यूरोपीय गए, किन्तु भारतवर्ष में ही ब्राह्मणों का प्रभाव प्रबल हुआ? ऐसा लगता है कि भारत में ब्राह्मणवाद का जन्म आर्य और प्राक-आर्य तत्वों के मिश्रण से हुआ। ध्यान देने की बात है कि वैदिक परंपरा और महाकाव्यों में इंद्र को ब्रह्मघाती बताया गया है। इंद्र के प्रमुख शत्रु वृत्र को ब्राह्मण बताया गया है। संभवतः हड़प्पाई समाज के बचे-खुचे पुरोहितों ने वैदिक समाज में ब्राह्मणों का रूप धारण किया। ऋग्वेद में कण्व ऋषि को काला बतलाया गया है और दीर्घतमस नाम से इस ऋषि का काला रंग होने का आभास मिलता है। उन्हें उनकी माता के नाम से मामतेय भी पुकारा गया है। इन उदाहरणों से लगता है कि ब्राह्मणों का संबंध प्राक-वैदिक संस्कृति के लोगों से था। यह भी उल्लेखनीय है कि ब्राहुई भाषा – जो बलूचिस्तान में बोली जाती है- का संबंध ब्राह्मण शब्द से जोड़ा गया है।अतएव आर्यों और अनार्यों के मिश्रण के कारण ब्राह्मण-वर्ण का जन्म हुआ, जिसमें आर्य और अनार्य दोनों सम्मिलित थे। इस प्रकार प्रारंभिक ब्राह्मण-वर्ण या ब्राह्मणवाद को प्राचीनकाल की विशुद्ध आर्य-संस्कृति का अभिन्न अंग नहीं माना जा सकता है।” ( आर्य संस्कृति की खोज ,पृष्ठ 63 -64 )

ब्राहुई-जो सिंध नदी के पश्चिम बलूचिस्तान का एक क्षेत्र है, में आज भी द्रविड़ भाषा का एक रूप ब्राहुई इस्तेमाल होता है। द्रविड़ ब्राह्मणों का संबंध भी इन्हीं से है। बहुत संभव है इन लोगों ने ही संस्कृत भाषा का ठाट तैयार किया, क्योंकि इनका संबंध ईरान के एलम इलाके से कभी रहा था। सिंधु-सभ्यता के समय से ही उसका पुरोहित तबका, पणि (वणिक-व्यापारी), दास और दस्यु समूहों से सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर दूर होता जा रहा था। आर्यों के जम जाने के तुरंत बाद उनके पुरोहित तबके से इनकी एकता हुई। वैवाहिक संबंध भी होने लगे और सामाजिक-राजनैतिक मामलों में भी हस्तक्षेप होने लगे।

धर्मानंद कोसंबी (डी.डी. कोसंबी के पिता ) का कहना है कि आर्यों के पूर्व सप्तसिंधु इलाके में दासों का राज-शासन था, जिनका नेतृत्व ब्राह्मण पुरोहित करते थे। आर्य प्रमुख इंद्र ने दास प्रमुख ब्राह्मण वृत्र को पराजित कर स्थितियों को अपने नियंत्रण में कर लिया। तदन्तर दिवोदास और उसके पुत्र प्रतर्दन से समझौता कर एक नयी सामाजिक-राजनैतिक स्थिति को विकसित किया। संघर्ष और एकता के इस खेल में सप्तसिंधु इलाके में वृत्र ब्राह्मण के नेतृत्व वाले राज-पाट का सफाया हो गया और दिवोदास के नेतृत्व में राजन्यों का राज स्थापित हुआ। धर्मानंद कोसंबी का कहना है ऐसे में दास ब्राह्मण राजपाट से विमुख होकर भाषा और साहित्य की रचना में लग गए। उन्होंने संस्कृत भाषा और उसके साहित्य को समृद्ध किया। आर्यों का पुरोहित तबका भी इन्हीं ब्राह्मणों में शामिल हो गया और इस तरह एक नए ब्राह्मण वर्ग, जो आगे एक वर्ण में तब्दील हो गया, का निर्माण हो गया।

इस पूरी कथा-परिकथा से एक ही बात स्पष्ट होती है, वह यह कि पेशागत तौर पर आर्य-अनार्य सामाजिक समूह धीरे-धीरे नजदीक हुए और अंततः एक हो गए। आर्य पुरोहित और दास ब्राह्मण एक हुए, तो पशुचारक आभीर और असुर भी एक हुए। नाग और कई आदिवासी सामाजिक समूह भी परिधि से केंद्र की तरफ अग्रसर हुए। आर्यों में वणिक समूह विकसित होने की गुंजायश ही नहीं थी, क्योंकि उनकी उत्पादन क्षमता कमजोर थी। इसी आधार पर उनमें शूद्रों के लिए भी कोई गुंजायश नहीं बनती थी। बड़े पैमाने पर मेल-जोल बढ़ने से धीरे-धीरे आर्य लोग हिन्दू समाज में घुल-मिल गए। सामाजिक-सांस्कृतिक मेल-जोल इतना हुआ कि कुछ समय पश्चात् आर्य अपना प्रिय पेय सोम को लगभग भूल ही गए। उसकी जगह हिन्दू-असुरों का पेय सुरा उनके देवताओं को भी पसंद आने लगा। आर्यों और अनार्यों ने संघर्ष और एकता का सिलसिला बनाये रखा। ऐसा नहीं था कि इनके बीच लड़ाई-झगडे नहीं थे। खूब थे। लेकिन मेल-जोल की स्थितियां भी थीं। समन्वय और एकता की स्थितियां निरंतर विकसित होती रहीं। इस समन्वय और एकता के बेहतर नतीजे ये आये कि ज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे। लेकिन ख़राब चीज यह हुई कि वर्ण-व्यवस्था का जन्म हुआ, जिसने आगे चल कर जातिवाद और छुआछूत के रूप में भारतीय समाज को काफी कमजोर कर दिया। हालांकि जल्दी ही इस वर्णधर्म और जातिवाद के खिलाफ भी संघर्ष का सिलसिला आरम्भ हुआ।

(कॉपी संपादन : नवल)

वैदिक सभ्यता से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य

वैदिक सभ्यता

वैदिक काल का विभाजन दो भागों 1 ऋग्वेदिक काल – 1500 -1000 ईसा पूर्व

2. उत्तर वैदिक काल 1000 -600 ईसा पूर्व में किया गया हैं।

ऋग्वेदिक काल – 1500 -1000 ईसा पूर्व
आर्य सर्वप्रथम पंजाब एवं अफगानिस्तान में बसें। मेक्समुलर ने आर्यो का मूल निवास स्थान मध्य एशिया को माना हैं। आर्यो द्वारा निर्मित सभ्यता वैदिक सभ्यता कहलायी।
आर्यो द्वारा विकसित सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी।
आर्यो की भाषा संस्कृत थी।
आर्यो के प्रशासनिक इकाई आरोही क्रम से इन पांचो भागो में बँटा था – कुल , ग्राम , विष , जान , राष्ट्र


ग्राम के मुखिया ग्रामिणी एवं विश का प्रधान विशपति कहलाता हैं। जन के शासक को राजन कहा जाता था।

राज्याधिकारियों पुरोहित एवं सेनानी प्रमुख थे।

सूत, रथकार तथा कम्मादी नामक अधिकारी रत्नी कहें जाते थे। इनकी संख्या राजा सहित करीब 12 हुआ करती थी।

पुरप – दुर्गपति एवं स्पश – जनता की गतिविधियों को देखने वाले गुप्तचर होते थे।

वाजपति -गोचर भूमि का अधिकारी होता था।

उग्र – अपराधियों को पकड़ने का कार्य करता था।

सभा एवं समिति राजा को सलाह देने वाली संस्था थी। सभा श्रेष्ठ एवं संभ्रांत लोगो की संस्था थी जबकि समिति सामान्य का प्रतिधित्व करती थी। इसके अध्यक्ष को ईशान कहा जाता हैं।

युद्ध में कबीले का नेतृत्व राजा करता था। युद्ध के लिए गविष्टि शब्द का प्रयोग किया गया हैं , जिसका अर्थ हैं – गायों की खोज

दसराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद के 7वें मंडल में हैं, यह युद्ध परुषनि ( रावी ) नदी के तट पर सुदास एवं दस जनो के बीच लड़ा गया, जिसमे सुदास विजयी हुआ।

ऋग्वेद समाज चार वर्णो में विभक्त था। ये वर्ण थे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था। ऋग्वेद के 10वे मंडल के पुरुषसूक्त में चतुर्वर्णो का उल्लेख मिलता हैं। इसमें कहा गया हैं कि ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओ से, वैश्य उनकी जांघो से एवं शूद्र उनके पैरो से उत्पन्न हुए हैं।

आर्यो का समाज पितृप्रधान था। समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल थी, जिसका मुखिया पिता होता था, जिसे कुलप कहा जाता था।

स्त्रियाँ इस काल में अपने पति के साथ यज्ञ – कार्य में भाग लेती थी।

बाल – विवाह एवं पर्दा – प्रथा का प्रचलन नहीं था।

विधवा अपने मृतक पति के छोटे भाई ( देवर ) से विवाह कर सकती थी।

स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण करती थी। ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, आपला एवं विश्वास जैसी विदुषी स्त्रियों का वर्णन हैं।

जीवन भर अविवाहित रहने वाली महिलाओं को अमाजू कहा जाता था।


आर्यो का मुख्य पेय – पदार्थ सोमरस था। यह वनस्पति से बनाया जाता था।

आर्य मुख्यतः तीन प्रकार के वस्त्रों का उपयोग करते थे – 1. वास 2. अधिवास और 3. उष्णीष। अंदर पहनने वाले कपडे को नीवि कहा जाता था।

आर्यो का मुख्य व्यवसाय पशुपालन एवं कृषि था।

गाय को अध्न्या – न मारे जाने योग्य पशु की श्रेणी में रखा गया था। गाय की हत्या करने वाले या उसे घायल करने वाले के लिए वेदो में मृत्युदंड अथवा देश के निकले की व्यवस्था की गयी हैं।

आर्यो का प्रिय पशु घोडा एवं सर्वाधिक प्रिय देवता इंद्र थे।

आर्यो द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी। जिसे श्याम अयस कहा जाता था। ताँबे को लोहित अयस कहा जाता था।

व्यापार हेतु दूर – दूर तक जाने वाले व्यक्ति को पनि कहते थे।

लेन – देन में वस्तु – विनियम की प्रणाली प्रचलित थी।

ऋण देकर ब्याज लेने वाला व्यक्ति को वेकनॉट ( सूदखोर ) कहा जाता था।

मनुष्य एवं देवता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले देवता के रूप में अग्नि की पूजा की जाती थी।

सीमावर्ती राजवंशो का अभ्युदय
ऋग्वेद में उल्लिखित सभी नदियों में सरस्वती सबसे महत्वपूर्ण तथा पवित्र मानी थी। ऋग्वेद में गंगा एक बार और यमुना का उल्लेख तीन बार हैं। इसमें सिंधु नदी का उल्लेख सर्वाधिक बार हुआ हैं।
उत्तरवैदिक काल में इंद्र के स्थान पर प्रजापति सर्वाधिक प्रिय देवता हो गए थे।
उत्तरवैदिक काल में राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।

उत्तरवैदिक काल में हल को सिरा और हल रेखा को सीता कहा जाता था।
उत्तरवैदिक काल में निष्क और शतमान मुद्रा की इकाइयाँ थी, लेकिन इस काल में किसी खास भार, आकृति और मूल्य के सिक्को कोई प्रमाण नहीं मिलता।

सांख्य दर्शन भारत के सभी दर्शनों में सबसे प्राचीन हैं। इसके अनुसार मूल तत्व पच्चीस हैं, जिनमे प्रकृति पहला तत्व हैं।

“सत्यमेव जयते” मुंडकोपनिषद से लिया गया हैं। इसी उपनिषद में यज्ञ की तुलना टूटी नाव से की गयी है।

गायत्री मन्त्र सवितृ नामक देवता को सम्बोधित हैं, जिसका सम्बन्ध ऋग्वेद से हैं।

उत्तरवैदिक काल में कौशाम्बी नगर में प्रथम बार पक्की ईंटो का प्रयोग किया गया हैं।

महाकाव्य दो हैं – महाभारत एवं रामायण।
“महाभारत” का पुराना नाम जयसंहिता हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य हैं।
गोत्र नामक संस्था का जन्म उत्तरवैदिक काल में हुआ।

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