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लेबनान की राह चलता भारत : मोदी ने देश को तबाह कर दिया : वीडियो

Ravish Kumar
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बिहार के अस्पताल बंद से ही हो गए हैं, डॉक्टर ही नहीं हैं
बीबीसी के नीरज प्रियदर्शी रिपोर्ट बताती है कि बिहार में चिकित्सा की क्या हालत है। डॉक्टरों के स्वीकृत पदों में से 61 प्रतिशत ख़ाली है। ऐसा नहीं है कि बिहार की जनता को यह पता नहीं होगा। चुनाव के बाद भी वही हाल रहेगा। यही नहीं दूसरे राज्यों में भी कमोबेश यही हाल है।
आज कल आप देखते होंगे कि सरकारें अस्पतालों की इमारतों का उद्घाटन करती हैं। नए डिज़ाइन में होने के कारण वे बड़ी और भव्य भी लगती हैं। लेकिन किसी भी राज्य में ऐसे नए बने अस्पतालों का अध्ययन करेंगे तो पता चलेगा कि यह भी एक गोरखधंधा है। इमारत का उद्घाटन हो गया और अस्पताल के कई विभाग चालू ही नहीं हुए। वहाँ डॉक्टर और हेल्थ वर्कर नहीं हैं। सब ठेके पर रखे जाते हैं जिसे लेकर अलग तरह का घोटाला चलता है। दो दिन पहले यूपी में एंबुलेंस सेवा में काम करने वालों की हड़ताल हुई। उनका कहना था कि हमें 110000 वेतन पर दस्तख़त कराया जाता है लेकिन मिलता 6500 है। यह वेतन भी बहुत कम है लेकिन आपको यही समस्या राजस्थान और उत्तराखंड में भी मिलेगी। आप जितनी रिपोर्टिंग कर लें होना कुछ नहीं है।
जब सरकार स्वास्थ्य पर ख़र्च नहीं करती तो आप करते हैं। क़र्ज़ लेते हैं। तबाह होते हैं। नेता आइडिया लाता है। आपके लिए बीमा योजना का एलान करता है। वह बीमा की जगह अस्पतालों को संपूर्ण और सुचारू रूप से चालू करने का एलान नहीं करता है। बीमा से अस्पताल नहीं बन जाते और डॉक्टर नहीं आ जाते। जहां अस्पताल में डॉक्टर न हो वहाँ बीमा से इलाज हो जाएगा ? शायद राजनीति में हो जाता होगा।
– राज्य में चिकित्सा पदाधिकारी के कुल स्वीकृत पद 10609 हैं. जिसमें से 6437 पद रिक्त हैं।
– पटना मेडिकल कॉलेज में भी 40 फ़ीसद डॉक्टरों की कमी है. दरभंगा मेडिकल कॉलेज में भी 50 फ़ीसदी डॉक्टरों की कमी है।
बिहार सरकार ने विधानसभा में ही स्वीकार किया था कि कई ज़िलों के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर नहीं है।
शायद लोगों को ही यह सब नहीं चाहिए। ऐसा नहीं है कि उन्हें पता नहीं है। जनता और नेता के बीच राजनीतिक संबंध अन्य चीजों से निर्धारित होते हैं। इन चीजों से नहीं।

भयानक होती जा रही है देश में बेरोज़गारी : रिपोर्ट

लॉकडाउन खुलने के बाद बेरोजगारी दर में तेज गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन यह एक बार फिर बढ़ती हुई दिखाई पड़ रही है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनोमी के मुताबिक इस समय देश में बेरोजगारी दर 7.93 फीसदी हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी ज्यादा है।
इस समय शहरी क्षेत्र में बेरोजगारी दर 9.65 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्र में 7.13 फीसदी हो गई है। शहरों में जुलाई माह के अंत तक बेरोजारी दर 10 फीसदी के करीब थी, जिसमें कुछ कमी आई है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक बार घटकर यह दोबारा बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।

दिल्ली सरकार ने अपने जॉब पोर्टल के जरिए बताया था कि उसके यहां काम के अवसर ज्यादा हैं, जबकि नौकरी चाहने वालों की संख्या कम है। सरकार के मुताबिक उसके पास उपलब्ध नौकरियां नौ लाख से ज्यादा थीं, जबकि नौकरी चाहने वालों की संख्या लगभग 8.5 लाख के करीब थी। लेकिन सीएमआईई के आंकड़े इस बात की तस्दीक नहीं करते हैं।

इन आंकड़ों के मुताबिक राजधानी दिल्ली में बेरोजगारी दर 20.3 फीसदी तक पहुंच गई है, यानी यहां हर पांचवे व्यक्ति को नौकरी की तलाश है। हरियाणा में 24.5 फीसदी बेरोजगारी दर्ज की गई है, यानी यहां लगभग हर चौथे आदमी को नौकरी की तलाश है। पंजाब में भी 10.4 फीसदी लोगों के पास कोई नौकरी नहीं है।

किन राज्यों में कितनी बेरोजगारी
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनोमी (CMIE) के जुलाई के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में बेरोजगारी दर 12.2 फीसदी तो उत्तर प्रदेश में 5.5 फीसदी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ में 9 फीसदी, गोवा में 17.1 फीसदी, गुजरात में 1.9 फीसदी, हिमाचल प्रदेश में 18.6 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 11.2 फीसदी, झारखंड में 8.8 फीसदी, उत्तराखंड में 12.4 फीसदी, पश्चिम बंगाल में 6.8 फीसदी, केरल में 6.8 फीसदी, मध्य प्रदेश में 3.6 फीसदी, महाराष्ट्र में 4.4 फीसदी, ओडिशा में 1.9 फीसदी, पुडुचेरी में 21.1 फीसदी, राजस्थान में 15.2, तो तमिलनाडु में 8.1 फीसदी, तेलंगाना में 9.1 और त्रिपुरा में 16.4 फीसदी लोग बेरोजगार हैं।

कौशल विकास के दावे कितने सही
कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय भी लोगों को स्किल करने और रोजगार उपलब्ध कराने के प्रयास कर रहा है, लेकिन सीएमआईई के आंकड़ों से इसकी तालमेल बैठती नहीं दिखाई दे रही है। कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक अपने तमाम केंद्रों के जरिए लाखों युवाओं को दक्ष बनाया जा रहा है।

जन शिक्षण संस्थान योजना के तहत 4.10 लाख लोगों को 2019-20 में प्रशिक्षित किया गया है। कृषि क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए 3.42 लाख लोगों को विशेष कृषि के तरीके सिखाए गये हैं। देश में आईटीआई संस्थानों की संख्या लगभग 15 हजार पहुंच चुकी है। इसमें 5000 आईटीआई संस्थानों को पिछले पांच सालों के अंदर ही स्थापित किया गया है।

मालूम होकि बीते कुछ समय से विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार हमलावर रहे पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अब रोजगार का मुद्दा उठाया है। राहुल ने एक ट्वीट कर रोजगार को देश के युवाओं की मन की बात कहा है और युवाओं से इस अभियान से जुड़ने की अपील की है।
राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ‘देश के युवाओं के मन की बात: रोजगार दो मोदी सरकार।’ उन्होंने लोगों से अपील की कि आप भी अपनी आवाज युवा कांग्रेस के रोजगार दो ( #RozgarDo ) के साथ जोड़कर, सरकार को नींद से जगाइए। यह देश के भविष्य का सवाल है।

!!!!!!!!!!!!प्रेम क्या है!!!!!!?? (1)
आज का विषय है प्रेम प्यार क्या है। प्रेम जो मेने किया या प्रेम जो उनहोने किया। मे आजतक समझ नही पाया। प्रेम जो कृष्ण ने राधा से किया या रुक्मिणी ने कृष्ण से किया,,,,,किया प्रेम का आधार इतना कमजोर है। कुछ महीने या कुछ साल या कुछ पल साथ बिताना और फिर एक झटके मे सब खत्म कर देना, कुछ लोगो का प्रेम करके उसे खत्म कर देना बहुत सरल है। जेसाकि आज के दौर मे हो रहा है। कहते है जहा प्रेम है वहाँ वादविवाद भी होते है। यदि डर वादविवाद का होता है तो फिर प्रेम क्यो होता है। हम किसी को प्रेम करते नहीं ये तो हो जाता है। प्रेम किसी को पाना नही बल्कि प्रेम तो महसूस करने का नाम है। प्रेम यह नहीं की कोई हमे अच्छा या अच्छी लगती है।या फिर हम उसे हर कीमत पर पाना चाहते है। लैकिन लगता है कि प्रेम का मायना तेजी से बदलता जा रहा है पहले वो मुझे अच्छा या अच्छी लगती है। मे उसके बैगैर जी नहीं सकता या सकती हू। वो मुझे नही मिला या मिलि तो मे मर जाऊगा लेकिन जब हम उसे पा लेते है। तो कुछ समय तक तो सबकुछ अच्छा लगता है फिर एक बोरियत सी महसूस होने लगती है और हम एकदुसरे की कमयीओ को नोटिस करने लग जाते है ।और जो बाते एकदुसरे से करे बैगैर नही रहते थे वो छुपाने लग जाते है। अगर कोई वादविवाद है तो बैठ कर उन बातो को एक दुसरे से व्यक्त करके समाधान या समाप्त करने की कोशिश नहीं करते क्योंकि एक बोरियत उस प्रेम मे घर बनाने लग जाती है।दरअसल हम उस रिश्ते को निभाना ही नही चाहतै क्योंकि हमे तो कभी प्रेम था ही नही। बात यहातक बढ् जाती है और एकहि वाक्य बचता है ( मेनै तेरा इस्तेमाल किया और तुने मेरा)))))) बस सब खत्म और कुछ समय तक खामोशी,,,,,,,,,,,,,,, ✍️🙏

Rajkamal Goswami
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साहित्य संगीत कला विहीन: साक्षात्पशु: पुच्छ विषाणहीन: ।
तृणं न खादन्नपिजीवमानस्तद्भाग्धेयं परमं पशूनाम् ॥
साहित्य संगीत और कला से विहीन मनुष्य बिना सींग और पूँछ के पशु के समान होता है । पशुओं का परम सौभाग्य है कि वह चारा नहीं खाता ।
काव्य की एक विधा निंदा काव्य भी होती है , उर्दू में इसे हिजोगोई कहते हैं । अब यह कला लुप्तप्राय हो चली है वरना लखनवी शायरी में मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा और जुरअत हिजोगोई के माहिर शायर थे । हिजो की ख़ूबसूरती यही होती थी कि जिसकी निंदा की जाती थी वह मन मसोस के रह जाता था लेकिन कविता की तारीफ़ ही करता था ।
मिर्ॹा दाग़ दिल्ली से दुर्दिनों में भाग कर रामपुर पहुँचे , नवाब साहब ने उन्हें अस्तबल का इन्चार्ज बना दिया । दाग़ का रंग काला था जिसे मुश्क़ी भी कहते हैं और मुश्क़ी काले घोड़े को भी कहते हैं । जब दाग़ साहब अस्तबल में पहुँचे तो दीवार पर बड़े बड़े अक्षरों में एक शेर किसी ने उनके स्वागत में लिखा हुआ था ,
शहर देहली से आया एक मुश्क़ी
आते ही अस्तबल में दाग़ हुआ ।
दाग़ साहब इस काव्य कटाक्ष से आहत तो हुए किंतु शेर की प्रासंगिकता पर मुग्ध हो गये । उन्होंने शायर के सामने आकर अपना परिचय देने पर हज़ार रुपये का इनाम घोषित किया मगर कोई सामने आया नहीं ।
लखनऊ के नवाब भीलों के वन में शिकार करने गये थे , ख़बर आई कि उन्होंने एक शेर मारा है , मिर्ज़ा सौदा ने बड़ा गुस्ताख़ाना शेर पढ़ा ,
यारो ये इब्ने मुल्ज़िम पैदा हुआ दोबारा ।
शेरे ख़ुदा को जिसने भीलों के वन में मारा ॥
यह बहुत ही बड़ी गुस्ताख़ी थी । इब्ने मुल्ज़िम वह शख़्स था जिसने हजरत अली को शहीद किया था । हजरत अली को शेरे ख़ुदा भी कहा जाता है । शिया नवाब को इब्ने मुलज़िम कह देना मौत को दावत देना था । तो नवाब के सामने सौदा की पेशी हुई । नवाब ने कड़क के पूछा कि तुमने मुझे इब्ने मुलज़िम कहा ?
सिटपिटाये हुये मिर्ज़ा सौदा बड़े अदब से सफाई पेश की कि जो शेर हुजूर ने मारा वह भी तो ख़ुदा का ही शेर था । बमुश्किल तमाम जान की अमान पाई ।
निंदा काव्य या साहित्यिक व्यंग्य और कटाक्ष लिखना सदा से बहुत ही जोख़िम वाला काम रहा है । काव्यानुराग और व्यंग्य की समझ परमात्मा हर किसी को नहीं देता । जो लोग कार्टून बनाने पर क़त्ल कर देने की निंदा करते हैं वह भी कटाक्ष बर्दाश्त नहीं कर पाते ।
ममत्व और परत्व से रहित होकर ही साहित्य का आनंद लिया जा सकता है ।
राजकमल गोस्वामी

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