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वह है दास! मालिक के इशारे पर नाचना

Sonaali Mish
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एक और शब्द है जो अनुवाद का शिकार हुआ है वह है दास! दास का भारतीय परिप्रेक्ष्य में जो स्थान है, वह slave से पूर्णतया भिन्न है. रामचरित मानस में कहा गया है

“जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।।
निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।“

अत: दास का अर्थ भक्ति भाव से समर्पण कर देना, स्वामी का अर्थ भी मास्टर नहीं है! इसमें समर्पण है, दासत्व का अर्थ slavery नहीं है, यद्यपि अंग्रेजी अनुवाद में उसे slave ही लिया गया है. परन्तु इस शब्द को दास ही लिया जाना चाहिए था. जब हम slavery के इतिहास में जाते हैं तो इसका मूल हमें पश्चिम से मिलता है. दास शब्द का क्षरण हुआ, जब पश्चिम की कुरीतियाँ तथा मुसलमानों का आगमन हुआ. दास शब्द उस परिप्रेक्ष्य में जरा भी प्रयोग नहीं होता था जिस अर्थ में slave या गुलाम का प्रयोग होता था. और यह मैं नहीं कहती, यह ऐतिहासिक तथ्य कहते हैं.

INTERCOURSE BETWEEN INDIA AND THE WESTERN WORLD में एच.जी. रव्लिंसन H. G. RAWLINSON जो दक्कन कॉलेज, पुणे में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे, वह मौर्य काल के समय मेग्स्थ्नीज़ की इंडिका के हवाले से लिखते हैं One feature of Hindu society struck Megasthenes with admiration. Slavery, a universal custom in the Graeco-Roman world, was unknown.

अर्थात भारतीय समाज की एक खूबी ने मेगस्थनीज़ को बहुत प्रभावित किया कि भारतीय समाज में वह slavery नहीं थी जो ग्रीस और रोमन समाज का एक जरूरी हिस्सा थी.

slave का अर्थ है बंधक बन जाना, जबरन गुलामी करना! मालिक के इशारे पर नाचना, जबकि भारतीय परिप्रेक्ष्य में दास का अर्थ ह्रदय से भक्तिभाव से समर्पण है जैसे हनुमान चालीसा में तुलसीदास लिखते हैं

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुवर के दासा

जब तुलसीदास, या सूरदास ने अपने नाम के आगे दास लगाया तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह slave थे, अपितु वह ह्रदय से सेवा भाव से समर्पित थे. slave में सेवा भाव नहीं है, और गुलाम किसलिए इस्तेमाल होते थे, वह लिखा तो फिर से सोनाली तो बहुत कम्युनल है, आदि आदि लिखा जाने लगेगा.

परन्तु यह बात सत्य है कि हर शब्द का एक इतिहास है तथा दास, slave और गुलाम तीनों ही भिन्नार्थी हैं, यह समानार्थी नहीं हैं!

सूरदास के मुख पर जो वात्सल्य दिख रहा है, क्या वह किसी slave में दिख सकता है?

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