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ईरान, तुर्की और क़तर का मुक़ाबला करने के लिए अमेरिका, इस्राईल और अरब देशों की रूपरेखा तैयार : रिपोर्ट

15 सितम्बर को यूएई-इस्राईल शांति समझौते को औपचारिक रूप दे दिया गया, जिसका लम्बे समय तक मध्यपूर्व की भू-राजनीति पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।

मुख्य रूप से क्षेत्र में ईरान और तुर्की के बढ़ते प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए इस्राईल और अरब देशों के बीच इस तरह के समझौतों की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन के साथ इस्राईल के तथाकथित शांति समझौतों के विपरीत, जो अरब समाज में कभी गहरा प्रभाव नहीं छोड़ सके, फ़ारस खाड़ी के अरब देशों के साथ तालमेल के माध्यम से इस्राईल को केन्द्र में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

संयुक्त अरब अमीरात में राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक केन्द्र स्थापित करके, इस्राईल दूसरे अरब देशों में अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास करेगा।

इसी तरह, यह समझौता, तुर्की और क़तर के लिए एक बुरी ख़बर है। दोनों देश अन्य क्षेत्रीय देशों की रूढ़ीवादी व्यवस्था के सथान पर एक वैकल्पिक विचारधारा विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।

आने वाले वर्षों में अरब-इस्राईल के गठजोड़ के प्रभाव को रोकने के लिए, ईरान, तुर्की और क़तर को न केवल राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में एकजुट होना होगा, बल्कि अपनी रणनीति को भी अधिक धारदार बनाना होगा। क्योंकि अगर वह ऐसा नहीं करेंगे, तो निश्चित रूप से अरब रूढ़िवाद और इस्राईली विस्तारवाद का गठजोड़ पूरे क्षेत्र को आग के समुद्र में धकेल सकता है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अरब-इस्राईल नए गठबंधन से सबसे ज़्यादा नुक़सान ईरान को पहुंच सकता है। हालांकि यूएई ने यह दावा ज़रूर किया है कि यह समझौता, ईरान के मुक़ाबले में नहीं है, लेकिन ईरानी अधिकारियों ने तुरंत रूप से क्षेत्रीय रणनीति और राष्ट्रीय हितों पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभाव को समझने में कोई ग़लती नहीं की।

ईरान के सैन्य अधिकारियों और नेताओं ने इस समझौते की कड़े शब्दों में निंदा करने में कोई झिझक नहीं दिखाई और भविष्य में देश की सुरक्षा को होने वाले किसी भी संभावित ख़तरे के प्रति यूएई को चेतावनी दी।

अमरीका और इस्राईल, ईरान के चारो ओर एक घेरा बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि इस्राईल क्षेत्र में ऊर्जा और तेल से लेकर, राजनीतिक तथा जासूसी नेटवर्क क़ायम कर सके।

यहां सबसे अहम सवाल यह कि ईरान, इस्राईल और अमरीका की इस नई साज़िश का मुक़ाबला कैसे कर सकता है?

इस समझौते के सुरक्षा प्रभावों का मुक़ाबला करने के लिए निश्चित रूप से ईरान, इस्राईल और यूएई दोनों पर दबाव बनाएगा, ताकि कोई भी संयुक्त सुरक्षा या रक्षा परियोजना शुरू करने से पहले वह दो बार सोचें।

इस्राईल पर दबाव बनाना ईरान के लिए आसान है, क्योंकि ईरान ने पहले ही इस्राईल को उत्तर से लेकर दक्षिण तक घेरे में ले रखा है।

इसके अलावा, ईरान, क़तर और तुर्की के साथ एक रणनीतिक साझेदारी बना सकता है, क्योंकि यह दोनों देश भी यूएई-इस्राईल सहयोग से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। तुर्की और यूएई के बीच लीबिया से लेकर यमन तक टकराव चल रहा है।

दूसरी ओर, इस्लामी प्रतिरोध ने ईरान, सीरिया, इराक़ और यमन से लेकर हिज़्बुल्लाह और हमास का एक मज़बूत गठजोड़ मौजूद है, जिसमें तुर्की और क़तर के शामिल होने से यह रूढ़िवादी अरब-इस्राईल नए गठजोड़ के मुक़ाबले में सबसे मज़बूत मोर्चा बन सकता है।

अगर यह तीनों देश, रूढ़िवादी अरब देशों, इस्राईल और अमरीका का मुक़ाबला करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने मतभेदों को भुलाकर, एक प्लेफ़ार्म पर आना होगा। इससे न सिर्फ़ यूएई और इस्राईल को बांधकर रखने में मदद मिलेगी, बल्कि फ़िलिस्तीनी आकांक्षाओं को जीवित रखने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन प्राप्त होगी।

बिन ज़ायद और बिन ख़लीफ़ा, ट्रम्प के चुनावी सर्कस के जोकर

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि लोगों के बीच संपर्क केवल 7 प्रतिशत शब्दों से होता है, 38 प्रतिशत आवाज़ के टोन से और 55 प्रतिशत बाॅडी लैंग्वेज से। अगर शब्द, बाॅडी लेंग्वेज से अलग होते हैं तो सामने वाला व्यक्ति शब्दों के बजाए बाॅडी लैंग्वेज पर भरोसा करता है। अगर इस नियम को मंगलवार के दिन ट्रम्प, नेतनयाहू, बिन ज़ायद और अज़्ज़य्यानी के सर्कस से जोड़ कर देखा जाए तो बड़ी ही आश्चर्यजनक सच्चाइयां सामने आएंगी।

यह बात पूरी तरह से स्पष्ट थी कि इमारात व बहरैन के विदेश मंत्री अब्दुल्लाह बिन ज़ायद और अब्दुल लतीफ़ ज़य्यानी, अपने अमरीकी रिंग मास्टर के इशारों पर काम कर रहे थे। इसी तरह यह भी स्पष्ट था कि जो कुछ वाइट हाउस में हुआ वह ट्रम्प के चुनावी प्रचार के अलावा कुछ नहीं था जिन्हें अपनी सरकार के कमज़ोर क्रियाकलाप, अपने झूठों और राजनैतिक व नैतिक स्कैंडलों के कारण लोकप्रियता में भारी कमी का सामना है। इसी लिए सभी चुनावी सर्वेक्षणों में उन्हें उनके डेमोक्रेट प्रत्याशी जो बाइडन से पीछे बताया जा रहा है। यही कारण है कि ट्रम्प को हर वह काम करना है जो वे कर सकते हैं लेकिन उनके पास ज़ायद के बेटों और ख़लीफ़ा के बेटों के अलावा कोई है ही नहीं, इसी लिए उन्होंने उन्हें वाइट हाउस में तलब कर लिया। वे भी दुम हिलाते हुए पहुंच गए और समझौते पर दस्तख़त कर दिए। उन्होंने ज़मीर, प्रतिष्ठा और स्वाभिमान रखने वाले किसी भी इंसान के विपरीत, अपनी मूर्खतापूर्ण मुस्कानों से अपने संबंध में होने वाले अपमानजनक लेन-देन पर ख़ुशी प्रकट की।

यह बात भी पूरी तरह से स्पष्ट थी कि ट्रम्प ने ज़ायद के बेटों और ख़लीफ़ा के बेटों को अपने सर्कस के लिए जोकरों के रूप में चुना है ताकि शायद वे निराश और कोरोना से पीड़ित अमरीकियों को हंसा सकें। अलबत्ता अपने अमरीकी आक़ा के लिए ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों की सेवाएं जितनी भी हों, अमरीका की वास्तविक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा जो कोरोना, नस्लवाद, आग, बेरोज़गारी और राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक संकटों में घिरा हुआ है।

शर्मनाक समझौतों पर हस्ताक्षर के कार्यक्रम में, जो वास्तव में ट्रम्प के चुनाव प्रचार का कार्यक्रम था, सबसे बड़ी हार ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों को हुई है और अगले चरण में सऊद के बेटे हैं जबकि ट्रम्प को होने वाला नुक़सान, चुनाव में उनकी हार और कुछ भेड़ों की बलि से ज़्यादा नहीं होगा। इसी तरह नेतनयाहू को होने वाला नुक़सान ज़्यादा से ज़्यादा यही होगा कि वे जेल की सलाख़ों के पीछे पहुंच जाएंगे लेकिन लोक-परलोक की फ़ज़ीहत, ज़ायद और ख़लीफ़ा के बेटों के नसीब में लिख दी गई है और इतिहास, अरब व इस्लामी राष्ट्रों और दुनिया के सभी स्वतंत्र लोगों की धिक्कार व घृणा से वे अब कभी भी अपना दामन बचा नहीं पाएंगे।

बड़ा ख़ुलासा, यूएई और बहरीन ने इस्राईलियों के हाथों मस्जिदुल अक़सा का सौदा कर दिया

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की दलाली से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और बहरीन के इस्राईल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के समझौते में मस्जिदुल अक़सा के बारे में सौदेबाज़ी का एक बड़ा ख़ुलासा हुआ है।

इस समझौते में मस्जिदुल अक़सा की तथास्थिति की पूर्व सहमति का उल्लंघन करते हुए इसके विभाजन पर सहमति बनी है।

टेरेस्ट्रियल जेरूसालेम (टीजे) एनजीओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, यह समझौता मस्जिदुल अक़सा की यथास्थिति में बड़े बदलाव को चिह्नित करता है, जिसके दूरगामी और भयानक परिणाम निकल सकते हैं।

1967 की यथास्थिति के तहत अल-हरम अल-शरीफ़ या मस्जिदुल अक़सा के परिसर में सिर्फ़ मुसलमान इबादत कर सकते हैं, जो 14 हेक्टेयर पर फैला हुआ है।

ग़ैर मुस्लिम वहां जा सकते हैं, लेकिन इबादत नहीं कर सकते। 2015 में इस्राईली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू ने इस यथास्थिति को बाक़ी रखने पर बल दिया था।

लेकिन इस्राईल और फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों के बीच होने वाले हालिया समझौते में इस यथास्थिति को ख़त्म करने पर सहमति बनी है।

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने 13 अगस्त को इस समझौते का एलान करते हुए कहा थाः शांति के दृष्टिकोण से सभी मुस्लिम जो शांति के साथ आयेंगे, अल-अक़सा मस्जिद में इबादत कर सकते हैं और यरूशलम के अन्य पवित्र स्थल सभी धर्मों के मानने वालों के लिए खुले रहने चाहिए।

समझौते में जिस भाषा का इस्तेमाल किया गया है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि टैम्पल माउंट कि यथास्थिति में बड़ा बदलाव कर दिया जाएगा, जो मस्जिदुल अक़सा के परिसर में ही स्थित है।

बहरीन के साथ होने वाले समझौते में भी इसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है।

फ़िलिस्तीनी वकील और यरूशलम मामलों के जानकार, ख़ालिद ज़बरक़ा का कहना है कि इस समझौते से साफ़ ज़ाहिर है कि मस्जिद पर अब मुसलमानों का अधिकार नहीं रहेगा।

ज़बरक़ा का कहना था कि वास्तव में यूएई और अन्य अरब देशों ने इस्राईल को मस्जिद अक़सा को सौंप दिया है और उससे इस पवित्र स्थल का सौदा कर लिया है।

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