साहित्य

एक कवि जो बिक न सका

Bharat Yayawar
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एक कवि जो बिक न सका
भारत यायावर
बाजार में बिकने को बहुत आए
बड़े-बड़े शूरमा
रण- बाँकुरे !
कुछ ने अपने को अफसरों के हाथों बेच दिया
कुछ ने नेताओं के आगे और पीछे दुम हिलाई
कुछ पूंजीपतियों को बेचकर अपने को
खुश हुए
कुछ अपराधियों के लूट- मार में
शामिल हो गए
कुछ अपनी दुकान सजाकर
बैठ गए
कुछ अपनी टांग उठा कर
लेट गए!
कुछ ने रूप का व्यापार किया
और मीना बाजार किया
कुछ तस्करी कर
मालामाल हुए !
बिक रही थी आबरू
नीलाम हो रही थी नैतिकता
नगद नारायण का बोलबाला था !
ऐसे में एक मासूमियत से भरा कवि
बाजार में आया
और वह
मेरा ही समरूप था
बिकने को आतुर
मैं भी खड़ा रहा बाज़ार में
सुबह से शाम हो गई
सब क्रांतियाँ भी बिकती रहीं
और विकास भी बिकता रहा
कुछ लोग भ्रांतियों को भी बेच गए
कुछ बीमारियाँ भी बिक गईं
रात हुई
तो कबीर आए
पास खड़े होकर
समझाया
तुझमें क्या है जो खरीदेगा कोई
बाजार में खड़े हो
और कोई खरीदार नहीं है !
जलाकर अपने घर को निकले हो
हाथ की लुकाठी भी बुझ गई है
चलो गंगा के किनारे टहला जाए
किसी जलती चिता को
मौन होकर बस देखते रहें
फिर उसकी लपटों में खो जाएँ
घर है नहीं
कि घर जाएँ

( साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य ‘ के नए अंक में यह कविता प्रकाशित हुई है ।)

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