धर्म

और जब मूसा ने मदयन का रुख़ किया तो कहा…सूरए क़सस की आयत!

क़दम उठाने के बाद ही दुआ व प्रार्थना सार्थक होती है।

आवश्यकता होने पर ईश्वरीय पैग़म्बर की बेटियां चरवाहे का काम कर सकती हैं लेकिन कभी भी अपमान सहन नहीं कर सकतीं और न भीख मांग सकती हैं।

सूरए क़सस की आयत क्रमांक 22 और 23 का अनुवाद:

और जब मूसा ने मदयन का रुख़ किया तो कहा आशा है कि मेरा पालनहार सीधे रास्ते की ओर मेरा मार्गदर्शन करेगा। और जब मूसा मदयन के पानी (के कुएं) पर पहुँचे तो उन्होंने वहां (अपने चौपायों को) पानी पिलाते लोगों के एक गुट को देखा और उन (लोगों) से हटकर एक ओर दो स्त्रियों को पाया, जो अपने जानवरों को रोक रही थीं। उन्होंने पूछाः तुम्हारा (अलग खड़े होने से) क्या तात्पर्य है? उन्होंने उत्तर दियाः हम उस समय तक (अपने जानवरों को) पानी नहीं पिला सकते जब तक ये चरवाहे अपने जानवर निकाल न ले जाएँ और (हम इस लिए यहां आए हैं कि) हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।

संक्षिप्त टिप्पणी:

अपने घर-बार और शहर से पलायन के लिए तैयार रहना, बड़े सुधारकों के कार्यक्रमों में से एक है ताकि भविष्य की कठिनाइयों और कड़ी परिस्थितियों के लिए तैयार हो सकें।

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

अपने घर-बार और शहर से पलायन के लिए तैयार रहना, बड़े सुधारकों के कार्यक्रमों में से एक है ताकि भविष्य की कठिनाइयों और कड़ी परिस्थितियों के लिए तैयार हो सकें।

क़दम उठाने के बाद ही दुआ व प्रार्थना सार्थक होती है, प्रयास करने और क़दम उठाने के बजाए दुआ करने का कोई लाभ नहीं है।

महिलाओं व पुरुषों के बीच की सीमा का पालन करना और कार्य स्थान पर उनका एक दूसरे से अधिक मेल-जोल से दूर रहना, एक मान्यता है जैसा कि उन दो लड़कियों ने, जो ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत शुऐब की बेटियां थीं, मर्दों की भीड़ में अपनी भेड़ों को पानी नहीं पिलाया और इस बात की प्रतीक्षा में रहीं कि पुरुष चले जाएं तो वे अपनी भेड़ों को पानी पिलाएं।

आवश्यकता होने पर ईश्वरीय पैग़म्बर की बेटियां चरवाहे का काम कर सकती हैं लेकिन कभी भी अपमान सहन नहीं कर सकतीं और न भीख मांग सकती हैं।

अपनी समस्याओं के समाधान और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

दूसरों की सेवाओं का मूल्य समझना चाहिए और उचित ढंग से उनका बदला देना चाहिए।

सूरए क़सस की आयत क्रमांक 24 और 25 का अनुवाद:

तो मूसा ने उन दोनों (के रेवड़) को पानी पिला दिया। फिर छाया की ओर पलट गए और कहा हे मेरे पालनहार! मैं उस भलाई का, जो तू मेरी ओर भेज दे, ज़रूरतमंद हूँ। फिर (थोड़ी देर बाद) उन दोनों में से एक, जो शर्माते हुए चल रही थी, उनके पास आई। उसने कहाः मेरे पिता आपको बुला रहे है, ताकि आपने हमारे लिए (भेड़ों को) जो पानी पिलाया है, उसका बदला आपको दें। तो जब वे उनके (अर्थात शुऐब के) पास पहुँचे और उन्हें अपनी सारी बातें कह सुनाईं तो उन्होंने कहा कि बिल्कुल न डरो कि तुम अत्याचारी जाति (के लोगों) से छुटकारा पा गए हो।

संक्षिप्त टिप्पणी:

अपनी कठिनाइयों के समय, लोगों की समस्याओं को नहीं भूलना चाहिए और जहां तक संभव हो उनकी कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

अपनी कठिनाइयों के समय, लोगों की समस्याओं को नहीं भूलना चाहिए और जहां तक संभव हो उनकी कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

अपनी समस्याओं के समाधान और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए ताकि वह उस प्रकार उसका साधन उपलब्ध कराए जिसमें हमारी भलाई हो।

पैग़म्बरों के मत में समाज में महिलाओं की उपस्थिति में कोई रुकावट नहीं है अलबत्ता इसकी शर्त यह है कि यह उपस्थिति पूरी पवित्रता के साथ हो और महिला व पुरुष की सीमाओं का पालन किया जाए।

दूसरों की सेवाओं का मूल्य समझना चाहिए और उचित ढंग से उनका बदला देना चाहिए।

अगर हम ईश्वर के लिए काम करेंगे तो वह भी ख़तरों के समय हमारी मदद करेगा और हमें सुरक्षित रखेगा।

वंचितों और अत्याचारग्रस्त लोगों की सहायता और इसी तरह अत्याचार को रोकने के लिए अत्याचारियों के बीच प्रभाव बनाना अच्छी बात है।

सूरए क़सस की आयत क्रमांक 20 और 21 का अनुवाद:

और (उसी समय) एक आदमी नगर के अंतिम छोर से दौड़ता हुआ आया और कहने लगाः हे मूसा! (फ़िरऔन के) सरदार आपके बारे में परामर्श कर रहे हैं कि आपको मार डालें। अतः (तुरंत नगर से) निकल जाइए। मैं आपके हितैषियों में से हूँ। तो मूसा वहाँ से डरते और (ईश्वरीय सहायता की) प्रतीक्षा करते हुए निकल खड़े हुए। उन्होंने कहा, हे मेरे पालनहार! मुझे इस अत्याचारी जाति (के लोगों) से मुक्ति दे।

संक्षिप्त टिप्पणी:

महलों में रहने वालों के बीच भी सत्य प्रेमी लोग हो सकते हैं और झोंपड़ियों में रहने वालों के बीच भी असत्य के पुजारी हो सकते हैं।

इन आयतों से मिलने वाले पाठ:

अत्याचारियों की सहायता नहीं करना चाहिए लेकिन वंचितों और अत्याचारग्रस्त लोगों की सहायता और इसी तरह अत्याचार को रोकने के लिए अत्याचारियों के बीच प्रभाव बनाना अच्छी बात है।
अगर हम ईश्वर के लिए काम करेंगे तो वह भी ख़तरों के समय हमारी मदद करेगा और हमें सुरक्षित रखेगा।

कभी कभी मौक़े पर ख़बर पहुंचाना, एक पूरे समुदाय के भविष्य को बदल देता है।

अगर हिज़क़ील ने हज़रत मूसा को समय पर सूचित न किया होता और वे शहर से न निकल जाते तो संभव था कि फ़िरऔन के सिपाही उनकी हत्या कर देते।

महलों में रहने वालों के बीच भी सत्य प्रेमी लोग हो सकते हैं और झोंपड़ियों में रहने वालों के बीच भी असत्य के पुजारी हो सकते हैं।

कसौटी, हर स्थिति में सत्य और असत्य है, लोग कहां रहते हैं और कैसे जीवन बिताते हैं यह बात मानदंड नहीं है।

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