साहित्य

…और देर तक…यूं ही…मैं महकती रही दोपहरी में…©रश्मि शाक्य

Rashmi Shakya
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#दोपहरी_में
जितने चुपचाप से
खड़े थे पेड़
जितनी चुपचाप सी
बिछी राहें
उतनी चुपचाप सी
दोपहरी थी
जिन पे चलती रही
दोपहरी में
कुछ ख़यालों में
बेख़याल सी मैं
मन में
हिलती रही
रुमाल सी मैं
ताप सूरज का
होंठ पर रखकर
यूं ही
चलती रही दोपहरी में
बस उसका नाम
साथ चलता रहा
साथ चलते रहे
कई क़िस्से
उन में उलझे हुए कई धागे
कुछ कलावा के
कुछ थे जन्तर के
उलझनों से भरी
दोपहरी थी
मैं भी उलझी रही दोपहरी में
कोई एक राह भी
ज़रूर होगी
उसके घर तक
जो पहुंचती होगी
घर का
दरवाज़ा खुला होगा क्या
जिस के बिल्कुल बगल के कमरे में
कुर्सियां दो ही होंगी
अब तक क्या
उनके ठीक बीच में
वही टेबल
जिस पर वह फ़्रेम फोटो होगा क्या
जिसमें मासूम सी ख़ुश्बू कोई
दोनों के दरमियां
महकती थी
याद करती हुई वही मौसम
सारे मौसम
मुरीद थे जिसके
दूर तक…
…और देर तक…
यूं ही…
मैं महकती रही दोपहरी में
©रश्मि शाक्य✍️

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