साहित्य

क्या लिखने के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी है?

Ikkyu Tzu
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प्रश्न- मुझे एक किताब लिखनी है। उसके लिए कितना पढ़ना होगा! सीधा जवाब मिलेगा तो खुशी होगी। क्या लिखने के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी है?
इक्क्यु- कितना पढ़ना होगा से यदि आपका मतलब डिग्रीयों (BA, MA, Phd इत्यादि) से है, तो, किताब लिखने के लिए, इस सबकी कोई बहुत ज़रूरत नहीं है| हाँ, लेकिन भाषा और शिल्प का ज्ञान होना ज़रूरी है| अपनी खास शैली विकसित करने के लिए बहुत-से लोगों को पढ़ना होगा| बहुत से शैलीयों और कथ्यों से परिचित होना जरूरी है|

बिना पढ़े बिंब-प्रतीक का संशिष्ट प्रयोग, उपमा एवं सूक्ति का सटीक इस्तेमाल सीखना संभव नहीं है| वसीम वलेरी साहब का एक शेर है- “कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है ये सलीक़ा हो, तो हर बात सुनी जाती है” और सलीक़ा आपको पढ़ने से आएगा| इसीलिए जितना हो सकते उतना पढ़े, उन को पढ़ें जिनको सब पढ़ते हैं, उनको भी पढ़ें जिनको कोई नहीं पढ़ता है| सब तरह के लेखकों को पढ़ें| एक नियम के तहत पढ़ें, धार्मिक रूप से पढ़ें| यदि आपको कविता पसंद है, तो कहानियां पढ़ें, कहानियां पसंद है तो उपन्यास पढ़ें, उपन्यास पसंद है, तो धार्मिक किताबें पढ़ें, पतली किताबें पसंद है तो मोटी किताबें पढ़ें| अपने सारे पसंद-नापसंद, तर्क-समझ, नियम-क़ानून और आलस्य को ताक पर रखकर पढ़ें| मन अक्सर तर्क देता है- यदि पढ़ोंगे तो दूसरों से प्रभावित हो जाओगे, उसके जैसा लिखने लगेगो| यह बहुत ही ग़रीब तर्क है, इसको तिलांजलि देकर पढ़ें| इस तरह के सभी मनहूस तर्कों को तर्पण दें, और बेहिसाब पढ़ें| आमतौर पर मैं लोगों को 30 पेज रोज़ पढ़ने को कहता हूँ| लेकिन यह मिनिमम है, आपको दिन में कम-से-कम 100 पेज पढ़ने की आदत डालनी होगी|

पढ़ने के तीन नियम-

पहला नियम- सबसे पहले तो उन लेखकों को ख़ूब पढ़ें, जो आपको पसंद है| फिर पता करें कि आपके पसंदीदा लेखक किसको पढ़ते थे, या पढ़ते हैं| मान लीजिए मुझे अज्ञेय को पढ़ना पसंद है, तो अब मैं अज्ञेय को ही पढ़ते नहीं चला जाऊंगा, मैं पता करूँगा कि वात्सायनजी किसको पढ़ना पसंद करते थें, उनकी लेखनी पर किसका छाप था| और इस तरह से मुझे डी एच लॉरेन्स के बारे में पता चलेगा| फिर मैं उनको भी पढूंगा|

दूसरा नियम- जब पढ़ने का मन करे तो क्लासिक पढ़ें, सभी देशों के जो भी कालजयी किताबें हैं, उनको पढ़ें, लियो तोल्स्तोय, दोस्तोवस्की, तुर्गनेव, चेखव, गोर्की, कामू, काफ्का, इरविंग स्टोन, खलील जिब्रान, नीत्शे, ज्यां पाल सार्त्र, शेक्सपियर, इत्यादि को पढ़ें (लिस्ट बहुत लम्बी है), फिर जब पढ़ने का मन नहीं करें तो निर्मल वर्मा, अज्ञेय, प्रेमचंद, मंटो, मोहन राकेश, श्रीलाल शुक्ल, ममता कालिया, रविन्द्र कालिया, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, कृष्णा सोबती, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, सुरेन्द्र वर्मा, राजेन्द्र यादव, मन्नू भण्डारी, कृशन चन्दर और (यह लिस्ट भी बहुत लम्बी है) को पढ़ें| फिर जब पढ़ते-पढ़ते भयंकर ऊब पकड़ ले, तब उन लोगों को पढ़ें जिनको वे लोग भी पढ़ते हैं, जो किसी और को नहीं पढ़ते हैं, मसलन चेतन भगत, और ऐसे ही बहुत से नाम| फिर अंत में जब पढ़ते-पढ़ते बेहोशी छाने लगे, तब जासूसी उपन्यास पढ़ें| और जब आप पूरे ही बेहोश हो जाएं, तो आपने को होश में लाने के लिए एकदम ही घटिया साहित्य पढ़ें, अश्लील किताबें पढ़ें, प्रतिबंधित किताबें पढ़ें|

तीसरा नियम- हर बार जैसे ही कोई किताब खत्म हो उसकी समीक्षा लिखें, अपने लिए| यदि किताब आपको अच्छी लगी, तो इस पर विचार करें कि किताब आपको क्यों अच्छी लगी| या फिर अच्छी नहीं लगी, तो इसका भी कारण ढूंढें| दोस्तों को अपनी पसंदीदा किताबों के बारे बताएं, उनसे भी उन्हें पढ़ने के लिए कहें| अगर आपकी बात मानकर वे किताब ख़रीद लेते हैं, और उसे पढ़ते हैं, तो समझिये आपके अन्दर एक अच्छा संवेदनशील पाठक और लेखक जन्म लेने लगा| अब आप न सिर्फ किताबों को पसंद या नापसंद करते हैं, बल्कि पसंद या नापसंद की फीलिंग को गहराई से महसूस भी करते हैं, उसकी व्याख्या भी कर सकते हैं| और इससे भी बड़ी बात है कि आप दूसरों तक भी अपने भावों को संप्रेषित कर पाते हैं| यही लेखक बनने की शुरुआता है|

लेकिन क्लासिकस के मामले ऐसा नहीं सोचें| जैसे वॉर एंड पीस पढ़कर इस तरह विचार नहीं करें कि किताब मुझे पसंद आई या नहीं| अब आपकी पसंद का सवाल नहीं है| अब यह पूछें कि किताब मुझ तक पहुंची या नहीं| तोल्स्तोय जो कहना चाह रहे हैं, उसे मैंने समझा या नहीं| यदि समझ लिया, तो उन पर मनन करें| यदि नहीं समझा, तो इस सम्बन्ध में भी विचार करें कि आखिर क्यों किताब आप के उपर से निकल गई| और पसंद आने और न आने, दोनों ही स्थितयों को किताब को दो बार और पढ़ें|

लिखने के तीन नियम-

पहला नियम- नियमित रूप से लिखें| शुरुआत में नियमित रूप से लिखना बहुत ज़रूरी है| आप क्या लिखते हैं, इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है, बस लिखना है| दोस्तों को मेल लिखें, खत लिखें, फेसबुक पर पोस्ट लिखें, डायरी लिखें, कहानी लिखें, कविता लिखें, उपन्यास लिखें, जो मन में आए वही लिखें| बस इतना ध्यान रखना है कि दिन में 3 पेज कम-से-कम लिखना ही है|

दूसरा नियम- सुबह या रात सोने से पहले 1 घंटा एकदम अकेले होकर बिताएं, नो मोबाइल, नो टीवी, नो किताब, नो लिखना, नो दोस्त, किसी भी प्रकार का कोई काम नहीं| सुविधा हो तो किसी पार्क, जंगल, नदी के पास, तालाब के पास या कहीं भी प्रकृति में चले जाएं| यह दूसरा नियम अभी तक मैंने आपको जितने भी नियम बताएं हैं, उसमे सबसे अहम् है| इस एक घंटे में पास्ट या फ्यूचर के बारे में कुछ भी नहीं सोचना, बस प्रकृति साथ होना है|

तीसरा नियम- लिखने पढ़ने में इतना न खो जाएं कि समाज और लोगों से आप बिलकुल कट ही जाएं| लोगों से मिले, दोस्तों से बातें करें, फिल्म देखें, यात्रा करें, बच्चों के साथ खेलें| कभी यूं ही व्यर्थ की चीज़ों को करते हुए समय नष्ट करें| लेखक के लिए उसका कोई भी अनुभव व्यर्थ नहीं जाता है|

पीछे मैं निर्मल वर्मा की पत्नी का एक इन्टरव्यू देख रहा था, उसमें उन्हों बताया, “निर्मल सुबह 5 बजे उठते थे, फ्रेश होकर 6 बजे के आसपास अपने टेबल पर बैठ जाते थे, फिर 1 बजे तक वे लिखते-पढ़ते थे, बीच में एक-दो छोटा ब्रेक लेते थे चाय-कॉफ़ी के लिए, लेकिन किसी से कोई बात-चीत नहीं करते थे| फिर 1:30 पर हम लंच लेते थे| लंच के बाद से रात सोने तक निर्मल बहिर्मुखी बने रहते थे, घर में सबसे बातें करते थे, दोस्तों से मिलते थे, बहस करते थे, बाहर जाते थे, पार्क में घुमते थे, फ़िल्म देखते थे, सोने तक वे बिलकुल एक्टिव रहते थे|

इसी तरह का कुछ संतुलन स्थापित करना ज़रूरी है| दिन का एक हिस्सा बिलकुल मौन और शांत और दूसरा हिस्सा एकदम एक्टिव और फुल ऑफ़ लाइफ|
एक और बात- मोबाइल, फोन, टीवी, और लैपटॉप का इस्तेमाल यदि संभव हो तो सुबह उठने के तीन घंटे बाद ही करें, और रात सोने से 3 घंटे पहले बंद कर दें|

अंतिम नियम-
उपरोक्त नियमों का पालन, धार्मिक रूप से, आपको पहले 12 से 36 महीने ही करना है| उसके बाद कोई नियम नहीं, फिर जैसा आपको सहज लगे वैसा ही करें| पढ़ने का मन करें, पढ़ें, नहीं मन करें तो न पढ़ें| जो मन में आए वही कहें| और अब वो लिखना शुरू करें, जो आपको सच में लिखना है, जिसके लिए आपने 1 (या 3) साल की साधना की है| यदि आपने साधना अच्छे से की है, तो आपको सिद्धियाँ ज़रूरी मिलेगी| और जो सिद्ध हो जाता है, वह एक दिन प्रसिद्ध भी हो ही जाता है|

एक और बात, पूरी दुनिया के सभी बड़े लेखकों का यह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अनुभव यह रहा है कि ब्रह्मचर्य (काम उर्जा का रुपान्तरण) की साधना, आपको काफी रचनात्मक बनाता है| इस पर भी विचार करें|

– इक्क्यु केंशो तजु

नोट-आप आपने प्रश्न ikkyutzu@gmail.com पर मेल कर सकते हैं| एक प्रश्न का जवाब पाने के लिए 500 (और अधिक) डोनेट करना अनिवार्य है|

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