साहित्य

चुपके से तबाही चली आती है!

रमाकान्त नीलकंठ
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साहित्य की समझ और प्रचलित कवि-लेखक
सारा जीवन साहित्य में गुजारने के बाद किसी साहित्यकार को यह समझ में न आए कि साहित्य होता क्या है और जन-मन से उसका सम्बन्ध क्या है तो समझना चाहिए कि साहित्यिक प्रवृत्ति का पानी कितना गंदा हो चुका है और किस स्तर तक उतर चुका है। इतिहास-बोध और जन-अभिरुचि में कितना बड़ा फांक पैदा हो गया है कि एक देशी लेखक देशी अस्मिता पर ही कुल्हाड़ी चलाता है और छपने मात्र से निहाल हो जाता है कि क्या दांव मारा है, कि वह जरा भी इस बात पर नहीं जाता कि पढ़ने वालों के चित्त पर गुजरेगा क्या या गुजरा क्या होगा या कोई पढ़ता भी है क्या।

ऐसे लोग आज हिन्दी साहित्य के कर्णधार बने लेखक-कवि हैं। साहित्य से उनके रिश्ते को इस तरह भी समझिए कि साहित्यकार शब्द अपना अर्थ, अपनी पहचान इस कदर खो चुका है कि वे खुद अपने को साहित्यकार कहने-कहलाने में शर्म की भेंट चढ़ चुके हैं। अब वे अधिक से अधिक लेखक हैं, नहीं तो कवि हैं, कथाकार हैं, व्यंग्यकार हैं,‌ नवगीतकार हैं, गज़लकार हैं। किन्तु निबंधकार भी नहीं रह गये हैं। वे केवल हिन्दी की साहित्य-परम्परा और मानकता ही नहीं, दुनिया भर की साहित्य-परम्पराओं और मानकों को तिलांजलि देकर नंगधड़ंग बरसात के दिनों में सड़क के किनारे देहात में सुबह-शाम शौच करने वालों की तरह निर्लज्ज, असभ्य-असंस्कृत आदमियों-औरतों की तरह लेखकीय व्यवहार का फर्ज़ पूरा कर रहे हैं। जो किसी समझदार, हृदयदार, दिमागदार मनुष्य के गले नहीं उतर सकता। साहित्य तो छोड़िए, औसत लेखन की पीठ में ही वे छुरा घोंप रहे हैं।

लेखन के नाम पर कितना घटिया, कितना उबाऊ, कितना अधकचरा, कितना बिडम्बनापूर्ण, कितना कायल न करने वाला, जनता का जी जलाने वाला कूड़ा और फर्जी कविता-कथा-लेख सामग्री पत्रिकाओं, पत्रों, किताबों के माध्यम से वे परोस रहे हैं, परोसते रहे हैं कि समझ में नहीं आता कि प्रतिभा और औचित्यबोध के पतन की यह अवस्था सामूहिक रूप से पराकाष्ठा के स्तर तक तक पहुंची कैसे! साहित्यिक संस्कार इस तरह यकायक एकबारगी इतने लम्बे समय के लिए पुंछ कैसे गये! विवेक के सारे वल्ब एक साथ ही बुझ कैसे गये! और दुख इस बात का, मलाल इस बात का कि यह दिन देखने मेरे जैसे तमाम लोगों को क्यों बदा ! (मेरा लेखकीय दौर तो मात्र तीन साल का है, तब भी।)

मुझे पक्का विश्वास है कि भविष्य में यदि कोई व्यास जैसा (आचार्य शुक्ल जैसा हो तब भी) मनस्वी हिन्दी साहित्य के इतिहास का सम्पादक हुआ तो कम से कम विगत पांच दसकों के साहित्य को निकाल बाहर करेगा। या उसे ‘अंधकार के पांच दसक’ शीर्षक देकर एक-दो प्रस्तरों में अपने क्षोभ को वाणी देते हुए इस काले अध्याय को समाप्त कर देगा। इस काल की कोई उपलब्धि यदि रेखांकित भी भविष्य में होगी तो वह पुराने रचनाकारों की रचनावलियों का सम्पादन और भूमिका-लेखन होगी। सबसे ज्यादा तकलीफ़देह कारस्तानी तो इस दौरान की पत्रिकाओं के सम्पादकों की कूती जाएगी कि ऐसे लीचड़, बैल-बुद्धि के सम्पादक भरभराकर किस गोष्ठ से, घोष से बिल से, ढाबे से, कारखाने से या कहां से निकले कि साहित्य की पूरी फसल ही चर गये, बगीचा ही खा गये और साहित्यिक पत्रकारिता की जमीन पर गेहूं जौ चावल, दलहनी तेलहनी, गन्ना आदि दानेदार, रसदार फसलों की जगह भ्रामक, नकली, निरर्थक, चोर पौधे उगा गये, उगाते रहे, उगाते चले आ रहे। बगीचे उजाह कर वहां भी खर-पतवारों की खेती की, जिनमें सांप-छछूंदर पले। पलते जा रहे।

जिस दौर के लेखक-कवियों में इतनी मानसिक योग्यता भी न हो कि वे समझ सकें कि साहित्य मनुष्य के राग तत्त्व की झांकी है जिसमे विराग भी शामिल है, संघर्ष भी शामिल है, जीवन का लक्ष्य भी शामिल, जिसमें सब शामिल है तो उसकी रचना में यदि वे सूत्र, वे कला-कौशल अनुस्यूत ही नही बल्कि मांस-मज्जा की तरह रचे-बसे नहीं होंगे, ओतप्रोत नहीं होंगे जो मनुष्यमात्र को रचना में अपना चित्र, अपने परिवेश, देश, समाज, काल का चित्र देखने में सहायक होते हैं, तो वह रचना साहित्यिक रचना किस मुंह से कही जाएगी। जो रचना मनुष्यमात्र को कायल न करे, उसके मन को बांधे न, अपने कहे से तदाकार न करे, उसे उठाए न, झकझोरे न, संतोष न दे, क्या वह रचना भी रचनात्मक साहित्य की श्रेणी में आएगी ? हर्गिज नहीं।

सारी मनुष्य जाति के जीवन का ढर्रा अन्तत: एक ही है इसलिए किसी भाषा का साहित्य अनुवादित अवस्था में भी सभी मनुष्यों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। प्रभावित करने की यह क्षमता, लेखकों में बड़ा-छोटा आंकने का पैमाना, साहित्य में लोगों की विशेष दिलचस्पी का कारण क्या है ? लेखकों में निहित वह बौद्धिक शक्ति जो मानव मनोजाल को भलीभांति समझती है, उसपर अचूक पकड़ रखती है, मनुष्य मन की प्रकृति और सामाजिक संरचना के ताने-बाने के आपसी समीकरण, सामंजस्य, अंतर्विरोध और पाखण्ड को हस्तामलकवत् देखने मे सक्षम होती है, सच्चाई किधर है, का निर्णय-विवेक रखती है लेखकीय प्रतिभा और उसके कलाकौशल का आधार है, बुनियाद है। फिर साहित्य की विभिन्न विधाओं में कालक्रम से हुई प्रगति जो परम्परा का रूप धारण करती है, की समझ कितनी है, भी साहित्यिक कृति की सफलता में हाथ बँटाती है।

वास्तव मे साहित्यकार अपने युग का और आने वाले युगों के भी काम का रसात्मक‌ यानी अनुभूति के स्तर पर चढ़ा हुआ अभिव्यंजक प्रवक्ता होता है। जिस साहित्यकार में यह बौद्धिक योग्यता नहीं होती वह साहित्यकार कहलाने का हकदार नही है क्योंकि वह अपने लेखन से लोगों से संवाद नहीं कर सकता, उनका संबोधन नहीं कर सकता, उन्हें कायल नहीं कर सकता, अनुरंजित नही कर सकता। उनके हृदय को स्पंदित, व्यंजित, रोमांचित, आनन्दित नहीं कर सकता तो वास्तव में उनके लिए व्यर्थ है। निष्फल है। साहित्य की पीठ पर भार है। ऐसे भारों से साहित्य को मुक्त करना आलोचक का दायित्व है। बशर्ते उस मनोकाठी का आलोचक हो। छुटभैया न हो यानी वैसा आलोचक न हो जो रचना-निर्भर जीविकोपायी मात्र या यशलोभी मात्र है, आलोचक रचना-निर्भर तो होता है लेकिन वह रचना-हस्तक्षेपक भी होता है। दौर में उभर रही पतनशील प्रवृत्तियों से आगाह कर सकता है। साहित्य पर मँडरा रहे खतरों के विरुद्ध मोर्चा खोल सकता है।‌ वह मार्ग-निर्देशक हो सकता है।

अत: यह समझ रखनी चाहिए कि साहित्य नीरस, निर्गुण ज्ञानमार्ग का नहीं, बुद्धि के प्रकाश में भाव मार्ग का राही है। साहित्यकार में वह दम, वह बूता होना चाहिए कि वह मनुष्यमात्र के चित्त को अपने भाव प्रकाश से, भाव सम्पत्ति से आलोकित कर सके, अनुरंजित कर सके, प्रभावित कर सके, कायल कर सके। सहृदय जनमात्र को अपने रचनात्मक उत्कर्ष से अपनी ओर खींच सके, उसमें तल्लीन कर सके। उस बल पर आह्लादित और गमगीन कर सके, उदारता में उठा सके, करुणा में डुबा सके, सौन्दर्य से चकित कर सके, चमत्कृत कर सके, शमित कर सके। रमा सके, सत्साहस के लिए उत्साह से भर सके। कला-साहित्य के प्रति प्रेम ही नहीं, श्रद्धा भी पैदा कर सके।

… रमाकान्त नीलकंठ

रमाकान्त नीलकंठ
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तबाही
जब तबाही चली आती है
न जाने क्या दिमागी दशा में कुछ फँसा जैसे
चला आता है
भलाई चली जाती है
बुराई चली आती है,
आदमी की जात भी असहाय कैसी चीज
समुन्नत उठी जाती गगन छूती यात्रा भी
चूमती जमीन जैसे ढली जाती है
निज की ही उमंगों ख्वाब-रंगों
गहन गहरे शांत पर बहिरंग धारा की तरंगों
छली जाती है
अंधी गली जैसे चली जाती है
विपथगा वीथिका-पथ की गुलाबी
स्निग्ध आभा
काजलों के बादलों से मली जाती है,
खुलती हुई खिलती हुई जीवन विजय गाथा
पतन के मन के पराजय के उठे इतिहास-पैरों
लोक-पथ पर दली जाती है
तबाही चली आती है
गवाही चली आती है
वगैरह चले आते हैं
विग्रह चला आता है
अथाह पानी-रात की सम्भ्रम-भरी दुर्दांत कोई
छांह-जैसी धार उतरी चली आती है
निर्देश जैसे काल के घर से घुमंतू चले आते हैं
विधान जैसे नया कोई भाग्य रचने चला आता है,
आकाश जैसे बदल जाता है
धरा जैसे पलट जाती है
पर्वत नदी जैसे वन जैसे
उदधि जैसे उछल जाते हैं,
तबाही चली आती है
दुनिया बही जाती है
दुनिया ढही जाती है
कोई नहीं होता पास कोई नहीं होता खास
कोई नहीं होती आस
सब विश्वास जैसे फांकते हैं धूल
सब निर्मूल सब बे-शिखा-शाखा
और सब बे-ठाट सब बे-चूल
जैसे बिना आशा बिना भाषा
बिना फूले बिना पतरे
चिन्दियों-से उड़े जाते
क्या तमाशा बना जाता
जगहँसाई हुई जाती
जब तबाही चली आती
नाचती गाती कि छाती चढ़ी जाती
होश की बाती बुझाती बढ़ी जाती
रक्त‌ जीह्वा से भयानक कढ़ी जाती,
कटा सिर भी लिए कर में
नाश है निर्माण जैसे तड़े आती
छूटता है नहीं उसका साथ
छोड़े साथ,
ऐसी है तबाही
व तबाही है कोई बदी ऐसी
दोष सारा आदमी के सिर जैसे मढ़े आती
व सारे समय सीने पर उसके
यह कि जैसे युद्ध का मैदान हो वह
लाल आंखों से
उगलती आग आंखों से
विप्लव-घोर आंखों से
जैसे कूटती है आदमी को
काढ़ती है आदमी से रूप कोई नव्य
जैसे अर्थ कोई दृश्य कोई श्रव्य काफ़ी भव्य,
चुपके से बहाने से
तबाही चली आती है !
… रमाकांत नीलकंठ

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