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तालिबान काबुल से 40 किमी दूर हैं : तालिबान ने जो करिश्मा कर दिखाया है वो ”अनोखा” है, बेमिसाल है : रिपोर्ट

किसने सोचा था कि जंगलों, पहाड़ों में जीने वाले लोग पूरी दुनियां को कभी न भूलने वाली जंग में हरा देंगे, 1991 में सुपर पावर अमेरिका ने अपने 54 मित्र देशों को साथ में लेकर ज़बरदस्त हमला किया था, अमेरिका के पास लेटेस्ट टेक्नोलॉजी थी, खतरनाक हथियार थे, घातक युद्धक विमान, पनडुब्बियां और विशाल थल सेना थी, 54 देशों की सेना अमेरिका के साथ थी बाकि देश अमेरिकी गठबंधन की अन्य तरीकों से मदद कर रहे थे, अमेरिका के मुकाबले में थे तक़रीबन 30 हज़ार अफ़ग़ान तालिबान, जिनका लीडर थे मुल्ला मुहम्मद उमर,

तालिबान के पास पुराने हथियार थे, खाने, पीने का कोई बंदोबस्त नहीं था, उनके जिस्म पर फटे पुराने कपडे थे, उनके नंगे पैर थे, उनके चेहरों पर रुआब था, उनकी आँखों में खुआब था, उनकी ज़बानों पर अल्लाह और रसूल अल्लाह का नाम था, उनके दिलों में दीन-ए-इस्लाम था, उनके सरों पर बड़ी बड़ी पगड़ियां थीं और उनके हाथों में बंदूकें थी,,,,इस मामूली सी ग़ैर मामूली नफरी को लेकर मुल्ला उमर अमेरिका से टकरा गए थे

उस वक़्त अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने कहा था ”हम तालिबान” के लिए अफ़्ग़ानिस्तान की ज़मीन तंग कर देंगे”,,जवाब में मुल्ला उमर ने कहा था, ”अल्लाह जनता है क्या होने वाला है और ज़मीन तो अल्लाह की है”,,,

तालिबान और अमेरिका का समझौता हो चुका है, अल्लाह अल्लाह कर के अमेरिका को अपनी जान बचा के भागना पड़ा है, अब तालिबान और अफ़्ग़ानिस्तान की सरकार के बीच आपसी सुलह की बातचीत शुरू हो चुकी है, तालिबान ने तमाम समझौते अपनी शर्तों पर किये हैं, वहीँ तालिबान अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी से तक़रीबन 40 किलोमीटर की दुरी पर हैं, तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान के 80 फीसद से ज़यादा हिस्से पर तालिबान का कब्ज़ा है, सुलह, समझौते हो रहे हैं और तालिबान काबुल की तरफ बढ़ रहे हैं

जल्द ही तालिबान के पास अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत होगी, रूस, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान, चीन, नेपाल, मलेशिया, श्रीलंका, बंगलदेश, म्यांमार, मालदीव, नार्थ कोरिया का नया ग्रुप दुनियां के सामने होगा, अफगान तालिबान ने अल्लाह की मदद से जो कामयाबी हासिल की है वो दुनियां के लिए नसीहत, सबक़ है

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तालिबान ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया को ख़ाक़ चाटने पर मजबूर कर दिया : रिपोर्ट

कैसे कहें, क्या कहें, कितना कहें, किस किस के बारे में कहें,,,बहुत मुश्किल है अल्फ़ाज़ों को खोजपाना, तालिबान को अल्लाह ने जो फ़तेह/क़ामयाबी दी है, उसे बयान करना आसान नहीं, तालिबान इस ज़मीन पर अब तक की सबसे बड़ी और ख़ौफ़नाक जंग के फ़ातेह हैं

यूरोप के लुटेरे/चोर/डाकू चरित्र के देश, षड्यंत्रों में माहिर इस्राईल, सबसे ताक़तवर अमेरिका, 54 मुस्लिम देशों में से कोई एक भी साथ नहीं था, ज़मीनी सच्चाइयों को कुछ वक़्त के लिए गड़बड़ तो कर सकते हैं झुठला नहीं सकते, अफ़्ग़ानिस्तान आज पूरी दुनियां में चर्चा/राजनीती का केंद्र बना हुआ है और तालिबान ने जो करिश्मा कर दिखाया है वो ”अनोखा” है, बेमिसाल है, ऐसा कभी नहीं हुआ था कि एक संगठन पर दुनियां के 200 देश हमला करें और हार जायें, ये बिलकुल जंगे बदर के जैसी फ़तेह है,

….हैं सितारे कुछ, नज़र आते हैं कुछ,,,देते हैं धोखा ये बाज़ीगर खुला,,,,दुनियां हैरान है, मगर क्यों, इसलिए कि ये चमत्कार हुआ कैसे, जब इधर से उधर कनेक्टिविटी ‘लिंक’ क़ायम हो जाता है तब ऐसा ही होता है, कि ‘वो’ चारपाही के चक्कर लगा कर दुआ करता है कि मेरे बेटे की बीमारी मुझे दे दे और उसे अच्छा करदे, दुआ पूरा हो जाती है, हाथ में गोश्त का टुकड़ा लेकर ‘सूरज’ से कहते हैं ‘इसे भून दे’, और सूरज हुकुम पर अमल करता है,,,बात ये है कि ‘ईमान’ का एलिमेंट ही है जो तालुक क़ायम रखता है, हमारा दीन, हमारी इबादतों का दुरुस्त होना इंसानी कामयाबी की ज़मानत है,

इस राज़ को इक मर्द-ए-फ़रंगी ने किया फ़ाश
हर-चंद कि दाना इसे खोला नहीं करते
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिस में
बंदों को गिना करते हैं तौला नहीं करते

अल्लामा इक़बाल की एक नज़म
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फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआ
है पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजा
था सरापा रूह तू बज़्म-ए-सुख़न पैकर तिरा
ज़ेब-ए-महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहा
दीद तेरी आँख को उस हुस्न की मंज़ूर है
बन के सोज़-ए-ज़िंदगी हर शय में जो मस्तूर है
महफ़िल-ए-हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया-दार
जिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत-ए-कोहसार
तेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार
तेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वार
ज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी-ए-तहरीर में
ताब-ए-गोयाई से जुम्बिश है लब-ए-तस्वीर में
नुत्क़ को सौ नाज़ हैं तेरे लब-ए-एजाज़ पर
महव-ए-हैरत है सुरय्या रिफ़अत-ए-परवाज़ पर
शाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ पर
ख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ पर
आह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा है
गुलशन-ए-वीमर में तेरा हम-नवा ख़्वाबीदा है
लुत्फ़-ए-गोयाई में तेरी हम-सरी मुमकिन नहीं
हो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र-ए-कामिल हम-नशीं
हाए अब क्या हो गई हिन्दोस्ताँ की सर-ज़मीं
आह ऐ नज़्ज़ारा-आमोज़-ए-निगाह-ए-नुक्ता-बीं
गेसू-ए-उर्दू अभी मिन्नत-पज़ीर-ए-शाना है
शम्अ ये सौदाई-ए-दिल-सोज़ी-ए-परवाना है
ऐ जहानाबाद ऐ गहवारा-ए-इल्म-ओ-हुनर
हैं सरापा नाला-ए-ख़ामोश तेरे बाम दर
ज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मर
यूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहर
दफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र-ए-रोज़गार ऐसा भी है
तुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है

کاش ایسا ہو
کہ اب کے بے وفائی
میں کروں
تُو پھرے
قریہ بہ قریہ ، کُو بہ کُو
میرے لئے
اور میں تو
لامحدود ہوجاؤں سمندر
کی طرح
تُو بہے
دریا بہ دریا جُو بہ جُو
میرے لئے

कभी के दिन बड़े कभी की रात, 19 साल पहले अमेरिका ने पूरी दुनिया के साथ मिलकार अफ़ग़ानिस्तान पर चढ़ाई की थी, दूसरी तरफ थे अकेले तालिबान, 54 मुस्लिम देशों में से कोई एक भी तालिबान के साथ नहीं था, सिर्फ 50000 तालिबान थे और उनका मुक़ाबला विश्व की सुपर पॉवर अमेरिका, और उसके मित्र 42 देशों से था, लेकिन वक़्त कैसे बड़े बड़े ताकतवरों के सर झुकाता है, वो आज अफ़ग़ानिस्तान में फसे अमेरिका को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है. अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता क़तर की राजधानी दोहा में दस्तखत हो गया है, समझौते की तमाम शर्तें तालिबान के मुताबिक शमिल की गयी हैं, इस समझौते में अमेरिका ने इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान ”तालिबान” लिखा है, इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान को संयुक्त राष्ट्र से मान्यता नहीं मिली हुई है, फिर भी ये समझौता कई तरह से ऐतिहासिक हैसियत का है,

अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ टवीन टॉवर अटैक को मुद्दा बना कर हमला किया था, तालिबान की कोई हैसियत नहीं थी, उनके पास सिर्फ 30 हज़ार लड़ाके थे, हथियार लोकल फैक्ट्रियों के बने हुए थे, ज़्यादातर लड़ाके खेतों में काम करने वाले किसान, मजदुर थे, जबकि अमेरिका और उसके बिरादर मुल्कों के पार लेटेस्ट टेक्नोलॉजी थी, बहुत अच्छे हथियार थे, भारी भरकम सेना थी, ये मुकाबला शेर और बकरी के मुकाबले जैसा था, हर कोई समझता था कि अमेरिका तालिबान को कुचल डालेगा, कुछ ही दिनों में तालिबान का नामो निशान तक मिट जायेगा मगर ऐसा हुआ नहीं, तालिबान तादाद में बहुत कम थे, उनके पास साज़ो सामान नहीं था लेकिन उनका ‘तवाकुल’ भरोसा अल्लाह पर था, ईमान पर कायम रहने वालों की मदद का अल्लाह ने वादा किया हुआ है, जंग हुई, तालिबान लड़े, शहीद होते रहे, लड़ते रहे और वोही हुआ जिसका अल्लाह ने अपने बन्दों से वादा किया हुआ है, उसकी मदद से तालिबान ने अमेरिका समेत पूरी दुनिया को खाक चाटने पर मजबूर कर दिया,

Shahnawaz Ansari
@shanu_sab
तालिबान के अमीर मुल्ला हैबतुल्लाह ने कहा- “हम अपने उन तमाम मुख़ालफ़ीन को माफ़ करते हैं जो आज से पहले हमारे विरोधी थे, और उनके लिए नेक और पुर-अम्न ज़िंदगी की ख़्वाहिश ज़ाहिर करते हैं”
मक्का फतह करने के बाद प्रॉफेट मुहम्मद साहब ने भी यही किया था…Red heart

अमेरिका ने तालिबान के सामने अपनी शिकश्त कबूल कर समझौता कर लिया है, अफ़ग़ानिस्तान दुनियां का ”दिल” है, यहाँ एक ही समय में दुनियां के सभी बड़े और ताक़तवर देश जंग लड़ रहे थे, सबके अपने अपने मकसद थे, तालिबान की फ़तेह ने दुनियां की इक्वेशन बदल दी है, इस्राईल, फ्रांस, ब्रिटैन, भारत, सऊदी अरब का यहाँ बहुत कुछ दाव पर लगा हुआ था, तालिबान से समझौते के बाद अब इन देशों को वहां से निकलना पड़ेगा, भारत का खरबों का निवेश है, रॉ और अन्य एजेंसियों के बड़े ऑपरेशन वहां से चल रहे हैं जो अब जारी नहीं रह सकेंगे, तालिबान और अमेरिका के समझौते से सबसे ज़ियादा फायदे में पाकिस्तान रहा है, पाकिस्तान ने ये समझौता करवाने में बड़ी भूमिका अदा की है, तालिबान पाकिस्तान के हमदर्द हमेशा से रहे हैं, ऐसे में पाकिस्तान का अफ़ग़ान बॉर्डर सुरक्षित हो जायेगा, अब वो अपनी वहां तैनात दो लाख से ज़ियादा सेना को हटा कर भारत की सरहद पर ला खड़ा करेगा, साथ ही तालिबान को कश्मीर मामले में दखल देने के लिए मनाने में उसे कोई मशकत नहीं करना पड़ेगी, तालिबान को कश्मीर जैसे इलाकों और आबोहवा में काम करने का लम्बा तजुर्बा है, अगर तालिबान ने कश्मीर मामले में दखल दिया तो भारत के लिए बहुत नुक्सान पहुंचेगा,

Shahnawaz Ansari
@shanu_sab
दुनिया का सुपरपॉवर कहे जाने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति बुश ने इन्ही ऊंचे पायजामे वाले मुसलमानो से कहा था।
“मैं जमीन तुम पर तंग कर दूंगा हम अफ़ग़ान कौम को हफ़्तों मे मिटा देंगे”
आज वही अमेरिका तालिबान के कदमो मे लेटा हुआ है और तालिबान का हर शर्त मानने को तैयार है।
#Taliban

,,,तालिबान विश्व विजेता हैं, विश्व की महाशक्तियां तालिबान के क़दमों में हैं!

मेरा जनम अलीगढ ज़िले के एक छोटे से गॉंव में हुआ था, इस गॉंव में मेरे बचपन के कई साल बीते थे, पांचवी कक्षा पास करने के बाद हमारा परिवार गॉंव से शहर आ गया, ये 1979 का साल था, जब हम शहर में आ गए थे, अब 2019 है, गॉंव छोड़े हुए 40 साल हो गए, बाद में कभी कभा ही जाना हुआ, आखिरी बार 2017 जनवरी/फ़रवरी में विधान सभा चुनाव लड़ा था तब जाना हुआ था, 2017 से पहले 2005 में,,,हम 40 साल से अलीगढ शहर में रह रहे हैं, मगर ”ख़ाब” हमेशा बचपन के गॉंव के आते हैं, ये ‘रूहानी’ ताल्लुक़ की वजह से शायद, इंसान को भूख प्यास लगती है, इसके लिए उसे खुराक की ज़रूरत होती है, खुराक से एनर्जी मिलती है, ये एनर्जी इंसान को हरकत में रखती है,,,ठीक इसी तरह रूह को भी खुराक की ज़रूरत होती है, जब तक ‘रूह’ को उसकी खुराक न मिले वो भूखी, प्यासी रहती है,,रूह की खुराक ‘इबादत, ज़िक्र, इश्क़’ है,,,इबादत के लिए इबादतगाहें होती हैं,,,

”ख़ाब” में गॉंव का नज़र आना,,,इबादतगाहों में रूह की ख़ुराक़ का मिलना,,,इश्क़ की वो मंज़िलें हैं जिसके बग़ैर इंसान का ज़िंदा रहना मुमकिन नहीं है,,,अल्लाह ने इंसान को जन्नत के लिए पैदा किया था, एक भूल/ग़लती की वजह से इस ज़मीन पर आ पहुंचा, इंसान बहुत नाज़ुक, भावुक होता है, ज़मीन पर और बाकी जितनी भी जानदार मखलूकेँ हैं, उन सभी में इंसान सबसे बेहतर है,,,सभी मखलूकों में इंसान अकेला ऐसा जीव है जो ”आज़ादी” न हो तो जी नहीं सकता है, अगर किसी की आज़ादी उससे छीन ली जाये तो वो बे मौत मर सकता है, पागल हो सकता है, उसकी आँखों की रौशनी जा सकती है, वो बहरा हो सकता है, उसका जिस्म महसूस करना बंद कर सकता है,,,इंसान की अपनी ज़रूरत दुनियां से और उसकी रूह की ज़रूरतें, इबादत, ज़िक्र और इश्क़ से हासिल होती है,,,मस्जिद, मुसलमानों के लिए बड़ी अहमियत की जगह होती है, रूह की भूख, प्यास यहाँ बुझती है, इंसान की रूह जब कुव्वत हासिल कर लेती है तब उसकी जिस्मानी ताकात खुद बढ़ जाती है, उसका होंसला, हिम्मत बढ़ जाता है,,,

Shahnawaz Ansari
@shanu_sab
ये दो कुर्सियों का स्टेज बनाया गया है।
एक पर अमेरिकी सिक्रेटरी ऑफ स्टेट “माईक पोमपयो” और दूसरी पर तालिबान इंचार्ज “मुल्ला बिरादर” बैठेंगे
मुआहीदे पर दस्तखत कुछ देर बाद होने वाले हैं
2001 और 2020 अमेरिकीयों का ग़ुरूर आज ख़ाक में मिलने वाला है।
#Taliban

बाबर एशिया का सबसे तकातवर, महान बादशाह था, वो बहुत खुखार था, बहुत बहादुर था, वो 12 साल की उम्र में बादशाह बना था, वो शराब खूब पीटा था, वो लड़ाई के बाद दुश्मन सैनिकों की ”मुंडियों” को कटवा कर ‘मीनार’ बनवाता था, लाशों के ऊपर लाशें चुनवाकर, अपना सिंहासन लगवाता था, वो पागल हाथियों को सुधारता था, वो मोटी लोहे की ज़ंजीरों को दांतों से काट देता था, वो दो लोगों को अपनी बगल में दबा कर ‘दिल्ली के पुराने किले/तुग़लकाबाद’ के चार चक्कर रोज़ लगाता था, वो दिल्ली में जमुना नदी को रोज़ाना कई बार तैर कर पार करता था, जिस वक़्त जमुना में भारी बाढ़ आयी हुई होती थी तब भी पार कर जाता था, वो जहाँ पहुँचता था, बाग़ लगाता था, नदिया, दरिया खुदवाता था, महल बनवाता था, सराये, पियाऊ, रास्ते, और रास्तों पर दरख़्त लगवाता था, वो हिन्दोस्तान में सबसे पहली बार ”तोप” लेकर आया था, उसके पास अच्छी नसल के घोड़े और तेज़ धार, लचीली तलवारें थीं, वो भाला फेंकने में माहिर था, वो बहुत अच्छा घुड़सवार था,,,उसने ‘एक पल’ में कभी शराब न पीने का अहद लिया था, वो अपने दुश्मनों से अच्छा सलूक करता था, वो हुमायूँ के बीमार हो जाने पर खुद उसकी ‘चारपाही’ के चक्कर लगा कर उसकी बीमारी अपने लिए मांगता है और हुमायूँ अच्छा हो जाते हैं, वो शेर से लड़ता था, उसने शेरशाह को पहली बार देखने के बाद ही हुमायूँ को आगाह कर दिया था कि ‘शेरशाह’ से मुग़लों को बहुत परेशानी मिलेगी और ये हिन्दोस्तान का एक दिन बादशाह बनेगा,,,,वो कभी अयोध्या नहीं गया था, उसने अयोध्या में कोई मस्जिद नहीं बनवायी थी,,,,मगर बाबरी मस्जिद को लेकर देश में झूठ पर झूठ, लगातार झूठ बोला गया, मस्जिद में मूर्तियां रख दी गयीं मगर मूर्तियां रखने वालों को कभी सज़ा नहीं मिली,,,मस्जिद को ढा दिया गया, मस्जिद गिराने वालों में से किसी को सज़ा नहीं मिली,,,500 साल तक जो ईमारत दुनियां की आँखों के सामने थी, उसे ‘षड़यंत्र’ रच कर निशाना बनाया गया और अब उस की जगह पर ‘राम’ मंदिर बनेगा,,,फ़ैसला हो चुका है,,,मंदिर वहीँ ‘मस्जिद’ की जगह बनेगा,,,इंसान और उसकी रूह कितनी बीमार हो गयी हैं,,,,मेरी मस्जिद भी लेली,,,मेरा नाम भी बदनाम किया,,,,

Shahnawaz Ansari
@shanu_sab
“अमेरिका की इतिहास का काला दिन”
आज अमेरिका जैसा सुपरपॉवर देश तालिबान के साथ समझौते पे साइन करेगा, वही तालिबान जिसको दुनिया और मीडिया ने “आतंकी” कहा।
आज अमेरिका घुटनों के बल अफगानिस्तान से बाहर निकलना चाहता है।
काहेका सुपरपॉवर?
वतु इज़्ज़ु मंतशा
वतु ज़िल्लु मंतशा Red heart
#Taliban

नॉर्व के अंदर एंटी इस्लाम प्रदर्शन हो रहा था, उस प्रदर्शन में एक आदमी क़ुरआन को जला कर लोगों को दिखा रहा था, वो इस्लाम, मुस्लमान, क़ुरआन के खिलाफ नारे लगा रहा था, उस प्रदर्शन में सैंकड़ों नॉन मुस्लिम मौजूद थे, वहां बड़ी तादाद में पुलिस थी, वहीँ से दो मुस्लिम नौजवान गुज़र रहे होते हैं, वो दोनों नौजवान देखते हैं कि एक आदमी क़ुरआन की बेहुरमती कर रहा है, क़ुरआन को आग लगा कर लोगों को इस्लाम के खिलाफ भड़का रहा है, उन दो नौजवानों में से एक जिसका नाम इलियास था आगे बढ़ता है, झपड़ पड़ता है क़ुरआन की बेअदबी करने वाले पर, वो अकेला था, मगर अल्लाह के नाम से डरने वाला वहां मौजूद सैंकड़ों की भीड़ से डरा नहीं, उसके दिल में पुलिस का भी खौफ नहीं रहा था, उस अकेले जांबाज़ मुस्लिम नौजवान ने क़ुरआन की बेअदबी करने वाले को धुन डाला,,,

अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिका ने 48 देशों को साथ लेकर हमला किया था, सामने थे आग्ग़निस्तान के किसान, मजदुर, भेड़ चराने वाले चरवाहे,,,अमेरिका के पास लेटेस्ट टेक्नोलॉजी थी, मदर ऑफ़ ऑल बम, फ़ादर ऑफ़ ऑल बम, लेटेस्ट लड़ाकू विमान थे, ट्रैंड सेना थी, सेना के पास एक से एक उम्दा हथियार थे, उनके पास जी भर कर खाने के साधन थे, पूरी दुनियां अमेरिका के साथ थी इस जंग में थी और तालिबान अकेले थे,,,वो तनहा/अकेले नॉर्व के नौजवान की तरह लड़े, भिड़ गये दुनिया की सुपर पॉवरों से और लड़ते रहे, मरते रहे अल्लाह की राह में, मारते रहे अपने दुश्मनों को,,,18 साल तक अफ़ग़ान तालिबान अकेले विश्व की महाशक्तियों से जंग करते रहे,,,आज तालिबान विश्व विजेता हैं, अमेरिका, फ्रांस, इस्राईल, ब्रिटेन, स्पेन, जर्मनी, जापान, कोरिया, कनाडा,,,तालिबान के क़दमों में हैं,,,

खुदा का वादा है मोमिनों से मदद का, मगर वादा मोमिन से है, हक़ के लिए लड़ जाने का,,,ज़ुल्म का पक्षकार अल्लाह कभी नहीं है, बाबरी मस्जिद मामले में मुसलमानों के साथ जो ज़ुल्म हुआ है वो इतिहास बनेगा,,,

कहीं देखा है ऐसा इन्साफ कि चोरी की शिकायत करने वाले को ही चोर बना दिया जाए और चोर को चोरी का माल देकर उसकी हिफाज़त की जाये,,,

मेरा ऐतराज़ मुस्लिम समाज से भी है, 09 नवम्बर के ‘डाके’ के बाद मेँ निजी तौर पर बहुत दुःख में था, इंसान हूँ, गर्मी, सर्दी महसूस करता हूँ, दिल, नज़र, कान, ज़बान, दिमाग़ अभी दुरुस्त हैं इसलिए कुछ होता है तो उसके होने के असरात का अंदाजा भी करता हूँ, बीच कार्यवाही के जो वक़्त दोनों पक्ष को सुलह का दिया गया था, शक उसी वक़्त से होना शुरू हो गया था कि कुछ भी सही/अच्छा नतीजा नहीं आने वाला है, उसके बाद टीवी की चर्चाओं में जाने वाले यहूदी मुसलमानों को बार बार ये कहते सुन कर ‘कि जो भी फैसला आएगा मंज़ूर है, फैसला हमारे हक़ में नहीं हुआ तो भी हमें मंज़ूर है’,,,अदालत की हुरमत क़ायम रखते हुए, कह रहा हूँ कि ‘सब को पहले ही मैनेज कर लिया गया था’,,,वो जो ”सुलह’ के लिए वक़्त दिया गया था, ‘खिचड़ी’ उसी वक़्त पक गयी थी, तड़ीपार, जेम्स बॉन्ड ने दाढ़ी वाले यहूदी मुल्लों, मदनियों, नदवियों, आला दर्जे के हरामियों को ”पटा” लिया था, ‘नागपुरी’ ‘नाग देवता’ से भी कठमुल्लों का मिलाप करवाया गया था, ‘नाग’ की फुसकार से डरे लोगों को तसल्ली से समझाया गया, अच्छे दाम मिले तो सलमान ख़ान राखी सावंत के साथ भी ठुमके लगा लेगा तो फिर मदनी महमूद हो या नदवी सलमान या बरेली के बाजार में रोज़ बिकने वाले आला हरामी लोग पीछे क्यों रहे,,,वक़्फ़ बोर्ड़ के डकैत, कब्रिस्तान बेच बेच कर सत्तर साल से खा रहे हैं उनका हाज़मा बहुत अच्छा है,,,पैसे के लिए,,मस्जिद तो क्या चीज़ है अपने बाप को भी बेच दें,,,

मुस्लिम पर्सनल बोर्ड के इस कदम से कि वो अपील करेंगे, कुछ राहत मिली है,,,ये मौका है जब मुस्लिम पर्सनल बोर्ड अपने साथ हुई नाइंसाफी से न्याय के ”देवी – देवतों’ को क़ुतुबमीनार की बुलंदी पे खड़े होकर चीख चीख कर बताया जा सकता है,,,,याद रखना कोई भी जुर्म, नाइंसाफ़ी से ज़यादा हौलनाक नहीं होता है,,,और मौमिन की ज़िम्मेदारी है कि वो नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ बोले, लडे, यहाँ तक कि अगर ऐसी लड़ाई में जान चली जाए तो जाए,,,मगर ये ख़याल रहे कि लड़ते वक़्त अपनी तरफ से भी कोई ज़ुल्म कभी नहीं होना चाहिए,,,खुदा ज़ालिमों को पसंद नहीं करता है,,,मुझे मेरी मस्जिद दे दो,,,

– parvez khan

अफ़ग़ानिस्तान में हर रोज़ 22 अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ान तालिबान के डर-घबराहट की वजह से आत्महत्या करते हैं : रिपोर्ट

पुराना लेख

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कश्मीर मांमले को लेकर दुनियांभर में हलचल है, वहीँ अफ़ग़ानिस्तान के मामलात पहले से ज़यादा उलझ गए हैं, भारत अखंड भारत के एजेंडे पर काम कर रहा है और इस्राइल ग्रेटर इस्राईल बनाने में लगा हुआ है, दो देशों के बीच समन्वय की कई सारी वजह से है

अमेरिका का राष्ट्रपति सन्देश दे चुका है कि भारत और अमेरिका जहाँ जहाँ मुस्लमान हैं वहां इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ मिल कर जंग लड़ने जा रहे हैं, कश्मीर की उलझन में उलझे भारत और पाकिस्तान अमेरिका, इस्राईल, फ्रांस, सऊदी अरब की चालों के मुताबिक आगे की कार्यवाही करते नज़र आ रहे हैं

दुनियां में तबाही का सभी लोगों को मिल कर इन्तिज़ार करना चाहिए, ये तबाही अमेरिका की निति का हिस्सा है, इस्राईल का एजेंडा भी यही है, कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान समस्या के अब लिमिटेड ऑप्शन रह गए हैं, शांति, अमन, समझौते, साझेदारी, भाईचारा दुनियां को पसंद नहीं है, अरब को भी अमन पदंड नहीं है

अब से 18 साल पहले अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर 43 देशों को साथ लेकर हमला बोला था, उस समय पूरी दुनिया अमेरिका के साथ थी और तालिबान अकेले थे, कोई एक भी देश संगठन तालिबान या अफ़ग़ानिस्तान के साथ खड़ा होने की हिम्मत भी नहीं कर सकता था, उस समय अमेरिका ने अपनी ताकात के ज़ोम में कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसकी सारी ताकात इन बकरी चराने वाले देहाती लोगों के हाथों चकनाचूर कर रख दी जायेगी और सुपर पावर अमेरिका को शर्मिंदा हो कर अफ़ग़ानिस्तान से हार का तमग़ा लेकर जान बचा कर भागना पड़ेगा

अफ़ग़ान जंग विश्व इतिहास की एक मात्र जंग है जिसमे मुकाबला दो ऐसे विचारों की है जिसमे एक तरफ वो शक्तियां हैं जोकि खुद को इब्लीस का बंदा समझते हैं और दूसरी तरफ कमज़ोर, बेसहारा, बेघर, नंगे पॉंव, नंगे जिस्म, ख़ाली पेट, फ़ाकों की कसरत, दिलों में ख़ुदा का ख़ौफ़, निगाहों में अपने रसूल की निशानियां, मौत से मुहब्बत पाले अफगानी लड़ाके थे, कोई सोच भी सकता है कि पूरी दुनियां मिल कर एक छोटे से देश में बहुत थोड़े से लोगों से मार खायेगी, अमेरिका की हेकड़ी अफ़ग़ान तालिबान ने मटियामेट कर के रख दी है

तालिबान और अमेरिका के दरमियान शांति समझौता आखिरी वक़्त में जा के नाकाम हो गया है, तालिबान ने समझौता न होने की ख़बरों के बाद एलान किया है कि हम अमेरिका से अगले 100 साल तक लड़ने को तैयार हैं मगर अमेरिकन को अफ़ग़ान ज़मीन पर नहीं रहने देंगे

तालिबान की बहादुरी और उनके अल्लाह पर भरोसे की वजह से कोई भी ताक़त उनका मुकाबला नहीं कर सकती है, तालिबान से लड़ते लड़ते अमेरिकी सैनिक पागल हो गए हैं, औसतन हर रोज़ 22 अमेरिकी सैनिक डर/घबराहट की वजह से आत्महत्या करते हैं, 18 साल से जारी ये जंग दुनियांभर के लिए नसीहत और अकाल वालों के लिए खुली निशानी है कि अल्लाह के बन्दे किसी से नहीं डरते

जानकारी के मुताबिक सात लाख 30 हज़ार अमेरिकी सैनिक अब तक अफ़ग़ानिस्तान में लड़ने की वजह से पागलपन का शिकार हो चुके हैं, इनके इलाज पर अभी तक 61 बिलियन डॉलर खर्च आया है, इन अमेरिकी सैनिकों में से तीन लाख बेघर हो चुके हैं, अफ़ग़ानिस्तान से वापस अमेरिका पहुँचने वाले अमेरिका के इन पागल सैनिकों को उनके परिजनों ने ही घरों से निकाल दिया है, जानकारी के मुताबिक जब अमेरिकी सैनिक वापस अमेरिका अपने घर पहुँचते हैं तो वो अपने पागलपन की वजह से परिवार वालों बोझ लगने लगते हैं, इन सैनिकों को उनकी पत्नियों, माँ-बाप आदि घरों से निकाल देते हैं जिन्हें शेल्टर होम्स आदि में जीना पड़ता है

अमेरिका हो या कोई और शक्तिशाली देश, संगठन हमेशा युद्ध में कमज़ोर लोगों की जीत होती है, कभी भी सम्पन देश जंग नहीं जीते हैं, इतिहास गवाह है, बाबर ने कुल 12 हज़ार की सेना को लेकर इब्राहिम लोधी की 1 लाख 40 हज़ार की सेना को मात दे दी थी, बाबर ने एक लाख की सेना को लेकर राणा संग्राम सिंह की पांच लाख से सेना को हरा दिया था, कुल 30 हज़ार की सेना को साथ लेकर खान बाबा यानी अहमद शाह अब्दाली ने मराठाओं की साथ लाख सेना को तहसनहस कर दिया था

असल में ये वो जज़्बा है जो मौत से बेखौफ होकर अल्लाह के लिए लड़ते हैं, और अल्लाह की मदद उन्हें हासिल होती है, इसीलिए 313, हज़ार को हरा देते हैं, खालिद बिन वालिद रुस्तम के टुकड़े टुकड़े कर देते हैं, तीन हज़ार की मुठीभर फौज को रोम की लाखों की सेना से टकरा देते हैं और हारते नहीं,,,,,अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में जंग हार चुका है अब वो अपना मुंह छुपाना चाह रहा है, कैसा बदले का वक़्त आया है कि बुश ने कहा था कि तालिबान के लिए हम ज़मीन तंग कर देंगे, आज उसी ज़मीन से बच कर भागने का रास्ता भी अमेरिका को नहीं मिल रहा है, वो दर दर गुहार लगाने को मजबूर है कि कोई आये और तालिबान को मना, समझकर अमेरिका का समझौता करवा दे ताकि वो यहाँ से निकल जाये,,,,,
– परवेज़ खान

”मुल्ला मुहम्मद उमर”….वो हज़रत उमर की तरह हुकूमत करता था : रिपोर्ट

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान कैसे बने थे, कौन थे मुल्ला मुहम्मद उमर, जानिये!

क़ुदरत की तरफ से इंसान को ज़ालिम नहीं बनाया गया है, अल्लाह ने इंसान को जन्नत का मेहमान बनाया था, एक ग़लती हुई उसकी सज़ा के तौर पर उसे जन्नत से निकलना पड़ा और कुछ वक़्त के लिए इस ”आलम” दुनियां में भेज दिया गया, यहाँ की जिंदिगी बहुत मुख़्तसर सी है, एक नमाज़ के बाद दूसरी में जो वक़्त होता है उससे भी कम,. जब बच्चा पैदा होता है तब उसके कान में अज़ान पढ़ी जाती है और जब वो मरता है तब उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ी जाती है, इस तरह देखें तो पूरी जिंदिगी अज़ान के बाद नमाज़ अदा होने तक की होती है,,,

हम जिस ”आलम” ज़मीन पर रहते हैं, इसके ऊपर हमें आसमान नज़र आता है, उस आसमान में रात के वक़्त अनगिनत सितारे नज़र आते हैं, वैज्ञानिकों के मुताबिक बहुत सारे ”तारे’ ज़मीन से इतना दूर हैं कि जब से ये ज़मीन बनी है तब से उनकी रौशनी यहाँ तक नहीं पहुंची है, आसमान में कितने ही सितारे हैं जो एक मुद्दत के बाद चमक खो देते हैं उनको ब्लैक होल कहा जाता है, ये डेड स्टार/ब्लैक होल हमारी ज़मीन से हज़ारों, लाखों गुना बड़े होते हैं, जो हमारा सूरज है वो ज़मीन से बड़ा है मगर ”तारा मंडल” आसमान में हमारे सूरज से बड़े अनेक सूरज हैं,

अल्लाह ने इंसान को बहुत नरम तबियत, नाज़ुक मिज़ाज बनाया है, मगर चूँकि इंसान ने ग़लती की थी उस ग़लती की सज़ा उसे मिली और यहाँ ज़मीन पर भेज दिया गया, ज़मीन पर कुछ भी इंसान की मर्ज़ी के मुताबिक नहीं है, उसे खुद अपने मुताबिक चीज़ों को बनाना पड़ता है, इंसान को सर्दी में सर्दी लगती हैं, सर्दी से बचने के लिए उसने गरम कपडे बनाये, यहाँ गर्मी होती है तो गर्मी से बचने के लिए हवा महल, झरोखे, पंखे, कूलर, AC बनालिये, जबकि जन्नत में गर्मी, सर्दी, बरसात का कोई मसला नहीं, वहां जो ख्याल दिल में पैदा होगा वो चीज़ उस इंसान के सामने अल्लाह की तरफ से हाज़िर हो जाएगी, वहां के दरिया शहद, दूध और शराब के हैं, जबकि यहाँ ज़मीन पर शराब पीने की मनाही है,,,यहाँ ज़मीन पर इंसान को काम करना पड़ता है, काम के बदले में पैसा मिलता है, उस पैसे से वो अपने खाने, पीने, पहनने, बाकी की ज़रूरतों को पूरा करता है, वहां जन्नत में इंसान को कोई काम नहीं करना है,,,

अब जबकि हम इस ज़मीन पर हैं, तो हमारे मामलात यहाँ के हालात के मुताबिक हैं, हम लालच करते हैं, बुराइयां करते हैं, बुरा सोचते हैं, बुरा करते हैं, चोरी करते हैं, डाके डालते हैं, माल लुटते हैं, अमानत की रखवाली नहीं करते, खून बहाते हैं, आबरू से खेलते हैं,,,ये सिफ़त इंसान के अंदर अल्लाह ने खुद पैदा की हैं, ये शैतानी काम जो हम करते हैं, वो हमारा आगे का मामला तै करेंगे, यहाँ हम जो कुछ भी करते हैं, वो सब ‘लिखा हुआ’ हिसाब, फैसले के दिन हमारे सामने लेकर रखा जायेगा, तब होगा ‘इन्साफ़’,,,तो लोगों को अल्लाह से डरते रहना चाहिए, और हिसाब के दिन की सोच कर यहाँ दुनियां में काम करने चाहिए,
जो लोग ऐसे ख़याल रखते हैं कि मरने के बाद कुछ नहीं होगा और जो कुछ भी है बस ये दुनियां की ही जिंदिगी है, वो लोग समझ से काम नहीं लेते हैं और

अल्लाह ने जो निशानियां दे रखी हैं उनको नहीं देखते हैं और देखते भी हैं तो जानने, समझने के लिए नहीं बस उसे बुरा कहने या कोई कमी तलाशने के लिए,,,अक्सर लोग कहते देते हैं,,”मै उसके खर्चे उठता हूँ, खाना खिलाता हूँ’,,,ख़याल करो यहाँ कोई किसी को खिलाने वाला नहीं है, वो जो है, जो हर बात का जानने वाला है, वो हर बात का इलम रखता है, वोही तो है जो ज़मीन के नीचे, समानदरों की तह में मछलियों और हज़ारों तरह के जानदारों का पेट भरता है,,,वोही आसमानों में उड़ने वाले परिंदों को खाना खिलता है,,,उसने हर चीज़ का ‘तवाज़ुन’ ‘बैलेंस’ क़ायम किया है,,,

जब हम देखते हैं कि लोग ज़ुल्म से काम लेते हैं तब ये भी देखते हैं कि वो किस तरह से ज़लील होते हैं,,,

एक मिसाल देखें

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान कैसे बने थे, जब 1989 में रूस अफ़ग़ानिस्तान से निकल रहा था, तो अफगानी लोग आपस में लड़ने लगे यानी तब वहां सिविल वॉर शुरू होगयी, अफ़ग़ान कबीलों के सरदारों के पास जो फौज थीं वो आमने सामने आगयीं, वहां कोई कानून नहीं बचा था, क़तल, मारकाट, आम बात थी, कोई कानून नहीं था,,,एक दिन एक उस्ताद मदरसे में बच्चों को पढ़ा रहा था, कि एक औरत अपनी फरियाद लेकर वहां आयी और उसने कहा कि मेरी दो जवान बेटियों को नॉर्थन अलाइंस के कबीले के दबंग/जंगजू लोग उठा कर ले गए हैं, खुदा के लिए मेरी मदद करें, उस औरत की फरियाद सुन कर मदरसे का मौलवी अपने 52 शागिर्दों को साथ लिया और नॉर्थन अलाइंस के कबीले पर गए, वहां से उन दोनों लड़कियों को आज़ाद कराया, जो गुंडे वहां मौजूद थे उन्हें घसीट कर ‘चौक’ पर लाया गया, उसी वक़्त पंचायत लगी, और फैसला सुनाया गया कि इन सभी को फांसी पर लटका दिया जाये, ये नॉर्थन अलाइंस के कबीले लोग बहुत असरदार लोग थे, किसी की हिम्मत नहीं थी कि कोई इन पर हाथ डाल दे, लोग हैरान हो गए कि इतना सस्ता इन्साफ हमें मिल गया,,,उस दिन मदरसे के बच्चों को जो लीड कर रहा था वो था ”मुल्ला उमर”,,,इसके बाद तालिबान एक संगठन की तरह काम करने लगा, लोग इनके पास अपनी परेशानियां लेकर आते, उनका हल हो जाता,,,फिर क्या था तालिबान की ताकात बढ़ती गयी, मुल्ला उमर ने अफ़ग़ानिस्तान के 50 से ज़यादा कबीलों के सरदारों को एक साथ बिठा कर उनसे ‘हलफ़ लिया, मुल्ला उम्र बहुत बहादुर/निडर था, 1996 में तालिबान के पास पुरे अफ़ग़ानिस्तान की हुकूमत आगयी थी, तालिबान के वक़्त में वहां जीरो फ़ीसद क्राइम रेट था, मुल्ला उमर के बारे में कहा जाता है कि वो अमीर तैमूर, बाबर की तरह था, वो हज़रत उमर की तरह हुकूमत करता था, खुद कहीं भी किसी भी वक़्त पहुँच कर वहां के मामलात की जानकारी लिया करता था, कानून ऐसा क़ायम किया था जहाँ शेर और बकरी एक घाट पानी पीते,,,

ऐसा बिलकुल नहीं है कि जिसे कोई ताकतवर बुरा कहें वो सच में बुरा है, अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा करने के लिए 48 देशों को साथ लेकर हमला किया था, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हुकूमत से इस्राईल, यूरोप, अमेरिका खौफ में थे, उन्हें घबराहट थी कि कहीं तालिबान की हुकूमत आगे चल कर इस्राईल पर हमला न कर दें, उधर यूरोप मुल्ला उमर की हिकमत, सियासत से डरा हुआ था, हज़रत उमर वाली खूबियों वाला ये आदमी मुल्ला उमर यूरोप को भी फ़तेह कर सकता है, वैसे भी हज़रत उमर के नाम से आज भी यूरोप थर्राता है,,, मुल्ला मुहम्मद उमर और अमेरिकी गठबंधन सेना के बीच तीन किलोमीटर का फ़ासला था मगर अपनी तमाम लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के बावजूद अमेरिका उन्हें खोज नहीं पाया था, अमेरिका नेअबतक का सबसे ज़यादा इनाम मुल्ला उमर पर रखा हुआ था, माचिस की डिबिया, सिगरेट के पैकेट, दीवारों, बाज़ारों, पहाड़ों में उनकी तस्वीरें लगवा दी थीं कि शायद कोई अफ़ग़ान इनाम के लालच में कोई जानकारी दे दे मगर सारी मेहनत बेकार ही गयी, मुल्ला उमर की परछायीं भी अमेरिका नहीं देख पाया था, वो कब मरे ये जानकारी भी कई साल के बाद बाहर आ पायी थी,,,अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन की खूबी है कि वहां के लोग बहादुर, वादे के पक्के, इरादे के अडिग, दीनदार, जंगजू, जुनूनी, वफ़ादार होते हैं,,,मुल्ला उमर हो या सद्दाम हुसैन या गद्दाफी या मुर्सी, या तय्यप अर्दोगान या हसन रूहानी या असद, या इमरान ख़ान,,,सब यहूद के दुश्मन हैं, इस्राईल, अमेरिका किसी न किसी तरकीब से इन को ख़तम करने, कमज़ोर करने, मिटाने की कार्यवाहियां करता रहता है,,,

दुनियां में दो विचार हैं एक अल्लाह को मानने वाले, दूसरा अल्लाह को न मानने वाले, दोनों के दरमियान ये जंग, फ़साद हमेशा जारी रहेगी, क़यामत के आने तक,,,मुल्ला उमर अल्लाह के वली थे, वो नेक, परेहज़गार, इबादतगुज़ार, दीनदार पुख्ता ईमान वाले, अल्लाह की राह में जान देने वाले, अल्लाह के हुकुम के मुताबिक जिंदिगी बसर करने वाले, इन्साफ़ क़ायम करने वाले, भलाई का रास्ता दिखाने वाले, सच्ची बात कहने वाले, अल्लाह की मख्लूक़ से मुहब्बत करने वाले, रसूल अल्लाह से इश्क़ करने वाले मुजहिद थे,,,,

जब भी कहीं कानून अपना काम नहीं करता है तब वहां ग़ैर कानूनी काम बेखौफ होने लगते हैं, भारत के बटवारे के एक साल बाद ही बाबरी मस्जिद के अंदर रात के समय चोरी छिपे मूर्तियां रख दी गयी थी, उस वक़्त मुल्क के कानून ने अपना काम नहीं किया था, मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखने वालों को अगर तब सज़ा मिल गयी होती तो आज भारत की सूरत बदली हुई होती, यहाँ दंगे, फसाद, आतंकवाद, अराजकता, मोब लिंचिंग, नरशंहार न होते,

कानून ने अपराधियों का साथ दिया और अपराधियों की फौज बनाने में मदद की, इस फौज ने 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद तो ढा दिया, मस्जिद दिन के वक़्त, पूरी दुनियां की आँखों के सामने तोड़ी गयी, अनेक दंगाई, हुड़ंगी टीवी चैनलों पर मस्जिद गिराने में अपनी भूमिका कबूल कर चुके हैं मगर कानून की आँखों पर पट्टी बंधी रही, कोई एक भी मस्जिद को गिराने वाले को सज़ा नहीं मिली, कानून जब मर चुका होता है तब समाज टूटने लगते हैं, देश बिखरने लगते हैं, जनता के अंदर असंतोष पैदा हो जाता है, भीड़ खुद कानून, अदालत बन जाती है,,,बाबरी मस्जिद, सिख कत्ले आम, गुजरात दंगे, मुंबई दंगे, भागलपुर, मेरठ, मलियाना, अलीगढ, कानपूर आदि के हज़ारों दंगे, गुजरात कत्लेआम में इन्साफ नहीं मिला, अदालतों ने अपना काम नहीं किया, जनता में गुस्सा पलता बढ़ता जा रहा है, अब वो फ़र्ज़ी एनकाउंटर पर ख़ुशी से झूमने लगी है, मरने वालों को पाप और मारने वालों को देवता बना रही है, हैदराबाद में चार लोगों को एनकाउंटर में मारा गया है, जो जानकारियां मीडिया में आ रही हैं, और जिस तरह से तेलंगाना की पुलिस ने कहानी सुनाई है, साफ़ ज़ाहिर होता है कि चारों ”आरोपियों’ को फ़र्ज़ी मुढभेड़ में मार डाला है,,,क़ुदरत की तरफ से इंसान को ज़ालिम नहीं बनाया गया है, इंसान ज़ालिम बन गया है अपने बनाये गए हालात से, अपनी बनायीं हुई वयवस्था से,,,पहले बीहड़ों में डाकू हुआ करते थे,,,अब वो शहरों में रहते हैं,,,बन्दुक का राज कहीं भी शांति नहीं ला ता है,,,लोगों की जान की कोई तो अहमियत समझे,,,इन्साफ कायम करो,,,हिसाब के दिन से डरो,,,बाबरी मस्जिद की जगह पर मस्जिद के सिवा कोई भी ईमारत अगर बनती है तो ये ‘खुला ज़ुल्म’ होगा, और ज़ुल्म का अंत ज़रूर होता है,,,

– परवेज़ ख़ान

shahbaaz khan
@shahbaazk8174
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Sep 12
एक दुनिया का सबसे तरक्की और और हथियारों वाला मुल्क अमेरिका और दूसरी तरफ पंचर बनाने वाले मुल्ले तालिबान जिन्होंने अमेरिका समेत पूरे नाटो को घुटनों पर लाकर खड़ा कर दिया। जो कल तक तालिबान को आतांकवादी संघटन कहते हुए थकते नही थे। आज पूरी दुनिया उनसे दोस्ती करने पर मजबूर हो रही है।

ANI_HindiNews
@AHindinews
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Sep 12
हमारे दोस्ती अफगानिस्तान के साथ हमारे इतिहास का प्रमाण है। हमारे 400 से अधिक विकास परियोजनाओं से अफगानिस्तान का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं है। विश्वास है कि यह सभ्यतागत (civilizational) संबंध बढ़ता रहेगा: विदेश मंत्री डॉ.एस जयशंकर

ANI_HindiNews
@AHindinews
· Sep 12
माना जाता है कि शांति प्रक्रिया अफगान के नेतृत्व वाली,स्वामित्व वाली व अफगान-नियंत्रित होनी चाहिए, इसे अफगानिस्तान की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करना चाहिए: वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए दोहा में अफगान शांति वार्ता पर सम्मेलन को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री

Suhasini Haidar
@suhasinih
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Sep 12
“Interests of minorities,women and vulnerable sections of society must be preserved,issue of violence across the country and neighbourhood has to be effectively addressed,”says EAM Jaishankar, addressing the first Intra Afghan dialogue in Doha via video.

भारत की अफगान नीति

दोहा में अफगानिस्तान सरकार और तालिबान वार्ता का दौर प्रगति पर है। भारत के लिए स्थिति असहज भी है और चुनौतीपूर्ण भी। तालिबान और अफगानिस्तान वार्ता को लेकर दिल्ली ने अपने स्टैंड में बड़ा बदलाव किया है। भारत ने कभी भी तालिबान को मान्यता नहीं दी और न ही उससे कोई सम्पर्क रखा लेकिन अफगान-​तालिबान शांति वार्ता में विदेश मंत्री एस. जयशंकर वर्चुअल तरीके से मौजूद रहे। इस अवसर पर भारत सरकार के पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान मामलों के संयुक्त सचिव जे.पी. सिंह भी मौजूद रहे। इस बातचीत में वैसे तो 30 देशों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। अफगानिस्तान ने इसमें ईरान, पाकिस्तान और कई मध्य एशियाई देशों को भी आमंत्रित किया था। इस वर्ष 29 फरवरी को अमेरिका-तालिबान के बीच दोहा में समझौता हुआ था मगर तब कतर में भारत के प्रतिनिधि पी. कुमारन अनौपचारिक तौर पर मौजूद रहे। दरअसल अफगानिस्तान दक्षिण एशिया में भारत का अहम साथी है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध पारम्परिक रूप में मजबूत और दोस्ताना रहे हैं। 1980 के दशक में भारत- अफगानिस्तान संबंधों को एक नई पहचान मिली। 1990 के अफगान गृह युद्ध और वहां तालिबान के सत्ता में आ जाने के बाद दोनों देशों के संबंध कमजोर होते चले गए। कंधार विमान अपहरण कांड में तालिबान ने पाकिस्तानी अपहर्ताओं का साथ ​दिया था। भारत-अफगान संबंधों को मजबूती तब मिली, जब 2001 में तालिबान सत्ता से बाहर हो गया और इसके बाद अफगानिस्तान के लिए भारत मानवीय और पुननिर्माण सहायता का सबसे बड़ा क्षेत्रीय प्रदाता बन गया। अफगानिस्तान में भारत के पुननिर्माण के प्रयासों से विभिन्न निर्माण परियोजनाओं पर काम चल रहा है। भारत ने अब तक अफगानिस्तान को लगभग तीन अरब डालर की सहायता दी है, जिसके तहत वहां संसद भवन, सड़कों और बांध आदि का निर्माण हुआ है। वहां कई मानवीय व विकासशील परियोजनाओं पर भारत अभी भी काम कर रहा है। यही वजह है कि मौजूदा वक्त में अफगानिस्तान में सबसे अधिक लोकप्रिय देश भारत को माना जाता है।

जहां तक राजनीतिक और सुरक्षा का सवाल है तो भारत-अफगानिस्तान संचालित और अफगान स्वामित्व वाली शांति और समाधान प्रक्रिया के लिए अपने सहयोग को बराबर दोहराता रहा है। दोनों देश इस बात पर सहमत हैं कि अफगानिस्तान में शांति और स्थायित्व को प्रोत्साहित करने और ​हिंसक घटनाओं पर तत्काल लगाम लगाने के लिए ठोस और सार्थक कदम उठाए जाने चाहिएं।

अगर अफगानिस्तान-तालिबान वार्ता सफल होती है तो अमेरिका और नाटो सैनिकों की करीब 19 वर्ष के बाद अफगानिस्तान से वापसी का रास्ता साफ होगा। इस वार्ता में अमेरिका सक्रिय रूप से भागीदारी कर रहा है, क्योंकि वह राष्ट्रपति चुनाव से पहले अफगानिस्तान में फंसे अपने 20 हजार सैनिकों को वा​पस ​िनकालना चाहता है। अमेरिकी चुनाव में अफगानिस्तान में सैनिकों की वापसी भी एक बड़ा मुद्दा है। यद्यपि अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने दो टूक लहजे में कहा है कि अफगानिस्तान में शांति का मतलब सत्ता साझा करने का राजनीतिक सौदा नहीं है। हर कोई देश में हिंसा को समाप्त होते देखना चाहता है। दुश्मन चाहे देश को कितना ही नुक्सान क्यों न पहुंचाने की कोशिश कर ले, अफगानिस्तान वापस उठ खड़ा होगा। जहां तक भारत के वार्ता में तालिबान के साथ शामिल होने का सवाल है, भारत काफी सतर्कता से आगे बढ़ रहा है। भारत की चिंता यह है कि अगर अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत होता है तो यह भारत के लिए नुक्सानदेह हो सकता है, क्योंकि तालिबान पारम्परिक रूप से पाकिस्तानी खुफिया एजैंसी आईएसआई का करीबी है। भारत अब भी 116 सामुदायिक विकास परियोजनाओं पर काम कर रहा है।

भारत ईरान की चाबहार परियोजना के जरिये अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप में व्यापार को बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए भारत कई सड़कों का निर्माण कर रहा है जिससे अफगानिस्तान से होते हुए भारत के माल ढुलाई नेटवर्क को बढ़ाया जा सके। अगर तालिबान ज्यादा मजबूत होता है तो वह पाकिस्तान के इशारे पर भारत को परेशान कर सकता है। इससे चाबहार से भारत जितना फायदा उठाने की को​शिश में जुटा है उसे नुक्सान पहुंच सकता है। शांति समझौते से तालिबान पर लगे सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध भी खत्म होंगे, इससे न केवल तालिबान मजबूत होगा बल्कि वहां की लोकतांत्रिक सरकार को खतरा पैदा हो सकता है। तालिबान का जन्म 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ। इस समय अफगानिस्तान से तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) की सेना हारकर अपने देश वापस जा रही थी। पश्तूनों का नेतृत्व उभरा, तालिबान 1994 में पहली बार अफगानिस्तान में सामने आया, 80 के दशक के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद कई गुटों में आपसी संघर्ष हुआ था, जिसके बाद तालिबान का जन्म हुआ था। यह भी सच है कि रूसी सेनाओं को हराने के लिए अमेरिका ने भी तालिबान को हथियार और धन दिया था। वहीं तालिबान अमेरिका का दुश्मन नम्बर एक हो गया। अमेरिका ने भी लादेन की खोज में तोराबोरा की पहाड़ियों में काफी खाक छानी लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। अंततः अमेरिका के कमांडो ने पाकिस्तान के एबटाबाद में छिपे बैठे लादेन को मार गिराया था। बदलती परिस्थितियों में भारत को अपना स्टैंड बदल कर तालिबान से वार्ता में शा​िमल होना पड़ा है। विदेश मंत्री जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अफगानिस्तान की धरती से भारत विरोधी गतिविधियों का इस्तेमाल नहीं हो। महिलाओं और अल्पसंख्यकों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए। अगर भारत शांति वार्ता में भाग नहीं लेता तो इसका अर्थ पाकिस्तान को खुला हाथ देना होगा। किसी भी सरकार को परिस्थितियों के अनुरूप फैसला लेना पड़ता है। भारत तो हमेशा ही शांति का समर्थक रहा है। अफगानिस्तान में शांति पर ही उसका भविष्य छिपा हुआ है।

आदित्य नारायण चोपड़ा

Adityachopra@punjabkesari.com

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