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तुर्की को कंट्रोल करो : अरब जगत की अमरीका, इस्राईल से गुहार : रिपोर्ट

इमारात-इस्राईल समझौते के एलान से महीनों पहले अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प की ओर से डील आफ़ सेंचुरी का एलान होने पर टीकाकारों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि ट्रम्प उस डील के लिए इतनी एनर्जी क्यों ख़र्च कर रहे हैं जिससे फ़िलिस्तीनी नेता नाराज़ हैं, अरबों ने जिसे ख़ारिज किया है और जो सफल होती दिखाई नहीं दे रही है। इमारात ने इस्राईल से समझौते का एलान कर दिया तब भी यह सवाल अपनी जगह मौजूद है।

इमारात और बहरैन छोटे देश हैं जो इस्राईल से समझौता करने जा रहे हैं। नेतनयाहू इन देशों के नेताओं से हाथ मिलाएंगे और ट्रम्प इस समझौते को एतिहासिक जीत बताएंगे। मगर इससे नया क्या हासिल हो रहा है जो इससे पहले तक नहीं था।

ज़मीनी स्तर पर देखा जाए तो बहरैन और इमारात ही नहीं, ओमान, क़तर और सऊदी अरब से इस्राईल का व्यापक सहयोग जारी है। सऊदी अरब ने महीनों पहले अपनी वायु सीमाएं इस्राईल जाने वाले भारतीय विमानों के लिए खोल दी थीं। यमन युद्ध में सऊदी अरब को इस्राईल का सपोर्ट मिल रहा है। यही नहीं मीडिया रिपोर्ट्स अगर दुरुस्त हैं तो सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बन सलमान अपने विरोधियों का सुराग़ लगाने और उन्हें जाल में फंसाने के लिए भी इस्राईली टेक्नालोजी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

अरबों और इस्राईल का एलायंस बनाने की बड़ी वजह यह बताई जाती रही है कि अरब देशों को ईरान से ख़तरा है और इसी मनगढ़त ख़तरे के नाम पर अरबों को पश्चिमी देशों ने ख़ूब ढगा भी है।

अब एक नया बदलाव नज़र आ रहा है कि अरब देशों के सामने ईरान के साथ ही तुर्की को एक बड़े ख़तरे के रूप में पेश किया जाने लगा है और ईरानोफ़ोबिया के साथ ही टर्की का फ़ोबिया फैलाया जाने लगा है। तुर्की नैटो का सदस्य देश है और वह अमरीका के परमाणु बमों का मेज़बान भी है मगर हालिया वर्षों में कई मौक़े आए जब तुर्की और अमरीका के बीच टकराव की स्थिति बन गई।

इस समय अरब देशों की ओर से तुर्की पर बहुत तेज़ हमले किए जा रहे हैं। अरब लीग की बैठक में इमारात के विदेशी मामलों के मंत्री अनवर क़रक़ाश ने साफ़ शब्दों में कहा कि अरब देशों के आंतरिक मामलों में तुर्की का हस्तक्षेप इलाक़े में बुरे हस्तक्षेप का स्पष्ट उदाहरण है।

मिस्र के विदेश मंत्री सामेह शुक्री ने कहा कि कई अरब देशों में तुर्की का हस्तक्षेप अरब नेशनल सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा है। उन्होंने कहा कि तुर्की इस समय इराक़, लीबिया और सीरिया में खुलकर हस्तक्षेप कर रहा है। अरब लीग की बैठक फ़िलिस्तीन ने बुलाई थी और इसका मक़सद इमारात इस्राईल समझौते की निंदा करना था मगर यह निदां प्रस्ताव तो ख़ारिज ही कर दिया गया और तुर्की के ख़िलाफ़ जमकर बयानबाज़ी हुई।

जार्डन के सरकारी अख़बार द जार्डन टाइम्ज़ ने एक लेख में लिखा कि तुर्की की सेनाएं तीन अरब देशों लीबिया, सीरिया और इराक़ में सक्रिय हैं यह जियोपोलिटिकल तथ्य है अरब जगत और विश्व समुदाय को चाहिए कि इसका नोटिस ले और इस पर जवाबी क़दम उठाए।

तुर्की के ख़िलाफ़ इस समय जो अभियान चल रहा है उसमें केवल अरब देश नहीं है बल्कि फ़्रांस भी आगे आगे है और अन्य यूरोपीय देश भी फ़्रांस का साथ दे रहे हैं। फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने कहा कि अब इलाक़े में तुर्की हमारा पार्टनर नहीं रह गया है अर्दोग़ान सरकार के रवैए के बारे में यूरोपीय देशों को चाहिए कि दो टूक और कड़ा स्टैंड लें।

मगर इस बीच एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जो देश तुर्की के ख़िलाफ़ नया एलायंस बनाने जा रहे हैं वह हालिया वर्षों में लगातार नाकाम होते रहे हैं। बहरैन तो सऊदी अरब के इशारे पर अपनी विदेश नीति तय करता है इसलिए उसकी अलग से बात करनी की ज़रूरत नहीं है, सऊदी अरब का मिशन सीरिया में फेल हुआ, लीबिया में फेल हुआ, इराक़ में फ़ेल हुआ, लेबनान और यमन में फ़ेल हुआ। सऊदी अरब की नाकामियों की सूचि लंबी है जबकि अमरीका भी अपने इतिहास के बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा है। कौन सोच सकता था कि सुरक्षा परिषद में अमरीका को ईरान के हाथों बार बार शिकस्त उठानी पड़ेगी? इस्राईल की बात की जाए तो वह ज़मीन पर बदलते हालात के नतीजे में उन ताक़तों के घेरे में आ गया है जो इस्राईल के अस्तित्व को ग़ैर क़ानूनी मानती हैं। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अमरीका और इस्राईल दरअस्ल पराजित देशों का गठजोड़ बनाना चाहते हैं जो ज़मीनी समीकरणों को बदल नहीं पाएगा हां यह मौक़ा ज़रूर उन्हें मिलेगा कि एक दूसरे के आंसू पोछें और एक दूसरे को दिलासा दें।

इनपुट्स एजेंसियों से

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