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दुनिया में सबसे ज़्यादा सोना भारतीय मंदिरों के पास है : मंदिरों के सोने पर सरकार की नज़र : रिपोर्ट

दुनिया में सबसे ज़्यादा सोना, सामूहिक रूप से भारतीय नागरिकों के पास है, इसी के साथ देश में मंदिरों को सोना दान करने की पुरानी परंपरा है। विभिन्न देवताओं के भक्त, अपनी आस्था के अनुसार, देवताओं का सम्मान करने के लिए मंदिरों में सोना चढ़ाते हैं।

सदियों से चली आ रही इस परंपरा के कारण, 30 लाख मंदिरों के पास दुनिया में सबसे ज़्यादा सोना है।

हालांकि आजकल कोरोना वायरस महामारी के कारण, देश के बड़े बड़े मंदिर महीनों से बंद हैं और दान से वंचित हैं। अब यह मंदिर अपने ख़र्चों को पूरा करने के लिए, बैंकों में सोना गिरवी रखने पर विचार कर रहे हैं।


वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में हिंदू मंदिरों के पास लगभग 4,000 टन सोना है। दक्षिणी राज्य केरल के एक प्रमुख मंदिर त्रावणकोर देवासोम के बोर्ड के अधिकारियों ने मंदिर के सोने का एक भाग, बैंकों के पास गिरवी रखने का फ़ैसला किया है, ताकि उससे हासिल होने वाले ब्याज से कर्मचारियों का वेतन और दूसरे ख़र्चों को पूरा किया जा सके।

दरअसल मंदिरों की आमदनी का एक बड़ा ज़रिया चढ़ावे के रूप में आने वाली नक़दी या सोना चांदी है। लेकिन कोरोना महामारी के कारण चढ़ावे में काफ़ी कमी आ गई है।

त्रावणकोर बोर्ड के अंडर केरल राज्य में क़रीब 1250 मंदिर आते हैं। बोर्ड के अध्यक्ष एन वासु का कहना है कि हमारे पांच हज़ार रेगुलर कर्मचारी हैं, जिनकी हमें तन्ख़्वाह देनी होती है। हमारे चार हज़ार रिटायर्ड कर्मचारी हैं जिनकी पेंशन देनी होती है। इसी में हर महीने क़रीब 40 करोड़ रुपए ख़र्च होते हैं, इसके अलावा पूजा की सामग्री और कुछ और कामों पर क़रीब 10 करोड़ रुपए ख़र्च होते हैं। कुल मिलाकर हर महीने 50 करोड़ रुपए ख़र्च होते हैं।

उनका कहना था कि तन्ख़्वाहों के लिए भगवान के सोने के इस्तेमाल का कुछ लोग विरोध भी कर रहे हैं। लेकिन हमने अब तक के सबसे कठिन दौर के लिए यह कठिन फ़ैसला लिया है।

बोर्ड के सबसे अमीर मंदिर सबरीमला को सालाना क़रीब 350 करोड़ रुपए की आमदनी हो जाती थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण इसकी आमदनी भी बहुत कम हो गई है।

वासू के अनुसार, बोर्ड केन्द्र सरकार की गोल्ड मॉनेटाइज़ेशन स्कीम के तहत क़रीब 1,000 किलो सोना गिरवी रखने की योजना बना रहा है। उनका कहना था कि आगे चलकर हो सकता है कि उससे भी ज़्यादा सोना गिरवी रखा जाए।


गोल्ड भारतीयों के लिए एक भावनात्मक निवेश है, मंदिरों को दान किए गए गोल्ड बैंकों के हवाले किए जाने का देश में कड़ा विरोध हो सकता है। वहीं मंदिरों के सोने को बाज़ार में लाने के बारे में अखिल भारतीय रत्न और आभूषण परिषद के चेयरमैन एन. अनन्था पदमानबन का कहना है कि बाज़ार में अधिक सोने का मतलब होगा कि सरकार को अधिक आयात करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, इससे देश में विदेशी मुद्रा बढ़ेगी और भारतीय मुद्रा मज़बूत होगी।

भारत ने 2019 में लगभग 647 टन सोना आयात किया था, जिसमें से 60% फ़ीसद को गहने बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया, जो अक्सर दुल्हन को दहेज़ के रूप में दिया जाता है। हालांकि एक अनुमान के अनुसार, 2020 में सोने की मांग में एक तिहाई से अधिक कमी आ सकती है, क्योंकि देश की अर्थव्यस्था गंभीर संकट में है और करोड़ों लोग अपनी नौकरी से हाथ धो बैठे हैं।

मोदी सरकार की शुरूआत से ही मंदिरों के सोने पर नज़र है और 2015 में उन्होंने बैंकों में सोना जमा करने की एक स्कीम की घोषणा की थी, जिसके बदले लोग ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। अवधि के पूरा होने पर, वे सोने में या रुपए में अपना मूल वापस ले सकते हैं, लेकिन योजना के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि धातु की शुद्धता की जांच के लिए उसे पिघला दिया जाता है, जिसका अर्थ है कि जमाकर्ताओं को उनके द्वारा जमा किया गया सोना कभी वापस नहीं मिलेगा।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नवम्बर 2015 से जनवरी 2020 तक इस स्कीम के तहत केवल 20.5 टन सोना ही जमा कराया गया है, जो भारत द्वारा हर साल 700 से 900 टन सोने के आयात की तुलना में बहुत ही कम है।

वहीं त्रावणकोर बोर्ड के पूर्व प्रमुख प्रायर गोपालाकृषनन का कहना है कि भगवान, मंदिर के सोने के मालिक हैं। इतिहास गवाह है कि सरकारों ने अपने हितों के लिए मंदिरों के गोल्ड और ज़मीनों का दुरुपयोग किया है और मंदिरों की हालत ख़स्ता बना दी है। अगर मंदिरों को सोने का इस्तेमाल करना है, तो उसके लिए एक मज़बूत व्यवस्था बनाए जाने की ज़रूरत है।

यह योजना काम करेगी या नहीं, इसके बारे में विशेषज्ञों की अलग अलग राय हैं। तन्वी गुप्ता जैन का कहना है कि भारत के सोने के साथ गहरे संबंध की वजह से, मानसिकता और दृष्टिकोण में एक बुनियादी बदलाव की ज़रूरत है, और इसके लिए पीढ़ियां गुज़र जायेंगी, तब जाकर यह बदलाव आ सकता है

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