साहित्य

“बौद्ध साधना में मंत्र जाप”

मनीष कुमार विपस्सी
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Rajesh Chandra जी एक जाने माने नाम है बौद्ध कार्यकर्ताओ और बुद्धिजीवियों में । फेसबुक पर भी उनके पोस्ट पढ़ने वालो की बड़ी संख्या है तिपिटक के अच्छे जानकार है।

उनकी फेसबुक पोस्ट में ही एक दो आलेख उन्होने अपनी किताब की उसके संबंधित लिखी जो मुझे आकर्षित की सोचा खरीदा जाए अमेजन से पर देखा Maitri Sampoorn Dhamm Hai कीमत 650/- थी लगा मंहगी किताब है सो मंगाने का विचार करता रहा इसी दौरान एक आलेख इसी किताब के अंश का पढ़ा “बौद्ध साधना में मंत्र जाप” अब मुझे लगा यह किताब मुझे लेनी ही होगी।

अंतत किताब आ गई किताब कुछ डैमेज थी सीलन लगी तो एक्चेज के लिए लिखा । भला हो अमेजन वालो का उन्होने किताब बदल दी । मेरे हाथ में एक मोटी सी हार्ड कभर की किताब थी । 400 पन्नो कि किताब 58 लेखो की माला । माला का लगभग हर मनका लेख लगभग अलग अलग तबियत का, पर मैत्री और घम्म के ही इर्दगिर्द घुमता हुआ । किताब पढना शुरू किया और खुद को रोक नहीं पाया व्यस्ता के बावजूद पूरी किताब जल्द खत्म कर दिया।

यह किताब “मैत्री संपूर्ण धम्म है” बहुत अच्छी लगी।जैसे कोई धम्म रूपी खंबे को पकड़ गोल गोल घुम रहा हो वैसे किताब के परिधि में धम्म है और धम्म के अंतर्गत मैत्री पर जोर है जो किताब का शीर्षक भी है। इसमें कुछ महत्वपूर्ण सुत्तो की सरलतम व्याख्या है, धम्म के प्रति मार्गदर्शन है, लेखक के अनुभव है, उनके हृदय के भाव है ,घम्म के प्रति श्रद्धा है, अनुराग है, कुछ छिपा सा इतिहास है विशिष्ठ लोगो के मुलकात है उनके साथ जुड़कर धम्म के प्रति समर्पण का सुंदर वर्णन है । कुल मिलाकर किताब बाँधे रहती है । इस तरह एक सुंदर सी किताब कई सारी जानकारीयों के भरी हुई ।

लगभग 125 पेज तो थोड़ा थोड़ा करके पढा पर मेरी किताब जब एक्चेंज हो गई तो उसके बाद तीन दिनों में पुरी किताब खत्म कर दी । घ्यान के दौरान मैत्री चुकि विपस्सना के दौरान तो करते ही है पर लेखक ने जिस तरह विस्तृत रूप से मैत्री कैसे करे लिखा वो अत्यंत लाभकारी है।

पुस्तक में एक असम के एक परिवार का विवरण भी है जो धम्मिका संध के रूप में खुद का परिचय देता है। बुद्ध के विनय की प्रतिमुर्ति पूरे भारत में पैदल चारिका कर रहे है । धम्मिका संध के बारे मे जो जानकारी दी तो विस्वास नहीं हो रहा था धम्म को समर्पित ऐसे लोग भी है इस धरती पर हैं जब वे आज के समय ऐसा विनय के प्रति निष्ठावान है तो फिर भगवान बुद्ध के समय कैसा रहा होगा जब घम्म अपनी पराकाष्ठा पर थी।

राजेश चंद्रा जी अपने हृदय की बात उसके भाव को अपने अनुभव को इस किताब में ढाला है उनका हृदय एक भक्त के रूप में शास्ता(बुद्ध) के प्रति प्रीति को भी दर्शाया है । बुद्ध धम्म संध के प्रति अपनी भावो को दर्शाने वाली एक लेख के अंत में दि गई एक कविता यहां प्रस्तुत करता है –

महाबोधि मन्दिर, बोध गया में बुद्ध के सामने घुटने टेक कर हाथ जोड़ कर मैंने प्रार्थना की थी –
शास्ता !
तुम मेरा उपयोग कर लो
मुझे नहीं मालूम
कि मैं किस काम का हूँ
बस इतना मालूम है
कि मैं तुम्हारे लिए
धम्म के लिए
और संघ के लिए ही
जन्मा हूँ
हे बुद्ध!
मैं तुमको
धम्म को
और संघ को
शरणागत हूँ …
बस यह त्रिरत्न ही
मेरी कुल सम्पदा हैं
अन्यथा और कुछ भी नहीं है
मेरे पास …
तुम मेरा उपयोग कर लो
इस जीवन की
सार्थकता इसी में है कि यह
त्रिरत्नों के काम आ जाए
मगर काम कैसे आऊँ ?
मुझे नहीं मालूम
मेरी हाथ जोड़ विनती है तुमसे
कि तुम मेरा उपयोग कर लो
इस निरर्थक जीवन को
कुछ अर्थ दो ?
हे मेरे शास्ता !
यह कविता में राजेश जी ने अपने पुरे हृदय के भाव को सींचा है । मैंने महसुस किया कि जब लेखक का कलम इस शब्द को लिख रही था तो ऑखें डबडबई हुई थी अक्खर भी धुंधले हुए जा रहे थे ऑखे के पलक से बहकर गालो को छुते हुए बुंदे कागज पर टपक रहे थे। मेरे मन में गुंज उठा।
“शास्ताऽऽ
इस अकिंचन को भी उपयोग कर लो !
राह बिखरे किसी अनजान ठोकर खाते पत्थर को ,
जीवन का एक अर्थ दो।
हॉ, जीवन का एक अर्थ दे दो॥
शास्ता मेरा भी उपयोग कर लो।
इस भावपूर्ण कविता के आईने में खुद के हृदय का भी प्रतिबिंब देखने लगा।
सो कह सकते कि बहुत पसंद आयी यह किताब। इस सुंदर किताब के लिए राजेश चंद्रा जी को साधुवाद!
यह एक संग्रहणीय किताब है जिसमें बुद्ध धम्म और संध के प्रति समर्पण भाव को दर्शाया है।

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