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भारत के रक्षा मंत्री और फिर विदेशमंत्री की ईरान यात्रा और चीन व भारत के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा : एक रिपोर्ट

हालिया दिनों में जल्दी जल्दी भारत के दो वरिष्ठ अधिकारियों की ईरान यात्रा और चीन व भारत के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा, चीन, ईरान भारत के त्रिकोण के बीच राष्ट्रीय हितों के आधार पर सहयोग और प्रतिस्पर्धा में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकती है।

भारत के रक्षा मंत्री और फिर विदेशमंत्री ने 6 और 8 सितंबर को तेहरान की यात्रा की। भारतीय नेताओं ने इस यात्रा में अपने ईरानी समकक्षों के साथ, अफगानिस्तान, ऊर्जा और बुनियादी सुविधाओं तथा चाहबहार बंदरगाह के बारे में चर्चा की। ईरान व भारत के संबंध तेज़ी से बढ़ रहे हैं तो फिर भारत, चीन और ईरान के त्रिकोण में ईरान की भूमिका के बारे में बहुत से सवाल उठ रहे हैं। सब से महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या भारत की कूटनैतिक भाग-दौड़ ईरान व चीन के सहयोग में वृद्धि और ईरान के साथ सहयोग की वजह से इलाक़े में चीन के प्रभाव में वृद्धि का कारण बनेगी?

सच्चाई यह है कि इलाक़े में दो विचारधाराएं हैं जो एक दूसरे के विपरीत हैं। एक अमरीकी विचारधारा है जो इंडिया पेसेफिक कही जाती है और र विदेशमंत्री ने 6 और 8 सितंबर को तेहरान की यात्रा की। भारतीय नेताओं ने इस यात्रा में अपने ईरानी समकक्दूसरी चीनी है जिसे पेसेफिक इंडिया कहा जाता है। अमरीका इस इलाक़े में भारत को अपना घटक बनाता है और चीन, पाकिस्तान को। पाकिस्तान व अफगानिस्तान में भी प्रतिस्पर्धा है जबकि दूसरी तरह भारत और चीन में भी खींचतान रहती है। इस बीच अमरीकी यह चाहते हैं कि किसी तरह से चीन पर लगाम कसें ताकि वह शक्ति की सीढ़ियां चढ़ते हुए अमरीका को पीछे न छोड़ पाए क्योंकि अमरीकियों को अब भी यही लगता है कि उन्हें दुनिया की सब से बड़ी ताक़त के रूप में अपना रोल निभाचना चाहिए और उन्हें लगता है कि 21वीं सदी को भी अमरीकी सदी होना चाहिए जबकि साक्ष्यों से यह पता चलता है कि अमरीका अब न तो अपनी आर्थिक शक्ति की वजह से, और न ही अपनी राजनीतिक व्यवस्था की वजह से, अपनी पोज़ीशन बचाने की क्षमता रखता है। चीन धीरे धीरे दुनिया की सब से बड़ी ताक़त बन रहा है क्योंकि उसके पास शक्ति के लिए आवश्यक सभी पारंपारिक और आधुनिक साधन मौजूद हैं।

इस आधार पर सवाल यह है कि भारत चीन के साथ किस स्तर पर सहयोग कर सकता है? इसका जवाब भारत की नीतियों में निहित है। भारत शीत युद्ध के काल में गुट निरपेक्ष आंदोलन का महत्वपूर्ण देश था तो क्या आज भी वह अपनी उन नीतियों के प्रति वफादार रह सकता है? इस संदर्भ में भारत और चीन का दृष्टिकोण काफी हद तक समान है। दोनों ही देशों का मानना है कि दुनिया में एक ही महाशक्ति का होना उचित नहीं है बल्कि कई शक्तियों का होना आवश्यक है।

अफगानिस्तान में शांति स्थापना भी चीन और भारत दोनों की ही इच्छा है अगर एसा हो जाए तो चीन, अपनी महत्वकांक्षी योजना के तहत अफगानिस्तान और ईरान से जुड़ जाएगा और भारत और अमरीका भी इलाक़े में अपना प्रभाव बढ़ा लेंगे।

भारत और ईरान के मध्य बढ़ते संबंधों के तहत यह सवाल भी है कि क्या भारत, चीन को ईरान के बाज़ार के कुछ हिस्सों से हटा सकता है?

इसके जवाब यह है कि संभवतः यह मुमकिन नहीं है। ईरान अगर चीन के साथ 25 वर्षीय महत्वकांक्षी समझौते को अंतिम रूप देता है और उसके आधार पर चीन ईरान के तेल और गैस के सेक्टर में 400 अरब डालर का निवेश करता है तो निश्चित रूप से भारत के लिए चाबहार बदंरगाह में अपनी पोज़ीशन बचाना चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकता है।

इन हालात में एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चीन और भारत के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, ईरान किस तरह से ईरान, भारत , चीन त्रिकोण में अपनी पोज़ीशन बचा पाएगा?

इस सवाल के जवाब में यह कहना चाहिए कि ईरान, साधनों की दृष्टि से इस त्रिकोण में अपनी पोज़ीशन सुरक्षित रखने की क्षमता रखता है और ईरान का हित भी इसी में है कि वह क्षेत्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी एक पक्ष से एकपक्षीय रूप से न जुड़े। भारत और चीन की एक दूसरे से विभिन्न क्षेत्रों में कड़ी प्रतिस्पर्धा है अगर इस प्रतिस्पर्धा में ईरान को शामिल किया जाए तो निश्चित रूप से ईरान के लिए नये नये अवसर पैदा होंगे। उदाहरण स्वरूप अब तक भारत, चाबहार में अकेला ही रहा है लेकिन चीन और ईरान के बीच बढ़ते सहयोग के बाद चीन भी इस परियोजना में शामिल हो सकता है और इस की वजह से भारत अपनी परियोजना को जल्दी जल्दी पूरा कर सकता है।

साभार, स्पूतनिक न्यूज़ एजेन्सी

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