इतिहास

मुस्लिम अपनी ही चचेरी, ममेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों से विवाह करते हैं, ये उचित है या अनुचित : सुभद्रा अर्जुन की सगी ममेरी बहन थीं!

Azhar Shameemشاھین نیوز
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Vishal varma जी के सवाल का जवाब

मुस्लिमों द्वारा अपने चाचा, मामा, बुआ की बेटियों से विवाह करने की प्रथा पर हमारे कुछ अन्य धर्म वाले भाईयों का बड़ी घृणा के साथ कहना है कि मुस्लिम अपनी ही बहनों के ही भाई नहीं होते, और मुस्लिमों की गन्दी नज़र ने उनकी अपनी बहनें ही नहीं बच पातीं

भाईयों आपका ये कटाक्ष सर आंखो पर लेते हुए मैं ये कहना चाहता हूँ कि मुस्लिमों को सिर्फ अपनी बहनों का ही नही बल्कि इसकी, उसकी, आपकी, मेरी सभी की बहनों का भाई बनने का, यानि संसार की सारी लड़कियों का भाई बनने का आदेश दिया गया है, चाहे वो लड़कियां किसी भी धर्म, जाति समुदाय की हों, उनके मान-सम्मान उनके सतीत्व और उनके जीवन की रक्षा हमें ठीक उसी प्रकार करनी है, जैसे एक भाई अपनी बहन की रक्षा करता है

अब भाई, रहा सवाल इस बात का कि जो मुस्लिम अपनी ही चचेरी, ममेरी, फुफेरी और मौसेरी बहनों से विवाह करते हैं, ये उचित है या अनुचित, सराहनीय कार्य है या घृणास्पद ?

तो इस बारे मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि क्योंकि ऐसे विवाह की हर धर्म मे अनुमति है, तो आप चाहे जिस भी धर्म को उचित मानें, ये विवाह भी आपको उचित ही मानना होगा …..

ऐसे विवाह की विशेषता ये है कि क्योंकि वधू, वर पक्ष के किसी अपने ही प्रिय सम्बन्धी की ही बेटी होती है, इसलिए दहेज प्रताड़ना, दहेज हत्या की संभावना शून्य, और वधू के मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न की संभावना बिलकुल क्षीण रहती है … पति को अपने ससुराल पक्ष का इस कारण और लिहाज़ रहता है, कि वो पहले से उनके रिश्तेदार हैं, इसलिए अकारण वो पत्नी को त्यागने आदि से खुद को रोकता है…

फिर ऐसे विवाह मे विशेषकर लड़की के विवाह मे आसानी रहती है, लड़की यदि गुणवती है तो उसके गुणों से मुग्ध हो कर, और यदि गुणवती नहीं भी है तो भी उसके परिवार से प्रेम के कारण खानदान से ही लड़की के रिश्ते आ जाते हैं, क्योंकि लड़की को देखने वाला उसका भावी ससुराल पक्ष उसके घर मे सदा से ही आता जाता रहा है

पति पत्नी या उनके परिवारों के आपस मे व्यवहार न मिल पाने के कारण विवाह के टूटने का भय भी इस विवाह मे न्यून है क्योंकि दोनों परिवार वर वधू के जन्म से भी पहले से एक दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं, और एक दूसरे के व्यवहार को वर्षों अच्छी तरह परखने, और विवाह के लिए वर वधू की सहमति के बाद ही आपस मे ये नया सम्बन्ध जोड़ते हैं …. और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि करीबी सम्बन्धियों मे विवाह की प्रथा से लड़के लड़कियों के विवाह मे देरी की नौबत नही आती, जिससे नई पीढ़ी मे भटकाव की समस्या भी नही आने पाती, जबकि अन्य परिवारों मे रिश्ता ढूंढने और पसंद करने मे कई वर्ष लग जाते हैं, इसके बाद भी विवाह के सफल न होने का डर अलग …!! इन्हीं सारे कारणों से मैं तो करीबी रिश्तेदारियों मे विवाह की प्रथा को एक सराहनीय कार्य मानता हूँ .

आज भी हिन्दू समाज में पुरे साऊथ इंडिया में up और उड़ीसा के कुछ जगहों पे चचेरी ममेरी फुफेरी बहन से शादिया होती है और साऊथ में तो सगी भांजी से भी

संभवत: इसी कारण हर धर्म ने इस विवाह की अनुशंसा की है, महात्मा बुद्ध की पत्नी यशोधरा उनके सगे मामा और सगी बुआ की बेटी थीं, और स्वयं श्रीकृष्ण जी ऐसे विवाह के पक्ष मे थे . कृष्ण जी ने अपनी बहन सुभद्रा का विवाह अपनी सगी बुआ के पुत्र अर्जुन से करवाया था ! अर्जुन सुभद्रा के सगे फुफेरे भाई थे, और सुभद्रा अर्जुन की सगी ममेरी बहन थीं, नीचे लिखे प्रमाणों से ये बात भली प्रकार सिद्ध होती है :-

1- वसुदेव एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और माता का नाम मारिषा था।
*. ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे। पांडवों की माता कुंती वसुदेव की सगी बहन थी ।

http://bharatdiscovery.org/india/वसुदेव

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वसुदेव
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– कृष्ण जन्म वसुदेव, कृष्ण को कंस के कारागार मथुरा से गोकुल ले जाते हुए, द्वारा- राजा रवि वर्मा
– एक यदुवंशी जिनके पिता का नाम शूर और माता का नाम मारिषा था।
– ये मथुरा के राजा उग्रसेन के मन्त्री थे। पांडवों की माता कुंती वसुदेव की सगी बहन थी।

कृष्ण-बलराम, देवकी-वसुदेव से मिलते हुए, द्वारा- राजा रवि वर्मा
उग्रसेन के भाई देवक की सात कन्याओं से इनका विवाह हुआ था जिनमें देवकी और रोहिणी प्रमुख थीं। कहीं पर इनकी पत्नियों की संख्या 12 बताई गई है।
रोहिणी के आठ पुत्र थे। इनमें बलराम प्रमुख थे। देवकी के भी आठ संताने हुई जिनमें से सात को उसके चचेरे भाई कंस ने जन्म लेते ही मार डाला और आठवीं संतान श्रीकृष्ण बच गए। बाद में द्वारका में श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण का समाचार सुनकर वसुदेव ने भी प्राण त्याग दिए।

भागवत तथा अन्य पुराणों के अनुसार वसुदेव कृष्ण के वास्तविक पिता, देवकी के पति और कंस के बहनोई थे। जिस प्रकार यशोदा की तुलना में देवकी का चरित्र भक्त कवियों को आकर्षित नहीं कर सका, उसी प्रकार नन्द की तुलना में वसुदेव का चरित्र भी गौण ही रहा। कृष्ण जन्म पर कंस के वध के भय से आक्रान्त वसुदेव की चिन्ता, सोच और कार्यशीलता से उनके पुत्र-स्नेह की सूचना मिलती है। यद्यपि उन्हें कृष्ण अलौकिक व्यक्तित्व का ज्ञान है फिर भी उनकी पितृसुलभ व्याकुलता स्वाभाविक ही है।

मथुरा में पुनर्मिलन के पूर्व ही वसुदेव को स्वप्न में उसका आभास मिल जाता है। वे अपनी दुखी पत्नी देवकी से इस शुभ अवसर की आशा में प्रसन्न रहने के लिए कहते हैं।[वसुदेव का चरित्र भागवत-भाषाकारों के अतिरिक्त सूर के समसामायिक एवं परवर्ती प्राय: सभी कवियों की दृष्टि में उपेक्षित ही रहा। आधुनिक युग में केवल ‘कृष्णायन’ (1/2) के अन्तर्गत उसे परम्परागत रूप में ही स्थान मिल सका है।

संदर्भ
सूर सागर प0 620-630
सूर सागर प0 307-309
रा0 कु0

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2- पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुंतिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम ‘कुंती’ पड़ गया, कुंती भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। कुन्ती को इन्द्र के अंश से अर्जुन का जन्म हुआ।

http://bharatdiscovery.org/india/कुन्ती

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कुन्ती
कुन्ती महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक है। श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव की बहन थीं और भगवान श्रीकृष्ण की बुआ थीं। महाराज कुन्तिभोज से इनके पिता की मित्रता थी, उसके कोई सन्तान नहीं थी, अत: ये कुन्तिभोज के यहाँ गोद आयीं और उन्हीं की पुत्री होने के कारण इनका नाम कुन्ती पड़ा। महाराज पाण्डु के साथ कुन्ती का विवाह हुआ, वे राजपाट छोड़कर वन चले गये। वन में ही कुन्ती को धर्म, इन्द्र, पवन के अंश से युधिष्ठर, अर्जुन, भीम आदि पुत्रों की उत्पत्ति हुई और इनकी सौत माद्री को अश्वनीकुमारों के अंश से नकुल, सहदेव का जन्म हुआ। महाराज पाण्डु का शरीरान्त होने पर माद्री तो उनके साथ सती हो गयी और ये बच्चों की रक्षा के लिये जीवित रह गयीं। इन्होंने पाँचों पुत्रों को अपनी ही कोख से उत्पन्न हुआ माना, कभी स्वप्न में भी उनमें भेदभाव नहीं किया।

जीवन परिचय
पृथा (कुंती) महाराज शूरसेन की बेटी और वसुदेव की बहन थीं। शूरसेन के ममेरे भाई कुन्तिभोज ने पृथा को माँगकर अपने यहाँ रखा। इससे उनका नाम ‘कुंती’ पड़ गया। पृथा को दुर्वासा ऋषि ने एक मंत्र बतला दिया था जिसके द्वारा वे किसी देवता का आवाहन करके उससे संतान प्राप्त कर सकती थीं। समय आने पर स्वयंवर-सभा में कुंती ने पाण्डु को जयमाला पहनाकर पति रूप से स्वीकार कर लिया।

महर्षि दुर्वासा का वरदान
आगे चलकर पाण्डु को शाप हो जाने से जब उन्हें संतान उत्पन्न करने की रोक हो गई तब कुंती ने महर्षि दुर्वासा के वरदान का हाल सुनाया। यह सुनने से महाराज पाण्डु को सहारा मिल गया। उनकी अनुमति पाकर कुंती ने धर्मराज के द्वारा युधिष्ठिर को, वायु के द्वारा भीमसेन को और इन्द्र के द्वारा अर्जुन को उत्पन्न किया। इसके पश्चात् पाण्डु ने पुत्र उत्पन्न करने के लिए जब उनसे दोबारा आग्रह किया तब उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। कह दिया कि यह नियम – विरुद्ध और अनुचित होगा।

वैवाहिक जीवन
वास्तव में कुंती का वैवाहिक जीवन आनन्दमय नहीं हुआ। आरम्भ में उन्हें कुछ सुख मिला, किंतु इसके अनंतर पति के शापग्रस्त होकर रोगी हो जाने और कुछ समय पश्चात् मर जाने से उनको बड़े क्लेश सहने पड़े। ऋषि लोग जब बालकों समेत विधवा कुंती को उनके घरवालों को सौंपने हस्तिनापुर ले गये तब वहाँ उनका स्वागत तो हुआ नहीं, उल्टा वे सन्देह की दृष्टि से देखी गईं। उनकी संतान को वैध संतति मानने में आपत्ति की गई। किसी प्रकार उनको रख भी लिया गया तो तरह-तरह से सताया जाने लगा। वे अपने पुत्रों के साथ “वारणावत” भेजी गईं। और ऐसे भवन में रखी गईं जो किसी भी घड़ी भभककर सबको भस्म कर देता। किंतु हितैषी विदुर के कौशल से वे संकट से पुत्रों समेत बचकर निकल गईं। जंगल में उन्होंने विविध कष्ट सहे। साथ में पुत्रों के रहने से उनके लिए बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ भी सरल हो गईं। इन्हीं कष्टों के सिलसिले में उनको पुत्रवधू द्रौपदी की प्राप्ति हुई। इससे उन्हें कुछ संतोष हुआ। इसी बीच उन्हें धृतराष्ट्र ने हस्तिनापुर में बुलाकर अलग रहने का प्रबन्ध कर दिया जिसमें कोई झगड़ा-बखेड़ा न हो। यही थोड़ा-सा समय था जब कुंती को कुछ आराम मिला।

कुन्ती का पाण्डवों के साथ वनवास
इसके बाद दुर्योधन ने युधिष्ठिर को जुए में हराकर शर्त के अनुसार वनवास करने को भेज दिया। इस वनवास के समय कुंती को अपने पुत्रों से अलग हस्तिनापुर में रहना पड़ा। उनके लिए यह बहुत बड़ा संकट था। उन्होंने हस्तिनापुर से युधिष्ठिर के पास संदेशा भेजा था वह उन जैसी वीर पत्नी और वीरमाता के अनुरूप था। वे नहीं चाहती थीं कि संकट में पड़कर उनके पुत्र आत्मसम्मान को खो बैठें। संकट सहते-सहते उन्हें संकटों से एक प्रकार का प्रेम हो गया था। इसी से, एक बार श्रीकृष्ण के वरदान देने को तैयार होने पर कुंती ने कहा था कि यदि मैं धन-दौलत अथवा और कोई वस्तु माँगूँगी तो उसके फेर में पड़कर तुम्हें (भगवान को) भूल जाऊँगी, इसलिए मैं ज़िन्दगी भर कठिनाइयों से घिरी रहना पसन्द करती हूँ। उनमें फँसे रहने से मैं सदा तुमको स्मरण किया करूँगी।

माद्री का विश्वास
कुंती की सौत का नाम माद्री था। साथ कुंती का बर्ताव बहुत ही अच्छा था। वह कुंती को अपने बेटे सौंपकर सती हो गई थी। उसने कुंती से कहा था कि मैं पक्षपात से बचकर अपने और तुम्हारे बेटों का पालन न कर सकूँगी। यह कठिन काम तुम्हीं करना। मुझे तुम पर पूरा-पूरा भरोसा है।

धृतराष्ट्र और गान्धारी का सत्कार
जेठ-जेठानी-धृतराष्ट्र और गान्धारी-के पुत्रों ने यद्यपि कुंती के लड़कों को कष्ट देने में कुछ कमी नहीं की थी फिर भी वे सदा जेठ-जेठानी का सत्कार किया करती थीं। पाण्डवों को राज्य प्राप्त हो जाने पर कुछ समय के बाद जब धृतराष्ट्र, गान्धारी के साथ, वन को जाने लगे तब कुंती भी उनके साथ हो गईं। धृतराष्ट्र आदि ने उनको घर रखने के लिए बहुत-बहुत समझाया, वे रोये-गिड़गिड़ाये भी, किंतु नहीं लौटीं। उन्होंने धर्मराज से स्पष्ट कर दिया कि ‘मैंने अपने आराम के लिए तुमको युद्ध करने के लिए सन्नद्ध नहीं किया था, युद्ध कराने का मेरा उद्देश्य यह था कि तुम संसार में वीर की भाँति जीवन व्यतीत कर सको।’ उन्होंने वन में जाकर अपने जेठ-जेठानी की सेवा-शुश्रूषा जी-जान से की। इस दृष्टि से उसका महत्त्व गान्धारी से भी बढ़ जाता है। गान्धारी को संतान-प्रेम था, वे अपने पुत्रों का भला चाहती भी थीं। यद्यपि दुर्योधन के पक्ष को न्याय-विरुद्ध जानकर उन्होंने उसे विजय का आशीर्वाद नहीं दिया था, फिर भी माता का हृदय कहाँ तक पत्थर का हो जाता। उन्होंने कुरुक्षेत्र का संहार देख अंत में श्रीकृष्ण को शाप दे ही डाला। किंतु कुंती ने हज़ार कष्ट सहने पर भी ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे उनके चरित्र का महत्त्व कम हो जाय। उनमें इतनी अधिक दया थी कि वे एकचक्रा नगरी में रहते समय, अपने आश्रयदाता ब्राह्मण के बेटे के बदले अपने पुत्र भीमसेन को राक्षस की भेंट करने को तैयार हो गईं। थीं। यह दूसरी बात है कि उस राक्षस से भीमसेन इक्कीस निकले और उसे मारकर उन्होंने बस्तीवालों का संकट काट दिया। कुंती इतनी उदार थीं कि उन्होंने हिडिम्बा राक्षसी को भी पुत्रवधू मानने में आपत्ति नहीं की।

कुन्ती का त्याग
मुख्य लेख : कुन्ती का त्याग
पाँचों पाण्डवों को कुन्ती सहित जलाकर मार डालने के उद्देश्य से दुर्योधन ने वारणावत नामक स्थान में एक चपड़े का महल बनवाया और अन्धे राजा धृतराष्ट्र को समझा बुझाकर धृतराष्ट्र के द्वारा युधिष्ठिर को आज्ञा दिलवा दी कि’ तुम लोग वहाँ जाकर कुछ दिन रहो और भाँति-भाँति से दान-पुण्य करते रहो।

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3- सुभद्रा कृष्ण की बहिन जो वसुदेव की कन्या और अर्जुन की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई बलराम इनका ब्याह दुर्योधन से करना चाहते थे पर कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु , महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा हैं।

http://bharatdiscovery.org/india/सुभद्रा

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सुभद्रा

अर्जुन और सुभद्रा
पूरा नाम सुभद्रा
पिता/माता वसुदेव, देवकी
पति/पत्नी अर्जुन
संतान अभिमन्यु
वंश यदुवंश
संबंधित लेख कृष्ण, बलराम, अर्जुन, अभिमन्यु

अन्य जानकारी पुरी, उड़ीसा में ‘जगन्नाथ की यात्रा’ में बलराम तथा सुभद्रा दोनों की मूर्तियाँ भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ ही रहती हैं।
सुभद्रा महाभारत के प्रमुख नायक भगवान श्रीकृष्ण की बहिन थीं, जो वसुदेव की कन्या और अर्जुन की पत्नी थीं। इनके बड़े भाई बलराम इनका विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे, किंतु कृष्ण के प्रोत्साहन से अर्जुन इन्हें द्वारका से भगा लाए। सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा थे। पुरी, उड़ीसा में ‘जगन्नाथ की यात्रा’ में बलराम तथा सुभद्रा दोनों की मूर्तियाँ भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ ही रहती हैं।

अर्जुन-सुभद्रा विवाह
एक बार वृष्णि संघ, भोज और अंधक वंश के लोगों ने रैवतक पर्वत पर बहुत बड़ा उत्सव मनाया। इस अवसर पर हज़ारों रत्नों और अपार संपत्ति का दान किया गया। बालक, वृद्ध और स्त्रियां सज-धजकर घूम रही थीं। अक्रूर, सारण, गद, वभ्रु, विदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु, विपृथु, सत्यक, सात्यकि, हार्दिक्य, उद्धव, बलराम तथा अन्य प्रमुख यदुवंशी अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उत्सव की शोभा बढ़ा रहे थे। गंधर्व और बंदीजन उनका विरद बखान रहे थे। गाजे-बाजे, नाच तमाशे की भीड़ सब ओर लगी हुई थी। इस उत्सव में कृष्ण और अर्जुन भी बड़े प्रेम से साथ-साथ घूम रहे थे। वहीं कृष्ण की बहन सुभद्रा भी थीं। उनकी रूप राशि से मोहित होकर अर्जुन एकटक उनकी ओर देखने लगे। कृष्ण ने अर्जुन के अभिप्राय को जानकर कहा- “तुम्हारे यहाँ स्वयंवर की चाल (प्रचलन) है, परंतु यह निश्चय नहीं कि सुभद्रा तुम्हें स्वयंवर में वरेगी या नहीं, क्योंकि सबकी रुचि अलग-अलग होती है, लेकिन राजकुलों में बलपूर्वक हर कर ब्याह करने की भी रीति है। इसलिए तुम्हारे लिए वही मार्ग प्रशस्त होगा।”

एक दिन सुभद्रा रैवतक पर्वत पर देवपूजा करने गईं। पूजा के बाद पर्वत की प्रदक्षिणा की। ब्राह्मणों ने मंगल वाचन किया। जब सुभद्रा की सवारी द्वारका के लिए रवाना हुई, तब अवसर पाकर अर्जुन ने बलपूर्वक उसे उठाकर अपने रथ में बिठा लिया और अपने नगर की ओर चल दिए। सैनिक सुभद्राहरण का यह दृश्य देखकर चिल्लाते हुए द्वारका की सुधर्मा सभा में गए और वहां सब हाल कहा। सुनते ही सभापाल ने युद्ध का डंका बजाने का आदेश दे दिया। वह आवाज़ सुनकर भोज, अंधक और वृष्णि वंशों के योद्धा अपने आवश्यक कार्यों को छोड़कर वहां इकट्ठे होने लगे। सुभद्राहरण का वृत्तान्त सुनकर उनकी आंखें चढ़ गईं। उन्होंने सुभद्रा का हरण करने वाले को उचित दंड देने का निश्चय किया। कोई रथ जोतने लगा, कोई कवच बांधने लगा, कोई ताव के मारे ख़ुद घोड़ा जोतने लगा, युद्ध की सामग्री इकट्ठा होने लगी। तब बलराम ने कहा- “हे वीर योद्धाओ! कृष्ण की राय सुने बिना ऐसा क्यों कर रहे हो?” फिर उन्होंने कृष्ण से कहा- “जनार्दन! तुम्हारी इस चुप्पी का क्या अभिप्राय है? तुम्हारा मित्र समझकर अर्जुन का यहाँ इतना सत्कार किया गया और उसने जिस पत्तल में खाया, उसी में छेद किया। यह दुस्साहस करके उसने हमें अपमानित किया है। मैं यह नहीं सह सकता।”

सुभद्रा और अर्जुन
तब कृष्ण बोले- “अर्जुन ने हमारे कुल का अपमान नहीं, सम्मान किया है। उन्होंने हमारे वंश की महत्ता समझकर ही हमारी बहन का हरण किया है। क्योंकि उन्हें स्वयंवर के द्वारा उसके मिलने में संदेह था। वह उत्तम वंश का होनहार युवक है। उसके साथ संबंध करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सुभद्रा और अर्जुन की जोड़ी बहुत ही सुंदर होगी।” कृष्ण की यह बात सुन कर कुछ लोग कसमसाए। तब कृष्ण ने आगे कहा- “इसके अलावा अर्जुन को जीतना भी दुष्कर है। यहाँ चाहे जितनी जोशीली बातें कर लें, वहां उसके हाथों पराजय भी हो सकती है। मैं समझता हूं कि इस समय लड़ाई का उद्योग न करके अर्जुन के पास जाकर मित्रभाव से कन्या सौंप देना ही उत्तम है। कहीं अर्जुन ने अकेले ही तुम लोगों को जीत लिया और कन्या को हस्तिनापुर ले गया तो और बदनामी होगी। यदि उससे मित्रता कर ली जाए तो हमारा यश बढे़गा।”

आख़िर लोगों ने कृष्ण की बात मान ली। सम्मान के साथ अर्जुन लौटा कर लाए गए। द्वारका में सुभद्रा के साथ उनका विधिपूर्वक विवाह संस्कार संपन्न हुआ। विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। बनवास के बारह वर्ष समाप्त होने के उपरांत श्रीकृष्ण, बलराम, सुभद्रा तथा दहेज के साथ अर्जुन इन्द्रप्रस्थ वापस चले गये। कालांतर में सुभद्रा की कोख से अभिमन्यु का जन्म हुआ।

श्रीमद्भागवत के उल्लेखानुसार
‘श्रीमद्भागवत’ के उल्लेखानुसार जब अर्जुन तीर्थयात्रा करते हुए प्रभास क्षेत्र पहुँचे, तब वहाँ उन्होंने सुना कि बलराम अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते हैं, किंतु कृष्ण, वसुदेव तथा देवकी सहमत नहीं हैं। अर्जुन एक त्रिदंडी वैष्णव का रूप धारण करके द्वारका पहुँचे। बलराम ने उनका विशेष स्वागत किया। भोजन करते समय उन्होंने और सुभद्रा ने एक-दूसरे को देखा तथा परस्पर विवाह करने के लिए इच्छुक हो उठे। एक बार सुभद्रा देव-दर्शन के लिए रथ पर सवार होकर द्वारका दुर्ग से बाहर निकलीं। सुअवसर देखकर अर्जुन ने उनका हरण कर लिया। इस कार्य के लिए अर्जुन को कृष्ण, वसुदेव तथा देवकी की सहमति पहले से ही प्राप्त थी। बलराम को उनके संबंधियों ने बाद में समझा-बुझाकर शांत कर दिया।

संदर्भ
महाभारत, आदिपर्व, अ0 217-220
श्रीमद् भागवत, 10।86।1-12

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