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मृतक श्राद्ध चीन से आयातित अवैदिक परंपरा है।

डॉ. नरेंद्र वेदालंकार
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🔥मृतक श्राद्ध🔥

मृतक श्राद्ध चीन से आयातित अवैदिक परंपरा है।

महाभारत-काल में मृतक-श्राद्ध का पाखंड नहीं था। वहाँ पर स्पष्ट लिखा है कि अपने अच्छे-बुरे कर्मों के अनुरूप ही जीव की गति होती है। और मृत्यु के बाद जीव को दूसरा जन्म मिल जाता है। मृतकों के लिए अन्यत्र कहीं कोई स्वर्ग या नरक जैसा कल्पित लोक नही है। सभी को अपने शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है-

“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।” और केवल शरीर के माध्यम से ही सुख या दुःख का अनुभव किया जा सकता है।

महाभारत की एक कथा है-

किसी दत्तात्रेय नामक राजा का पुत्र मर गया, तो उसने नयी विधि से दशगात्र-पिंड-श्राद्ध करके कुछ लोभी-ब्राह्मणों को बुलाकर भोजन करा दिया किंतु अब वह काफी भयभीत होकर पछताने लगा कि मैंने तो बौद्धों के बहकावे में आकर यह अवैदिक- कुकृत्य कर डाला। यदि किसी ऋषि या ब्राह्मण को यह जानकारी मिल गई तो मुझे शाप देकर भस्म कर देंगे या समाज से बहिष्कृत कर देंगें-(महा.आदि.91.17)( वाराह पुराण-187.75–77).

मतलब यह कि सपिंड श्राद्ध-क्रिया प्राचीन भारत की वैदिक परंपरा नहीं है बल्कि यह बौद्धों देन है। बौद्धमत के प्रचलन के बाद महाभारत में यह कहानी जोड़ी गई। बौद्धों में यह अंधविश्वास चीनी बौद्धों से आया। चीनी लोग मृतकों की याद में चबूतरे बनवाकर, वहाँ पर प्रतिवर्ष पशु-पक्षियों को जलाते-मारते और भूत-प्रेतों को पूज-पूज कर, विविध-मांसों का सहभोज भी करते थे। ये लोग जब बौद्धधर्मी होकर बौद्धमत के प्रमुख प्रचार केंद्र “बोधगया” में आने लगे, तो कुछ परिवर्तित रूप में प्रतिवर्ष यहां भी वे “पितृ-महोत्सव” मनाने लगे! यहां के बौद्ध-भिक्षु भी इन्हें अतिथि समझकर,और कुछ लालचवश भी मना न कर सके। भारतीय बौद्धों ने भी इस परंपरा को अपना लिया।

बौद्धों की देखा-देखी यहां के पौराणिक-पंडितों ने भी “गया” को ही अपना पितृतीर्थ घोषित कर दिया तथा वहाँ पर हर वर्ष “पितृपक्ष-मेला” लगाने लगे और इस चीनी परंपरा को श्राद्ध का नाम देकर इस अवैदिक कृत्य के पक्ष में शास्त्रों में मिलावट करने लगे। पाखंडी पेटू पंडितों ने बेशर्मी से मनुस्मृति, रामायण,

महाभारत आदि महान् आर्यग्रंथों में श्राद्ध से संबंधित श्लोक बनाकर मिलावट कर दी। पुराणों में खुलकर इसके पक्ष में लिखा। बिहार में जौं और चावल ही प्रमुख रूप से उत्पन्न होता है इसीलिए श्राद्ध में जौ और चावल के चूर्ण का पिंडदान करने का विधान किया।

महाभारत की उपरोक्त कथा से स्पष्ट है कि मृतक श्राद्ध भारतीय संस्कृति, दर्शन और परंपरा के विरुद्ध अवैदिक कृत्य है। यह चीन से आयातित घटिया उपकरणों की तरह ही घटिया परंपरा है।
पितर किसे कहते हैं?

हमारे माता-पिता के समकक्ष और उनसे बड़े सभी लोग पितर कहलाते हैं। हमारे माता- पिता जीवित हों या मृत; दोनों अवस्थाओं में वें हमारे माता पिता ही होते हैं, पितर नहीं क्योंकि पितर शब्द बहुवचन का रूप है जबकि पिता एक ही हो सकता है बहुत सारे नही।

माता पिता के समकक्ष या उनसे बड़े लोग भी जीवित अथवा मृत दोनों ही अवस्थाओं में हमारे पितर ही होते हैं।

पितृश्राद्ध का अर्थ होता है- श्रद्धापूर्वक पितरों की सेवा करना। जीवित व्यक्तियों की ही सेवा की जा सकती है मृतकों की नही। जीवित पितरों को ही भोजन-वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है, मृतकों को नही।
पितृ शब्द-

पा रक्षणे धातु से पितृ शब्द बनता है। इसका अर्थ है- रक्षा और पालन करने वाला। पितृ शब्द का एक वचन का रूप है- ‘पिता।’ द्विवचन का रूप है- पितरौ। इसका अर्थ है-माता और पिता। बहुवचन का रूप है- पितरः। पितरः शब्द का अर्थ है- माता पिता के समकक्ष और उनसे बड़े लोग। यें जीवित और मृत दोनों अवस्थाओं में पितर ही कहलाते हैं। हमें अपने जीवित माता पिता तथा पितरों की श्रद्धापूर्वक, यथायोग्य सेवा करनी चाहिए। मृतकों के लिए हम कुछ भी नही कर सकते।

मृतक पूजा अवैदिक कृत्य है। हमें अपने माता पिता तथा जीवित पितरों की ही तन्मयता से सेवा करनी चाहिए।
(आर्य प्रह्लाद गिरि के लेख पर आधारित विवेचन)

~डॉ. नरेन्द्र वेदालंकार

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