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वामन द्वादशी – यदि किसी राजा का अभिषेक होली के दिन हुआ तो

Arun Upadhyay
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वामन द्वादशी-विष्णु के वामन अवतार ने बलि से इन्द्र के ३ लोकों का राज्य भाद्र शुक्ल १२ के दिन वापस लिया था, अतः इस दिन को वामन द्वादशी कहते हैं। इस दिन तक इन्द्र बिना राज्य के अर्थात् शून्य थे। अतः इसे शून्य पर्व भी कहते हैं। अन्य कारण है कि राजाओं का राजत्व काल इसी दिन से गिना जाता है। यदि किसी राजा का अभिषेक होली के दिन हुआ तो होली से वामन द्वादशी तक नहीं गिना जाता है। प्रथम वामन १२ को शून्य गिना जाता है। उसके बाद के वर्षों की वामन द्वादशी क्रमशः १,२,३… आदि गिनी जाती है। राजा की प्रथम वामन द्वादशी को शून्य कहा जाता है अतः इसे शून्य (सुनिया) पर्व भी कहते हैं। इस पद्धति से राजत्व काल की गणना अंक पद्धति है जो अभी केवल ओड़िशा में ही प्रचलित है। २ प्रकार की अंक पद्धति का उल्लेख तेलुगु मादला-पांजी (राजकीय आदेशों की सूची) में है जिसे प्रायः ३०० वर्ष पूर्व कलिंग के एक तेलुगू भाषी मन्त्री ने लिखा था। श्रीजगन्नाथ-स्थल वृत्तान्तम् के नाम से जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, पुरी से इसका अंग्रेजी अनुवाद २००५ में प्रकाशित हुआ। एक पद्धति में सभी अंक लिखे जाते हैं, दूसरी पद्धति में ६ तथा शून्य से अन्त होने वाले अंक छोड़ दिये जाते हैं। इसकी गिनती होगी १, २, ३, ४, ५, ७, ८, ९, ११, १२, १३, १४, १५, १७ …. आदि। दो पद्धतियों के कारण पुराणों में चन्द्र वंश के प्रथम चक्रवर्त्ती पुरुरवा का राजत्व कहीं ५६ और कहीं ६४ वर्ष लिखा है। कहीं कही पूर्ण संख्या ६० भी है। बाद के संकरणों के लेखक इसका रहस्य भूल गये और बिना किसी मन्तव्य के ये काल लिखते गये।

ओड़िशा में इसके पालन का कारण है कि वामन अवतार यहाँ हुआ था। उनका निजी नाम विष्णु था, जैसा ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है-वामनो ह विष्णुरास। उसी काल में कार्तिकेय भी हुए थे, जिन्होंने क्रौञ्च द्वीप में बलि को पराजित किया। उस विजय की स्मृति में कोणार्क में विजय स्तम्भ बना तथा माघ शुक्ल सप्तमी को वहाँ चन्द्रभागा तट पर रथयात्रा आरम्भ हुई। (स्कन्द पुराण, १/२/३२/१७८)। यह कृत्तिका के पुत्र थे। इस नक्षत्र के ६ तारा को कार्तिकेय की ६ माता कहा गया है-अत्र जुहोति अग्नये स्वाहा, कृत्तिकाभ्यः स्वाहा, अम्बायै स्वाहा, दुलायै स्वाहा, नितत्न्यै स्वाहा, अभ्रयन्त्यै स्वाहा, मेघयन्त्यै स्वाहा, चुपुणीकायै स्वाहेति। (तैत्तिरीय ब्राह्मण ३/१/४/१-९)

इस नाम के ६ स्थान सेना के ६ केन्द्र या मुख्यालय हो सकते हैं। ओड़िशा में दुला क्षेत्र था जिसके मन्दिर कोणार्क तथा निकट स्थानों में हैं। प्रचलन अनुसार वर्षयन्ती असम में (अधिक वर्षा), चुपुणीका पंजाब में (चोपड़ा), मेघयन्ती गुजरात, राजस्थान में (मेघानी, मेघवाल), अभ्रयन्ती महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश में, नितत्नि (जमीन पर फैलने वाली लता) तमिलनाडु, कर्णाटक में हो सकता है।

यही पर्व केरल में ओणम कहा जाता है पर वह सिंह मास की १० वीं तिथि को मनाते हैं। यह जानने का पुराणों के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है कि जिस दिन बलि ने ३ लोक इन्द्र को लौटाये उसदिन सचमुच भाद्र शुक्ल १२ के दिन सिंह मास का १०वां दिन भी था। क्या यह किसी वर्ष जब संयोग से दोनों तिथियां मिल रही थीं, तब किसी ने अंग्रेजी परम्परा की नकल में सिंह मास की १०वीं तिथि को ओणम कर दिया? यदि भाद्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन सूर्य संक्रान्ति मानी जाय तो संक्रान्ति के दिन द्वितीया आरम्भ हो जायेगी तथा अगले दिन तृतीया से सिंह मास का प्रथम दिन होगा। सिंह मास की दशम तिथि को द्वादशी हो जायेगी।
यहूदी तथा इसाई मतों के पूर्व पश्चिम एशिया में बाल देवता की पूजा होती थी, जो पौराणिक नाम बलि का ही अपभ्रंश है।

वामन द्वादशी के दिन ही झारखंड में करमा पूजा होती है। झारखण्ड को इन्द्र का नागपुर कहते थे। इन्द्र को अच्युत-च्युत कहते थे, अर्थात् जो अजेय को भी च्युत या पराजित कर सके।

यो अच्युत च्युतः स जनास इन्द्रः (ऋग्वेद , २/१२/९)। हिब्रू भाषा में भी चुतियापा का यही अर्थ है-Chutzpah = un-abashed audacity (Chambers Dictionary)।

इन्द्र पूर्व दिशा के लोकपाल थे, अतः असम में राजा को च्युत या चुतिया कहते थे। इन्द्र के राजा बनने पर असुरों के सहयोग से समुद्र मन्थन अर्थात् खनिज निष्कासन आरम्भ हुआ। झारखण्ड में बलि के राज्य उत्तर अफ्रीका, पश्चिम एशिया से असुर आये। बाद में वहाँ के यवनों को सगर ने ग्रीस भगा दिया जिसके बाद वहाँ का नाम यूनान हुआ। अतः अफ्रीका से खनन के लिए आये असुरों का नाम वही है जो ग्रीक भाषा में खनिज नाम हैं। खालको -खालको पाइराइट (ताम्बा अयस्क), ओराम (Aurum = gold), टोप्पो (Topaz) आदि।

समन्वय के लिए वासुकि नाग आये थे जिनका स्थान ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२० अध्याय) में रसातल (दक्षिण अमेरिका) कहा है। उनके नाम पर वासुकिनाथ तीर्थ भी यहाँ है। अतः इस क्षेत्र का नाम चुतिया नागपुर हुआ (चुतिया इन्द्र + वासुकि नाग)। १८५७ विद्रोह के अंग्रेजी वर्णनों में यह चुटिया तथा चोटा हो गया। आज भी रांची में चुटिया थाना है। चुटिया नागपुर से छोटा नागपुर हो गया। भाद्र शुक्ल द्वादशी को खनन कर्म आरम्भ हुआ अतः यह करमा पर्व है।

 

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