दुनिया

अफ़ग़ानिस्तान में गुज़रे दिन जब मौत के मुंह से वापसी हुई : डाक्टर फ़ैसल हाशेमी ने अपने साथ हुई घटना को इस तरह बताया!

डाक्टर फ़ैसल हाशेमी एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पदस्थ अधिकारी हैं जो इस कंपनी के लिए पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान रीजन देखते हैं। अपने एक पत्रकार दोस्त के पूछने पर डाक्टर हाशेमी ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने साथ हुई घटना का अनुभव बयान किया जो कुछ इस तरह हैः

कंपनी के काम से अकसर अफ़ग़ानिस्तान भी जाना होता था। काबुल भी इस्लामाबाद की तरह पहाड़ों में घिरे प्याले की तरह है बस फ़र्क़ यह है कि पहाड़ों पर हरियाली नहीं हल्के बेहंगम घर हैं। काबुल में सरीना होटल अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति भवन और सरकारी कार्यालयों से बमुशकिल आधा किलोमीटर दूर है। यहां अब तक कई नाकाम हमले हो चुके हैं। यह इलाक़ा किसी सैनिक छावनी की तरह हाई सेक्युरिटी ज़ोन है।

वह मार्च 2014 की एक शाम थी। काबुल का मौसम थोड़ा सर्द था। सरीना होटल में बड़ी संख्या उन लोगों की भी थी जो अफ़ग़ान इलेक्शन आबज़रवर की हैसियत से वहां मौजूद थे। राष्ट्रपति चुनाव होने ही वाले थे और मेहमानों में स्थानीय और विदेशी पत्रकारों की भी अच्छी ख़ासी तादाद मौजूद थी। रेस्टोरेंट में जश्ने नौरोज़ मनाने के लिए भी काफ़ी मेहमान आमंत्रित थे। रात 9 बजे के क़रीब मैं भी अपने दो साथियों के साथ दिन भर के काम का जायज़ा लेने और अगले दिन की प्लानिंग के लिए मौजूद था। खाने से पहले हमने सूप का आर्डर दिया। हर टेबल पर हल्की आवाज़ में लोग बातें कर रहे थे। चेहरों पर सुकून था।

मेरे साथियों में एक 27 साल का दुबला पतला जवान था और पहली बार हमारे साथ अफ़ग़ानिस्तान के सफ़र पर आया था जबकि दूसरा साथी कंपनी का सीनियर अधिकारी था। अचानक छोटे हथियारों की फ़ायरिंग की आवाज़ गूंजने लगी। हालीवुड के फ़िल्मी नज़ारे की तरह लोगों ने अपने सामने मेज़ें गिराकर उनके पीछे छिपना शुरू कर दिया। फ़ायरिंग से बचने के लिए जब मैं ज़मीन पर गिरने लगा तो चम्मच और प्लेटें उड़ने का दृष्य दिखाई दिया। अगला दृश्य बहुत दर्दनाक था क्योंकि मेरे एक साथ के सिर मे दो गोलियां घुस चुकी थीं जबकि दूसरा नौजवान साथी सलीम तो शायद ट्रोमा में ही चला गया था वह बर्फ़ की तरह कुर्सी पर जम गया था।

मेरा दिमाग़ माउफ़ हो चुका था। सोचने समझने की शक्ति जैसे छिन गई हो। ज़बान पर या अल्लाह ख़ैर रिकार्डर की तरह जारी था। पहला ख़याल यही आया कि रेस्टोरेंट में मौजूद शायद दो गिरोह आपस में भिड़ गए हैं मगर अचानक गूंजते नारों ने बता दिया कि यह आतंकी हमला है। क़रीब आते क़दमों की आहट से मेरा शरीर ज़ोर ज़ोर कांपने लगा। हमलावर ने अपना पिस्तौल मेरे गले पर लगा दिया। मैं बोलने की कोशिश कर रहा था कि हम मेहमान हैं मगर ज़बान लड़खड़ा रही थी। हमलावर को किसी चीज़ का कोई एहसास नहीं था। उसने गरदन पर रखी पिस्तौल से फ़ायर कर दिया। यूं महसूस हुआ कि जैसे गर्म सलाख़ किसी ने आर पार कर हो। कुछ ही सेकेंड में एहसास हुआ कि गोली नहीं चली। आंखें खोलीं तो 20, 22 साल का नौजवान हमलावर अपनी पिस्तौल में गोलियां भरने की कोशिश कर रहा था। बस वही लमहा था कि ज़िंदगी की पुकार ने ज़ेहन को फौरन भागने का हुक्म दिया।

अपने नौजवान साथी को आवाज़ लगाई के भाग चलो। वह भी शायद इसी लम्हे के इंतेज़ार में ख़ामोश बैठा था। हमारे पास बस मैगज़ीन के लोड होने तक का ही समय था क्योंकि हमलावर आतंकी किसी रहम के मूड में नहीं था। हम किचन की ओर भाग निकले। मैं किचन के दरवाज़े को क्रास करता सामने दीवार से टकराया जबकि मेरा साथी किचन के एक और अंदरूनी दरवाज़े को बंद करके ख़ुद को सुरक्षित कर चुका था। मैं दीवार से टकराकर अपने बाएं ओर भागा। यह होटल के कमरों का कारीडोर था। मैं मदद मदद पुकार रहा था मगर दरवाज़े खुलने के बजाए बंद होते गए। चूंकि मेरे प्रोफेशनल कैरियर के शुरुआती पांच साल पाकिस्तान के एक बड़े होटल में काम करते गुज़रे थे इसलिए मुझे मालूम था कि होटल के कमरों का इमरजेंसी दरवाज़ा किस तरफ़ होता है। मेरे डगमगाते क़दम उसी ओर बढ़ रहे थे और फ़ायरिंग की आवाज़ें अब भी आ रही थीं। इमरजेंसी दरवाज़े को बार बार धक्का दिया मगर वह नहीं खुला अचानक नज़र पड़ी कि किसी ने कुंडी बंद कर दी है। कुंडी खोली तो बाहर से आती ठंडी हवा ने एक दम ज़िंदगी का पैग़ाम दिया। अचानक क़ालीन के नीचे नर्मी का एहसास दिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाली शीट के बड़े बड़े रोल दिखाई दिए। बस उस मौक़े को ग़नीमत जानते हुए छलांग लगा दी और रोल के अंदर अपने आप को समेट लिया। ख़्वाहिश यही थी कि अब यहां से कहीं नहीं जाना है। लेकिन अचानक आसमान ने बरसना शुरू कर दिया। पानी की बूंदें बर्फ़ की तरह ठंडी थीं। एहसास हुआ कि यहां से फ़ौरन न हटे तो ठंड ही जान ले लेगी। हिम्मत जुटा कर निकला तो देखा कि थोड़ी थोड़ी देर से लोग कारीडोर की ओर भाग रहे थे। मगर यह मालूम नहीं था कि यह कौन लोग हैं। मैंने बड़ी मेहनत से मुंह से आवाज़ निकाली क्योंकि आवाज़ निकल ही नहीं रही थी। कारीडोर से गुज़रता व्यक्ति थोड़ा ठिठका मगर फिर भागता चला गया और यह पूछा कि तुम कौन हो? मेरे मुंह से आवाज़ नहीं निकली बस मैंने दोनों हाथ उठा दिए। कुछ ही क्षणों में फ़ौजियों का एक दस्ता पोज़ीशन लेते हुए मुझे कवर कर चुका था। स्पीकर से किसी ने कड़े स्वर में पूछा तुम कौन हो? बताने की कोशिश की मेहमान हूं मगर मैं लड़खड़ाकर गिरने लगा तो सैनिकों ने दौड़ कर मुझे संभाला।

अचानक मुझे अपने साथी का ख़याल आया जिसके सिर में दो गोलियां लगी थीं। मैं रेस्टोरेंट की ओर भागा। वहां तो जैसे क़यामत आ गई थी। हर तरफ़ घायल और लाशें नज़र आ रही थीं। फ़ौजी घायलों की मदद कर रहे थे। वहां एएफ़पी के लिए काम करने वाले मशहूर अफ़ग़ान पत्रकार सरदार ख़ान अपने दो बच्चों और पत्नी के साथ मौत की नींद सो गए थे।

मैंने अपने साथी के बारे में पता किया तो मालूम हुआ कि उसे अस्पताल पहुंचा दिया गया है। मैंने कंपनी के हेड आफ़िस फ़ोन करके स्थिति की जानकारी दी। कंपनी तत्काल हरकत में आ गई और मेरे ज़ख़्मी साथी को एयरलिफ़्ट करके दुबई पहुंचाने की तैयारी शुरू हो गई। अपनी ज़िंदगी में बार बार दुबई जाने की इच्छा दोहराने वाला मेरा साथी किस हाल में दुबाई जा रहा था यह सोच कर दिल बैठा जा रहा था। उसे दुबई के बेहतरीन अस्पताल में एडमिट कराया गया। गोली दिमाग़ को छूते हुए माथे के क़रीब फंसी थी जो आप्रेशन से निकाली गई। जबकि दूसरी गोली डाक्टरों ने नहीं निकालने का फ़ैसला किया। मेरा साथी तीन महीना कोमा में रहा। उसके बाद उसे होश आ गया। मगर वह चल फिर नहीं सकता था। अलबत्ता वह ख़तरे से बाहर था।

अब इस घटना को छह साल बीत चुके हैं। सलीम अपनी वीडियो बनाकर भेजता है जिसमें वह क़ुरआन की तिलावत करने और ख़ुद चलने की कोशिश कर रहा है। कंपनी ने हमारा बहुत साथ दिया। उसे सारी सहूलियात दी जा रही हैं। कंपनी ने हमसे कहा है कि अब हम अफ़ग़ानिस्तान न जाएं। छह साल हो गए हैं मगर जब भी सरीना होटल के क़त्लेआम की तसवीर दिमाग़ के पर्दे पर चल जाती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अल्लाह का शुक्र है कि उसने मुझे एक और ज़िंदगी दी।

अकतूबर का महीना अफ़ग़ानिस्तान के लिए अहम रहा। आम तौर पर 8 अकतूबर 2001 को अफ़ग़ानिस्तान पर अमरीकी हमले को नाइन इलेवन के हमलों की प्रतिक्रिया माना जाता है लेकिन सच्चाई यह है कि इसकी शुरुआत 15 अकतूबर 1999 को उस समय हो गई थी जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने अलक़ायदा और तालेबान पर प्रतिबंध लगाए थे।

अब अकतूबर 2020 में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने अफ़ग़ानिस्तान से क्रिसमस तक सेना को बाहर निकालने की बात कही है। जंग तो अब ख़त्म हो ही जाएगी लेकिन अपने पीछे न जाने कितने डाक्टर फ़ैसल जैसे लोगों की ज़िंदगियों पर अनमिट निशान छोड़ जाएगी क्योंकि हर जंग के पीछे इसी तरह की हृदय विदारक दास्तानें हज़ारों ख़ानदानों की ज़िंदगी का तकलीफ़देह अध्याय बन जाती हैं।

स्रोतः डान न्यूज़ नेटवर्क

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *