दुनिया

अब पश्चिमी एशिया के इलाक़े में क्या होने वाला है?

रियाज़ और अबू धाबी में बेचैनी है। मज़बूत छत दोनों देशों के शासकों के सिर से खिसकती महसूस हो रही है। अगर यह हो गया तो वाइट हाउस में कोई जेर्ड कुशनर नहीं रह जाएगा जो आधी रात को इन शासकों की टेलीफ़ोन काल रिसीव करे और क़तर पर हमला करने या न करने के बारे में उनसे बात करे।

इस्राईली प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू लंबा गेम खेल रहे हैं। सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान और इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ायद इतना लंबा गेम न तो खेल रहे हैं और न खेल सकते हैं। नेतनयाहू को ज़्यादा फ़िक्र नहीं है। वह चार अमरीकी राष्ट्रपतियों के शासन काल में काम कर चुके हैं और उन्हें अच्छी तरह ख़बर रहती है कि वाशिंग्टन का क्या मिज़ाज है। नेतनयाहू हर सीज़न में अपना काम सेट कर लेने वाले इंसान हैं। उन्होंने किसी भी दौर में वाइट हाउस में अपने मैले कपड़े धुलवाने का सिलसिला बंद नहीं होने दिया।

बिन सलमान और बिन ज़ाएद इस समय विश्व में सुन्नी समुदाय का लीडर बनने की योजना पर काम कर रहे हैं। उन्होंने इसी योजना के तहत ट्रम्प पर अरबों डालर लुटा दिए। मगर अब उन्हें लग रहा है कि ट्रम्प के चुनाव हारने के साथ ही उनका यह सारा निवेश बर्बाद हो जाएगा। वैसे इन दोनों के लिए चिंता के दूसरे भी कई कारण हैं।

दोनों ने मिलकर इस्राईल के साथ समझौतों की रेलगाड़ी को आगे ढकेलना शुरू तो किया मगर यह रेलगाड़ी दो क़दम चलकर रुक गई। कोई बड़ा अरब देश इस रेलगाड़ी पर सवार होने का रिस्क नहीं ले रहा है। अब तक इमारात और बहरैन ही इस पर सवार हुए हैं।

फ़िलिस्तीन में भी उन्हें बदलाव करना है और महमूद अब्बास को हटाकर उनकी जगह पर मुहम्मद दहलान को फ़िलिस्तीनी प्रशासन का प्रमुख बनाना है जो इमारात में डेरा जमाए हुए हैं।

जब यह स्थिति है तो बिन सलमान और बिन ज़ाएद को बंदर बिन सुलतान की याद आई जो फ़िलिस्तीनी नेताओं पर जमकर हमला बोलें और अरब जनता में इस सोच को मज़बूत करें कि इस्राईल से समझौता करना समय की ज़रूरत है।

सऊदी अरब के अलअरबिया टीवी चैनल से प्रसारित होने वाले लंबे इंटरव्यू में राजकुमार बंदर बिन सुलतान ने जो 37 साल तक सऊदी डिप्लोमेसी के केन्द्र में रहे और जिसमें 22 साल उन्होंने वाशिंग्टन में सऊदी अरब के राजदूत के रूप में गुज़ारे हैं, बड़े साफ़ साफ़ शब्दों में कहा कि हम यह समझते हैं कि सऊदी अरब की हैसियत से हमें अपने हितों की चिंता होनी चाहिए। हम कई दशकों से फ़िलिस्तीनियों को भारी आर्थिक मदद और महत्वपूर्ण सुझाव देते आए हैं मगर फ़िलिस्तीनी नेतृत्व हमारी आर्थिक मदद तो ले लेता है जबकि हमारे सुझाव भूल जाता है। अब समय आ गया है कि सऊदी अरब रास्ता अलग कर ले।

इस इंटरव्यू से एक बार फिर यह हक़ीक़त याद आ गई कि अमरीका की हर जंग और हर डर्टी गेम में बंदर बिन सुलतान हमेशा व्यक्तिगत रूप से शामिल रहे हैं। ईरान-कोन्ट्रा स्कैंडल, अलयमामा आर्म्स डील, पहला फ़ार्स खाड़ी युद्ध, इराक़ पर 2003 का अमरीकी हमला और फिर सीरिया का संकट इन सब में बंदर बिन सुलतान गले तक डूबे नज़र आए।

पहले फ़ार्स खाड़ी युद्ध में बंदर बिन सुलतान अमरीकियों के इतने क़रीब थे कि ब्रेंट स्कोक्रोफ़्ट के शब्दों में सऊदी राजकुमार अमरीका की नेशनल सेक्युरिटी काउंसिल के सबसे प्रभावी सदस्य के रूप में काम कर रहे थे।

जार्ज बुश ने 2003 में इराक़ पर हमले से पहले पूरी योजना के बारे में बंदर बिन सुलतान को विश्वास में लिया।

सीरिया संकट शुरू हुआ तो बंदर बिन सुलतान सऊदी अरब के इंटेलीजेन्स चीफ़ थे और उन्होंने फांसी की सज़ा का इंतेज़ार करने वाले 1200 क़ैदियों को जेल से निकाल कर ट्रेनिंग दी और बश्शार असद का तख़्ता पलटने के लिए सीरिया भेज दिया।

किसी भी अरब देश के ख़िलाफ़ पश्चिमी देशों में रची जाने वाली हर साज़िश में बंदर बिन सुलतान ज़रूर शामिल रहे और बंदर बिन सुलतान ने हमेशा इसकी क़ीमत भी वसूली।

कम से कम दस साल तक ब्रिटिश एरोस्पेस इंजीनियरिंग ने हर तीन महीने पर बंदर बिन सुलतान को 30 मिलियन पाउंड अदा किए क्योंकि उन्होंने यमामा आर्म्स डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस भारी फ़्राड की जांच ब्रिटेन में शुरू होने ही वाली थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों का नाम लेकर रुकवा दिया।

बंदर बिन सुलतान फिर एक्शन में हैं। इस बार उनके निशाने पर फ़िलिस्तीनी नेतृत्व है। अब पता नहीं कि इस बार उन्होंने क्या क़ीमत वसूल की है। बंदर बिन सुलतान का एक ही वसूल है कि अपने बास की सेवा करो और जितना हो सकता है कमाओ। उन्होंने अपने चचा प्रिंस अहमद को टाटा कह दिया, पूर्व क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन नाएफ़ से विवाह करने वाली अपनी बहन से हर रिश्ता तोड़ लिया और अपने दूसरे बहुत से चचेरे भाइयों से नाता ख़त्म कर लिया केवल इसलिए कि मुहम्मद बिन सलमान का दिल जीत सकें। इसका उन्हें इनाम भी मिला। उनकी बेटी रीमा बिन्ते बंदर इस समय वाशिंग्टन में सऊदी अरब की राजदूत है और बेटा ख़ालिद बिन बंदर लंदन में सऊदी राजदूत के रूप में कार्यरत है।


रीमा बिंते बंदर

कहते हैं कि जब भी बंदर बिन सुलतान नज़र आते हैं तो पश्चिमी एशिया के इलाक़े के लिए कोई मुसीबत साथ लाते हैं इसलिए जितनी जल्दी वह बड़ी लहरों के पीछे गुम हो जाएं उतनी जल्दी इलाक़ा संकट से उबरेगा।

डेविड हर्स्ट

वरिष्ठ पत्रकार

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