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अरब डायरी : दुनिया के नक्शे से मिट जाएगा इस्राईल : शैतान की सत्ता अपनी आख़िरी सांसें ले रही है!

इराक़ में अन्नोजबा आंदोलन के महासचिव शेख अकरम अलकाबी ने गुरुवार को कहा है कि अगर इस्राईल ने इलाक़े में कोई युद्ध शुरु किया तो वह दुनिया के नक्शे से गायब हो जाएगा।

अकरम अलकाबी ने तेहरान में वरिष्ठ नेता के सलाहकार अली अकबर विलायती से एक भेंट में कहा कि ट्रम्प की चुनावी टीम, इलाक़े के देशों पर इस्राईल के साथ संबंध स्थापित करने के लिए दबाव डाल रही है और यह सिलसिला इराक़ तक भी पहुंच गया है यहां तक कि कुछ दाइशी राजनेता और एजेन्ट, इस्राईल के साथ संबंध बनाने को इराक़ की प्राथमिकताओं में से गिनाने लगे हैं और उन्होंने तो इस्राईल का काल्पनिक दूतावास भी खोल लिया।

उन्होंने कहा कि इराक़ी प्रतिरोध मोर्चा और अन्नोजबा संगठन, इस्राईल के साथ संबंध सामान्य बनाने की हर कोशिश के खिलाफ डटा हुआ है।

उन्होंने बताया कि इस्राईली प्रतिनिधिमंडल, अमरीकी पास्पोर्ट पर इराक़ की यात्रा करते हैं और बगदाद हवाई अड्डे पर इस्राईलियों का इस तरह से आवागमन और इसी प्रकार कुछ इराक़ी नेताओं से उनकी भेंट, इराक़, ईरान और पूरे इलाके के लिए खतरा है।

उन्होंने इस्राईल के बारे में कहा कि हमारा यह विश्वास है कि अगर इस्राईल किसी भी नये युद्ध में शामिल हुआ तो उसका अस्तित्व ही मिट जाएगा और निश्चित रूप से फिलिस्तीनी, लेबनानी, इराक़ी और ईरानी प्रतिरोधक गुट बैतुलमुकद्दस में झंडा गाड़ देंगें जैसा कि इस्लामी क्रांति के नेता ने वादा किया है कि हम सब बैतुलमुकद्दस में नमाज़ पढेंगे।

उन्होंने कहा कि हम इस्राईल को अपने देश से खदेड़ चुके हैं और अगर इस्राईलियों ने हमारे देश में दोबारा घुसने की कोशिश की तो उन्हें बड़ा दर्दनाक जवाब मिलेगा।

उन्होंने बताया कि इराक़ के मामले को ट्रम्प ने यूएई के क्राउन प्रिंस बिन ज़ायद के हवाले कर दिया है और अब वह इराक़ में संकट पैदा करने के लिए जासूसों की सेवाएं प्राप्त कर रहे हैं।

इराक़ प्रतिरोधक गुट अन्नोजबा के महासचिव अकरम अलकाबी ने कहा कि सऊदी अरब और यूएई के सारे अपराधों के पीछे अमरीका और इस्राईल का हाथ है लेकिन अन्ततः सारी साज़िशें नाकाम हो जाएंगी।

उन्होंने कहा कि जनरल क़ासिम सुलैमानी जैसे शहीदों के खून की वजह से प्रतिरोध का मोर्चा एकजुट हुआ है और आज प्रतिरोध मोर्चा किसी एक देश तक सीमित नहीं है बल्कि उसकी जड़ें, इराक़, सऊदी अरब, सीरिया और पाकिस्तान तक फैल चुकी हैं।

 

इराक़ में पकड़ी दवाओं को ईरानी बताने का दुश्मनों का षड्यंत्र

ईरान के खाद्य व दवा संगठन के प्रमुख ने इराक़ में पकड़ी गई दवाओं को ईरानी बताए जाने को इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था के दुश्मनों काी एक अंतर्राष्ट्रीय साज़िश क़रार दिया है।

इराक़ के अधिकारियों ने हाल ही में बताया है कि देश में दवाओं से भरे हुए 19 ट्रक पकड़े गए हैं। ईरान के खाद्य व दवा संगठन के प्रमुख मुहम्मद रज़ा शाने साज़ ने बुधवार को पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि इराक़ में पकड़ी गई दवाएं किसी भी तरह ईरानी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना के फैलाव और अमरीका के ग़ैर क़ानूनी प्रतिबंधों के कारण ईरान अपने मरीज़ों के लिए आवश्यक दवाएं व चिकित्सा उपकरण ही बड़ी मुश्किल से उपलब्ध कर पा रहा है और ऐसे में इराक़ में पकड़ी गई दवाओं को ईरानी बताना, बड़े आश्चर्य की बात है।

उन्होंने इस बात का उल्लेख करते हुए कि इराक़ में पकड़ी गई दवाओं का ईरान से कोई लेना-देना नहीं है, कहा कि इस खेप में कुछ दवाएं ऐसी थीं जो विभिन्न देशों से ईरान के माध्यम से इराक़ भेजी गई थीं। ईरान के खाद्य व दवा संगठन के प्रमुख मुहम्मद रज़ा शाने साज़ ने बताया कि इनमें से कुछ दवाएं तुर्की से भेजी गई थीं जबकि कुछ भारत से आई थीं और ईरान के कस्टम विभाग में इसका ब्योरा मौजूद है।

ट्रम्प की विदाई से पहले क्या अमरीकी प्रतिबंध आख़िरी सासें ले रहा है?

ईरान और वेनेज़ोएला के मामलों में अमरीका के विशेष दूत एलियट अब्राम्ज़ ने कुछ ही दिन पहले धमकी दी थी कि लंबी दूरी की मार करने वाला कोई भी ईरानी मिसाइल अगर वेनेज़ोएला लाया गया तो हम हमला करके उसे ध्वस्त कर देंगे।

इस धमकी के कुछ ही दिन बाद ईरानी एयर लाइन क़िश्म फ़ार्स का विमान जिस पर अमरीका ने प्रतिबंध लगा रखा है वेनेज़ोएला की राजधानी काराकास के अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर सुरक्षित उतरा। अपनी मंज़िल पर पहुंचने से पहले इस विमान ने ट्यूनीशिया में लैंडिंग की।

ईरान पर हथियारों की ख़रीद फ़रोख़्त पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों की अवधि समाप्त होने के बाद यह पहला मालवाहक विमान है जो ईरान से वेनेज़ोएला गया है।

अमरीकी सूत्र कहते हैं कि संभावित रूप से इस विमान पर मिसाइल और भारी हथियार लदे हुए थे। वेनेज़ोएला के राष्ट्रपति निकोलस मादोरो ने भी इसकी घोषणा की है। मगर सवाल यह है कि बड़े कट्टरपंथी माने जाने वाले मिस्टर अब्राम्ज़ ने अपनी धमकी पर अमल क्यों नहीं किया? उन्होंने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि अगर ईरान ने मिसाइल और भारी हथियार वेनेज़ोएला भेजे तो हम उस विमान पर हमला कर देंगे या उसे ज़बरदस्ती उतार कर उस पर लदी हथियारों की खेप ज़ब्त कर लेंगे।

वेनेज़ोएला और ईरान ने जिन पर अमरीका ने कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं अपना सहयोग विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ा दिया है। पहले पेट्रोकेमिकल पदार्थों से लदे हुए समुद्री जहाज़ और टैंकर ईरान से वेनेज़ोएला गए और अब मिसाइल और भारी हथियार लेकर ईरानी जहाज़ काराकास पहुंचा है।

ट्रम्प ईरान और वेनेज़ोएला दोनों में से किसी भी देश में प्रतिबंधों या सैनिक शक्ति का प्रयोग करके सत्ता बदलने में कामयाब नहीं हो सके और हम देख रहे हैं कि उनकी सत्ता अपनी आख़िरी सांसें ले रही है। वही हाल पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जान बोल्टन का हुआ जिन्होंने पेरिस में एक सम्मेलन में कहा था कि वह ईरान की वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था की समाप्ति का जश्न एक साल के भीतर तेहरान में मनाएंगे।

ईरान की बात करें तो यह देश अमरीकी प्रतिबंधों का सामना करते हुए आधुनिक मिसाइल और ड्रोन विमान विकसित करने के साथ ही साथ अपने घटकों की मदद करने में भी सफल रहा है। अमरीकी इंटेलीजेन्स रिपोर्टें बताती हैं कि ईरान ने वर्ष 2019 में कम से कम 12 टैंकर भेजे हैं जिनमें से अधिकतर सीरिया गए। ईरान ने हालिया दिनों सीरिया को लगभग तीस लाख बैरल ईंधन पहुंचाया है।

वाशिंग्टन को यह चिंता है कि ईरान को तेल और मिसाइलों की खेप के बदले वेनेज़ोएला से सोना मिल रहा है यानी वह डालर का प्रयोग ही नहीं कर रहा है और सोने से अपनी ज़रूरत की चीज़ें दुनिया के किसी भी देश से ख़रीद रहा है। ईरान ख़ुद को मज़बूत करने के साथ साथ लेबनान, यमन, फ़िलिस्तीन, इराक़ और सीरिया में अपने घटकों की भरपूर मदद कर रहा है।

ट्रम्प ने प्रतिबंधों के हथियार की ख़ूब बड़ाई की थी मगर यह हथियार तो अपनी धार खो चुका है क्योंकि इस हथियार का निशाना बनने वाले देशों को इससे निपटने का तरीक़ा मालूम हो गया है। प्रतिरोध और दृढ़ता ने इस मामले में अपना चमत्कार दिखाया है खेद की बात यह है कि अरब शासकों की समझ में यह समाधान नहीं आता।

स्रोतः रायुल यौम, अरबी भाषा की वेबसाइट


अरब देशों के मुखिया बन गए हैं नेतनयाहू!

हमें इस्राईल के इंटेलीजेन्स मंत्री एली कोहेन का यह बयान सुनकर कोई हैरत नहीं हुई कि इस समय अरब देश इस्राईल से जो समझौते कर रहे हैं वह क्षेत्र में एतिहासिक परिवर्तनों के दायरे में होने वाली घटनाएं हैं जिनके आर्थिक और सामरिक पहलू हैं।

ईरान और तुर्की के नेतृत्व में बनने वाले मोर्चे के मुक़ाबले में अमरीका की कोशिश से मिस्र, सूडान, बहरैन और इमारात का एलायंस तैयार हो रहा है।

कोहेन ने यह बयान तब दिया है जब ट्रम्प के हवाले से एक बयान सामने आया है कि सऊदी अरब, क़तर, ओमान, मोरक्को और नाइजर अमरीका के राषट्रपति चुनाव में उनकी विजय के बाद तोहफ़े के तौर पर इस्राईल से शांति समझौते का एलान करेंगे।

दुख की बात तो यह है कि हालिया वर्षों का हमारा यह अनुभव रहा है कि अरब-इस्राईल संबंधों के बारे में इस्राईली अधिकारी जो भी ख़ुलासे करते हैं वह सही साबित होते हैं इसलिए हमें इस्राईली इंटैलीजेन्स मंत्री के बयान के बारे में कोई संदेह नहीं है क्योंकि यह अनुमान नहीं बल्कि रियाज़, अबू धाबी, मनामा और दोहा के उनके एलानिया और ख़ुफ़िया दौरों का नतीजा है।

अरब देशों से इस्राईल के जो भी समझौते हो रहे हैं वह इस्राईल का संकट हल करने और उसे इलाक़े में एकांत की स्थिति से निकालने के लिए हैं और हम यह मानते हैं कि सूडान और इस्राईल से समझौते के बारे में जो बातें आ रही हैं वह हमारे लिए चौंकाने वाली हैं। एक बात तो यह सामने आई है कि इस्राईल डेढ़ लाख से अधिक अफ़्रीकियों को निकाल कर सूडान में बसाना चाहता है क्योंकि उनकी वजह से इस्राईल के भीतर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

सूडान की सरकार ने इस पर औपचारिक रूप से सहमति भी जताई है। इसके बदले में सूडान को इस्राईल से अनाज मिलेगा। क्या सूडान के लिए इससे भी बड़े अपमान की कोई बात हो सकती है।

हमारी समझ में यह नहीं आता कि आख़िर अमरीका ने इन अरब देशों पर क्या जादू कर दिया है कि वह हर अपमान सहन करने के लिए तैयार हैं लेकिन इस बात पर हरगिज़ तैयार नहीं हैं कि ईरान और तुर्की के नेतृत्व वाले मोर्चे से वार्ता करें और इस समय जब पैग़म्बरे इस्लाम के अपमान की घटनाएं हो रही हैं तो इन दोनों इस्लामी देशों के साथ मिलकर मज़बूत मोर्चा बनाएं और ठोस जवाब दें।

यह बड़े खेद की बात है कि अधिकतर इस्लामी देश तो पैग़म्बरे इस्लाम के विषय पर बोल रहे हैं और विरोध जता रहे हैं मगर मक्का मदीना जैसे पवित्र स्थलों के मेज़बान सऊदी नरेश ने कान में रूई डाल ली है।

नेतनयाहू से अगर वह मदद की उम्मीद कर रहे हैं तो यह इन अरब नेताओं की भूल है क्योंकि नेतनयाहू शायद कुछ महीनों बाद जेल की सलाखों के पीछे नज़र आएंगे मगर सबसे बुरी बात यह है कि नेतनयाहू अरब सरकारों को हथकंडे के रूप में प्रयोग कर रहे हैं और उनका अंदाज़ देखिए तो अरब जगत के नेता के रूप में बयान देते हैं और तुर्की और ईरान के ख़तरे की बात करके इस ख़तरे का मुक़ाबला करने में इस्राईल की केन्द्रीय भूमिका का बखान करते हैं।

हम तो तुर्की और ईरान को मुबारकबाद देंगे जिन्होंने शीया सुन्नी फ़र्क़ को नज़रअंज़ाद करते हुए पूरे इस्लामी जगत के लिए महत्वपूर्ण स्टैंड अपनाया है। जब अरब नेताओं ने अपने सारे मुद्दे कूड़ेदान में डाल दिए हैं और सिर झुकाए ज़िबह होने के लिए नेतनयाहू और ट्रम्प के सामने खड़े हो गए हैं तो फिर इन हालात में इस्लामी जगत के नेतृत्व के लिए ईरान और तुर्की से बेहतर कौन हो सकता है।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के विख्यात लेखक व टीकाकार

फ़्रान्स मुसलमानों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से दूर रहेः रूहानी

राष्ट्रपति रूहानी ने कहा है कि अगर पश्चिम, यूरोप व फ़्रान्स सच बोल रहे हैं कि वे मानव समाज में शांति, बंधुत्व, प्रेम व सुरक्षा की स्थापना के इच्छुक हैं तो उन्हें मुसलमानों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बंद करना चाहिए।

डाॅक्टर हसन रूहानी ने बुधवार को मंत्रीमंडल की बैठक में कहा कि किसी पैग़म्बर का अनादर न केवल यह कि कोई अच्छी बात नहीं है बल्कि यह नैतिकता के ख़िलाफ़ एक क़दम, हिंसा पर उकसाना और अरबों मुसलमानों व ग़ैर मुस्लिमों के भावनाओं को भड़काना है। उन्होंने इस सिलसिले में ग़लत क़दम उठाने वालों से मांग की कि वे जल्द से जल्द अपनी ग़लती की भरपाई करें और न्याय, नैतिकता व सभी आसमानी धर्मों के सम्मान के रास्ते पर लौट आएं।

ईरान के राष्ट्रपति ने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को मानवता के शिक्षक व पूरी दुनिया के लिए दया बताते हुए कहा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जो लोग संस्कृति व प्रजातंत्र के दावेदार हैं, वे दूसरों को हिंसा व रक्तपात के लिए उकसा रहे हैं। डाॅक्टर रूहानी ने कहा कि यूरोप के प्रत्येक व्यक्ति और पूरब व पश्चिम में रहने वाले सभी लोगों पर पैग़म्बरे इस्लाम का हक़ है क्योंकि वे इंसानियत के शिक्षक थे और बड़ी हैरानी की बात है कि जो देश आज़ादी, अधिकार व क़ानून का दावा करते हैं, वही लोगों को एक दूसरे का अनादर करने और उन लोगों का अनादर करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिनसे लोग दिल की गहराई से प्यार करते हैं।

ईरान के राष्ट्रपति ने इस बात का उल्लेख करते हुए दिलों में पैदा होने वाला सारा द्वेष पूरे इतिहास में पश्चिम की ओर से मुसलमानों पर किए गए अत्याचारों व हस्तक्षेप का परिणाम है, कहा कि इसका खुला उदाहरण, यमन की स्थिति है जिसके ग़रीब व संकट ग्रस्त लोग, पश्चिम वालों के बमों और पश्चिमी देशों द्वारा आक्रमणकारियों को दिए गए युद्धक विमानों के हमलों से मर रहे हैं। डाॅक्टर हसन रूहानी ने पश्चिम के कुछ अधिकारियों के ग़लत बयानों पर इस्लामी जगत की ओर से सही समय पर सामने आने वाली ठोस प्रतिक्रिया पर ख़ुशी जताते हुए कहा कि इस प्रतिक्रिया से पता चलता है कि इस्लामी जगत हमेशा अपने महान नेता व पैग़म्बर का अनुसरण करता रहेगा।

ईरान में कोरोना से एक दिन में 399 लोगों की मौत

ईरान में पिछले 24 घंटों के दौरान, कोविड-19 महामारी से 399 लोगों की मौत हो गई है।

गुरुवार को ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रवक्ता सीमा सादात लारी के अनुसार, पिछले 24 घंटों में कोविड-19 के 8,293 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 2,924 मरीज़ों को अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जबकि बाक़ी को प्राथमिक उपचार के बाद, छुट्टी दे गई है।

उन्होंने बताया कि अब तक कोरोना के कुल संक्रमितों का आंकड़ा 5,96,941 हो गया है, जबकि पिछले 24 घंटों में 399 लोगों की मौत हो गई है।

विश्व भर में कोरोना से मरने वालों की संख्या 11 लाख 80 हज़ार हो गई है, जबकि अब तक 44 मिलियन ने अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं।

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