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अल्लाह, क्या लज़ीज़ खाना है, सुबहान अल्लाह…ये कहकर भगत सिंह ने रुमाल से मुंह पोंछा!

एक थे भगवानदास माहौर. दतिया के रहने वाले. भगत सिंह से दो साल छोटे थे. पहचान तो उनकी चंद्रशेखर आज़ाद से थी जो झांसी आते जाते रहते थे लेकिन उन्हीं के ज़रिए फिर वो भगत सिंह से भी मिले. लाहौर में सांडर्स की हत्या के प्लान में शामिल होने के लिए भगवानदास को भी बुलाया गया था. क्रांतिकारी दल में सबके नकली नाम रखे जाते थे. भगवानदास का रखा गया था कैलाश. भगवानदास उन दिनों ग्वालियर के हॉस्टल में रहा करते थे. उन्हें एक क्रांतिकारी साथी को छुड़वाने की योजना में हिस्सा लेने के लिए चंद्रशेखकर आज़ाद उर्फ पंडित जी ने आगरा के लिए बुलावा भेजा. सो आगरा के लिए निकल लिए. वहीं पहली बार वो भगत से मिले. चंद्रशेखर आज़ाद भी वहीं थे. और भी पांच-सात साथी थे. बताते हैं कि ओढ़ने-बिछाने-खाने-पीने के मामले में क्रांतिकारी दल भारी तंगी का सामना कर रहा था. अब भगत सिंह तो पंजाब के खाते पीते किसान परिवार के बच्चे थे. दूध घी खाने की आदत थी. यहां क्रांतिकारियों के बीच थे जहां एक एक पैसा बड़ा सोच समझकर खर्च किया जाता था. शुरू में तो बाज़ार से पूरियां लाई जातीं, खाई जातीं मगर फिर पैसा कम पड़ने लगा तो ठानी गई कि कमरे पर ही दाल रोटी बनाई जाएंगी. बर्तनों की कमी थी. जुगाड़ लगाए गए. दाल के लिए एक मटका लिया गया. उसका धड़ ऊपर से हटाया गया और नीचे जो बचा उसी में दाल पकाने की प्रक्रिया शुरू हुई. माहौर बताते हैं कि हम लोग अंदाज़े से नमक मिर्च डाल लेते थे लेकिन हल्दी डालने का नहीं पता था. अब जो दाल बनती थी उसकी शक्ल सूरत ऐसी हो जाती थी कि किसी भूखे की भूख भी वो देखकर मर जाए. माहौर बताते हैं कि आंखों से उसे देखकर खाते जाना कोई साधारण सिद्धि की बात नहीं थी. फिर बर्तनों की कमी के कारण दाल उसी एक खप्पर में रखी जाती थी जिसमें बनी और फिर हम लोग उसके चारों ओर अपने जले, पके अधपके टिक्कड़ लेकर बैठ जाते थे. अघोरियों की घिनौनी साधनाओँ की बात सुनी थी परंतु हम क्रांतिकारियों का ये भक्षण चक्र भी कोई साधारण बात ना थी.

अब हुआ ये कि दो एक दिन की इस साधना से आज़ाद जैसे कुछ लोग तो अवधूत पद तक पहुंच गए लेकिन भगत सिंह से नहीं हो पा रहा था. इसके बाद भगत सिंह ने इस तरह के खाने से अपना पिंड छुड़ाने की तरकीब एक दिन निकाली. जब खप्पर के चारों तरफ साथी जुटे तो भगत स्टाइल में बोले- देखो मैं तुम्हें बताऊं अमीर लोग, लखनऊ के नवाब जैसे लोग किस नज़ाकत से किस अंदाज़ से खाना खाते हैं.

भगत सिंह ने एक टिक्कड़ में से बहुत छोटा सा टुकड़ा निकाला. ऐसे तोड़ा कि कहीं टिक्कड़ को ठेस ना पहुंच जाए. फिर बड़ी दूर से उसे खप्पर की दाल का मुंह दिखाकर बेहद नज़ाकत, नफ़ासत, लताफ़त के साथ उठाकर मुंह में रख लिया. मुंह चलाने में मुश्किल तो पेश आई पर किसी तरह गले से उतारकर बोले- अल्लाह, क्या लज़ीज़ खाना है, सुबहान अल्लाह…

ये कहकर भगत सिंह ने रुमाल से मुंह पोंछा, और ऐसे खड़े हुए मानों भर पेट खाकर उठे हों. इस नाटक की आड़ में उन्होंने उस कच्चे पक्के खाने से पीछा छुड़या और उसी रोज़ कहीं से पैसे का इंतज़ाम कर लिया. कई दिनों तक सभी को कायदे का खाना भी नसीब हुआ और बर्तन भांडे भी खरीद लिए गए.

अब है तो ये क़िस्सा मज़ेदार लेकिन सोचिए क्या हौसला था कि अच्छे अच्छे खाते पीते घरों के लड़के ताकतवर ब्रिटिश साम्राज्य से भूखे पेट टक्कर ले रहे थे. और इससे भी बढ़कर मौका पड़ने पर मौत को खुशी खुशी मंज़ूर भी कर रहे थे.
– नितिन ठाकुर
#इतिइतिहास

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