साहित्य

आ भी जा के क़िस्सा तमाम हो मेरा…यूं रोज़ रोज़ इंतज़ार भी अच्छा नही होता…Jp

Vikram Partap Jp
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हर हाल में सपने सलोने ले बैठ जाती है
बच्चा रूठे जो माँ खिलोंने ले बैठ जाती है
थक जाता हूँ मैं अक्सर धुप में चल कर तो
माँ गोद में सर ले मेरे सिराहने बैठ जाती है
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Vikram Partap Jp

Vikram Partap Jp

आ भी जा के क़िस्सा तमाम हो मेरा
यु रोज़ रोज़ इंतज़ार भी अच्छा नही होता

वो लड़खड़ाना मेरा वो दिल का संभल जाना ,
मुझे याद है अभी तक तेरा वो बदल जाना .
उड़ा देना तेरे रुख़ से दुपट्टे का वो तौबा ,
मेरे दिल का अरमानो का वो फिर से मचल जाना.
तस्वीर नहीँ बनती अब तेरी तसव्वुर में ,
कुछ शोख रंगों का वो हाथों से फिसल जाना .
वादा तो नहीं कोई फिर भी इंतज़ार तेरा ,
रात ढले तेरा सितारों में बदल जाना .
रह रह के सताती है मुझे गयी बहार देखो ,
अब ख़िज़ाँ को भी मैंने फसल-ए-गुल जाना .
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Vikram Partap Jp

रात भर रोया है किसी का नाम ले ले कर
तेरे चेहरे से तू ताज़ा ओ तर नहीं लगता
लगा रहने दे तू भी इस दिल को’ प्रताप’
पुर्जा हरक़त में हो तो ज़ंग ओ जर नही लगता !!
Vikram Partap Jp

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