इतिहास

इस तरह 624 वर्षीय सलत़नत-ए-उस्मानिया का महान युग समाप्त हो गया : मुसलमानों का शानदार माज़ी : रिपोर्ट

खिलाफत ए उस्मानिया के दौर की वह रेलगाड़ी जो हर साल #ईद_मिलादुन्नबीﷺ के मौके पर तुर्की🇹🇷 से मदीना पाक आती थी.!

मुसलमानों का शानदार माज़ी

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

मुसलमानों का शानदार माज़ी
उस्मानी दौर में इस्तांबुल (तुर्की) से मुसलमानों की तीन महाद्वीप पर शासन

तुर्की में रजब तय्यिब उर्दुगान के 2029 तक तुर्की में सबसे बड़े पद पर रहने का रास्ता साफ हो गया है, अब पार्लिमानी निज़ाम (संसदीयप्रणाली) को अमेरिका की तरह सदारती निज़ाम (राष्ट्रपतिप्रणाली) से बदल दिया जाएगा, जिसके बाद मंत्रियों, जजों की नियुक्ति और संसद को रद्द करने जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामलों में उन्हें विस्तृत शक्ति मिल जायेगी, इस्तांबुल के नाज़िम (मॉडरेटर) के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले रजब तय्यिब उर्दुगान मार्च 2003 ई. से अगस्त 2014 ई. तक देश के प्रधानमंत्री रहे और अगस्त 2014 से देश के राष्ट्रपति हैं,

तुर्की में हुई असफल तख्तापलट के मद्देनजर उर्दुगान के समर्थक इस फैसले को समय की जरूरत बताया , जबकि विरोधियों को आशंका है कि यह निर्णय डिकटेटरशिप (तानाशाही) को जन्म दे सकता है, रजब तय्यिब उर्दुगान की शख्सियत (व्यक्तित्व) पर उंगलियां उठती रही हैं, वहीं उन्हें इस्लाम पसंद (कट्टरपंथी) नेता भी स्वीकार किया जाता रहा है, अन्य मुस्लिम शासकों की तुलना में मुसलमानों की समस्याओं में विशेष रुचि लेकर दुनिया के मौजूदा चौधरियों के सामने खुलकर बात करने की वजह से दुनिया के मुसलमान आमतौर पर उन्हें सम्मान की दृष्टि (निगाह) से देखते हैं, वह तुर्की की अदालत और विकास पार्टी (AKP) के मुखिया भी हैं, जो तुर्क संसद में बहुमत रखती है,

1923 ई. में तुर्क साम्राज्य के समाप्त होने के बाद तुर्की के शासकों ने इस्लामी अध्ययन (शिक्षा) और संस्कृति (स़क़ाफ़त) के केंद्र“क़ुस्त़ुन्त़ुन्या” और तुर्की के अन्य क्षेत्रों को इस्लामी सभ्यता (तहज़ीब) से दूर और पश्चिमी सभ्यता (मग़रीबी तहज़ीब) से करीब की कोशिश की थी, जिस पर उर्दुगान ने कुछ हद तक प्रतिबंध लगाया जिसको तुर्की जनता में उनकी लोकप्रियता का कारण बताया जा रहा है।

सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ज़माने में लोगों विशेषकर (ख़ास़कर) युवाओं को इतिहास पढ़ने की फुर्सत कहाँ है, वर्तमान (मौजूदा) जनमत संग्रह (रेफिरंडम) के कारण तुर्की इन दिनों खबरों में है, इसलिए उचित समझा कि इस मौके पर संक्षिप्त (मुख़्तस़र) इतिहास ख़ास़कर तुर्क साम्राज्य के महान सरकार का उल्लेख कर दिया जाए, ताकि हम अपने पूर्वजों को याद करें और अल्लाह से दुआ है कि मुस्लिम देशों एकजुट होकर कुरान और ह़दीस़ की रोशनी में मुसलमानों और मानवता (इंसानियत) की सेवा करने वाले बनें, आमीन।

हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की 23 वर्षीय नुबुव्वत वाली जीवन खत्म होने के बाद ख़ुलाफ़ा-ए-राशिदीन लगभग 30 साल अन्तिम नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षाओं के अनुसार ख़िलाफ़त का उच्च नमूना पेश करके इस्लाम को जज़ीरा-ए-अरब के बाहर तक पहुंचाया, हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के निधन के समय मुसलमानों की संख्या दो लाख से अधिक थी, ख़ुलाफ़ा-ए-राशिदीन के दौर-ए-ख़िलाफ़त में यह संख्या करोड़ को पार कर गई, केवल उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माने में ईराक़, ईरान, आज़रबाइजान,आर्मेनिया, जोर्जिया, सीरिया, जोर्डन, फिलिस्तीन, लेबनान, मिस्र, अफगानिस्तान और तुर्कमानिस्तान का कुछ भाग, और वर्तमान (मौजूदा) पाकिस्तान का पश्चिमी दक्षिणी भाग इस्लामी शासन में शामिल हुआ, आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मृत्यु के पच्चीस साल बाद तक मदीना मुनव्वरा ही दारुल ख़िलाफ़त रहा, लेकिन हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुछ चीजों के कारण दारुल ख़िलाफ़तमदीना मुनव्वरा सेईराक के शहर कूफ़ा मुन्ताक़िल (स्थानांतरित) कर दिया, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत के बाद ईराक में मुसलमानों के ज़ोरदार आग्रह (इस़रार) पर हज़रत ह़सन रज़ियल्लाहु अन्हु ने बैअत-ए-ख़िलाफ़त ली, दूसरी तरफ शाम (सीरिया) में हज़रत मआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के हाथ पर बैअत की गई, संभव (मुमकिन) था कि मुसलमानों के बीच युद्ध (जंग) शुरू हो जाए, लेकिन नवासा-ए-रसूल हज़रत ह़सन रज़ियल्लाहु अन्हु ने अपनी दूरदर्शिता (दूर अनदेशी) से मुसलमानों को नरसंहार (क़त्ले आम) से बचाकर हज़रत मआविया रज़ियल्लाहु अन्हु के साथ सुलह फ़रमा ली और ख़िलाफ़त से त्याग दे दिया, 632 ई. से 661 ई. के दौर को “ख़िलाफ़त-ए-राशिदा” के नाम से जाना जाता है, हुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशाद: “मेरी उम्मत में ख़िलाफ़त तीस साल तक रहेगी, फिर बादशाहत हो जाएगी” (तिरमिज़ी, मुसनद अहमद) की रोशनी में मुअर्रिखीन (इतिहासकार) फरमाते हैं कि नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के इरशाद: “तुम मेरी और मेरे बाद आने वाले ख़ुलाफ़ा-ए-राशिदीन की सुन्नत को मज़बूती के साथ पकड़ लो” (तिरमिज़ी, अबुदाऊद) का मतलब चार ख़ुलाफ़ा (हज़रत अबू बकर, हज़रत उमर, हज़रत उस़मान और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हुम) हैं।

ख़ुलाफ़ा-ए-राशिदीन के बाद लगभग एक सदी (शताब्दी) क़बीला-ए-क़ुरैश एक परिवार बनु उमय्या ने दमिश्क (सीरिया) को दार-उल-सल्तानत (राजधानी) क़रार देकर जीत का सिलसिला जारी रखा था, यहां तक ​​कि इस्लाम की सीमाएं एक तरफ चीन और दूसरी तरफ स्पेन तक फैल गई, उमवी दौर में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ रह़िमहुल्लाह ने अपनी दो साल की ख़िलाफ़त(717 ई. – 720 ई.) के दौरान न्याय और समानता की ऐसी मिसालें पेश कीं कि लोगों को ख़ुलाफ़ा-ए-राशिदीन का ज़माना (समय) याद आ गया, मुआर्रिखीन (इतिहासकारों) ने उन्हें पांचवे ख़लीफ़ा का दर्जा दिया, लेकिन बाद में कुछ कारणों से बनु उमय्याशासन के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गया, अतः661 ई. से शुरू हुई बनु उमय्या का शासन 750 ई. में समाप्त हो गया।

बनु उमय्या शासन के खिलाफ आंदोलन द्वारा 750 ई. को जन्म लेने वाली “ख़िलाफ़त-ए-अब्बासिया” (अब्बासी शासन)ने राजधानी “दमिशक़” से “बग़दाद” स्थानांतरित(मुन्ताक़िल) करके जीत का सिलसिला जारी रखा, अब्बासिया परिवार ने 500 साल से अधिक समय तक शासन किया जो एक लंबा ज़माना है, “ख़िलाफ़त-ए-बनू अब्बासिया” 1258 ई. तक रही, इसी दौर (ज़माने) में शैक्षणिक, साहित्यिक और ऐतिहासिकअनगिनत काम हुए, ह़दीस़, तफ़स़ीर, तारीख़, सीरत और अदब की अनगिनत किताबें इस दौर में लिखी गईं, साइंस, ह़िसाब और त़िब (चिकित्सा) के माहिरीन (विशेषज्ञ) पैदा हुए।

1299 ई. में तुर्कों की उस्मानिया साम्राज्य (सलत़नत -ए- उस्मानिया) की स्थापना हुई, अपने चरम के ज़माने (सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी) में यह साम्राज्य (सलत़नत) तीन महाद्वीपों पर फैली हुआथा, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका का अधिकांश (ज़्यादातर) भाग और पूर्वी यूरोप इसके तहत था, प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1923 ई. हैं 624 वर्ष पुरानी यह महान साम्राज्य (सलत़नत) समाप्त हो गया, यानी तुर्की आज से 95 साल पहले 1923 ई. में सलत़नत -ए- उस्मानिया के अंत से पहले तक दुनिया के बहुत बड़े हिस्से का हुक्मरान (शासक) था, तुर्कों की अन्य सेवाओंके साथ हरमैन की सेवाउल्लेखनीयहै।

बहरहाल मदीना मुनव्वरा की हिजरत (प्रवास) के बाद मुसलमानों को हमेशा एक केंद्रीय संरक्षण (सरपरस्ती) हासिल रहा,जो 1923 ई. में सलत़नत-ए-


उस्मानिया (तुर्क साम्राज्य) के पतन के बाद समाप्त हो गई, इस तरह 1350 साल बाद मुसलमान ताश के पत्तों की तरह बिखर गए और मुसलमानों के सारी त़ाक़त(शक्ति) आज 45 देशों में बंट गई, यह एक ऐसी दर्दनाक घटनाथी कि इसकी वजह से इन दिनों मुसलमान जगह जगह पर परेशान हैं, कई मुस्लिम देश तबाह (नष्ट) कर दिए गए, लेकिन मुसलमानों का कोईहाल पूछने वाला नहीं, प्रथम (पहले) विश्वयुद्ध में तुर्की जर्मनी सहयोगी रहा, इस युद्ध की बड़ी भारी क़ीमत मुसलमानों को चुकानी पड़ी, इसलिए अंग्रेजों ने अरबों को तुर्कों के खिलाफ युद्ध पर उकसाया, इसलिए मुसलमानों में राष्ट्रीयता (क़ौमियत) के आधार पर लड़ाई लड़ी गई, और अरब क्षेत्र तुर्की के हाथ से निकल गए, यहां तक ​​कि अंग्रेजों ने तुर्की पर भी क़ब्जा कर लिया था, लेकिन जल्द ही सभी आक्रामक बलों को तुर्की से बाहर निकाल दिया गया और 1923 ई. को एक नया राज्य गठित किया गया जो तुर्की गणराज्य कहलाई, इस तरह 624 वर्षीय सलत़नत-ए-उस्मानिया (तुर्क साम्राज्य) का महान युग (दौर) समाप्त हो गया।

हज़रत इमाम अबू ह़नीफा रह़िमाहुल्लाह के निधन के बाद आपके चेलों ने हज़रत इमाम अबु ह़नीफा रह़िमाहुल्लाह क़ुरान-व-ह़दीस और फ़िक़ह के दुरूस को किताबीकी शक्ल देकर उनके ज्ञान (इल्म) के लाभ बहुत आम कर दिया, ख़ासकर आपके शिष्य (शागिर्द) काजी अबू यूसुफ रह़िमाहुल्लाह अब्बासी सरकार में काजीयुल क़ुज़ात (Chief Justice / मुख्यन्यायाधीश) के पद पर बैठे तो उन्होंने क़ुरान-व-ह़दीस की रोशनी में हज़रत इमाम अबू ह़नीफा रह़िमाहुल्लाह के फैसलों से सरकारी स्तर पर जनता को परिचय कराया, इसलिए कुछ ही वर्षों में फ़िक़ह-ए-ह़नफ़ी दुनिया के हर कोने में प्रचलित हो गया और इसके बाद यह सिलसिला बराबर चलता रहा, यहां तक ​​कि अब्बासी और तुर्क साम्राज्य में धर्म इमाम अबू हनीफा के विचारधारा को सरकारी मान्यता दे दी गई, इसलिए सैकड़ों साल से मुसलमानों का लगभग 75 प्रतिशत फ़िक़ह-ए-ह़नफ़ी का पालन करता है।

इस्लामी साम्राज्य के बिखरने के बाद 1923 ई. में बने तुर्की की सीमाएं 8 देशों से मिलती हैं, पूर्व में आर्मेनिया, ईरान और आज़रबाइजान क्षेत्र नखचवान,दक्षिण पूर्व में इराक और सीरिया, उत्तर पूर्व जॉर्जिया, उत्तर पश्चिम में बुल्गारिया और पश्चिम में यूनान है, इसके अलावा घरेलू सीमाएं उत्तर में (बुहैरा असवद) काला सागर, पश्चिम में(बुहैरा एजीनिया) सागर एजीनिया और दक्षिण में सागररूम से मिलती हैं, 1923 ई. के बाद तुर्की में धर्म (मज़हब) की स्वतंत्रता (आज़ादी) पर कुछ हद तक रोक लगा दी गई थी, शहर इस्तांबुल की मस्जिद अयासोफिया को संग्रहालय (अ़जाइब घर) बना दिया गया था, जहां 1453 ई. से 1953 ई तक बराबर पांचों नमाज़ें जमात के साथ अदा की जाती थीं, जिसके मनारों से पिछले साल 81 वर्षों के बाद अज़ान की आवाज़ बुलंद की गई, तुर्की में इस समय लगभग एक लाख मस्जिदें हैं, प्राचीन शहर इस्तांबुल (क़ुस्त़ुन्त़ुन्या) में सबसे अधिक हैं, आठ करोड़ से अधिक आबादी वाले देश तुर्की में लगभग 97 प्रतिशत मुसलमान हैं, जो इख्तिलाफ़ी मसाइल में उलमा-ए-अह़नाफ की राय का पालन करते हैं, सामान्य रूप (आम तोर पर) में तुर्की भाषा ही बोली जाती है, अलबत्ता कुछ लोग कोरमानजी भाषा भी बोलते हैं, कहीं कहीं अरबी भाषा भी बोली जाती है, तुर्की बहुत पुरानी भाषा है, सलत़नत-ए-उस्मानिया (तुर्क साम्राज्य) के तहत रहने की वजह से तुर्की भाषा अरबी लिपि (रस्मुल ख़त) में लिखी जाने लगी थी, सलत़नत-ए-उस्मानिया (तुर्क साम्राज्य)के समाप्त होने के बाद अरबी लिपि (रस्मुल ख़त) को खत्म करके नए लातीनी लिपि (रस्मुल ख़त) को 1928 में चालू किया गया।

आज से लगभग 1450 साल पहले मक्का मुकर्रमा की भूमि (सरज़मीन) से शुरू हुआ इस्लाम धर्म (मज़हब-ए-इस्लाम) के मानने वाले इस समय दुनिया में दो अरब से कुछ कम हैं, यानी 25 प्रतिशत दुनिया की आबादी सिर्फ इस्लाम धर्म को अपनी सफलता का गारंटर समझती है, विश्व रिपोर्ट के अनुसार 50 साल बाद दुनिया में सबसे अधिक मुसलमान होंगे, साथ ही यह बात पूरी दुनिया तस्लीम करती है कि मुसलमान ही सबसे ज़्यादा अपने धर्म (मज़हब) का पालन कर रहे हैं और क्यों न हों कि वे हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से लेकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तक आए सभी अंबिया-ए-किराम को सत्य (बरहक़) मानने के साथ क़यामत तक आने वाले इन्स व जिन्न के नबी सय्यिदुल बशर और सय्यिदुल अंबिया हज़रत मोह़म्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अन्तिम नबी व रसूल स्वीकार करते हैं, इस्लामी शिक्षाओं (ज्ञान) के अनुसार अगर कोई व्यक्ति हज़रत इब्राहीम, हज़रत याक़ूब (जिनकी औलाद को बनी को इस्राईल कहा जाता है) हज़रत मूसा और हज़रत ईसा अलैहिमुस्सलाम जैसे चुने हुए दूतों (रसूलों) को अल्लाह का पैगम्बर न माने तो उसे अपने ईमान की तजदीद की ज़रूरत होगी, लेकिन ईसाई और यहूदी धर्म के अनुसार अगर कोई व्यक्ति 570 ई. में मक्का में पैदा हुए हज़रत मोह़म्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अल्लाह का नबी व रसूल मान ले तो वह उनके धर्म (मज़हब) से निकल जाता है, आप ख़ुद फैसला करें कि हिंसा कहाँ मौजूद है? इसलिए दुनिया में अपनी खुशी और रुचि से अपने धर्म को छोड़कर दूसरे धर्म को अपनाने वालों में सबसे अधिक लोग वे हैं जो इस्लाम धर्म में दोनों जहां की सफलता समझ कर इस्लाम धर्म को स्वीकार करते हैं, अमेरिका और पश्चिमी देशों के शासकों के इस्लाम विरोधी फैसलों की एक वजह अन्य धर्मों के मानने वालों का तेजी के साथ इस्लाम धर्म को स्वीकार करना है, यह इस्लाम धर्म के ह़क़ होने की ख़ुद एक रोशन दलील है, इन शा अल्लाह हज़रत इमाम मेहदी की उपस्थिति और यीशु (ईसा) अलैहिस्सलाम के वंश (नुजूल) के बाद दुनिया के चप्पे चप्पे पर मुसलमानों की हुकूमत कायम होगी।

इस्लाम की फ़ित़रत में क़ुदरत ने लचक दी है= जितना ही दबाओगे उतना ही यह उभरेगा

डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली

Pirates of the caribbean

बारबरोसा नाम तो सुना होगा Pirates of the caribbean फिल्म का बूढ़ा कैप्टन जो कभी अच्छा लगता है तो कभी बुरा आपको जानकर हैरत होगी यह कैरेक्टर खिलाफत उस्मानिया के बहरी बेड़े के कैप्टन खैरूद्दीन बारबरोसा से लिया गया है.

कुस्तुनतुनिया को फतह करने में समुद्र बेड़े का बड़ा हाथ था. बाद में आने वाली उस्मानी सल्तनत समुद्र बेड़े को मजबूत करती रही. स्पेन में जब मुसलमानों का कत्ले-आम हो रहा था, जुल्म के पहाड़ तोड़े जा रहे थे, लाखों औरत बच्चे कैद में थे, तब कुछ कैदियों को फरियाद खलीफा सलीम तक पहुँची तो उसने अल्बानिया से ताल्लुक रखने वाले मशहूर जहाजरान

सिपहसलार बाबा ओरूज को बुलाया और स्पेन से मुसलमानों को निकालने का मिशन दिया. तुर्की और स्पेन के समुंदरी साहिलों के बीच इटली फ्रांस पुर्तगाल के इसाईयों की फौजें मौजूद थी, इस लिए वह अपने भाई खैरूद्दीन #बारबरोसा के पास अल्जीरिया पहुँचा जहाँ एक मुसलमान की गद्दारी से सलिबियो ने उन्हें शहीद कर दिया.

अब कमान बारबरोसा के हाथ में थी वह समुंदर का माहिर खिलाड़ी था. उसने बहरे रोम में मौजूद पुर्तगाली इतालवी फौजों को शिकस्त दे कर स्पेन के चर्चों में कैद हजारों मुसलमान औरतों बच्चों को वहाँ से निकाला. खैरूद्दीन को बारबरोसा नाम इतालवी फौज ने दिया जिसका मतलब है “लाल दाढ़ी वाला”.

जब बारबरोसा के कारनामों की खबर वेटिकन में पोप जान पाल को मिली तो उसने यूरोप के इसाई हुकमरानो को उकसा बारबरोसा को शिकस्त देने को कहा. तारीख का सबसे बड़ा जंगी समुंदरी बेड़ा जिसमें 6000 समुद्र जहाज शामिल थी बारबरोसा के पास 1200 जहाज थे.

28 सितम्बर 1538 को समुंदर में एक घमासान उठा और सलिबियो की फौज पास पास होकर बिखर गई इसाईयों का कमांडर एंड्रयू डोरिया फरार होकर अपनी जान बचाई. बारबरोसा समुंदर का राजा था उसकी जीत ही की वजह से ब्रिटेन फ्रांस जैसे मुल्क तिजारती जहाजों को गुजारने के लिए सालों तक खिलाफत उस्मानिया को टेक्स देते रहे.

इसाई मोअर्रिख बारबरोसा को समुंदरी डाकू के नाम से याद करते हैं और उसके किरदार पर हॉलीवुड फिल्म बनाता है ताकि दुनिया उसे एक लूटेरा समझे हालाँकि वह एक अज़ीम सल्तनत का अज़ीम समुंदरी चीफ था.

जो ख्वा़ब नहीं देखते उनका कोई मुस्तक़बिल नहीं :एर्तुग्रुल ग़ाज़ी

“जब मैंने ये शो देखना शुरू किया, तो मैं बस देखता ही चल गया । क्या शो है, क्या बात है शानदार, लाजवाब और बेमिसाल । इसकी म्यूजिक की धुने जिस्म में जोश पैदा कर देती है । शो को देखने के बाद मैंने सोचा की मैं इस के बारे में थोड़ा सा आपको भी बताता चलूं ।”

13वीं शताब्दी के अनातोलिया पर आधारित तुर्की का टीवी शो ‘एर्तुग्रुल’ है जो कि ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना से पहले की कहानी है इसमें एर्तुगुल गाजी के संघर्ष को दिखाया गया है, जो कि ऑटोमन साम्राज्य के संस्थापक, उस्मान, के पिता थे। इसे तुर्की का गेम ऑफ थ्रोन्स भी कहा जाता है, और इसकी कई वजह है – क्योंकि ड्रैगन और सेक्स के अलावा इसमें बाकी सब कुछ है। बड़े-बड़े महल, शानदार दृश्य, बेहतरीन कपड़े, तलवारों की खनखनाहट, रोमांच, सियासी चालें, धोखा, साजिश , मोहब्बत और यहां तक कि शो की शुरुआती धुन भी उतना ही जोश भर देने वाली है।

पाकिस्तान में इस शो ने धूम मचा दी है, यूट्यूब पर उर्दू वर्जन आने के बाद तो कई रिकॉर्ड टूट गए, और अब हिंदुस्तान में भी मुस्लिम घरों में इस शो को खूब पसंद किया जा रहा है। खासकर नौजवानों में इस शो को लेकर गजब का जोश है। जब मैंने ये शो देखना शुरू किया, तो मैं बस देखता ही चल गया । क्या शो है, क्या बात है शानदार, लाजवाब और बेमिसाल । शो को देखने के बाद मैंने सोचा की मैं इस के बारे में थोड़ा सा आपको भी बताता चलूं ।

एर्तुग्रुल ग़ाज़ी के मुतल्लिक़ ड्रामे में दिखाई गई कहानी का थोड़ा सा हिस्सा

तुर्की के खानाबदोश कबीला “काई” की कहानी है “काई” कबीला एक जंगजु कबीला है। जो एक तरफ बेरहम मौसमों के निशाने पर है तो दूसरी जानिब मंगोलों और सलेबियो के निशाने पर भी है । हिम्मत व जुर्रत कि अजीब दास्तान, के चरवाहों का ये खानाबदोश कबीला जो जाड़े के बेरहम मौसम में कहत से बचने के लिए हल्ब के अमीर से एक ज़र खैज़ चारागाह मे ठहरने की इजाज़त मांग रहा होता है।

आगे चल कर एक ऐसी सल्तनत की बुनियाद रख देता है । जो लगभग आठ सौ साल बनी रहती है,एर्तुग्रुल “काई” कबीले के सरदार “सलमान शाह” का बेटा है। वह मंगोलों से भी लड़ता है और सालेबियों से भी, अर्तुग्राल का बेटा उस्मान सल्तनत ए उस्मानिया का पहला बादशाह होता है । चरवाहों का “काई” कबीला एक अजिमुश’शान सल्तनत की बुनियाद कैसे रखता है उस गैर मामूली ज़िद्द-व-जेहद की दास्तान का नाम ” दिरिलिस एर्तुग्रुल”

सरदार सुलेमान शाह…

सुलेमान शाह 1214 से 1227 तक क़ाई क़बीला के सरदार रहे, वो निहायत ही बहादुर, रहमदिल और इंसाफ़ पसंद थे। इसलिए अल्लाह ने उन्हे अर्तग़ल गाज़ी जैसा बेटा नवाज़ा और पोता उस्मान गाज़ी जैसा दिया। दुश्मन को शिकस्त देने के बाद क़बीला लौट रहे सुलेमान शाह एक हादसे का शिकार हो गए और फ़रात नदी में डूब गए, जिससे सुलेमान शाह की मौत हो गई। जिसके बाद उन्हे पास में ही दफ़न कर दिया गया, सुलेमान शाह का मक़बरा आज सीरिया में फ़रात नदी के किनारे पर है।
(मक़बरे का निर्माण 13वीं सदी के अंत में हुआ था। 1921 में जब सीरिया फ्रांस के अधीन था, तुर्की और फ्रांस में एक समझौता हुआ था, जिसमें मक़बरे को तुर्की की भूमि बताया गया था। अभी हाल में ही तुर्की की फ़ौज ने सीरिया में घुस कर इस मक़बरे को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था।)

सुलेमान शाह के बाद उनके वफ़ादारों ने अर्तग़ल गाज़ी को क़ाई क़ाबिले का सरदार बनाया, जिसने मंगोल और क्रूसेडर को कई बार मात दी और ख़त्म हो रहे सल्जूक़ सल्तनत को बचाने कि भरपूर कोशिश की। उनके बाद उनके बेटे उस्मान गाज़ी ने उत्तर में आकर ख़िलाफत ए उस्मानिया की बुनियाद रखी।

एर्तुग्रुल ग़ाज़ी

दरअसल बात तेरहवीं सदी (1300) की है। इस दौर में पैदा हुए थे। एर्तुग्रुल ग़ाज़ी बहुत ही बहादुर थे और इनकी बहादुरी की वजह से पूरे इलाके में उनका डंका बजता था जिसकी वजह से कई मुमालिक उन्होंने फतेह कर डालें। एर्तुग्रुल ग़ाज़ी एक बेहतरीन जंगजू और सच्चे मुसलमान थे। अपनी शुजाआत दानिशमंदी और जुर्रत से उन्होंने एक के बाद एक कई इलाके फतेह किए और इन पर राज भी किया

एर्तुग्रुल ग़ाज़ी के समय में सलेबियों के अतिरिक्त मंगोल भी लूटपाठ करते वो किसी को नहीं छोड़ते वो चाहे बच्चे हो या बुगुर्ज। लुटेरी मंगोली फ़ौज सबके पीछे पड़ी थी। दूसरे कई कबीलों की तरह काई काबिले के लोग भी इस मंगोली सेना से बहुत परेशान थे। काई कबीले का सरदार सुलेमान शाह जिनकी हैसियत काबिले में सुलतान कि से थी। सुलेमान शाह के चार बेटे थे। तीसरे नंबर का बेटा था एर्तुग्रुल ग़ाज़ी।

उर्दू वर्जन के इस ड्रामे की जब शुरुआत होती है तो उस में दिखाया जाता है कि सल्जूकी सल्तनत की शहज़ादी हलिमा, उसके भाई और बाप को ईसाईयों ने कैद कर लिया था। जंगल के रास्ते जब ईसाई इनको महल ले जा रहे थे । तभी एर्तुग्रुल ग़ाज़ी वहां पहुंच के शहज़ादी हलीमा, उसके भाई और बाप को ईसाईयों से छुड़ा लेता हैं । बस यहीं से शरुआत होती है जाबाज़ एर्तुग्रुल ग़ाज़ी की कहानी की । इसके बाद ईसाईयों के तरफ से काई कबीले पे जो भी परेशानी आती गयी। उसका सामना एर्तुग्रुल ग़ाज़ी ने दिलेरी से किया। अब एर्तुग्रुल ग़ाज़ी के सामने एक चुनौती थी । सलिबियों ने एर्तुग्रुल ग़ाज़ी को शिकस्त देने के लिए उसके कबीले में कई लोगों को अपना हामी बना लिया था। जो गाज़ी को कत्ल करने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं। इसमें उसके चाचा करदोग्लो भी शामिल था।

सलीबियों की साजिशों से परेशान होकर एर्तुग्रुल ग़ाज़ी आखिरकार फैसला किया कि वह किसी भी हाल में ईसाईयों के कबीले पे फतह करेगा। और उनकी नापाक साजिशों को नाकाम कर देगा। उस समय ईसाईयों को नाईट मेयर भी कहा जाता था । ईसाई अपने कबीले से मुस्लिमों के ऊपर हमला करने की तैयारी में थे तभी एर्तुग्रुल ग़ाज़ी ईसाईयों के कबीले पर हमला कर ईसाई कबीले पे फतह कर लेता हैं। जिससे एर्तुग्रुल ग़ाज़ी का दुनिया में डंका बजने लगता है। एर्तुग्रुल ग़ाज़ी नाम का एक ऐसा तूफ़ान उठा की मुसिलमों से नफरत करने वाले इस तूफान में उड़ पड़े।

सल्तनत उस्मानिया (खिलाफत ए उस्मानिया) की शुरुआत कैसे हुई

दरअसल खिलाफत उस्मानिया एर्तुग्रुल ग़ाज़ी के सपने की ताबीर थी। एर्तुग्रुल ग़ाज़ी ने ख्वाब में चार पहाड़ और चार दरिया देखे थे। ख्वाब कि ताबीर जानने वालों ने एर्तुग्रुल ग़ाज़ी को बताया कि आप और आपकी औलाद दुनिया पर राज करेंगे । और आपकी हुकूमत बहुत बड़े चार पहाड़ों और चार दरियाओं तक फैलीं होगी। इसके बाद उनको ख्वाब सच्चा साबित हुआ। और ख़िलाफत उस्मानिया की सल्तनत में दरिया ए दजला, फरात, दरिया ए नील और दरिया ए तेंद्युक शामिल थे । और चार पहाड़ों में कोहेतूर, कोहेकाफ, कोहेउतलस और कोहेबिलकाफ शामिल थे।

सन 1258 इसवीं में एर्तुग्रुल ग़ाज़ी के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। जिसका नाम रखा गया उस्मान। यह वही उस्मान था जिसके नाम पे टर्की की सल्तनत को सल्तनते उस्मानिया कहा जाने लगा। उस्मान भी अपने बाप एर्तुग्रुल ग़ाज़ी की तरह ही जाबाज़ और ज़हीन था। सन 1288 में एर्तुग्रुल ग़ाज़ी की मौत हो जाती हैं। ग़ाज़ी के बेटे उस्मान ने भी अपने बाप की तरह बहुत जंगें जीती और उस्मान ने पुरे 40 देश पे कब्ज़ा किया। 1923 तक सल्तनते उस्मानिया ने 40 देश पे राज किया।

कितनी बड़ी थी खिलाफत ए उस्मानिया

खिलाफत ए उस्मानिया में 40 मुमालिक तक फैल चुकी थी। जिसमें सऊदी अरब भी शामिल था और मक्का मोअज्ज़मा और मदीना मुनव्वरा का भी कंट्रोल इन्हीं के पास था। जो के खिलाफत ए उस्मानिया के खात्मे के बाद अल सऊद के पास चला गया।
एक मामूली से तुर्क क़ाबिले ‘क़ाई’ ने 1299 अज़ीम तुर्क साम्राज्य ”उस्मानिया” का रूप लिआ और प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1922 इसका अंत हो गया। इस सल्तनत ना सिर्फ़ एक देश पर राज किया, बल्की योरप, एशिया और अफ्रीका के अधिकतर भाग को ख़ुद में मिला लिया। और इसकी शुरुआत उस्मान गाज़ी के दादा सुलेमान शाह ने की थी।

तैमूर लंग और उस्मानिया सल्तनत

कैरलाइन फिंकल लिखती हैं कि तैमूर लंग अपने घर से जंग की मुहिम पर निकले तो उसके 30 साल के बाद वो चीन और ईरान से होते हुए अनातोलिया (आज का तुर्की) में उस्मानी सुल्तानों के इलाक़े तक पहुंचे.

फिंकल कहती हैं कि तैमूर लंग अपने आपको चंगेज़ ख़ान का वारिस समझते थे और इसी वजह से उनके ख्याल में अनातोलिया सल्जूक़ मंगोल इलाक़ों पर उनका हक़ था. उन्होंने अनातोलिया की विभिन्न रियासतों (जो उस समय तक उस्मानी सुल्तानों के शासन में नहीं आई थी) के बीच मतभेद का फ़ायदा उठाने की कोशिश की. लेकिन उस्मानी सुल्तान बायज़ीद की नज़र भी उन्हीं रियासतों पर थी.

फिंकल बताती हैं कि इसका निष्कर्ष ये निकला कि तैमूर लंग और बायज़ीद की फ़ौजें 28 जुलाई 1402 को इंक़रा के पास आमने-सामने आ गईं. इस जंग में सुल्तान बायज़ीद की हार हुई और वो इसके बाद ज़्यादा देर ज़िंदा नहीं रहे. उनकी मौत कैसे हुई? फिंकल कहती हैं कि इसके बारे में कई मत हैं.

लेकिन आज के विषय के सन्दर्भ में अहम बात ये है कि उस्मानिया सल्तनत एक मुश्किल दौर में दाख़िल हो गई. अगले 20 साल तक उस्मानिया सल्तनत को गृह युद्ध की वजह से भारी तबाही और बर्बादी का सामना करना पड़ा.

डॉक्टर अकंजे लिखते हैं कि बायज़ीद प्रथम के चारों बेटों के अपने-अपने हज़ारों समर्थक थे और वो सालों तक आपस में लड़ते रहे.

गृह युद्ध के अंत में सुल्तान का सबसे छोटा बेटा मेहमत प्रथम अपने भाइयों को हरा कर 1413 में उस्मानिया सल्तनत का अकेला वारिस बना.

सुल्तान मेहमत प्रथम को उस्मानिया सल्तनत की अपने पिता सुल्तान बायज़ीद के दौर में जो सीमाएं थी उन तक पहुंचाने में और कई साल जद्दोजहद करनी पड़ी.

इसी दौरान नए सुल्तान और तैमूर लंग (जो मर चुके थे) के बेटे शाहरुख़ के बीच पत्रों के ज़रिए एक दिलचस्प बात चीत हुई जो हमारे आज के विषय पर रौशनी डालती है. कैरलाइन फिंकल लिखती हैं कि 1416 में शाहरुख़ ने सुल्तान मेहमत प्रथम को पत्र लिखा और अपने भाइयों को क़त्ल करने पर विरोध किया तो उस्मानी सुल्तान का जवाब था कि “एक देश में दो बादशाह नहीं रह सकते…हमारे दुश्मन जिन्होंने हमें घेरा हुआ है हर समय मौक़े की तलाश में रहते हैं.”

यहां ये बात अहम है कि सुल्तान बायज़ीद ख़ुद अपने भाई ‘को क़त्ल कराने के’ बाद तख़्त पर बैठे थे. सन् 1389 में उस्मानिया सल्तनत के तीसरे सुल्तान मुराद प्रथम सर्बिया के ख़िलाफ़ जंग के दौरान मर गए. उस समय पर शहज़ादे बायज़ीद ने अपने भाई को मरवा कर सल्तनत का कार्यभार संभाल लिया था.

फिंकल लिखती हैं कि शहज़ादे बायज़ीद के हाथों उनके भाई शहज़ादा याक़ूब का क़त्ल ‘उस्मानी ख़ानदान में भाई का पहला क़त्ल है जिसका रिकॉर्ड मौजूद है.’

लेकिन उन्होंने आगे लिखा है कि ये साफ़ नहीं है कि ये क़त्ल वहीं जंग के मैदान में अपने पिता की मौत की ख़बर मिलते ही उन्होंने करवा दिया था या कुछ महीने बाद किया गया. क्योंकि उस्मानी ये जंग जीत गए थे और सर्बिया उनके मातहत रियासत बन गई थी.

Why Did the Ottoman Empire Fall?

What Was the Ottoman Empire?
The Ottoman Empire was first established in the northwestern region of present-day Anatolia by Osman, a tribal leader, in the late 1200s. By the mid-14th century, the Ottomans had made their way west and taken control of the Balkans. Just 100 years later, the Ottoman Empire helped overthrow the Roman Empire, and by the 17th century the Ottoman Empire had expanded into areas of western Asia, southeastern and central Europe, northern and northeastern Africa, and the Caucasus. In total, at its most expansive reach, the Ottoman Empire covered 2 million square miles and controlled a population of approximately 15 million. It is remembered as one of the largest and most powerful empires in human history.

When Did the Ottoman Empire Fall?
This empire lasted for approximately 600 years, and began to lose political power and military advantage in the late 18th century. By the mid-19th century, the Ottoman Empire had implemented a reform aimed at modernization and secularization in an attempt to gain back some of its lost power. These attempts were largely unsuccessful, and by World War I the empire was in full decline. The Ottoman Empire fought against Great Britain, the United States, France, and Russia during the fighting. When the war ended, the empire was dismantled. Historical records indicate that the Ottoman Empire officially ended in 1922.

How Did the Ottoman Empire Fall?
The Ottoman Empire began to decline in the late 18th century as the result of a relatively peaceful period of time experienced in the middle of the century. In most political situations, peace is the ultimate goal; for the Ottoman Empire, however, it meant that military advancements became less important. This military neglect allowed rival European and Russian forces to become more powerful. As a result, the Ottoman Empire lost territory during both the Austro-Turkish War (1716-1718) and the Russo-Turkish War (1768-1764).

Modernization reforms gave the empire one last grasp at power, however it continued losing territory during the 19th century. Additionally, many of its residents began to lose identity as subjects of the Ottoman Empire and began to develop independent nationalistic identities, particularly in the Balkans region. This revolt against the empire reached its climax during the Serbian Revolution, which occurred between 1804 and 1815. By the mid-19th century, it was clear to nearby political powers that the Ottoman Empire was failing.

In 1911, the Ottoman Empire lost land to Italy during the Italo-Turkish War, followed by a loss of all of Balkan territories during the First Balkan War (1912 -1913). Prior to and during this war, the empire faced rebellions from various ethnic groups, including Kurds, Armenians, and Arabs. Additionally, Kuwait became an independent nation as a result of the Anglo-Ottoman Convention of 1913.

On October 29, 1914, the Ottoman Empire attacked Russia on the shores of the Black Sea, effectively prompting the beginning of World War I. In response to this attack, Britain and France allied with Russia and declared war on the Ottoman Empire. On October 31, 1918, the governments involved signed the Armistice of Mudros, which ceased fighting between the empire and the allies. This agreement, however, did not bring peace to the region. The British maintained control of Iraq, Syria, and Palestine, while Allied forces moved into Constantinople with the intention of bringing peace to the violence-filled zone. The Treaty of Sevres of 1920 officially gave control of much of the Middle East to Great Britain and France, leaving the empire with only small areas in Anatolia. At the same time, Turkish nationalists were gaining power in the empire, which resulted in the Turkish War of Independence. With the end of this war, the Ottoman Empire was officially ended in 1922, and the Republic of Turkey was officially established shortly after.

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