विशेष

एक छोटी-सी बात ने, बुद्ध के काल में, एक बार एक बड़े विवाद का रूप ले लिया!

मुदित मिश्र
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#विवाद-परिहारपूर्वक मैत्री स्थापनार्थ बुद्धोपदिष्ट_सप्त_नियमानुशासन (विनय)
मामूली-सी घरेलू कलह हो, सामाजिक विवाद हो या बड़े युद्ध अथवा महायुद्ध हों, वे शुरू हमेशा किसी छोटी-सी बात से ही होते हैं।
छोटी-सी बात ही बढ़ते-बढ़ते कलह, विवाद अथवा युद्ध का रूप ले लेती है।
ऐसी ही एक छोटी-सी बात ने, बुद्ध के काल में, एक बार एक बड़े विवाद का रूप ले लिया।

घटना यह हुई कि गोशिरा के विहार में एक सूत्राचार्य ने एक दिन भूलवश कर-प्रक्षालन पात्र नहीं धोया। भिक्षुओं के हाथ धोने के बर्तन को ‘कर-प्रक्षालन-पात्र’ कहते हैं। सूत्राचार्य की उस भूल पर एक शीलाचार्य ने उन पर आपत्ति आरोपित की, उनको दोषी ठहराया कि वे जानबूझकर अपने कर्तव्य से विमुख हुए हैं।

बुद्ध के सूत्रों को कंठस्थ करके उनका नियमित पाठ करने वाले भिक्षुओं को ‘सूत्राचार्य’ कहा जाता था और समय-समय पर संघ के लिए अथवा गृहस्थों के लिए बुद्ध के द्वारा बताए गए शीलों को कंठस्थ करके उन्हें सुरक्षित करने वाले भिक्षुओं को ‘शीलाचार्य’ कहा जाता था। बुद्ध के वचनों को इसी श्रुति-स्मृति परंपरा के द्वारा ही बौद्ध भिक्षुओं ने उसे शताब्दियों तक जीवित रखा। ‘त्रिपिटक’ को लिपिबद्ध करने का काम बुद्ध के निर्वाण के लगभग पाँच शताब्दियों के बाद हुआ।

शीलाचार्य के दोषारोपण को सूत्राचार्य ने अपना अपमान समझा और आरोप स्वीकार नहीं करने को शीलाचार्य ने अपनी अवमानना।

बात यहाँ तक बढ़ गई कि शीलाचार्य ने घोषणा कर दी कि सूत्राचार्य साप्ताहिक शीलपाठों में तब तक शामिल नहीं हो सकते जब तक वे अपना दोष स्वीकार न कर लें। इस विवाद से संघ दो गुटों में बँट गया- सूत्राचार्य गुट और शीलाचार्य गुट। दोनों गुट एक-दूसरे की निंदा करने लगे। निष्पक्ष भिक्षुओं की स्थिति विवशतापूर्ण हो गई। विवाद इतना बढ़ता चला गया कि इसकी खबर आम जनता को भी होने लगी।

उस वक्त बुद्ध गोशिरा के निकट ही थे। निष्पक्ष भिक्षुओं के द्वारा संघ-विवाद की बात उन तक भी पहुंची।वे स्वयं चलकर गोशिरा विहार तक आए। शीलाचार्यों एवं सूत्राचार्यों से अलग-अलग मिले, लेकिन दोनों ही पक्ष झुकने को तैयार नहीं थे।

आखिरकार बुद्ध ने दोनों ही पक्षों की संयुक्त बैठक की। उन्हें शीलों की सजगता के विषय में एक बार फिर स्मरण दिलाया। अहंकार, तृष्णा, क्रोध से विरत रहने की बात कही। ध्यान-साधना में और अधिक नियमित व निष्ठावान होने की सलाह दी, लेकिन बैठक में सन्नाटा छा गया जब एक दंभी भिक्षु ने भगवान् बुद्ध से ही इस विवाद में हस्तक्षेप न करने की बात कह दी।

बौद्ध ग्रंथों में ऐसा विवरण पढ़कर आज भी धक्का-सा लगता है- बुद्ध के साथ ऐसा व्यवहार!

लेकिन दंभ व अहंकार भगवान् बुद्ध को भी अनदेखा, अनसुना कर सकता है।

इससे लगता है कि प्रमादियों का अहंकार उनके लिये बुद्धत्व से भी बड़ा होता है।

पारिवारिक झगड़ों और सामाजिक विवादों में भी ऐसा होता है कि कभी-कभी विवादी पक्ष अपने बुजुर्ग मध्यस्थ की बात भी अनसुनी कर देते हैं। ऐसी स्थिति में बुजुर्ग सभा से उठकर चले जाना ही बेहतर समझते हैं। मगर जिस घर या सभा से बुजुर्ग उठकर चल देता है, मानो कि वहाँ से उजाला उठकर चला गया।
बुद्ध ने भी वही किया। वे उठकर चले गए। विवादी भिक्षुओं को उनके अहंकार के अंधेरों ने घेर लिया। यह अँधेरा उन्हें छह महीने से अधिक समय तक घेरे रहा। जब तक उन्हें खुद उजाले की याद नहीं आई, वे खुद उजाले के पास नहीं गए।

बुद्ध गोशिरा से विहार करते-करते दूर श्रावस्ती चले गए। गोशिरा का विहार कौशांबी अर्थात् आज के इलाहाबाद अथवा प्रयाग के निकट था। और श्रावस्ती बहराइच के निकट है।

दरअसल संगठन या स्थान कोई भी हो, सामाजिक संगठन या पारिवारिक संस्था, वह बनती तो बहुत लोगों के समन्वय से है, लेकिन प्रायः टूटती है कुछ गिने-चुने लोगों के निजी स्वार्थों व अहंकारों के कारण।

संघ का विवाद जनमानस के बीच चर्चा का विषय बन गया । अन्य संप्रदायों में संघ का उपहास होने लगा। निष्पक्ष भिक्षु भी स्वयं में शर्मिंदगी महसूस करने लगे। दीया तले अँधेरा जैसी बात हो गई- रोशनी को बाँटने वाले ही अँधेरे से घिर गए। पथ-प्रदर्शक ही पथभ्रष्ट हो गए।

जनमानस ने विवादी भिक्षुओं के प्रति अपने ही तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की- उन्हें आदर-सत्कार देना बंद कर दिया , उन्हें भिक्षा-उपहार देने से इंकार कर दिया, उन्हें नमन करना छोड़ दिया।

वास्तव में कभी भी व्यक्ति सम्मानित नहीं होता, व्यक्तित्व सम्मानित होता है। व्यक्ति का महत्त्व नहीं होता, व्यक्तित्व का महत्त्व होता है। व्यक्तित्व निर्मित होता है व्यवहार से, आचार से। यदि व्यक्ति अपने आचरण से च्युत हो जाए तब भी व्यक्ति तो वही रहता है, लेकिन व्यक्तित्व वहीं नहीं रह जाता। व्यक्तित्वच्युत व्यक्ति अहंकारवश पूर्ववत् ही मान-सम्मान चाहता है, लेकिन व्यक्तित्व से गिरे व्यक्ति को फिर वह मान-सम्मान मिलता नहीं, अगर वह अपने पूर्व व्यक्तित्व पर ही पुनःप्रतिष्ठित न हो जाए। ऐसी स्थिति में संवेदनशील लोग प्रायः अंतर्मुखी हो जाते हैं, आत्मनिरीक्षण करते हैं, अपनी त्रुटियाँ देखते हैं, फिर से सुधरने का प्रयास करते हैं।

बुद्ध के संघ की तो आधारशिला ही थी- सजगता, संवेदनशीलता, शील-हर समय साँसों पर नजर, शीलों पर नजर, कायिक-वाचिक-भावनात्मक वेदनाओं पर नजर। वे अंतर्मुख कैसे न होते!

विवादी भिक्षुओं को मान-सम्मान, आदर-सत्कार, भोजन-उपहार मिलना बंद हो गया। जनसमूह की इस प्रतिक्रिया ने और उनकी अपनी संवेदनशीलता ने उन्हें अपने अंदर झाँकने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें अपनी गलतियों का अहसास होने लगा। अपने गुरु शास्ता बुद्ध के अपने बीच से उठकर चले जाने का उन्हें अफसोस हुआ। अँधेरे को उजाला याद आने लगा। उन्होंने बुद्ध के सामने ही अपनी गलती स्वीकारने और समझौता करने का निर्णय लिया- लगभग छह महीने के बाद।

दोनों पक्ष संयुक्त रूप से गोशिरा से श्रावस्ती पहुँचे, जहाँ शास्ता अनाथपिंडक के जेतवन में विहार कर रहे थे। शीघ्र ही सूचना जेतवन में पहुँची कि गोशिरा से भिक्षु आए हैं, वे बुद्ध के दर्शन करना चाहते हैं। मोद्गल्यावन, महाकाश्यप, सारिपुत्र, आनंद आदि वरिष्ठ भिक्षुओं ने भगवान् से पूछा- “इन भिक्षुओं के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए?”

शास्ता ने कहा- “उनके साथ धर्मानुसार व्यवहार करो। विहार के द्वार खोल दो। उनका स्वागत करो।”
कहावत है कि सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।

उस रात जेतवन में बुद्ध की उपस्थिति में एक ‘ समझौता – समारोह ‘ हुआ । दोनों पक्षों ने पाप – देशना की । पाप – देशना का तात्पर्य है कि अपने दोष को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करना । दोनों पक्षों ने विनम्रतापूर्वक अपने – अपने दोष स्वीकार किए और उनके बीच समझौता हो गया ।

यह विवाद तो शांत हो गया, समझौता हो गया, लेकिन भविष्य में यदि संघ में विवाद हो तो उनका निवारण किस तरह किया जाए ? इस संबंध में भगवान् बुद्ध ने सारिपुत्र, महाकाश्यप, मोद्गल्यायन, आनंद आदि वरिष्ठ भिक्षुओं से विचार – विमर्श करके सात नियम बनाए , जो ‘विनय पिटक’ में ‘ सप्ताधिकरण समता विनय ‘ के रूप में संगृहीत हैं ।

वे सात नियम बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, उल्लेखनीय हैं और आज की वर्तमान परिस्थितियों में वे सामयिक दृष्टिकोण से देखे जाने की अपेक्षा रखते हैं, यदि हम उन्हें ऐसा देखना चाहें तो ।

वे सात नियम इस प्रकार हैं:
पहला नियम
सम्मुख विनय
अर्थात् विवाद को बुद्ध व संघ के सम्मुख रखना।
जब तक समस्या सम्मुख प्रस्तुत न की जाए तब तक समाधान पर काम नहीं हो सकता। इसलिए संघ के सामने समस्या को रखा जाना प्रथम विनय है, जिसे ‘सम्मुख विनय’ कहते हैं।

‘विनय पिटक’ के मुताबिक कम से कम पाँच भिक्षुओं की सामूहिक उपस्थिति को ‘संघ’ कहते हैं। भारत के गाँवों की पंचायत प्रणाली’, जो कि अभी भी प्रचलन में है, बुद्ध के संघ की ही देन है। पाँच लोगों के दिए गए निर्णय को मान्य निर्णय माना जाता है। कालांतर में यह ‘पंच’, अर्थात् पाँच लोगों का सर्वमान्य समूह, जनमानस में इतना अधिक स्वीकृत हो गया कि उसे ‘पंच परमेश्वर’ कहा जाने लगा। हिंदी के कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी का नाम ही है- “पंच परमेश्वर’। ‘पाँच’ में जो मुखिया होता है, उसे ‘सरपंच’ कहते हैं। ये पंचायतें एक तरह से भारत के गाँवों की ‘घरेलू अदालतें’ हैं, न्यायालय हैं। भारत सरकार ने ग्राम पंचायतों की प्रणाली को वैधानिक मान्यता देकर एक प्राचीन परंपरा को नवीन संविधान के अधीन आधुनिकीकृत करने की सराहनीय पहल की है।

दूसरा नियम
स्मृति विनय
अर्थात् स्मृति पर जोर डालकर उस मूल घटना को सविस्तार संघ के सामने बयान करना, जहाँ से विवाद शुरू हुआ था।
यह विनय विवाद के ‘मूल कारण’ को तलाशने का प्रयास करता है।
कहते हैं कि समस्या या रोग का कारण समझ में आ जाए तो आधा निवारण तो अपने आप हो जाता है।
आज भी अदालतों में अंतिम निर्णय देते समय न्यायाधीश की भाषा प्रायः इस प्रकार होती है- उपलब्ध साक्ष्यों एवं तथ्यों के प्रकाश में अदालत यह फैसला सुनाती है कि…
‘स्मृति विनय’ के माध्यम से संघ दोनों पक्षों से अधिक से अधिक तथ्य व साक्ष्य संगृहीत करने का प्रयास करता है।

तीसरा नियम
अमुद विनय
इस नियम के अनुसार दोनों पक्षों को संघ के सामने यह प्रार्थना करनी होती है कि वे विवाद का हल चाहते हैं। उन्हें भी स्वीकार करना होता है कि वे अपने-अपने पक्ष का हठ त्यागने को तैयार हैं और संघ के अंतिम निर्णय को स्वीकार करेंगे।
आज की वैधानिक भाषा में कहूँ तो उन्हें विवाद के हल के लिए अपनी तरफ से आवेदन-निवेदन करके इच्छा प्रकट करनी होती है। रोग ठीक तभी किया जा सकता है जब ठीक होने की इच्छा से रोगी वैद्य के पास जाए।
ये सभी विनय चरणबद्ध हैं- प्रत्येक विनय पूरक है अपने पूर्ववर्ती का और अनुगामी है अपने आगामी का।
विवाद संघ के सामने आ जाए, विवाद का कारण भी स्पष्ट हो जाए, लेकिन वादी प्रतिवादी पक्ष अपने-अपने हठ त्यागने को तैयार न हों, या अपने ही पक्ष में निर्णय चाहें, या संघ को निर्णायक सत्ता स्वीकार न करें तो भी कोई समाधान नहीं निकल सकता। जैसे रोगी वैद्य के पास जाए, अपने रोग का सविस्तार बयान करे, लेकिन इलाज करवाने से इंकार कर दे तो रोगी कभी ठीक ही नहीं होगा। इसलिए ‘अमुद विनय’ अपने पूर्ववर्ती दो विनयों का पूरक है और आगामी विनय का अनुगामी।

चौथा नियम
तत्त्व भायिष्य विनय
अर्थात् दोनों पक्ष अपने दोष को संघ के सामने स्वेच्छापूर्वक स्वीकार करें। यह समझौते की प्रक्रिया का बहुत बड़ा हिस्सा है- अपना दोष स्वेच्छा से स्वीकार करना। कहते हैं, गलती को स्वीकार कर लेना सुधार की दिशा में पहला कदम होता है। यहाँ यह विनय सुधार के लिए आवश्यक है और समझौते के लिए भी।

पाँचवाँ नियम
प्रतिज्ञाकारक विनय
इस विनय के अनुसार दोनों पक्ष प्रतिज्ञा करते हैं कि वे संघ द्वारा दिए गए निर्णय का अनुपालन करेंगे।
यह प्रतिज्ञाबद्धता संघ का आदेश नहीं होता, जो दोनों पक्ष मानने को विवश हों, बल्कि सभी की परस्पर सहमति होती है।
दोनों पक्षों की बात सुनकर संघ जो भी निर्णय देता है, उसका कोई एक प्रवक्ता भिक्षु उच्चस्वर में तीन बार उच्चारण करता है । यदि इस बीच सभी लोग चुप रहकर निर्णय सुनते हैं, कोई आपत्ति नहीं उठाते, तो निर्णय को सर्वस्वीकृत मान लिया जाता है।
आज की ग्राम पंचायतों में अभी भी परंपराएँ इसी रूप में जीवित हैं। विवादी पक्षों की बात सुनकर पंचायत जो भी फैसला लेती है, उसे सभा के सम्मुख एक ‘प्रवक्ता जैसा व्यक्ति’ तीन बार ऊँची आवाज में कहता है। उस ‘प्रवक्ता जैसे व्यक्ति ‘को उत्तर भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश के कुछ गाँवों में, ‘छड़ीबरदार’ या ‘बतकहा’ कहते हैं।

छठा नियम
यद्भूयासिकीय विनय
अर्थात् सर्वानुमति से निर्णय।
यह विनय विशेष उल्लेखनीय है कि इसके अनुसार निर्णय सर्वानुमति से ही होता है। अर्थात यह निर्णय किसी एक प्रभावशाली भिक्षु या भिक्षुओं के समूह द्वारा एकतरफा नहीं सुनाया जा सकता। संघ में प्रभावशाली व्यक्तित्व के भिक्षु हो सकते हैं, जिनके व्यक्तिगत निर्णय पर भी निर्विरोध सहमति हो सकती है, लेकिन फिर भी अंतिम निर्णय के लिए पूरे संघ की औपचारिक सहमति अनिवार्य है। यह लोकतांत्रिक पद्धति है।
भारत के संविधान-शिल्पी बोधिसत्त्व बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर बौद्ध संघों की लोकतंत्रात्मक पद्धति के अत्यधिक प्रशंसक थे और उससे प्रभावित भी। उनका कहना था कि भारतीय संविधान का लोकतांत्रिक स्वरूप उन्होंने बौद्ध संघों से लिया है, न कि फ्रांस, इटली अथवा इंग्लैंड से। सन् 1950 में श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में ‘विश्व भ्रातृत्व सम्मेलन’ में व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा था- “गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली (डेमोक्रेसी) भी बौद्ध युग की देन है।”

सातवाँ नियम
तृणस्तारक विनय
‘तृणस्तारक’ का शाब्दिक अर्थ होता है- कीचड़ को घास-पात-तिनकों से ढक देना। ‘तृण’ का अर्थ होता है- तिनका।
‘सप्ताधिकरण समता विनय’ का यह सातवाँ और उपसंहारक विनय उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितने कि पूर्व के छह विनय। इस विनय के अनुसार वादी-प्रतिवादी भिक्षुओं से तथा संघ के अन्य सदस्यों से, विवाद जिनके संज्ञान में है, यह अपेक्षा की जाती है कि वे पूर्व की नकारात्मक घटनाओं की चर्चा नहीं करेंगे और अपने व्यवहार व वाणी से उन नकारात्मक स्मृतियों की कीचड़ पर घास-पात-तिनके डालने का प्रयास करेंगे।

जैसे कीचड़ वाले मार्ग पर पथिक घास-पात-तिनके डालकर, कीचड़ को ढककर, बिना पैरों व वस्त्रों को गंदा किए आगे निकल जाते हैं, ऐसे ही पुरानी कटु स्मृतियों पर घास-पात डाल देना इस विनय की परिभाषा है।

जख्मों को कुरेदते रहने से जख्म कभी भरते नहीं। विवादी पक्ष भी यदि कटु स्मृतियों को बार-बार कुरेदते रहें तो समझौता होकर भी मन की कटुता नहीं जाती। जख्मों को भरने के लिए जैसे मरहम-पट्टी की जरूरत होती है, ऐसे ही कटु स्मृतियों को खत्म करने के लिए भी मृदु व्यवहार एवं वाणी की आवश्यकता होती है।

संघ की बैठक के अंत में यह जिम्मेदारी किसी वरिष्ठतम भिक्षु पर हुआ करती है- जिसकी दोनों पक्षों में निष्पक्ष छवि होती है जो दोनों पक्षों का सम्मानित व अविवादित व्यक्तित्व होता है- जो थोड़े-से मृदु शब्दों से दोनों पक्षों का समझौता कराता है। यह समझौता गले मिलकर, परस्पर पुष्प-उपहार आदि देकर या आज की परंपरा व संस्कृति में हाथ मिलाकर भी हो सकता है। एक-दूसरे का मुँह मीठा कराया जा सकता है।

इस सप्ताधिकरण विनय की पृष्ठभूमि में निष्कर्ष मात्र इतना देना चाह रहा हूँ कि यह सात नियम सिर्फ बौद्ध संघों के विवाद सुलझाने के लिए ही नहीं हैं, बल्कि यदि इन्हें कुशलता से अनुपालन करके देखा जाए तो यह हमारी आज की पारिवारिक, सामाजिक, वर्गीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय और यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय मसले जैसे अनेक देशों के बीच सीमा विवाद भी सुलझाए जा सकते हैं तथा एक सौहार्दपूर्ण दुनिया का निर्माण किया जा सकता है। क्यों न हम अपने जीवन में भी इनका परीक्षण करके देखें!

(“बुद्ध का चक्रवर्ती साम्राज्य”, पुस्तक से – साभार राजेश चन्द्रा जी)

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