विशेष

चंडी और दुर्गा

Tapan Bhatt
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छीतर अपने खेत से घर आया तो देखा कि आंगन में उसकी बेटी इमरती नारियल छील रही थी। वो दोनों हाथों से ज़ोर लगाती नारियल की जड़ को हाथों से खींच खींच कर उखाड़ रही थी। कभी नारियल को अपने पैरों से दबाती और उसकी जड़ को उखाड़ने का प्रयत्न करती, तो कभी एक हाथ से नारियल को पकड़, दूसरे हाथ की मुट्ठी से उसके रेशे छीलने लगती। अब नारियल तो नारियल ही होता है। कहाँ कठोर नारियल और कहां इमारती के नाजुक हाथ। छीलते छीलते पसीने से तर बतर हो गयी। छीतर उसे देख मुस्कुराया। बोला, जे काम तेरे बस का ना है। जा अंदर जा एक कप चाय बना। नारियल मैं छील देता हूँ। मगर इमारती ने जैसे सुना ही नहीं। वो तो तल्लीनता से एकाग्र होकर नारियल छीले जा रही थी। उसके जबड़े भिंचे हुए थे और आंखों में गुस्से की लकीरें तैर रही थीं। छीतर की पत्नी निर्मला आंगन की दीवार से टेक लगाए इमरती को देख रही थी। छीतर को कुछ समझ में नहीं आया। वो कुछ देर तो इमरती और निर्मला को देखता रहा, फिर भीतर चला गया। खेत में सुबह से काम करके थक गया था, तो रात होने से पहले ही सो गया।

रात 11 बजे अचानक छीतर की आंख खुली तो उसको कुछ अजीब सी हुंकारे जैसी आवाज़ आयी। वो उठ कर बाहर गया तो देखा, चौक में इमरती चाकू लिए खड़ी है और सामने दीवार पे बने एक पुतले को निशाना बना के चाकू चला रही है। छीतर भौंचक्का रह गया। उसने कहा, इमरती जे का कर रही है ? मगर इमारती ने इस बार भी नहीं सुना। वो तो एकाग्र होकर तल्लीनता से चाकू चला रही थी। उसके जबड़े अभी भी भिंचे हुए थे और आंखों में गुस्सा था। ये देख कर तो छीतर को और भी आश्चर्य हुआ कि पास में खड़ी निर्मला के हाथों में ढेर चाकू थे और वो इमरती को एक एक चाकू, पुतले पे फैंक मारने के लिए, पकड़ा रही थी। छीतर को शाम की तरह अभी भी कुछ समझ नहीं आया। वो वापिस अपनी खटिया पे जा कर सो गया। मगर अब नींद उससे दूर चली गयी थी। बड़ी देर तक इमरती की चाकू चलाते वक्त की हुंकार उसके कानों में बजती रही।

छीतर सुबह पांच बजे उठ जाता था। उठ कर नहाने के लिए जब वो घर के बाहर वाले नलकूप पे गया तो उसने देखा, इमरती ने एक डंडे के नीचे एक बड़ा सा गोल पत्थर बांध, उसे ज़मीन कूटने वाला मुगदर बनाया हुआ है और वो अपने दोनों हाथों से बारी बारी मुगदर उठा, आंगन की ज़मीन कूट रही है। छीतर नहाना भूल गया। वो इमरती को देखने लगा। फिर इमरती ने मुगदर रख दिया, एक कुल्हाड़ी उठायी और एक ठूंठ पे रखी लकड़ी पे ज़ोर से वार किया। लकड़ी के दो टुकड़े हो गए। फिर इमरती बारी बारी ढेर लकड़ियां काटने लगी। छीतर ने देखा कि, सर पे लकड़ियों का गट्ठर उठाये, निर्मला कहीं से और लकड़ियां लायी है। वो ज़ोर से चिल्लाया, अरे जे का कर रही हो तुम ? मगर वही हुआ जो पिछले दिन दो बार हुआ था। छीतर की बात ना इमरती ने सुनी, ना निर्मला ने। इमारती के जबड़े भिंचे हुए थे और उसकी आँखों से अंगारे बरस रहे थे।

उस दिन छीतर खेत पर नहीं गया। दोपहर के खाने के बाद इमरती उसके पास आई। उसके हाथ में दुर्गा माँ की एक छोटी मूर्ति थी। उसने मूर्ति छीतर को पकड़ा दी और बोली, बापू हम दुर्गा माँ की पूजा क्यों करते हैं ? छीतर कुछ देर तो इमरती को देखता रहा, फिर बोला, दुर्गा माँ शक्ति का अवतार हैं बेटा। हम इनकी पूजा इसलिए करते कि दुर्गा माता हमारी हमेशा रक्षा करे। इमरती मुस्कुराई, बोली, बापू पता है, अम्मा का कह रही थी ? अम्मा कह रही थी कि बिटिया अब लड़कियों को खुद ही दुर्गा होना पडेगा। खुद ही चंडी और काली बनना पडेगा। अम्मा मुझे दुर्गा और चंडी बना रही है बापू। छीतर आंखे फाड़े आश्चर्य से इमरती को देखने लगा। फिर उसने निर्मला को देखा। निर्मला अपने हाथ में अपनी बड़ी बेटी की फोटो लिए हुई थी और उसकी आंखे छलछला रही थीं। इमरती ने अपनी माँ के आंसू पोंछे। वो छीतर और निर्मला के हाथ अपने हाथों में लेकर बोली, दीदी तो खुद को ना बचा सकी। पर मेरे साथ ऐसा ना होगा बापू। कोई मुझे बिना मर्ज़ी के हाथ भी लगायेगा तो हाथ तोड़ दूंगी उसका। सर के बाल जड़ समेत उखाड़ दूंगी। पेट फाड़ दूंगी चाकू से। जैसे लकड़ी चीरती हूँ ना, वैसे छाती चीर दूंगी। जितने क्रूर वो हो सकते हैं उससे सौ गुना क्रूर हो जाऊंगी, पर मैं समर्पण ना करूंगी बापू, मैं समर्पण ना करूंगी। इमरती के जबड़े भिंच रहे थे और उसकी आँखे गुस्से से लाल थीं।

रात को बाहर आंगन में इमरती की ट्रेनिंग चल रही थी और भीतर कमरे में बिस्तर पे लेटे लेटे छीतर सोच रहा था कि वो वक्त आ गया है, जब बेटियों को संस्कार, प्यार, त्याग और तपस्या सिखाने के साथ साथ चंडी और दुर्गा भी बनाना पड़ेगा।
तपन

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