धर्म

चालीसवां क्या है : क्या है 40 का इस्लाम में महत्व : हज़रत इमाम हुसैन के चालीसवें के अवसर पर विशेष रिपोर्ट!

इस्लाम में बहुत सी महान हस्तियां हैं जिन्हें बेहद क्रूरता के साथ शहीद किया गया, उन सब की याद मनायी जाती है, उनके शहादत दिवस पर शोक मनाया जाता है लेकिन इमाम हुसैन के शहादत दिवस यानि आशूर के अलावा भी उनकी शहादत के चालीसवें दिन ” अरबईन” मनाया जाता है लेकिन किसी और इस्लामी हस्ती का चालीसवां या अरबईन नहीं मनाया जाता, वजह क्या है?

इस्लाम में कुछ संख्या और आंकड़ों को खास अहमियत दी जाती है। कुरआने मजीद में भी कुछ संख्या और आंकड़ों का उल्लेख है लेकिन इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि इस्लाम में किसी संख्या या आंकड़े को पवित्र माना जाता है।

संख्या और आंकड़ों में 40 की संख्या काफी प्रचलित है और इस्लामी किताबों यहां तक कि क़ुरआने मजीद में भी भी 40 की संख्या का बार बार उल्लेख है। ईश्वर ने 40 दिनों तक हज़रत आदम की मिट्टी को गूंधा। कुरआने मजीद ने मां की कोख में इन्सान के अस्तित्व में आने के चरणों को 40-40 दिन के तीन चरण में बयान किया है। हज़रत आदम को जब ज़मीन पर भेज दिया गया तो जन्नत के लिए 40 दिनों तक वह रोए थे जिसके बाद उन्हें माफ कर दिया गया इसी तरह अपने बेटे क़ाबील के हाथ अपने दूसरे बेटे हाबील के क़त्ल पर वह 40 दिनों तक रोए थे। इसी तरह जब हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने बरसों तक लोगों को एक अल्लाह की ओर बुला और कुछ लोगों के अलावा किसी ने उनकी बात नहीं सुनी तो उन्होंने अल्लाह से कड़े दंड की दुआ की तो 40 दिनों तक लगातार बारिश हुई और पूरी दुनिया पानी में डूब गयी। हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का अभियान भी 40 दिनों तक का था और जब उनके अनुयाइयों ने ईश्वर के आदेश को नहीं माना तो ईश्वर ने उन्हें 40 बरसों तक रेगिस्तान में भटकने पर मजबूर कर दिया। हज़रत मरयम ने 40 दिनों तक एकांतवास किया और पैग़ंबरे इस्लाम ने अपनी पैगंबरी के एलान से पहले 40 दिनों तक हिरा नामक गुफा में रात दिन एकांतवास किया और यही नहीं जब पैगंबरे इस्लाम 40 बरस के हुए तब ईश्वरीय संदेश लाने वाला फरिश्ता उन्हें नज़र आया।

ईश्वर की उपासना और आध्यात्मिक दर्जे पर पहुंचने के लिए भी 40 की संख्या बेहद महत्वपूर्ण है। हज़रत अली ने कहा है कि जो भी 40 दिनों तक ईश्वर के लिए स्वंय को समर्पित कर देगा, ईश्वर ज्ञान के सोते उसकी ज़बान पर जारी कर देगा। हज़रत अली हमेशा इस बात पर अफसोस करते थे कि उनके पास 40 मददगार नहीं हैं । हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम 40 दिनों तक लगातार उपासना करते थे और ज़मीन व आसमान इमाम हुसैन पर 40 दिनों तक रोए थे। इसी तरह की बहुत सी मिसालें हैं जिनसे पता चलता है कि इस्लाम में 40 की संख्या पर विशेष रुप से ध्यान दिया गया है।

पैगंबरे इस्लाम (स.अ.) के परिजनों के कथनों और हदीसों में, केवल “अरबीन” यानि इमाम हुसैन के चालीसवें के अवसर पर तीर्थयात्रा की सिफारिश की जाती है, और इमाम हुसैन के पहले या बाद में किसी भी हस्ती के लिए ऐसी कोई हदीस नहीं मिली है। दूसरे शब्दों में, आशूरा से पहले चेहलुम मनाने की किसी परंपरा का या किसी हदीस में कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए यह विशेषता केवल इमाम हुसैन की है, क्योंकि जाहिर तौर पर पवित्र पैगंबर के समय यह देखा ही नहीं गया कि किसी ने तीन दिनों से अधिक समय तक शोक मनाया हो। यह परंपरा शेख तूसी के समय तक जारी रही, इसलिए वह एक दिन से अधिक समय तक शोक मनाने ” मकरूह” यानि नापंसद काम मानते हैं। ” अखबारुज़्ज़ैनबियात सहित कई किताबों में बताया गया है कि अहले हरम भी जब मदीना पहुंचे तो उन्होंने भी तीन दिनों और तीन रातों तक ही शोक मनाया और इस शोक में बनी हाशिम खान्दान की और अन्य महिलाओं ने भाग लिया। आयतुल्लाह सैयद मुहम्मद अली काज़ी तबातबाई तबरीज़ी ने भी माना है कि मदीना पहुंचने के बाद पैगंबर के परिजनों ने शोक की धार्मिक समय सीमा पर ध्यान दिया और केवल तीन दिनों तक ही शोक मनाया। ऐसा लगता है कि वे तीन दिनों के शोक को धार्मिक शिक्षाओं के अनुरुप और उससे अधिक दिनों तक शोक मनाने को धार्मिक शिक्षाओं के विपरीत मानते थे।

शहीद सानी ने अपनी विश्व विख्यात किताब अल्लुमअतुद्दमिश्क़िया के “हेदाद” अर्थात महिलाओं के श्रंगार त्यागने के अध्याय में लिखा है कि पैगंबर इस्लाम ने कहा: ” अल्लाह और क़यामत में विश्वास रखने वाली महिला के लिए किसी मृत व्यक्ति के लिए तीन दिन से अधिक समय तक शोक मनाना सही नहीं है, सिवाए अपने पति के कि जिसके लिए शोक की अवधि चार महीने दस दिन है। ”

शिया सुन्नी मुसलमानों की किताबों और पैगंबरे इस्लाम के समय के मुसलमानों के व्यवहार से भी पता चलता है कि मरने वाले के लिए शोक की अवधि अधिक से अधिक तीन दिन ही होती थी। इस तरह से यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो जाती है कि इस्लामी संस्कृति में सात दिन या चालीस दिन या एक साल बाद शोक मनाने की कोई बात नहीं है।

यहां तक कि किताबों में है कि इमाम जाफरे सादिक़ के दौर तक शिया मुसलमान, सिर्फ इमाम हुसैन का शोक मनाते थे और इस तरह का शोक पैगंबरे इस्लाम, इमाम अली, और हज़रत फातेमा के लिए भी नहीं मनाते थे।

इमाम हुसैन के लिए शोक मनाने पर बहुत अधिक ज़ोर दिया गया है और निश्चित रूप से इसकी खास वजह है। दर अस्ल जिस तरह से इमाम हुसैन और उनके साथियों ने बलिदान दिया है उसकी मिसाल मानव इतिहास में नहीं मिलती। सभी इमामों बल्कि स्वंय पैगंबरे इस्लाम की जीवनी में इमाम हुसैन की तरह किसी अन्य के लिए शोक की मिसाल नहीं मिलती जिसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि इस तरह से इमाम हुसैन के मिशन को उनके बलिदान को अलग और अनोखा रूप देना ज़रूरी समझा गया हो। इमाम हुसैन के लिए शोक को हर प्रकार से अन्य शोक सभाओं से इस लिए भी अलग रखा गया ताकि यह शोक, गुम न हो जाए। चालीसवां या अरबईन सिर्फ इमाम हुसैन का मनाने के पीछे भी यह भी एक वजह हो सकती है। वैसे भी किसी भी अन्य हस्ती के लिए ” अरबईन” या चालीसवें की ज़ियारत भी नहीं है। यह सब कुछ इस लिए है ताकि लोगों को यह बताया जाए कि इमाम हुसैन का ग़म, अलग है और उसकी तुलना किसी भी तरह के अन्य ग़म से नहीं की जा सकती।

इसी लिए कहा जाता है कि इमाम हुसैन के चाहने वालों का कर्तव्य है कि वह मुहर्रम में और अबईन में उनका वैसा ही गम मनाए जैसा कि मनाना चाहिए लेकिन इसके साथ ही साल के अन्य दिनों में इमाम हुसैन या किसी भी अन्य हस्ती का शोक मनाते समय यह ज़रूर याद रखें कि मुहर्रम के विशेष दिनों में और चालीसवें का ग़म अलग है और उसका अलग स्थान हर हाल में सुरक्षित रहे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *