धर्म

पवित्र क़ुरआन चमकता हुआ सूर्य है जो अपने प्रकाशमयी मार्गदर्शन से अज्ञानता और अंधकार से मुक्ति दिलाता है : ईश्वरीय वाणी पार्ट 28

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरये नहल की ४८ वीं आयत में कहता है” क्या उन लोगों ने ईश्वर की सृष्टि में से किसी एसी चीज़ को नहीं देखा जिसकी छाया कभी दाहिने ओर और कभी बायीं ओर पलटी रहती है और विनम्रता के साथ ईश्वर का सजदा करती है?

पवित्र कुरआन की यह आयत महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की निशानियों को बयान करती है। यहां पर महान ईश्वर चीजों की छाया को जो कभी बायीं और कभी दाहिनी ओर चलती है, अपनी निशानियों में से बताता है और उन्हें अपने पालनहार के सजदे की हालत में मानता है। दूसरे शब्दों में न केवल चीज़ें बल्कि उनके चिन्ह और छाया जैसी विशेषताएं भी अपने पालनहार का सजदा करती हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चीज़ों की जो छाया होती है उसका भी हमारे जीवन में बहुत महत्व व प्रभाव है। जिस तरह सूर्य का प्रकाश सजीव वस्तुओं के बढ़ने के लिए आवश्यक है उसी तरह छाया भी प्रकाश को संतुलित करने के लिए जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। अगर सूर्य का प्रकाश लम्बे समय तक एक तरह से किसी चीज़ पर चमकता रहे तो वह चीज़ मुर्झा जायेगी लेकिन छाया के बदलते रहने से सूर्य की चमक संतुलित बनी रहती है।

पवित्र कुरआन की यह आयत छाया द्वारा सजदा किये जाने को बयान करती है परंतु उसके बाद की आयत में महान ईश्वर इस मामले को समस्त मौजूद वस्तुओं के बारे में एक कार्यक्रम के रूप में बयान करते हुए कहता है” फरिश्ते और जानवरों में से जो कुछ आसमान और ज़मीन में है वह ईश्वर का सजदा करती है और फरिश्ते तो कभी भी अहं व उददंड्ता नहीं करते हैं” सजदे या नतमस्तक होने की अवस्था पूर्ण विन्रमता को दर्शाती है। जब ब्रह्मांड की हर वस्तु यहां तक कि छाया भी ईश्वर का सजदा करती है तो इंसान अहं व उद्दंडता क्यों करता है? इस ब्रह्मांड में जितनी भी वस्तुएं हैं सबके सब महान ईश्वर का गुणगान कर रही हैं। दूसरे शब्दों में ब्रह्मांड की समस्त वस्तुएं ईश्वर के कानून के समक्ष नतमस्तक हैं यानी सारी वस्तुएं महान ईश्वर का गुणगान व सजदा कर रही हैं। पवित्र कुरआन में जो यह कहा गया है कि आसमान और ज़मीन में मौजूद हर वस्तु ईश्वर का सजदा कर रही है उसका स्पष्ट शब्दों में यह संदेश जाता है कि जमीन के अतिरिक्त आसमान में भी जीवित वस्तुएं मौजूद हैं। सूरये नहल की ६५वीं आयत के बाद की आयतों में महान ईश्वर द्वारा प्रदान की गयी नेअमतों व अनुकंपाओं की चर्चा की गयी है।

पहली अनुकंपा यह है कि महान ईश्वर ने आसमान से पानी भेजा है और मुर्दा ज़मीन को उससे जीवित किया। इस बात का वर्णन पवित्र कुरआन की विभिन्न आयतों में किया गया है कि महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने आसमान से वर्षा करके मुर्दा ज़मीन को जीवित किया। सूखी ज़मीन वर्षा और सूरज की धूप पड़ने के बाद जीवित हो जाती है। नाना प्रकार के फूल, पेड़- पौधे और वनस्पतियां अस्तित्व में आ जाती हैं। निः संदेह यह सब महान सृष्टि के चमत्कार हैं। पवित्र कुरआन सूरये नहल की ६६वीं आयत में चौपायों की अनुकंपा की ओर संकेत करते हुए कहता है” इसमें कोई संदेह नहीं है कि चौपायों में भी तुम्हारे लिए निशानियां व सीख है हम उनके पेट के अंदर से, जो पचे हुए भोजन और खून हैं तुम्हें शुद्ध दूध पीलाते हैं जो पीने वालों के लिए अत्यंत प्रिय हैं” महान ईश्वर दूध जैसी शुद्ध चीज़ को जानवर के पेट से निकालता है जबकि उसके अंदर पचे हुए भोजन, खून और न जाने क्या क्या होते हैं। वास्तव में यह बड़े आश्चर्य की बात है कि दूध का स्रोत इतना दूषित व गन्दा और उससे इतना शुद्ध, एवं लाभप्रद दूध।

पवित्र कुरआन सूरये नहल की ६८-६९ वीं आयत में कहता है और तुम्हारे पालनहार ने मधुमक्खी के दिल में यह बात डाल दी कि वह पहाड़ों, वृक्षों और लोगों के घरों में अपना छत्ता बनाये और फिर हर प्रकार के फूलों से खूराक ले और अपने पालनहार के सीधे मार्ग पर चलती रहे। उसके पेट से विभिन्न रंग का एक पेय निकलता है जिसमें लोगों के लिए शिफ़ा व फ़ायेदा है और इसमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो चिंतन- मनन करते हैं” इस आयत में इस बिन्दु की ओर संकेत किया गया है कि मधुमक्खी की ओर महान ईश्वर अपना संदेश भेजता है कि वह पहाड़ों, वृक्षों और पेडों आदि पर अपना घर बनाये। पवित्र कुरआन में वहि अर्थात ईश्वरीय संदेश कई अर्थों में आया है महान ईश्वर कभी अपने पैग़म्बरों पर वहि करता है और कभी वहि का अर्थ यह होता है कि कोई बात ईश्वर मन में डाल देता है जैसे हज़रत मूसा की मां के दिल में डाल दिया था। वहि का अर्थ कभी यह होता है कि महान ईश्वर जानवरों की जानकारी के बिना कोई चीज़ उनके अस्तित्व में रख देता है। जैसे उसने मधुमक्खी के अस्तित्व में रख दिया कि वह पहाड़ों, जंगलों और लोगों के घरों में छत्ता लगाये।

पवित्र कुरआन मधुमक्खी के रहस्यमयी जीवन की ओर संकेत करता है। आज वैज्ञानिक शोधों से यह बात सिद्ध हो गयी है कि मधुमक्खी का सामाजिक जीवन बहुत ही आश्चर्य चकित करने वाला है। सूरये नहल की 69वीं आयत में इस बात का उल्लेख किया गया है कि महान ईश्वर ने मधुमक्खी को यह आदेश दिया है कि वह पहाड़ों, जंगलों आदि में अपना छत्ता लगाये। हममें से अधिकांश ने मधुमक्खी का छत्ता अवश्य देखा होगा। वह अपने छत्ते को बड़ी ही सूक्ष्मता के साथ 6 कोणीय बनाती है और पवित्र कुरआन में इस बात की ओर संकेत भी किया भी गया है कि मधुमक्खी कभी अपना छत्ता पहाड़ों की दुर्गम चट्टानों में और कभी वृक्षों में लगाती है और कभी वह अपने छत्ते को एसी जगह लगाती है जहां इंसान पहुंच सकते हैं। मधुमक्खी के काम करने का तरीक़ा भी बड़ा रोचक है। सुबह के वक्त कुछ मधुमक्खियां अपने छत्ते से निकल कर उन क्षेत्रों की पहचान के लिए जाती हैं जहां फूल होते हैं। जब यह उन क्षेत्रों की पहचान कर लेती हैं जहां फूल होते हैं तो दूसरी मधुमक्खियों को बहुत ही रहस्यमयी तरीक़े से बता देती हैं कि छत्ते से फूल की दूरी कितनी है। उसके बाद मधुमक्खियां विभिन्न फूलों का रस चूसती हैं। उसके बाद इन मधुमक्खियों से जो चीज़ बाहर निकलती है वह लोगों के लिए बहुत ही लाभदायक होती है क्योंकि वह वास्तव में विभिन्न प्रकार के फूलों का रस और उनका निचोड़ होता है। इस मधु के माध्यम से इंसान अपने नाना प्रकार के रोगों का उपचार करते हैं और उसकी अनगिनत विशेषताओं से लाभान्वित होते हैं। मध्यमक्खी द्वारा अपने घर का बहुत ही सूक्ष्म ढंग से 6 कोणीय निर्माण और नाना प्रकार के फूलों का रस चूसना वह भी मधुमक्खी जैसे छोटे से जानवर के माध्यम से निः संदेह महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की महानता का एक चिन्ह है। पवित्र कुरआन के सूरये नहल की आयत नंबर ९० में महान ईश्वर सामाजिक, मानवीय और नैतिक मामले के संबंध में कहता है” ईश्वर लोगों के साथ न्याय और भलाई करने और नातेदारों को उनका अधिकार देने का आदेश देता है तथा अत्याचार व बुराई करने से रोकता है ईश्वर तुम्हें नसीहत करता है ताकि तुम ध्यान दो”

न्याय वह चीज़ है जिस पर पूरा ब्रह्मांड चल रहा है। ज़मीन और आसमान तथा समस्त वस्तुओं के मध्य न्याय स्थापित है और मानवीय समाज भी ब्रह्मांड के इस कानून से अपवाद नहीं है। न्याय बहुत अच्छी चीज़ है परंतु कभी वह अकेले प्रभावी व लाभदायक नहीं होती है। इसलिए महान ईश्वर ने न्याय के साथ भलाई का भी आदेश दिया है। समाज के मामलों को बेहतर बनाने में दोनों की प्रभावी भूमिका होती है। न्याय यह है कि लोगों के अधिकारों को उन्हें दे दिया जाये और भलाई यह है कि वह इंसान का अधिकार नहीं है परंतु उसे प्रदान कर दिया जाये। पवित्र कुरआन के सूरये नहल की आयत नंबर में ९० में महान ईश्वर ने बुराई और अत्याचार करने से मना किया है। न्याय इस्लाम धर्म की एक मूल शिक्षा है। अगर विश्व स्तर पर न्याय को लागू कर दिया जाये तथा विश्व में व्याप्त बुराई एवं अत्याचार से मुकाबला किया जाये तो एसा संसार अस्तित्व में आ जायेगा जिसमें चारों ओर शांति और प्रेम का ही बोल बाला होगा।

एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में कहा हे ईश्वरीय दूत इमारऊल क़ैस नाम का मेरा एक पड़ोसी है और उसने मेरी कुछ ज़मीन पर कब्जा कर रखा है। पैग़म्बरे इस्लाम ने इमरऊल कैस को बुलवाया और उससे इस बारे में पूछा। जवाब में उसने हर चीज़ का इंकार कर दिया। पैगम्बरे इस्लाम ने उससे सौगन्ध खाने के लिए कहा। जब वह सौगन्ध खाने के लिए उठा तो पैग़म्बरे इस्लाम ने उसे अवसर दिया और फरमाया जाओ इस बारे में सोचो और उसके बाद सौगन्ध खाना” इसके बाद पवित्र कुरआन की आयत नाज़िल हुई जिसमें लोगों को झूठी सौगन्ध खाने और उसके परिणामों से मना किया गया है। जब पैग़म्बरे इस्लाम ने इन आयतों की तिलावत की तो इमररूल क़ैस ने कहा यह सही है कि मैंने उसकी ज़मीन के कुछ भाग पर कब्ज़ा कर रखा है परंतु मैं यह नहीं जानता कि कितनी? उसका जितना भी हक़ बनता है वह ले ले और उसमें उसके बराबर और वृद्धि कर दें क्योंकि इतने दिनों तक मैंने उसकी ज़मीन से लाभ उठाया है।

इस अवसर पर सूरये नहल की आयत नंबर ९७ उतरी जिसमें ईमानदार लोगों को सदैव बाक़ी रहने वाले जीवन की शुभ सूचना दी गयी है। सूरये नहल की आयत नंबर ९७ में महान ईश्वर कहता है” जो भी अच्छा अमल अंजाम दे चाहे पुरूष हो या स्त्री इस शर्त के साथ कि वह ईमान रखता हो तो अवश्य हम उसे पवित्र जीवन प्रदान करेंगे और जो कुछ उन लोगों ने अंजाम दिया है हम उससे अच्छा प्रतिदान उन्हें देंगे” ईमान और अच्छे अमल का परिणाम स्वर्ग है जहां पर इंसान हमेशा हमेशा रहेगा कभी भी उसको मौत नहीं आयेगी। वहां हर प्रकार का आराम ही आराम होगा। दूध की नदियां बह रही होंगी। हरे- भरे और सुन्दर बाग होंगे। हर प्रकार के फल होंगे। भुने हुए पक्षी का मांस खाने को मिलेगा। संक्षेप में यह कि स्वर्ग में वह चीज़ इंसान को मिलेंगी जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता। सूरये नहल की आयत नंबर 114 में महान ईश्वर कहता है” अतः जो कुछ तुम्हें ईश्वर ने पवित्र और हलाल आजीविका प्रदान की उसमें से खाओ और उसकी नेअमतों का आभार व्यक्त करो अगर तुम उसकी उपासना करते हो” ईश्वरीय धर्म इस्लाम वैराग्य जीवन पसंद नहीं करता। वह इंसानों का आह्वान करता है कि वे उस रोज़ी को खायें जिसे ईश्वर ने हलाल व वैध किया है और उसकी नेअमतों का आभार व्यक्त करें। इस प्रकार अपवित्र चीजों के खाने से मना किया गया है। इसी प्रकार उन खाद्य पदार्थों को भी खाने से मना किया गया है जिन्हें अवैध ढंग से तैयार किया गया हो चाहे खाद्य पदार्थ पवित्र ही क्यों न हों।

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