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पुराने मुस्लिम कारोबारियों की रिवायत थी के वो…

जान अब्दुल्लाह
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पुराने मुस्लिम कारोबारियों की रिवायत थी के वो सुबह दुकान खोलने के साथ एक छोटी सी कुर्सी दुकान के बाहर रखते थे। जूं ही पहला ग्राहक आता दुकानदार कुर्सी उस जगह से उठाता और दुकान के अंदर रख देता था।


लेकिन जब दूसरा ग्राहक आता दुकानदार अपनी दुकान से बाहर निकल कर बाज़ार पर एक नज़र डालता जिस दुकान के बाहर कुर्सी पड़ी होती वो ग्राहक से कहता की “तुम्हारी ज़रूरत की चीज़ उस दुकान से मिलेगी,, मैं सुबह का आग़ाज़ (बोनी) कर चुका हूँ।

कुर्सी का दुकान के बाहर रखना इस बात की निशानी होती थी के अभी तक इस दुकानदार ने आग़ाज़ नही किया है।

ये मुस्लिम ताजीरों का अख़लाक़ और मोहब्बत थी, नतीजतन इन पर बरकतों का नुज़ूल होता था।


फिर सीन में एंट्री होती है, इन्ही में से एक व्यवसायी के पोते की। बरकतों में पला, मोहब्बतों में खाया, खुजाया यह middle class युवा कुछ ज़्यादा ही डेढ़ शाना था, इन्सान के पास जो होत्ता है वह उसकी कदर कब करता है, hence इसने भी कहा “उफ्फ यह उसूल यह आदर्श, साला अपनी दुकान का दूसरा ग्राहक, अब्दुल ग़फ़ूर चाचा की दुकान पर क्यों भेजूं, मार्केटिंग मैं करूं, खाये उनका पोता लल्लन, खुजाये उनका बेटा

जुम्मन, नही यह नही होगा, मैं बोनी बट्टे के बाद कुर्सी नही हटाम्मा”


कुछ दिन तक वह ज़्यादा कमाता रहा फिर लोगो ने नोटिस किया, बाजार के बड़े बूढ़े आये और उसे समझाया कि यह परंपरा, आदर्श और उसूल बड़ो की विरासत है, इसी के कारण यह मार्केट इतनी पॉपुलर है कि 1000 साल बाद इसकी पॉपुलेरिटी का किस्सा चेहरा किताब में लिखा जाएगा
परंतु अपने अभिमान में ओत पोत, खुद को वित्तीय मामलों का जानकार, विज्ञान का मित्र, अर्थव्यवस्था का कीर्तिमान और किसी मैकेनिकल अभियंता से ज्यादा गुणवान समझने वाले इस पोते ने मना कर दिया, उसने कहा सबका ठेका मैने नही लिया, मेरा ग्राहक मैने बुलाया,,,कुर्सी नही हटेगी।

सब लौट गए, फिर सबने भी कुर्सियां नही हटाई, सबके पोतों में गलाकाट प्रतिस्पर्धा पैदा हो गयी, मार्किट में अब वो बात नही रही, अब एक दूसरे की टोह में लगा जाने लगा, कुर्सी के कारण मशहूर हुई मार्किट का नाम फीका पड़ता गया।


बदलाव सृष्टि का नियम है, यह तो होकर रहेगा लेकिन बदलाव हमेशा प्रोडक्टिविटी की तरफ होना चाहिए। निजी फायदे में यदि किसी मार्किट , समाज की, राज्य की एकता टूटती है तो निजी फायदों को छोड़ देना चाहिए। ऐसी स्थिति में शांत रहना चाहिए, दूसरे की बातों का गलत मतलब नही लेना चाहिए, त्याग की भावना रखनी चाहिए, किनात करनी चाहिए, यह मानना चाहिए कि मौके संसाधन और पूर्ति भरपूर है, दिमाह को पूर्वाग्रह से साफ करना चाहिए, ध्यान भटकने से बचना चाहिए, अपनी राय पर दस लोगो की सम्मिलित राय को बढ़ावा देना चाहिए

किसानों, बिजली हड़ताल कर रहे कर्मचारियों, हड़ताल पर गए डॉ व अन्य सरकारी मुलाज़िमों से अनुरोध है, काम पर वापस आये, पैसा क्या है, आज है कल नही लेकिन आपका नाम 1000 साल बाद “भासूड़ि किताब” में स्वर्ण अक्षर से लिखा जाएगा। दिमाग से निकाल दे कि ऐसा हो जाएगा वैसा हो जाएगा, सरकार पर यकीन रखें, उतना यकीन जितना अपने 2014 से पहले “कोई आयेगा किसी को बाँस बिरयानी पिलायेगा” कहकर किया था, कांग्रेस की बातों में मत आओ, खुद आकलन करो, नोटबन्दी की सफलता, gst से अमीरी, लोकडाउन से कोरोना समाप्त, सब आपके सामने है।

डॉ भसूड़ि-बर्ग

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