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बाबरी मस्जिद विध्वंस ‘एक सोचा-समझा कृत्य’ था और मैं आज भी इस पर भरोसा करता हूं : जस्टिस एम एस लिब्राहन

बाबरी मस्जिद विध्वंस: सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई अदालत की राय बिल्कुल अलग कैसे हो गई?

बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

लेकिन बाबरी मस्जिद गिराए जाने से सबंधित लिब्राहन आयोग ने साल 2009 में जो अपनी रिपोर्ट तत्कालीन सरकार को सौंपी थी, उस रिपोर्ट में बाबरी मस्जिद विध्वंस को एक ‘एक सोचा-समझा कृत्य’ बताया गया था.

6 दिसंबर 1992 को भीड़ ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था. इसके 10 दिन बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने इस घटना की जाँच के लिए एक सदस्यीय आयोग गठित किया था.

उस समय पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में जज रहे जस्टिस मनमोहन सिंह लिब्रहान को 6 दिसंबर को हुए घटनाक्रम की जाँच पूरी करके जल्द से जल्द रिपोर्ट पेश करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

सरकारी की ओर से जारी नोटिफ़िकेशन में कहा गया था कि आयोग तीन महीनों के भीतर रिपोर्ट पेश करेगा. लेकिन लिब्रहान आयोग को जाँच पूरी करने में 17 साल लग गए. सरकार को 48 बार आयोग के कार्यकाल को बढ़ाना पड़ा.

अपनी रिपोर्ट में लिब्राहन आयोग ने साफ़ तौर पर बाबरी मस्जिद को गिराए जाने को ‘एक सोची समझी साज़िश’ बताया था.

अपनी रिपोर्ट में उन्होंने राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए धर्म का इस्तेमाल रोकने के लिए सज़ा देने के प्रावधान की सिफ़ारिश की थी. हालांकि उनकी सिफ़ारिशों पर कभी अमल नहीं हो सका.

बाबरी मस्जिद पर विशेष आदलत के फ़ैसले पर जस्टिस एम एस लिब्राहन ने बीबीसी से बातचीत में अपनी राय रखी है.

सवाल- आपने अपनी जाँच में अभियुक्तों को ज़िम्मेदार पाया था लेकिन अब इस तरह का फ़ैसला आया है तो क्या आपको दुख होता है?

मैं इस बारे में दुखी महसूस क्यों करूं. मुझे कोई दुख या सुख नहीं है. मैंने एक जज के तौर पर अपनी ड्यूटी की और छुट्टी.

सवाल – सीबीआई सबूत नहीं जुटा पाई, इसे लेकर आपको क्या लगता है?

मैं सीबीआई को नहीं कहूंगा कि वो सबूत नहीं जुटा पाई. उन्होंने कोर्ट में क्या पेश किया और क्या पेश नहीं किया मुझे तो कुछ मालूम नहीं. कोर्ट ने उनकी बातों पर मेरे विचारों से अलग कैसे भरोसा किया, यह भी नहीं मालूम.

सवाल- आपने अपनी जाँच में पाया था कि यह योजनाबद्ध तरीक़े से हुआ था लेकिन आदेश में इसे योजनाबद्ध तरीक़े से नहीं बताया गया है. आपका इस पर क्या कहना है?

मुझे अपनी जाँच में मालूम चला था कि यह एक षड्यंत्र था और मैं आज भी इस पर भरोसा करता हूं.

सवाल- इतना सबूत मौजूद था जिससे लगे कि यह एक षड्यंत्र था?

निश्चित तौर पर, यह सभी की आम सहमति से ही हुआ था. अगर आम सहमति से किया गया काम षड्यंत्र नहीं होता तो मुझे नहीं मालूम फिर षडयंत्र क्या होता है.

मैं उन सबूतों पर विश्वास करता हूं जो मेरे सामने पेश किए गए.

सवाल- सीबीआई कोर्ट इसे षड्यंत्र नहीं बताती है तो फिर आपकी जाँच को तो पूरी तरह से ख़ारिज कर दिया गया?

यह फ़ैसला मेरी जाँच के उलट है, बस इतना ही है और कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह अलग विचार रख सकता है. कोर्ट ने अलग विचार रखे, मैं क्या कर सकता हूं

क्या इस फ़ैसले में मेरी रिपोर्ट का रेफ़रेंस लिया गया? कोर्ट अलग विचार रख सकती है. उनकी शक्तियों को लेकर कोई शक नहीं है.

सवाल- तो फिर आपको क्या लगता है कि सीबीआई की जाँच में कहां कमी रह गई है?

मैं कुछ कह नहीं सकता कि क्या कमी रह गई होगी.

वो सभी मेरे सामने पेश हुए थे और मैंने जो पाया था वो बता दिया था.

मैं अभी भी मानता हूं कि मेरी जाँच बिलकुल सही थी, वह ईमानदारी और बिना किसी भय के की गई थी.

मैं जज या कोर्ट पर कोई कमेंट नहीं करना चाहता और ना ही जाँच पर कोई सवाल खड़े करना चाहता हूं. मैं यक़ीन करता हूं कि सभी ने अपना काम ईमानदारी से किया होगा.

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सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता

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