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भारत में बौद्ध धर्म का उत्थान और पतन!

Shekhar Verma
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भारत में बौद्ध धर्म का उत्थान और पतन
-राहुल सांकृत्यायन।
बौद्ध-धर्म भारत में उत्पन्न हुआ। इसके संस्थापक गौतम बुद्ध ने कोसी-कुरुक्षेत्र और हिमाचल-विंध्याचल के भीतर ही विचरते हुए 45 वर्ष तक प्रचार किया । इस धर्म के अनुयायी चिरकाल तक, महान् सम्राटों से लेकर साधारण जन तक, बहुत अधिकता से सारे भारत में फैले हुये थे। इसके भिक्षुओं के मठों और विहारों से देश का शायद ही कोई भाग रिक्त रहा हो। इसके विचारक और दार्शनिक हजारों वर्षां तक अपने विचारों से भारत के विचार को प्रभावित करते रहे। इसके कला-विशारदों ने भारतीय कला पर अमिट छाप लगायी । इसके वास्तु-शास्त्री और प्रस्तर-शिल्पी हजारों वर्षों तक सजीव पर्वतवक्षों को मोम की तरह काटकर, अजंता, एलौरा, काले, नासिक जैसे गुहा-विहारों को बनाते रहे। इसके गंभीर मंतव्यों को अपनाने के लिये यवन और चीन जैसी समुन्नत जातियाँ लालयित रहती रहीं। इसके दार्शनिक और सदाचार के नियमों को आरम्भ से आजतक सभी विद्वान् बड़े आदर की दृष्टि से देखते रहे। इसके अनुयायियों की संख्या के बराबर आज भी किसी दूसरे धर्म की संख्या नहीं है।
ऐसा प्रतापी बौद्ध धर्म अपनी मातृभूमि भारत से कैसे लुप्त हो गया ? यह बड़ा ही महत्वपूर्ण तथा आश्चर्यकर प्रश्न है। इसी प्रश्नपर मैं यहाँ संक्षिप्त रूप से विचार करूंगा। भारतसे बौद्ध धर्म का लोप तेरहवीं चौदहवीं शताब्दियों में हुआ। उस समय की स्थिति जानने के लिये कुछ प्राचीन इतिहास जानना जरूरी है।

गौतम बुद्ध का निर्वाण ई०पूर्व 483 में हुआ था। उन्होंने अपने सारे उपदेश मौखिक दिये थे; तो भी शिष्य उनके जीवन काल में ही कंठस्थ कर लिया करते थे। यह उपदेश दो प्रकार के थे, एक साधारण-धर्म और दर्शन के विषय में, और दूसरे भिक्षु-भिक्षुणियो के नियम । पहले को पाली में “धम्म” (धर्म ) कहा गया है, और दूसरे को “विनय’। बुद्ध के निर्वाण (वैशाख-पूर्णिमा ) के बाद उनके प्रधान शिष्यों ने ( आगे मतभेद न हो जाय, इस. लिये ) उसी वर्ष में राजगृह ( जिला पटना ) की सप्तपर्णी गुहा में एकत्रित हो, “धर्म” और “विनय’ का संगायन किया । इसीको प्रथम-संगीति कहा जाता है। इसमें महाकाश्यप भिक्षु संघ के प्रधान (संघ-स्थविर ) की हैसियत से, धर्म के विषय में बुद्ध के चिर-अनुचर ‘आनन्द’ से और विनय के विषय में बुद्ध-प्रशंसित ‘उपालि से प्रश्न पूछते थे। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य आदि सुकर्मो को पालि में ‘शील’ कहते हैं, और स्कंध ( रूप आदि), आयतन ( रूपचक्षु-चक्षुर्विज्ञान आदि) धातु ( पृथिवी, जल आदि) आदि के सूक्ष्म दार्शनिक विचार को प्रज्ञा, दृष्टि या दर्शन कहते हैं। बुद्ध के उपदेशों में शील और प्रज्ञा, दोनों पर पूरा जोर दिया गया है। “धर्म”के लिये पालि में दूसरा शब्द ‘सुत्त’ ( सूक्त, सूत्र ) या “सुत्तन्त” भी आया है। प्रथम संगीति के स्थविर भिक्षुओंने “धर्म” और “विनय का इस प्रकार संग्रह किया। पीछे भिन्न-भिन्न भिक्षुओं ने उनको पृथक पृथक कंठस्थ कर, अध्ययन-अध्यापन का भार अपने ऊपर लिया। उनमें जिन्होंने “धम्म” या “सुत्त”की रक्षा का भार लिया, वह “धम्म-धर”, “सुत्त-धर” या “सुत्तंतिक” ( सौत्रांतिक ) कहलाये।

जिन्होंने “विनय’ की रक्षा का भार लिया, वह “विनय-धर” कहलाये। इनके अतिरिक्त सूत्रों में दर्शन संबंधी अंश कहीं कहीं पर ही संक्षेप रूप में थे, जिन्हें “मालिका(मात्रिका) कहते थे। इन मातिकाओं के रक्षक “मातिकाधर” कहलाये। पीछे मातिकाओं को समझाने के लिये जब उनका विस्तार किया गया, तब इसीं का नाम “अभिधम्म” (अधिधर्म-धर्म में से ) हुआ, और इसके रक्षक “आभिधम्मिक’ (आभिधर्मिक ) हुये ।
प्रथम-संगीतिके सौ वर्ष बाद ( ई. प. 383 ) वैशाली के भिक्षुओं ने विनय के कुछ नियमों की अवहेलना शुरू की । इस पर विवाद आरम्भ हुआ, और अंत में फिर भिक्षु-संघ ने एकत्र हो उन विवाद-ग्रस्त विषयों पर अपनी राय दी, एवं “धर्म” और “विनय’ का संगायन किया । इसी का नाम द्वितीय संगीति हुआ। कितने ही भिक्षु इस संगीति से सहमत न हुए और उन्होंने अपने महासंघ का कौशाम्बी में पृथक् सम्मेलन किया, तथा अपने मतानुसार “धर्म” और “विनय’का संग्रह किया। संघ के स्थविरों (वृद्ध भिक्षुओं) का अनुगमन करनेवाला होने से पहला समुदाय (निकाय ) आर्य स्थविर या स्थविरवाद के नामसे प्रसिद्ध हुआ, और दूसरा महासांघिक । इन्हीं दो समुदायों से अगले सवा सौ वर्षों में, स्थविरवाद से वजिपुरक महीशासक, धर्मगुप्तिक, सौग्रांतिक, सर्गम्तिवाद, काश्यपीय, संक्रांतिक, सम्मितीय, पाण्णागरिक, भद्यानिक, धर्मोत्तरीय, और महासांघिक से – गोकुलिक, एकव्यवहारिक, प्रज्ञप्तिवाद (लोकोत्तरवाद ), बाहुलिक, चैत्यवाद; यह 18 निकाय हुये।

इनका मतभेद विनय और अभिधर्म की बातों कों लेकर था। कोई कोई निकाय आर्यस्थविरों की तरह बुद्धको मनुष्य न मानकर उन्हें लोकोत्तर मानने लगे। वह बुद्ध में अद्भुत और दिव्य-शक्तियों का होना मानते थे। कोई-कोई बुद्ध के जन्म और निर्वाण को दिखावा मात्र समझते थे। इन्हीं भिन्न-भिन्न मान्यताओं के अनुसार उनके सूत्र और विनय में भी फर्क पड़ने लगा । बुद्ध को अमानुषिक लीलाओं के समर्थन में नये-नये सूत्रों की रचना हुई। बुद्ध के निर्वाण के प्रायः सवा दो सौ वर्ष बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध-धर्म ग्रहण किया। उनके गुरु मोग्गलिपुत्त तिस्स (मौदगलि-पुत्र तिष्य ) उस समय आर्यस्थविरों के संघ-स्थविर थे। उन्होंने मतभेद दर करने के लिये पटना में अशोक के बनवाये “अशोकाराम” विहार में भिक्षु-संघके द्वारा चुने गये हजार भिक्षुओं का सम्मेलन किया, जिन्होंने मिलकर सभी विवाद-ग्रस्त विषयों का निर्णय तथा धर्म और विनय का संगायन किया। यही सम्मेलन तृतीय संगीति के नामसे प्रसिद्ध हुआ। इसी समय आर्यस्थविरों से निकाले सर्वास्तिवाद निकायों ने नालन्दा में अपनो पृथक् संगीति की । नालन्दा, जो समय-समय पर बुद्ध का निवास स्थान होने से पुनीत स्थानों में गिनी जाती थी, इसी समय से सर्वास्तिवादियों का मुख्य-स्थान बन गई ।

तृतीय सङ्गीति समाप्त कर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने सम्राट अशोक की सहायता से भिन्न भिन्न देशों में धर्म-प्रचारक भेजे । यह पहला अवसर था, जब एक भारतीय धर्म संगठित-रूप मे भारत की सीमा से बाहर प्रचारित होने लगा । यह प्रचारक जहाँ पश्चिम में यवन-राजाजों के राज्यों ग्रीस, मिस्र, सिरिया आदि देशों में गये, वहाँ उत्तर में मध्य एशिया तथा दक्षिण में ताम्रपर्णी [लंका ] और सुवर्ण-भूमि [ बर्मा ] में भी पहुँचे । लंका में अशोक के पुत्र तथा मोग्गलिपुत्त तिस्स के शिष्य ‘भिक्षु महेन्द्र’ और उनकी सहोदरा ‘संघमित्रा’ गयी। लंका के राजा ‘देवानंपिय विस्स’ बौद्ध-धर्म में दीक्षित हूये। कुछ ही दिनों में वहाँ की सारी जनता बौद्ध हो गयी । आर्य-स्थविरवाद का तभी से ही यहाँ प्रचार रहा। बीच में बारहवीं-तेरहवीं शताब्दियों में जब बर्मा और स्याम में महायान बौद्ध-धर्म विकृत तथा जर्जरित हो, हास प्राप्त होने लगा, तब आर्यस्थविरवाद वहाँ भी पहुंच गया। लंका में ही ईसा की प्रथम शताब्दी में सूत्र, विनय और अभिधर्म-तीनों पिटक (त्रिपिटक ), जो अबतक कंठस्थ चले आते थे-लेखबद्ध किये गये; और यही आजकल का पालि त्रिपिटक है।

मौर्य-सम्राट बौद्ध-धर्म पर अधिक भनुरक्त थे, इसलिये उनके समय में अनेक पवित्र स्थानों में राजाओं और धनिकों ने बड़े-बड़े स्तूप और संघाराम (मठ) बनवाये, जिनमें भिक्षु सुख-पूर्वक रहकर धर्म-प्रचार किया करते थे। ईसा-पूर्व दूसरी शताब्दी में, मौर्यो के सेनापति पुष्यमित्र ने अन्तिम मौर्य-सम्राट को मारकर अपने शुंगवंश का राज्य स्थापित किया । यह नया राजवंश राजनीतिक उपयोगिता के विचार से ब्राह्मण-धर्म का पका अनुयायी और अ-ब्राह्मण धर्मद्वेषी था।

शताब्दियों से परित्यक्त पशु-बलिमय अश्वमेध आदि यज्ञ, महाभाष्यकार पतञ्जलि के पौरोहित्य में फिर से होने लगे । ब्राह्मणों के माहात्म्य से भरे मनुस्मृति जैसे ग्रन्थों की रचनाका सूत्रपात हुआ। इसी समय महाभारत का प्रथम संस्करण हुआ तथा मृत संस्कृत भाषा के पुनरुद्धार की चेष्ठा की गयी । परिस्थिति के अनुकुल न होने से धरे-धीरे बौद्ध लोग बौद्धधर्म के केन्द्रों को मगध और कोसल से दूसरे देशों में हटाने पर मजबूर होने लगे । आर्य-स्थविरवाद मगध से हटकर विदिशा के समीप चैत्य-पर्वत ( वर्तमान ‘साँची’) पर चला गया; सर्वास्तिवाद मथुरा के उरुमुण्ड-पर्वत (गोवर्धन ) चला गया। इसी तरह और निकायों ने भी अपने-अपने केन्द्रों को अन्यत्र हटा दिया ।

स्थविरवाद सबसे पुराना निकाय है, और इसने पुरानी बातों की बड़ी कड़ाई से सुरक्षित रखा । दूसरे निकायों ने देश, काल और व्यक्ति आदि के अनुसार अनेक परिवर्तन किये । अबतक त्रिपिटक मगध की भाषा में ही था, जो कि पूर्वी उत्तरप्रदेश तथा बिहार की साधारण भाषा थी । सर्वास्तिवादियों ने मथुरा पहुँचकर अपने त्रिपिटक को ब्राह्मणों की प्रशंसित संस्कृत-भाषा में कर दिया। इसी तरह महासांधिक, लोकोत्तरवाद आदि कितने ही और निकायों ने भी अपने पिटकों को संस्कृत में कर दिया । यह संस्कृत पाणिनीय संस्कृत न थी; आज कल इसे गाथा-संस्कृत कहते हैं ।

मौर्य-सम्राज्य के विनष्ट हो जानेपर पश्चिमी भारत पर यवन राजा ‘मिनान्दर’ ने कब्जा कर लिया । मिनान्दर ने अपनी राजधानी साकला (वर्तमान ‘स्यालकोट) बनायी। उसके तथा उसके वंशजों के क्षत्रप मथुरा और उजैन में रहकर शासन करने लगे। यवन-राजा अधिकांश बौद्ध थे; इसलिये उनके उजैन के क्षत्रप सांची के स्थविरवादियों पर तथा मथुरा के क्षत्रप सर्वास्तिवादियों पर बहुत स्नेह और श्रद्धा रखते थे। मथुरा उस समय एक क्षत्रप की राजधानी ही न थी, बल्कि पूर्व और दक्षिण से तक्षशिला के वणिक पथपर व्यापार का एक सुसमृद्ध प्रधान केन्द्र थी; इसलिये सर्वास्तिवाद के प्रचार में बड़ी सहायक हुई । मगध के सर्वास्तिवाद से इसमें कुछ अन्तर हो चुका था, इसलिये यहाँ का सर्वास्तिवाद आर्य-सर्वास्तिवाद के नामसे प्रसिद्ध हुआ।

यवनोंको परास्तकर यूचियों (शकों) ने पश्रिमी भारत पर कब्जा किया। इन्हीं की शाखा कुषाण थी, जिसमें प्रतापी सम्राट कनिष्क हुए । कनिष्क की राजधानी पुरुषपुर (पेशाघर ) थी। उस समय सर्वास्तिवाद गंधार में पहुँच चुका था। कनिष्क स्वयं सर्वास्तिवादियों का अनुयायी था । इसीके समय में :महाकवि अश्वघोष और आचार्य वसुमित्र आदि पैदा हुए । उस समय गान्धार के सर्वास्तिवाद में-जो मूल सर्वास्तिवाद कहा जाता था-कश्मीर और गान्धार के आचार्यों का मतभेद हो गया था । देवपुत्र कनिष्क की सहायता से वसुमित्र, अश्वघोष आदि आचार्यों ने सर्वास्तिवादी बौद्ध भिक्षुओं की एक बड़ी सभा बुलायी । इस सभा में आपस के मतभेदों को दूर करने के लिये उन्होंने अपने त्रिपिटक पर ‘विभाषा’ नाम की टीकायें लिखीं। विभाषा के अनुयायी होने से मूल-सर्वास्तिवादियों का दूसरा नाम ‘वैभाषिक’-पड़ा। बौद्ध धर्म में दुःखों से मुक्ति यानी निर्वाणके तीन रास्ते माने गये हैं (1) जो सिर्फ स्वयं दुःखविमुक्त होना चाहता है, वह आर्य अष्टांगिक मार्गपर आरूढ़ हो जीवन्मुक्त हो अर्हत् कहा जाता । (2) जो उससे कुछ अधिक परिश्रम के लिये तैयार होता है, वह जीवन्मुक्त हो प्रत्येक-बुद्ध कहा जाता है । (3)जो असंख्य जीवों का मार्गदर्शक बननेके लिये अपनी मुक्ति की फिक्र न कर, बहुत परिश्रम और बहुत समय बाद उस मार्ग से स्वयं प्राप्य निर्वाण को प्राप्त होता, उसे ‘बुद्ध’ कहा जाता है । ये तीनों ही रास्ते क्रमशः अर्हत् (श्रावक ) यान, प्रत्येक-बुद्ध-यान और बुद्ध यान कहे जाते हैं। कुछ आचार्यों ने बाकी दो यानों की अपेक्षा बुद्ध-यान पर बड़ा जोर दिया और इसे महायान कहा । इस तरह पीछे कुछ लोग दूसरे यानों को स्वार्थपूर्ण कह, केवल बुद्धयान या महायान की प्रशंसा करने लगे । यह स्मरण रहे कि, अठारहों निकाय तीनों यानों को मानते थे। उनका कहना था, किसी यान का चुनना मुमुक्षु की अपनी स्वाभाविक रुचि पर निर्भर है।

ईसा की प्रथम शताब्दी में, जिस समय वैभाषिक-संप्रदाय उत्तर में बढ़ता जा रहा था; उसी समय दक्षिणके विदर्भ [ बरार ] देश में आचार्य नागार्जुन पैदा हुए। उन्होंने माध्यमिक या शून्यवाद दर्शनपर ग्रन्थ लिखे । कालान्तरमें महायान और माध्यमिक दर्शन के योग से शून्यवादी महायान संप्रदाय चला, जिसके त्रिपिटक की अवश्यकता समय-समय पर बने हुए अष्टसाहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता आदि ग्रन्थों ने पूरी की। चौथी शताब्दी में पेशावर के आचार्य वसुबन्धु ने वैभाषिकों से कुछ मतभेद करके “अभिधर्मकोश” ग्रन्थ लिखा और उनके बड़े भाई ‘असंग’ विज्ञानवाद या योगाचार-संप्रदाय के प्रवर्तक हुए । इस प्रकार चौथी शताब्दी तक बौद्धों के वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार और माध्यमिक, चार दार्शनिक संप्रदाय बन चुके थे । इनमें पहले दोनों को माननेवाले तीनों यानों को मानते थे, इसलिये उन्हें महायानियों ने हीनयान का अनुयायी कहा; और बाकी दो सिर्फ बुद्ध-यान ही को मानते थे; इसलिये उन्होंने अपने को महायान का अनुयायी कहा।

महायानी बुद्धयान के एकान्त-भक्त थे, इतना ही नहीं, बल्कि अपने उत्साह में वे बाकी दो यानों को बुरा-भला कहने से बाज न आते थे । बुद्ध के अलौकिक चरित्र उन्हें बहुत उपयुक्त मालूम हुए, इसलिये उन्होंने महासांघिकों और लोकोत्तरवादियों की बहुत-सी बातें ले ली । रत्नकुट और वैपुल्य नामवाले बहुत से सूत्रों की भी उन्होंने रचना की । बुद्धयान पर अच्छी प्रकार आरूढ़, बुद्धत्त्वव के अधिकारी, प्राणी को बोधिसत्व कहा जाता है । महायान के सूत्रों में हर एक को बोधिसत्व के मार्ग पर ही चलने के लिए जोर दिया गया है- हर एक को अपनी मुक्ति की पर्वाह छोड़कर संसार के सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये । बोधिसत्वों की महत्ता दरसाने के लिए जहाँ अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, आकाशगर्भ आदि सैकड़ों बोधिसत्त्वों की कल्पना की गयी, वहाँ सारिपुत्र, मोग्गलान आदि अर्हत् (मुक्त) शिष्यों को अ-मुक्त और बोधिसत्त्व बना दिया गया । सारांश यह कि, जिस प्राचीन सूत्र आदि परम्परा को अठारहों निकाय मानते आ रहे थे, महायानियों ने उन सभी को बोधिसत्त्व और बुद्ध बनने की धुन में एकदम उलटने में कोई कसर न रखी।

कनिष्क के समय अर्थात् बुद्ध से चार सदी बाद पहले-पहल बुद्ध की प्रतिमा (मूर्ति) बनायी गयी । ‘महायान के प्रचार के साथ जहाँ बुद्ध-प्रतिमाओं की पूजा-अर्चा बड़े ठाट-बाट से होने लगी, वहाँ सैकड़ों बोधिसत्त्वों की भी प्रतिमाएँ बनने लगीं। इन बोधिसत्त्वों को उन्होंने ब्राह्मणों के देवी-देवताओं का काम सौंपा। उन्होंने तारा, प्रज्ञापारमिता आदि अनेक देवियोंकी भी कल्पना की। जगह-जगह इन देवियों और बोधिसत्त्वों के लिए बड़े-बड़े विशाल मंदिर बन गये । उनके बहुत से स्तोत्र आदि भी बनने लगे। इस बाद में इन लोगों ने यह ख्याल न किया कि, हमारे इस काम से किसी प्राचीन परम्परा या भिक्षु-नियम का उल्लंघन होता है। जब किसी ने दलील पेश की, तो कह दिया-विनय-नियम तुच्छ स्वार्थ के पीछे मरने वाले हीनयानियों के लिए हैं; सारी दुनिया को मुक्ति के लिए मरने-जीने वाले बोधिसत्त्व को इसकी वैसी पाबन्दी नहीं हो सकती। उन्होंने हीनयान के सूत्रों से अधिक महात्म्यवाले अपने सूत्र बनाये । सैकड़ों पृष्ठों के सूत्रों का पाठ जल्दी नहीं हो सकता था, इसलिए उन्होंने हर एक सूत्र की दो-तीन पंक्तियों में छोटी-छोटी धारणी वैसे ही बनायी, जैसे भागवत का चतुःश्लोकी भागवत; गीता की सप्तश्लोकी गीता। इन्हीं धारणियों को और संक्षिप्त करके मन्त्रों की सृष्टि हुई। इस प्रकार धारणियों, बोधिसत्त्वों, उनकी अनेक दिव्य-शक्तियों तथा प्राचीन-परम्परा और पिटकों की निःसंकोच की जाती उलट-पलट से उत्साहित हो, गुप्तसाम्राज्य के आरम्भिक काल से हर्षवर्धन के समय तक मंजुश्री मूलकल्प, गुह्यसमाज और चक्रसंवर आदि कितने ही तन्त्रों की सृष्टि की गई । पुराने निकायों ने अपेक्षा-कृत सरलता से अपनी मुक्ति के लिए अर्हद्यान और प्रत्येक बुद्धयान का रास्ता खुला रखा था । महायान ने सबके लिए सुदुश्चर युद्ध-यान को ही एकमात्र रास्ता रखा । आगे चलकर इस कठीनाई को दूर करने के लिए ही उन्होंने धारणियों, बोधिसत्त्वों की पूजाओं का आविष्कार किया। इस प्रकार जब सहज दिशाओं का मार्ग खुलने लगा, तब उसके आविष्कारकों की भी संख्या बढ़ने लगी। मंजुश्री मूलकल्प ने तन्त्रों के लिए रास्ता खोल दिया । गुह्य-समाज ने अपने भैरवीचक्र के शराब, स्त्रीसंभोग तथा मन्त्रोच्चारण से उसे और भी आसान कर दिया । यह मत महायान के भीतर ही से उत्पन्न हुआ, किन्तु पहले इसका प्रचार भीतर-ही-भीतर होता रहा, भैरवी-चक्र की सभी कार्रवाइयाँ गुप्त रखी जाती थी । प्रवेशाकांक्षी को कितने ही समय तक उम्मेदवारी करनी पड़ती थी। फिर अनेक अभिषेकों भार परीक्षाओं के बाद वह समाज में मिलाया जाता था। यह मंत्रयान (तंत्रयान, वज्रयान) संप्रदाय इस प्रकार सातवीं शताब्दी तक गुप्त रीति से चलता रहा। इसके अनुयायी बाहर से अपनेको महायानी ही कहते थे। महायानी भी अपना पृथक् विनय-पिटक नहीं बना सके थे, इसीलिए उनके भिक्षु लोग सर्वास्तिवाद आदि निकायों में दीक्षा लेते थे। आठवीं शताब्दी में भी, जब कि नालन्दा महायान का गढ़ थी, वहाँ के भिक्षु सर्वास्तिवाद-विनय के अनुयायी थे, और वहाँ के भिक्षुओं को विनय में सर्वास्तिवाद की, बोधिसत्वचर्या में महायान की और भैरवीचक्र में वज्रयान की दीक्षा लेनी पड़ती थी।

आठवीं शताब्दी में एक प्रकार से भारत के सभी बौद्ध-संप्रदाय वज्रयान गर्भित महायान के अनुयायी हो गये थे। बुद्ध की सीधी-सादी शिक्षाओं से उनका विश्वास उठ चुका था, और वे मनगढन्त हजारों लोकोत्तर कथाओं पर विश्वास करते थे। बाहर से भिक्षुके कपड़े पहनने पर भी भीतर से वे गुह्यसमाजी थे। बड़े-बड़े विद्वान् और प्रतिभाशाली कवि आधे पागल हो, चौरासी सिद्धों में दाखिल हो, संध्या-भाषा में निर्गुण गान करते थे। आठवीं शताब्दी में उड़ीसा के राजा इन्द्रभूति और उसके गुरु सिद्ध अनंगवज्र तथा दूसरे पंडित-सिद्ध स्त्रियों को ही मुक्तिदात्री ‘प्रज्ञा’, पुरुषों को ही मुक्तिका ‘उपाय’ और शराब को ही ‘अमृत’ सिद्ध करने में अपनी पण्डिताई और सिद्धाई खर्च कर रहे थे। आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक का बौद्धधर्म वस्तुतः वज्रयान या भैरवीचक्र का धर्म था । महायान ने ही धारणियों और पूजाओं से निर्वाण को सुगम कर दिया था, वज्रयान ने तो उसे एकदम सहज कर दिया, इसीलिए आगे चलकर वज्रयान ‘सहजयान’ भी कहा जाने लगा।

वज्रयान के विद्वान् प्रतिभाशाली कवि चौरासी सिद्ध’ विलक्षण प्रकार से रहा करते थे। कोई पनहीं बनाया करता था; इसलिए उसे पनहीपा कहते थे। कोई कम्बल ओढ़े रहता था इसलिए उसे कमरीपा कहते थे । कोई डमरू रखने से डमरूपा कहा जाता था । कोई ओखल रखने से ओखरीपा। ये लोग शराब में मस्त, खोपड़ी का प्याला लिए श्मशान या विकट जंगलों में रहा करते थे। जन साधारण को जितना ही ये लोग फटकारते थे, उतना ही लोग इनके पीछे दौड़ते थे। लोग बोधिसत्त्व प्रतिमाओं तथा दूसरे देवताओं की भाँति इन सिद्धों को अद्भुत चमत्कारों और दिव्य शक्तियों के धनी समझते थे। ये लोग खुल्लमखुल्ला स्त्रियों और शराब का उपभोग करते थे। राजा अपनी कन्याओं तक को इन्हें प्रदान करते थे। यह लोग त्राटक या हेप्नोटिज्म की कुछ प्रक्रियाओं से वाकिफ थे। इसी के बल पर अपने भोले-भाले अनुयायियों को कभी-कभी कोई चमत्कार दिखा देते थे, कभी-कभी हाथ की सफाई तथा श्लेष-युक्त अस्पष्ट वाक्यों से जनता पर अपनी धाक जमाते थे। इन पाँच शताब्दियों में धीरे-धीरे एक तरह से सारी भारतीय जनता इनके चक्कर में पड़कर काम-व्यसनी, मद्यप और मूढ-विश्वासी बन गयी । राजा लोग जहाँ राज-रक्षा के लिए पल्टने रखते थे, वहाँ उसके लिए किसी सिद्धाचार्य तथा उसके सैकड़ों तान्त्रिक अनुयायियों की भी एक बहु-व्यय साध्य पल्टन रखा करते थे । देवमन्दिरों में बराबर ही बलिपूजा चढ़ती रहती थी। लाभ-सत्कार द्वारा उन्मुक्त होने से ब्राह्मणों और दूसरे धर्मानुयायियों ने भी बहुत अंश में इनका अनुकरण किया ।

भारतीय जनता जब इस प्रकार दुराचार और मूद-विश्वास के पंक में कंठ तक डूबी हुई थी। ब्राह्मण भी जातिभेद के विष-बीज को शताब्दियों तक बौद्ध जाति को टुकड़े-टुकड़े बाँटकर, घोर गृह-कलह पैदा कर चुके थे। शताब्दियों से श्रद्धालु राजाओं और धनिकों ने बढ़ावा चढ़ाकर, मठों और मंदिरों में अपार धन-राशि जमा कर दी थी। इसी समय पश्रिम से मुसलमानों ने हमला किया। उन्होंने मंदिरों की अपार-सम्पत्ति को ही नहीं लूटा, बल्कि अगणित दिव्य शक्तियों के मालिक देव-मूर्तियों को भी चकनाचूर कर दिया। तांत्रिक लोग मंत्र, बलि और पुरश्चरण का प्रयोग करते ही रह गये; किन्तु उससे मुसलमानों का कुछ नहीं बिगड़ा । तेरहवीं शताब्दी के आरम्भ होते होते तुर्को ने समस्त उत्तरी भारत को अपने हाथ में कर लिया। बिहार के पालवंशी राजा ने राज्य-रक्षा के लिये उदन्तपुरी में एक तांत्रिक विहार बनाया था, उसे मुहम्मद बिन्-बख्तियार ने सिर्फ दो सौ घुड़सवारों से जीत लिया। नालन्दा की अद्भुत शक्तिवाली तारा टुकड़े-टुकड़े करके फेंक दी गयी। नालंदा और विक्रमशिला के सैकड़ों तांत्रिक भिक्षु तलवार के घाट उतार दिये गये । यद्यपि इस युद्ध में अपार जन-धन की हानि हुई, अपार ग्रन्थ राशि भस्मशात् हुई, सैकड़ों कला कौशल के उत्कृष्ट नमूने नष्ट कर दिये गये; तो भी इससे एक फायदा हुआ-लोगों का जादू का स्वप्न टूट गया ।

बहुत दिनों से बात चली आती है कि, “शंकराचार्य के ही प्रताप से बौद्ध भारत से निकाले गये। शंकर ने बौद्धों को शास्त्रार्थ से ही नहीं परास्त किया, बल्कि उनकी आज्ञा से राजा सुधन्वा आदि ने हजारों बौद्धों को समुद्र में डुबो और तलवार के घाट उतारकर उनका संहार किया।” यह कथायें सिर्फ दन्तकथायें ही नहीं हैं, बल्कि इनका सम्बन्ध आनन्दगिरि और माधवाचार्य की ‘शंकर-दिग्विजय’ पुस्तकों से है; इसीलिये संस्कृतज्ञ विद्वान् तथा दूसरे शिक्षित जन भी इनपर विश्वास करते हैं, इन्हें ऐतिहासिक तथ्य समझते हैं। कुछ लोग इससे शंकर पर धार्मिक असहिष्णुता का कलंक लगता देखकर, इसे मानने से आनाकानी करते हैं; किन्तु, यदि यह सत्य है, तो उसका अपलाप न करना ही उचित है ।

शंकर के काल के विषय में विवाद है। कुछ लोग उन्हें विक्रम का समकालीन मानते हैं । Age of Shankar के कर्ता तथा पुराने ढंग के पण्डितों का यही मत है। लेकिन इतिहासज्ञ इसे नहीं मानते। वह कहते हैं- चूँकि शंकर के शारीरक-भाष्य पर वाचस्पति मिश्र ने “भामती’ टीका लिखी है, और वाचस्पति मिश्र का समय ईसा की नवीं शताब्दी उनके अपने ग्रन्थ से ही निश्चित है; इसलिये शंकर का समय नवीं शताब्दी से पूर्व तो हो सकता है, किन्तु शंकर कुमारिल-भट्ट से पूर्व के नहीं हो सकते हैं । कुमारिल बौद्ध नैयायिक धर्मकीर्ति के समकालीन थे, जो सातवीं शताब्दी में हुए थे; इसलिये शंकर सातवीं शताब्दी के पहले के भी नहीं हो सकते । शंकर कुमारिल के समकालीन थे, और दोनोंने एक दूसरे का साक्षात्कार किया था, यह बात हमें “दिग्विजय” से मालूम होती है । इनमें अन्तिम बात में, जहाँ तक उनके ग्रंथों का सम्बन्ध है, कोई पुष्टि नहीं मिलती। स्वेन्-चाङ ( सातवीं शताब्दी ) के पूर्व, किसी एसे प्रबल बौद्ध विरोधी शास्त्रार्थी और शस्त्रार्थी का पता नहीं मिलता। यदि होता, तो – स्वेन्-चाङ अवश्य उसका वर्णन करता । यदि यह कहा जाय कि, शंकराचार्य भारत के दक्षिणी छो रपर हुए थे और उनका कार्यक्षेत्र भी दक्षिण भारत ही रहा होगा; इसलिये संभव है, दक्षिण-भारत के बौद्धों पर उपरोक्त अत्याचार हुए हों। लेकिन यह भी बात ठीक नहीं जचती. क्योंकि, छठी शताब्दीके बाद भी कांची और कावेरीपट्टन के रहनेवाले आचार्य धर्मपाल आदि बौद्ध पालि-ग्रन्थकार हुए हैं, जिनकी कृतियाँ अब भी सिंहल आदि देशों में सुरक्षित हैं । सिंहल का इतिहास ग्रन्थ “महावंस” राजनीतिक इतिहास को अपेक्षा धार्मिक इतिहास को अधिक महत्त्व देता है। केरल देश (जहाँ शंकराचार्य पैदा हुए), और द्रविड़ देश, सिंहल के बिल्कुल समीप हैं। यदि ऐसी कोई बात हुई होती, तो यह कभी संभव नहीं था कि, “महावंस” उसका कोई जिक्र न करता । बौद्ध ऐतिहासिकों का शंकर के शस्त्रार्थ पर मौन रहना ही इस बात का काफी प्रमाण है कि, ये घटनाएँ वस्तुतः हुई ही नहीं। बल्कि रामानुज आदि के चरितों में भी भिन्न मतावलम्बियों के साथ ऐसा ही बर्ताव देखकर तो और भी सन्देह होने लगता है।

बात असल यह है : शंकराचार्य दक्षिण में एक प्रतिभाशाली पण्डित हुए। उन्होंने “शारीरक-भाष्य” ग्रन्थ लिखा । यद्यपि वह भाष्य एक नये ढंग का था और उसमें कितने ही दार्शनिक सिद्धान्तों पर बहस की गई थी, तो भी दिड नाग, उद्योतकर, कुमारिल, धर्मकीर्ति के युग के लिये वह कोई उतना ऊँचा ग्रन्थ न था । उत्तर भारतीयों का केरल और द्रविड़ देशीयों के साथ पक्षपात भी बहुत था। इस पक्षपात का हम अच्छा अनुमान कर सकते हैं, यदि सातवीं शताब्दी के महाकवि वाणभट्ट की कादम्बरी के उस अंश को पढ़ें, जहाँ वह शबरों के साथ किसी जंगल में बसे एक द्रविड़ ब्राह्मण का वर्णन करता है। वस्तुतः उत्तरी भारत की पण्डित मण्डली,- जो उस समय की दर-असल पंडित-मंडली थी – शंकर को आचार्य मानने के लिये तब तक तैयार न हुई, जब तक उत्तरीय भारत में दार्शनिकों की भूमि मिथिला के अपने समय के अद्वितीय दार्शनिक सर्व-शास्त्र-निष्णात वाचस्पति-मिश्र ने शारीरक-भाष्य की टीका “भामती” लिखकर शङ्कर को भी न सूझने वाले तत्व उसमें से निकाल डाले। यथार्थ में वाचस्पति के कंधे पर चढ़कर ही शंकर को वह कीर्ति और बड़प्पन मिला, जो आज देखा जाता है। यदि “भामती” न लिखी गई होती, तो शंकर-भाष्य कभी का उपेक्षित और विलुप्त हो गया होता; और शंकर के भारत में आज के गौरव और प्रभाव की तो बात ही क्या? वाचस्पति ने उत्तरी भारत की पंडित मण्डली के सामने शंकर की वकालत की । वाचस्पति मिश्र से एक शताब्दी पूर्व नालान्दा में आचार्य शान्तरक्षित हुए थे। इनका महान् दार्शनिक ग्रन्थ “तत्त्व-संग्रह’ संस्कृतमें उपलब्ध होकर बड़ौदा से प्रकाशित हो चुका है। इस ग्रन्थरत्न में शान्तरक्षित ने अपने से पूर्व के पचासों दार्शनिकों और दर्शन-ग्रन्थों के सिद्धान्त उद्धृत कर खंडित किये हैं। यदि वाचस्पति मिश्र से पूर्व ही शंकर अपनी विद्वत्ता और दिग्विजय से प्रसिद्ध हो चुके होते, तो कोई कारण नहीं कि, शान्तरक्षित उनका स्मरण न करते ।

एक ओर कहा जाता है, शंकरने बौद्धों को भारत से मार भगाया और दूसरी ओर हम उनके बाद गौड़-देश (बिहार-बङ्गाल) में पालवंशीय बौद्ध नरेशों का प्रचण्ड प्रताप फैला देखते हैं। तथा उसी समय उड़न्तपुरी (बिहार शरीफ) और विक्रमशिला जैसे बौद्ध विश्वविद्यालयों को स्थापित होते देखते हैं । इसी समय भारतीय बौद्वों को हम तिब्बत पर धर्मविजय करते भी देखते हैं। 19वीं शताब्दीमें जब कि, उक्त दन्तकथा के अनुसार भारत में कोई भी बौद्ध न रहना चाहिए, तब तिब्बत से कितने ही बौद्ध भारत में आते हैं; और वह सभी जगह बौद्ध और भिक्षुओं को पाते हैं । पाल-काल के बुद्ध, बोधिसत्त्व और तान्त्रिक देवी-देवताओं की गृहस्थों हजारों खण्डित मूर्तियाँ उत्तरी-भारत के गाँवों तक में पाई जाती हैं। मगध, विशेषकर गया जिले में तो शायद ही कोई गाँव होगा, जिसमें इस काल की मूर्तियाँ न मिलती हों ( गया जिले के जहानाबाद सब डिवीजन के कुछ गाँवों में इन मूर्तियों की भरमार है, केस्पा, घंजन आदि गाँवों में तो अनेक बुद्ध, तारा, अवलोकितेश्वर आदि की मूर्तियाँ उस समय के कुटिलाक्षरों में “ये धर्मा हेतुप्रभवा’…” इलोकसे अङ्कित मिलती हैं)। वह बतला रही हैं कि, उस, समय बौद्धों को किसी शंकर ने नेस्तनाबूद न कर पाया था । यही बात सारे उत्तर भारत में प्राप्त ताम्र-लेखों और शिला-लेखों से भी मालूम होती है। गौड़नृपति तो मुसलमानों के बिहार बङ्गाल विजय तक बौद्ध धर्म और कला के महान् संरक्षक थे, अन्तिम काल तक उनके ताम्र-पत्र, बुद्ध भगवान्के प्रथम धर्मोपदेश-स्थान मृगदाव ( सारनाथ) के लांछन दो मृगों के बीच रखे चक्रसे अलंकृत होते थे। गौड़-देश के पश्चिम में कान्यकुब्ज का राज्य था, जो कि यमुना से गण्डक तक फैला हुआ था । वहाँ के प्रजा-जन और नृपति-गण में भी बौद्ध-धर्म खूब संमानित था । यह बात जयचन्द्र के दादा गोविन्दचन्द्र के जेतवन-विहार को दिये पाँच गाँवों के दान-पत्र तथा उनकी रानी कुमारदेवी के बनवाये सारनाथ के महान् बौद्ध-मन्दिर से मालूम होती है । गोविन्दचन्द्र के पोते जयचन्द्र की एक प्रमुख रानी बौद्ध धर्मावलम्बिनी थी, जिसके लिये लिखी गई प्रज्ञापारमिता की पुस्तक अब भी नेपाल-दर्वार-पुस्तकालय में मौजूद है । कन्नौज में गहड़वारों के समय की कितनी ही बौद्ध मूर्तियाँ मिलती हैं, जो आज किसी देवी-देवता के रूपमें पूजी जाती हैं ।

कालिञ्जरके राजाओं के समय की बनी महोबा आदि से प्राप्त सिंहनाद-अवलोकितेश्वर आदि की सुन्दर मूर्तियाँ बतला रही हैं कि, तुर्कों के आने के समय तक बुन्देलखण्ड में बौद्धों की काफी संख्या थी । दक्षिण-भारत में देवगिरि ( दौलताबाद, निजाम ) के पास के एलोरा के भव्य गुहा प्रासादों में भी कितनी ही बौद्ध गुहायें और मूर्तियाँ, मलिक काफूर से कुछ ही पहले तक की बनी हुई हैं। यही बात नासिक के पाण्डव लेनी की कुछ गुहाओं के विषय में भी है । क्या इससे नहीं सिद्ध होता कि, शंकर-द्वारा बौद्ध-धर्म का देश-निर्वासन कल्पना मात्र है। खुद शंकर की जन्मभूमि केरल से बौद्धों का प्रसिद्ध तंत्र-ग्रन्थ “मंजुश्री-मूलकल्प” संस्कृत में मिला है, जिसे वहीं त्रिवेन्द्रम्से स्व० महामहोपाध्याय गणपतिशास्त्री ने प्रकाशित कराया है । क्या इस ग्रन्थ की प्राप्ति इस बात को नहीं बतलाती कि, सारे भारत से बौद्धों का निकालना तो अलग खुद केरल से भी वह बहुत पीछे लुप्त हुए । ऐसी ही और भी बहुत सी घटनाएँ और प्रमाण पेश किये जा सकते हैं, जिनसे इतिहास की उक्त झूठी धारणा खण्डित हो जाती है।

लेकिन प्रश्न होता है : तुर्को ने तो बौद्धों और ब्राह्मणों दोनों के ही मन्दिरों को तोड़ा, उपाहताको मारा; फिर क्या वजह है. जो ब्राह्मण भारत में अब भी हैं, और बौद्ध न रहे ? बात यह है : ब्राह्मण धर्म में गृहस्थ भी धर्म के अगुआ हो सकते थे; बौद्धा मे भिक्षुओं पर ही प्रचार और धार्मिक ग्रन्था की रक्षाका भार था। भिक्षुलोग अपने कपड़ों और मठों के निवास से आसानी से पहचाने जा सकते थे । यही वजह है, जो बौद्धभिक्षुओं को तुर्को के आरम्भिक शासन के दिनों में रहना मुश्किल हो गया । ब्राह्मणों में भी यद्यपि वाममार्गी थे; किन्तु सभी नहीं । बौद्धों में तो सब के सब वज्रयानी थे। इनके भिक्षुभों की प्रतिष्टा उनके सदाचार और विद्यापर नहीं, बल्कि उनके तथा उनके मंत्रों और देवताओंकी अद्भुत शक्तियों पर निर्भर थी। तुर्को की तलवारों ने इन अद्भुत शक्तियों का दिवाला निकाल दिया । जनता समझने लगी, हम धोखे में थे। इसका फल यह हुआ कि, जब बौद्ध भिक्षुओं ने अपने टूटे मठों और मन्दिरों. को फिर से मरम्मत कराना चाहा, तब उसके लिये उन्हें रुपया नहीं मिला। वस्तुतः, इन आचारहीन, शराबी भिक्षुओं को उस समय-जब कि तुर्कों के अत्याचार के कारण लोगों को एकएक पैसा बहुमूल्य मालूम होता था- कौन रुपयों की थैली सौंपता ? फल यह हुआ कि, बौद्ध अपने टूटे धर्मस्थानों की मरम्मत कराने में सफल न हो सके और इस प्रकार उनके भिक्षु अशरण हो गये । ब्राह्मणों में यह बात न थी। उनमें सबके-सब वाममार्गी न थे, कितने ही अब भी अपनी विद्या और आचरण के कारण पूजे जाते थे। इसलिये उन्हें फिर अपने मन्दिरों को बनवाने के लिये रुपये मिल गये । बनारस के पास ही बौद्धों का अत्यन्त पवित्र तीर्थ स्थान ऋषिपतन मृगदाव (वर्तमान’ सारनाथ) है । वहाँ की खुदाई से मालूम होता है कि, कान्यकुब्जेश्वर गोविन्दचन्द्र की रानी कुमारदेवी का बनवाया विहार, वहाँ का सबसे पिछला विहार था । तुर्कों ने जब इसे नष्ट कर दिया, तो फिर इसके पुनर्निर्माण की कोशिश नहीं की गयी। इसके विरुद्ध बनारस में विश्वनाथ का मन्दिर, एक के बाद एक, चार बार नये सिरे से बना । सबसे पुराना मन्दिर विश्वेश्वरगंज के पास था, जहाँ अब मस्जिद है, और शिवरात्रि को लोग अब भी उसमें जल चढ़ाने जाते हैं । उसके टूटने के बाद वहाँ बना, जिसे आजकल आदिविश्वेश्वर कहते हैं । उसके भी तोड़ देने पर ज्ञानवापी में बना, जिसका टूटा हुआ भाग अब भी औरंगजेब की मस्जिद के एक कोने में मौजूद है । इस मन्दिर को जब औरंगजेब ने तुड़वा दिया, तब वर्तमान मन्दिर बना । नालंदा, उड़न्तपुरी, जेतवन आदि बौद्ध पुनीत स्थानों में भी हम बारहवीं शताब्दी के बाद की इमारतें नहीं पाते । लामा तारानाथ के इतिहास से भी हम जानते हैं कि, विहारों के तोड़ दिये जाने पर उनके निवासी भिक्षु भाग-भागकर तिब्बत, नेपाल तथा दूसरे देशां की ओर चले गये। मुसलमानों की भांति हिन्दुओं से पृथक बौद्धों की जाति न थी। एक ही जाति क्या, एक ही घर में ब्राह्मण और बौद्ध दोनों मतों के अनुयायी रहा करते थे । इसलिये अपने भिक्षुओं के अभाव में उन्हें अपनी ओर खींचने के लिये, जहाँ उनके ब्राह्मण-धर्मी रक्तसम्बन्धी आकर्षण पैदा कर रहे थे, वहाँ उनमें से जुलाहा, धुनिया आदि कितनी ही छोटी समझी जानेवाली जातियों को मुसलमानों की ओंर से भय और प्रलोभन पेश किया जाता था, जिस कारण एक दो शताब्दियों में ही बौद्ध या तो ब्राह्मण-धर्मी बन गये, या मुसलमान ।Shekhar Verma

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