विशेष

“मौन” कैसे हों?…पूछते हो, मौन कैसे हों?

मुदित मिश्र
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“मौन कैसे हों?
‘पूछते हो, मौन कैसे हों?
बस हो जाओ।बहुत विधि और व्यवस्था की बात नहीं है।चारों ओर जो हो रहा है, उसे सजग होकर देखो और जो सुनाई पड रहा है उसे साक्षी भाव से सुनो।संवेदनाओं के प्रति होश तो पूरा हो, पर प्रतिक्रिया न हो।
प्रतिक्रिया शून्य सजगता से मौन सहज ही निष्पन्न होता है।”
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जायें नहीं, आने दें।
‘Be still’.
रुकें, रुक जायें और रुके ही रहें।
विचार भीतर से उठते रहते हैं, हम उनका पीछा करते हैं।फिर वे हमें दूर ले जाते हैं कहीं ओर।
अच्छा हो वे ही हमारा पीछा करें।कुछ लोगों को फरियाद होती है कि विचार पीछा करते हैं, अप्रिय स्मृतियां पीछा करके परेशान करती रहती हैं।
तो वे भागते क्यों हैं, ठहर क्यों नहीं जाते?
चिंता पीछा करती है, भय पीछा करता है।भागेंगे तो पीछा करेगा ही।ठहर जायें तो वह हमारे स्रोत में विलीन हो जाता है।
हम भी तो भयचिंता का पीछा करते हैं।कहां कहां खतरा है इस पर नजर रहती है।यह पीछा करना हमें हमारे ही स्रोत से तोड देता है।
सही यही है कि हम रुके रहें, स्व में स्थित रहें, स्वस्थ रहें-परम स्वस्थ फिर जो भी विचार, वृत्ति, स्मृति हमारा पीछा करे-हम ठहरे हुए हैं अपने आपमे,अपनी जगह।
इसे करके देखें।आप पायेंगे चारों ओर से आवाजें आ रही हैं, भाव आ रहे हैं, विचार आ रहे हैं।कोई अनुकूल, कोई प्रतिकूल, कोई सुखद, कोई असुखद।हम रुकेंगे तो ही हम स्वस्थ रह पायेंगे और जो भी ज्ञात हो रहा है वह सब अंदर स्रोत में विलीन हो पायेगा।
हम रुकते कहां हैं?या तो पीछा करते हैं या भागते हैं तब हमारा पीछा किया जाता है।इसलिए न भागना है,न पीछा करना है।
न आक्रामकता हो,न पलायन।
तराजु के बीच जो कांटा है उसकी तरह स्थिर हो जाना है।
सब कुछ इतना कठिन नहीं है जैसा लगता है।मौन कैसे हों? तो हो जाएं इसमें और करना क्या है? बात यही है भागदौड़ लगी है।या तो स्वयं पीछा करते हैं या दूर भागते हैं।
हम कहें ऐसा चित्त के कारण होता है तो हम कहां हैं?
हम चित्त हैं?
हम तो हम ही हैं स्व( सेल्फ)।और यदि हमें लगता है हम ही चित्त हैं तो चित्त के रुप में हमें ठहरने का अभ्यास करना होगा।रुकना होगा अपनी जगह।इस भागदौड़ को रोकना होगा।
कोई कहे इसमें खतरा है तो यह मन की आशंका है जैसे चारों ओर से उस पर हमला हो रहा हो।यह मन ही है जो मिटने से डरता है जिससे सुरक्षा के इंतजाम करता है।सदा भयचिंता से ग्रस्त रहता है।अच्छा है इसे मिट ही जाने दें।
हम भी कहां “स्वयं” की तरह जीते हैं, हम भी “अहम्मन्यता” की तरह जीते हैं अपनी छबि( अपनी इमेज) बनाकर।इमेज बनाकर जीने वाले के लिये अनेक कारण हैं असुरक्षा के।वह इमेज के मोह को छोडकर सीधा स्वयं को जीए तो उसे बडी शक्ति, बडी सामर्थ्य का अनुभव होता है।यह चित्त की स्थिरता से होता है।इमेज को जीनेवाली अहम्मन्यता सदा असंतुलित रहती है, डगमगाती रहती है।खतरा तो तथाकथित इमेज से ही है।आदमी दृढता से काम ले तब भी शंका बनी रहती है।ऐसी दृढता किसी काम की नहीं।यह अच्छी चीज का दुरुपयोग है।दृढता का तो सदुपयोग होना चाहिए।
असुरक्षा के खिलाफ दृढता नहीं चाहिए, असुरक्षा की परवाह न करने वाली दृढता चाहिए।यह दृढता अपनी अहम्मन्यता की भी परवाह नही करेगी।
‘मैं यह हूं,वह हूं’-छबि,इमेज।अहम्मन्यता इसी झूठी चीज से जुडी होती है।
स्वयं को जीना और बात है।स्वयं को जीनेवाला अपनी कथित अहम्मन्यता की परवाह नहीं करता।इसलिए उसमें बडी सामर्थ्य होती है।ऐसा आदमी सम्मान के लेनदेन की भाषा में नहीं सोचता अपितु निर्भय होकर सबका सम्मान करता है।
और जीव है भी कहां,लहर है भी कहां?
चारों ओर एक अखंड सतचित आनंद का सागर ही लहरा रहा है।
“जिस प्रकार मिट्टी में घडा, सुवर्ण में कुण्डल और सीपी में चांदी नाममात्र को ही हैं उसी प्रकार परब्रह्ममें जीव शब्द भी नाममात्र ही है।”
‘यथा मृदि घटो नाम कनके कुण्डलाभिधा।
शुक्तौ हि रजतख्यातिर्जीवशब्दस्तथा परे।।’
सभी को होने का अनुभव हो ही रहा है।अखंड अस्तित्व बोध हरेक को है बिना किसी अपवाद के।
अतः आदत डालें बिना हिले अस्तित्व बोध करते हुए बोलने की,सुनने की।
यह संभव है, यह हो सकता है।यह मौन है जिसके लिये पूछते हैं-
“मौन कैसे हों?”

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