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यमन और सऊदी गठजोड़ के बीच युद्ध बंदियों का आदान-प्रदान शुरू हुआ : रिपोर्ट

यमन और सऊदी गठजोड़ के बीच पहले सफल समझौते के लागू होने के रूप में युद्ध बंदियों का आदान प्रदान, पिछले तमाम विफल समझौतों की अनदेखी करते हुए, यमन के लिए एक बहुत बड़ी सफलता है।

जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतर्राष्ट्रीय रेड क्राॅस सोसाइटी की देख-रेख में युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान के समझौते पर दस्तख़त और उसके बाद व्यहारिक रूप से उठाए गए क़दम जिनके तहत यमनी सेना और स्वयं सेवी बल के 671 युद्ध बंदी रिहा हुए हैं, सनआ के लिए एक नई विजय है और पिछले 6 साल से जारी युद्ध और घेरेबंदी के दौरान यमन ने जो सामरिक व राजनैतिक सफलताएं, अर्जित की हैं, उनमें एक और बड़ी विजय जुड़ गई है। सनआ ने यमनी सेना और स्वयं सेवी बल के संयुक्त बलों के सहारे ज़मनी स्तर पर जो वर्चस्व स्थापित किया है और निरंतर विजय हासिल करके सैन्य संतुलन को अपने पक्ष में किया है, उसके बल पर थोड़ा सा भी झुके बिना पूरे गर्व व सम्मान के साथ इस समझौते पर दस्तख़त किए और इसी आधार पर इस समझौते को उसकी ज़मीनी सफलताओं का पूरक माना जा सकता है।


अब पहले क़दम के रूप में अंतिम सैनिक तक सभी युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान के लिए नए समझौतों पर दस्तख़त के लिए कोशिशें जारी रहेंगी और सनआ के अधिकारियों व नेताओं ने इस विषय पर बल देते हुए सभी युद्ध बंदियों की रिहाई के लिए सहयोग जारी रखने की घोषणा की है। जब यमनी युद्ध बंदी स्वदेश लौटे तो जनता और अधिकारियों ने जिस तरह से उनका स्वागत किया और जिस तरह जश्न मनाया वह ख़ूद इस बात का सूचक है कि युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान के समझौते में जीत यमन की हुई है। यमनी जनता के जश्न के दृश्य, रिहा होने वाले युद्ध बंदियों के संयम व दृढ़ता का परिणाम थे जिन्होंने यमन संकट के अन्य जटिल मामलों के समाधान की आशा यमनी राष्ट्र में भर दी है। इसी तरह इन दृश्यों से यह भी पता चला कि यमनी जतना अपने युद्ध बंदियों के बलिदान और संघर्ष की कितनी क़द्रदान है।

जैसे ही युद्ध बंदियों का आदान-प्रदान शुरू हुआ, हर ओर से बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया और मानो बधाइयों का सैलाब आ गया। यमनी बलों ने राजनैतिक व शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए एक अहम क़दम उठा लिया है। उन्हें आशा है कि वे और अधिक समझौते करके देश में समस्याओं के समाधान और मानवीय संकट की समाप्ति और अंततः युद्ध ख़त्म करके टिकाऊ शांति स्थापित करने में कामयाब हो जाएंगे।

दूसरी ओर युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान के समझौते के सफल क्रियान्वयन ने यमन को एक और सफलता दिलाई है और लोगों के दिलों में शांति की आशा मज़बूत हो गई है। इसी तरह इससे यह भी साबित हो गया है कि सनआ सरकार ने सऊदी अरब और उसके घटकों की ओर से दो बरस से की जा रही बहानेबाज़ी और आना-कानी के बावजूद, वार्ता के मामले को पूरी दक्षता से नियंत्रित किया है। सऊदी अरब के आक्रमणकारी गठजोड़ ने इससे पहले एक बार सन 2015 में और दूसरी बार सन 2018 में युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान के संबंध में होने वाली वार्ता को विफल बना दिया था और इसका कारण यह था कि सनआ की टीम के मुक़ाबले में वार्ता में शामिल अनेक टीमें किसी न किसी विदेशी पक्ष से जुड़ी हुई थीं और उनमें फै़सला लेने की क्षमता व स्वाधीनता नहीं थी। इसी लिए सऊदी अरब और इमारात ने अपने लक्ष्यों व हितों को पूरा करने के लिए उन वार्ताओं को विफल बनाने की हर संभव कोशिश की थी।

सनआ के अधिकारियों ने बल देकर कहा है कि उन्होंने अपनी उमंगों और सफलता को हासिल करने के लिए हर संभव प्रयास किया है और हालिया वार्ता में विजय का परिणाम युद्ध बंदियों के आदान-प्रदान था और इसने शांति की आशा दिलों में लौटा दी है।

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