साहित्य

यह कहानी एक नाचने वाली की संत पुत्री की है!

सोनाली मिश्र
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चेतना का प्रस्फुटन इस भूमि की स्त्रियों पर आज की बात नहीं है. जैसा समय हुआ है, स्त्री ने अपनी चेतना के अनुसार कदम उठाए हैं, हाँ, आज की तरह समाज को दोषी नहीं ठहराया, रुदन नहीं किया! यह नौ दिन भिन्न भिन्न स्त्रियों की चेतना आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ, तथा यह अपेक्षा करती हूँ कि आप समझें कि दूसरों को अपनी निजी पीड़ा के लिए विक्टिमाईज करना स्त्रीवाद नहीं है, अपितु स्वयं की चेतना का विस्तार ही स्त्रीवाद है, आज महान संत कान्होपात्रा की कहानी, जो हमें सिखाती है कि कैसे साहस से जीवन जीना है

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उनका नृत्य अप्सरा के नृत्य से कम न था, उनका सौन्दर्य अप्सरा के सौन्दर्य से कहीं बढ़कर था. उसने जब जन्म लिया नाचने वाली के घर तो माँ को लगा जैसे किसी अप्सरा ने ही उस पर तरस खा लिया हो और आ गयी हो उसकी समृद्धि में और वृद्धि करने! वह जब नाचती तो घुँघरू रुकने से मना कर देते और आकाश से जैसे देव उतर आते, उन्होंने जन्म तो लिया श्यामा के घर मगर उसकी मृत्यु हुई विट्ठल मंदिर में!

यह कहानी एक नाचने वाली श्यामा की संत पुत्री कान्होपात्रा की! जिसे गलती से भगवान ने गलत परिवार में भेज दिया होगा! शायद कोई अप्सरा किसी दंड के चलते आ गयी हो! रूपसी, और गुणवान पुत्री पाकर श्यामा बहुत हर्षाई होगी, जैसा कोई भी उस वर्ग की स्त्री करती! कान्होपात्रा के पास दासियों की कोई कमी न थी, परन्तु धनधान्य से पूर्ण होने के उपरान्त भी उसके ह्रदय में एक कसक रहती थी. उनका सामाजिक स्तर अपेक्षाकृत निम्न था. सामाजिक बहिष्कार सा था उसका! परन्तु उसके कंठ में साक्षात सरस्वती विराजती थीं. पंद्रहवीं शताब्दी में श्यामा का सपना था अपनी रूपवान पुत्री को किसी सुलतान की कृपापात्र बनाना, मगर कान्होपात्रा का ह्रदय तो कहीं और ही था. उसे इस संसार से कोई मोह नहीं था, उसे मोह था विट्ठल से! माँ बोली सुलतान की शरण में जाओ, बेटी ने मना कर दिया! बेटी को पंढरपुर बुला रहा था. बेटी को देह की दुनिया से कोई मोह नहीं था, देह का सुख बेटी के लिए कुछ नहीं था. माँ बोली “अच्छा विवाह ही कर ले!” बेटी फिर न मानी! बेटी को इस दुनिया में कोई स्वयं के योग्य लगता ही नहीं था.

फिर एक दिन बेटी के जन्म के लिए उत्तरदायी पिता तक बेटी के रूप का समाचार पहुंचा! पिता सदाशिव ने उनकानृत्य देखने की चाह व्यक्त की! बेटी ने तब भी मना कर दिया! श्यामा ने सदाशिव से कहा “बेटी है तुम्हारी, कुछ तो रहम खाओ!” पिता न माना! पिता ने अत्याचार आरम्भ कर दिए! माँ की धन दौलत कम होने लगी और फिर अंतत: बेटी को उसके पास भेजने को सहमत हो गयी!

बेटी को पता चल गया और दासियों के बीच पली कान्होपात्रा चल पड़ी एक अनजान यात्रा पर! एक दिन उसके घर के बाहर से पंढरपुर की तरफ जाते हुए विट्ठल भक्त उसे मिले थे. कहा जाता है कि उन्होंने एक विट्ठल भक्त से पूछा “ऐसा कौन है जिसके कारण इतना प्रसन्न हो!” उस भक्त ने कहा “विट्ठल महाराज! जो उन्हें देखता है बस उनका हो जाता है!”

“तो क्या वह मुझे अपने भक्त के रूप में स्वीकारेंगे?” उन्होंने प्रतिप्रश्न किया

“विट्ठल क्यों न स्वीकारेंगे? विट्ठल के घर पर कोई भेदभाव नहीं है! तुम भी आना, देखना विट्ठल को ही सब कुछ न मान लो तो कहना” और वह जैसे उसे वह संकेत देकर चला गया जिसकी तलाश में कान्होपात्रा अब तक भटक रही थी.

कान्होपात्रा अपने घर से उन्हीं विट्ठल की तलाश में चल दी! पंढरपुर पहुँचते ही उसे लगा जैसे उसकी तलाश पूरी हुई और उन्होंने विट्ठल की मूर्ति को देखा! उसे लगा जैसे इस दुनिया में विट्ठल जैसा कोई नहीं! यही हैं जिनके सम्मुख वह नृत्य कर सकती है, यही हैं जिनके सम्मुख वह गा सकती है! वह अपनी पीड़ा गा सकती है, इस जगत में उनके साथ जो हो रहा है, उसका उलाहना अपने विट्ठल को दे सकती हैं! कल तक दासियों के साथ रहने वाली खुद विट्ठल की दासी बन गयी और पंढरपुर में ही कुटिया बनाकर रहने लगी. भजन गाती, नृत्य करती अपने विट्ठल के लिए! और विट्ठल को ही अपना पति मान लिया उसने! उनसे बढ़कर कौन हो सकता था जिसे वह स्वयं को सौंप पाती! देह के प्रति लिप्सा भरे इस जगत में कौन था जो उनके इस सच्चे और आध्यात्मिक सौन्दर्य को पूर्णता दे पाता!

दीवानी हो गयी! मगर दुनिया प्रेम के इस रूप को कहाँ समझ पाई! सदाशिव ने उसके सौन्दर्य की प्रशंसा बीदर के बादशाह से की! और कहा कि उसे तो आपके दरबार में होना चाहिए, कहाँ वह अप्सरा मंदिर की कोठरी में रह रही है! पल भर में ही बादशाह के सैनिक मंदिर में पहुँच गए! अब वह कहाँ जाती!
कहते हैं वह विट्ठल की मूर्ति के पास स्वयं को बचाने की गुहार लेकर गयी और विट्ठल जी ने उसे अपनी शरण में ले लिया!
सैनिकों को मृत देह भी नहीं मिली!

कुछ कहते हैं कि वह पेड़ बनकर उसी मंदिर में अपने विट्ठल जी के साथ रहने आ गयी!

मगर कान्होपात्रा कहाँ गयी यह पता नहीं, हाँ, उन्होंने अपनी चेतना हम सभी में स्थानांतरित कर दी है

वह महाराष्ट्र के प्रमुख संतों में से एक मानी जाती हैं.

(शिवाजी लिखने के दौरान प्राप्त कुछ सन्दर्भों एवं पुस्तकों के स्रोत के आधार पर)

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