साहित्य

रस्में दुनिया के सलीके भी अजीब हैं,,,कहो, तो भी गुनाह ना कहो, तो इक सज़ा!

Preet Pratima
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रस्में दुनिया के
सलीके भी अजीब हैं
कहो, तो भी गुनाह
ना कहो, तो इक सज़ा,
कहो, तो किस से कहो,
ना कहो तो,
जीना ईक कज़ा
तुम्हें सोचूं तो,
खौफ ए ज़माना
ना सोचूं तो, बे वफा,
गिरिफत में अंधेरों के
कब तक चले कोई
थामा था जब,
हाथ तुम्हारा
ना मालूम
मैं जागी थी कि सोई,
अब तो,
थक गए हैं हम भी,
हंसते मुस्कुराते
निभाते निभाते
ये रस्में तन्हाईयां,
दिलों कि रंजिशें
दुनिया की बेवफाईयां ।
प्रीत प्रतिमां

Preet Pratima
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डिग्रियां टंगी दीवार सहारे,
मेरिट का ऐतबार नहीं है,
सजी है अर्थी नौकरियों की,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
शमशान हुए बाज़ार यहां सब,
चौपट कारोबार यहां सब,
डॉलर पहुंचा आसमान पर,
रुपया हुआ लाचार यहां सब,
ग्राहक बिन व्यापार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
चाय से चीनी रूठ गई है,
दाल से रोटी छूट गई है,
साहब खाएं मशरूम की सब्जी,
कमर किसान की टूट गई है,
है खड़ी फसल ख़रीदार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।
दाम सिलेंडर के दूने हो गए,
कल के हीरो नमूने हो गए,
मेकअप-वेकअप हो गया महंगा,
चाँद से मुखड़े सूने हो गए,
नारी है पर श्रृंगार नही है,
देश मे अब रोज़गार नही है।
साधु-संत व्यापारी हो गए,
व्यापारी घंटा-धारी हो गए,
चोर उचक्के नेता बन गए,
कैद में आंदोलनकारी हो गए,
सरकार से कोई सरोकार नही है,
युवा मगर लाचार नही है
देश मे अब रोज़गार नही है।
देश मे अब रोज़गार नही है।

आभार 

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