साहित्य

‘लहूज़दा जन्नत’

Arun Maheshwari
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आज हमारे लिए यह बहुत खुशी का क्षण है जब हमें सूर्य प्रकाशन मंदिर से सरला की कविताओं के नए संकलन ‘लहूजदा जन्नत’ की तस्वीरें मिली है । जल्द ही हमें इस संकलन की प्रतियां भी उपलब्ध होगी । यहां हम इस संकलन की भूमिका के साथ इन तस्वीरों को मित्रों के साथ साझा कर रहे हैं –

भूमिका
कविता के साथ यात्रा पर दो शब्द
कविता के साथ अपनी निजी यात्रा के विगत 10-15 सालों के अनुभवों के बाद कम से कम इतना जरूर कह सकती हूं कि भाषा में आम फहम जीवन का इतनी लालसाओँ से सरोबार सहज और स्वतंत्र शायद ही दूसरा कोई रूप होगा । अक्सर कविता में जोखिमों की काफी चर्चा की जाती है, पर हमें तो यह एक सबसे निरापद जगह लगती है । इसमें अगर जोखिम है तो वह मनुष्य के सहज जीवन के जोखिम से ज्यादा कुछ नहीं है । यही वजह है कि जो पंडितगण कविता को विशिष्ट, उच्च रुचिवान और पारंगत जनों का जगत बताते हैं, वे किसी भी लिहाज से हमारी समझ के परे होते हैं । यह तो अनाम, गुमनाम साधारण जन का अपना घर है । उनके अपनाने में ही कविता अपने होने को प्रमाणित करती है ।

वैसे भी भाषा का कोई भी उत्पाद मनुष्यों की खास-खास सत्ता के सापेक्ष कैसे हो सकता है ! भाषा मनुष्यों पर कहां आश्रित है ! हम रहे, न रहे, भाषा का अपना विकासमान पूर्ण स्वायत्त संसार हमेशा रहेगा । यह तो समग्र संसार के संकेतों और प्रतीकों से बंधी हुई उनकी धारक वैसी ही एक जमीन है जैसे मनुष्य का जैविक शरीर होता है । भाषा आदमी के स्वेच्छाचारों की गुलाम नहीं है । वह अपने प्रकार से शब्दों के ग्रहण और त्याग का काम करती है और अपनी शर्तों पर ही नए शाब्दिक प्रयोगों से निपटती है । इसीलिये उस पर मनुष्यों के बनाए हुए लिंग, वर्ग, जाति, धर्म आदि किसी भी श्रेणी विशेष के एकाधिकार की बात आमफहम इंसान को और भी निःस्व करने की कोरी धृष्टता के अलावा और कुछ नहीं हो सकती । जिसे हम अपने अनुभव के बल पर ही एक सहज सरल जीवन का सहजात पाते हैं, उस पर ऊंचे जटिल लोगों की कठिनता का दावा, किसी मायने में स्वीकार्य नहीं लगता है । पाब्लो नेरुदा ने बोरों में लिपटे मजदूरों की आंख में उनकी कविता से पैदा हुई जिस चमक का जिक्र किया था, भूखे आदमी की वह तृप्ति ही कविता के असली हकदार को बताने के लिए काफी है ।

बहरहाल, हमने जब कविता का दामन थामा, वह हमारे लिए एक अति-विशिष्टजन की कृत्रिमताओं से अपने को अलग करने का समय था । भाषा के कथित परिष्कृत विचार-संभार को किंचित परे करके सहज होने का समय था । अंतहीन निर्रथक बहसों और भाषणबाजियों से विशिष्टता के नशे से निकलने का समय था । तेज रोशनी के ताप के बजाय प्रेम की उष्मा और छाव में लौटने का समय था । अन्यों की किसी भी छितवन से बाहर निकलने का समय था । जैसे राजनीति हमारे तई किसी कोरी कामुक वासना की उत्तेजना की तरह नहीं आई, उसे आदमी के जीने का एक जरूरी आसरा माना, वैसे ही हमें उससे अलग सत्य के सहज भाषाई रूप की एक और ऐसी उर्वर जमीन की तलाश थी जिसमें कहीं कोई पिष्टपेषण, कोरा विस्फार न हो । सत्य की वह सघनता जिसमें किसी बंधन की रंच मात्र भी जगह न हो । वही सामान्य मनुष्यों के जीवन का आधारभूत सत्य होता है । राजनीति अपने बाकी सारे तामजाम से मुक्त, सत्य के मुक्तिकामी रूप में जहां जगह पा सके, वैसी ही किसी विधा से अपने छंद के तार जोड़ने की कामना थी । तभी हमें, संभव है पूर्वजों और अपनों के पूण्यों की बदौलत ही, कविता का साथ मिल गया । आज हमारा यह मानना है कि कविता से अधिक समृद्ध और सघन भाषाई साधन शायद दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता है ।

रवीन्द्रनाथ साहित्य और कला की दूसरी तमाम विधाओं में टहल कर स्वास्थ्य लाभ जरूर करते थे, पर उन्होंने घर बसाया था सिर्फ कविता के साथ ही । किसान के बेटे फिरदौसी ने कविता को जनता का घर कहा था । हर श्रेष्ठ उपन्यासकार, कथाकार और आलोचक भी अपने लेखन में भरती के तमाम ब्यौरों के बीच जहां भी उत्तरण के बिंदु का संकेत देता है, कवि की भूमिका में ही होता है।

राजनीति के क्रम से कविता की ओर आना हमें लगता है जैसे राजनीति के सत्य को आम फहम जीवन की सबसे शुद्ध वस्तु के रूप में पाने की तरह रहा है । कविता को भी उसके मूल सत्य से जोड़े रखने की जैसे एक अनिवार्य शर्त है राजनीति । अगर हमने कविता को अपनाया होता और राजनीति से परहेज किया होता, तो वह निजी तौर पर हमारे लिए विशिष्टता की राजनीति के कृत्रिम संसार से विशिष्टों की कविता के कृत्रिम संसार में प्रवेश करने के समान ही होता । फिर प्रेम के सत्य की कामना की वह डोर भी टूटनी ही थी, जिसने हमें सक्रिय राजनीति से जोड़ा और फिर तोड़ा भी । प्रेम, कविता और राजनीति मनुष्य के स्वच्छंद विचरण के स्वायत्त, पर साथ ही किन्हीं सूक्ष्म सूत्र से जुड़े हुए क्षेत्र भी है । मुक्तिबोध का यह सवाल कि पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है, कोई राजनीतिक सवाल नहीं, शुद्ध कविता का ही सवाल था ।

अपनी कविताओं के इस आठवें संकलन के प्रकाशन के लिए फिर एक बार हम अपने प्रकाशक प्रशांत बिस्सा जी के प्रति आभार प्रकट करना चाहेंगे । जिस समय यह संकलन निकल रहा है, हम कोरोना महामारी के सबसे डरावने दौर से गुजर रहे हैं । आदमी जैसे किसी मौत के कुए में फंस गया हैं । हर क्षण न जाने कितने उद्वेलनों से, मृत्यु और दुखों की और साथ ही इनसे जूझने की कहानियों से अटा हुआ है । हर सुबह जैसे एक नई उत्तेजना के साथ दरवाजे पर दस्तक दिया करती है । इस संकलन में हमारी इस काल की कविताओं को नहीं समेटा गया है । वे आगे फिर कभी आएगी ।
हमें उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही इस संकलन को भी पाठकों का समर्थन मिलेगा ।

1 सितंबर 2020

सरला माहेश्वरी

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