साहित्य

”वहाँ” विक्रति मानसिकता के लोग दूसरों को मानसिक बीमार कहते है!

Shikha Singh

Dist.farrukhabaad, uttar pradesh
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पित्रसत्ता पर चोट गहरी लगती है जब अपनी कुर्सी को कब्जे से बहार निकलते देखने का डर पैदा होता है ।

सच तो ये है कि लोग अपने घरों में संस्कारों के जो पोटले लटकाते हैं गले में वो सच में बगुला भगत होते हैं और यही दोहरी मानसिकता उनके विचारों में दिखती है उन्हें उनका डर बहुत खाये जाता है कहीं हम कम न पड़ जाये या कमज़ोर न हो जाये जहाँ स्त्रियाँ खुद अपना पायजामा पहने रहने को देती है कि तुम्ही सम्हालो हमारी डोर वहाँ विक्रति मानसिकता के लोग दूसरों को मानसिक बीमार कहते है और उस कमजोरी का फायदा उठाते है जो स्त्रियाँ उन्हें उठाने देती है स्त्री खुद डरती है कि कहीं हमसे कुछ टूट न जाये चाहे वो अपना शिकार रोज कराती हो जे वे ही स्त्रियाँ और पुरुष है।

जो दोहरी भूमिका का पायजामा पहने हैं और वो स्त्रियाँ कहां है जो आवाज उठाती हैं कि मैं स्त्रियों के साथ हूँ उन्हें एक संगठित योजना बना कर बहार निकालना चहाती हूँ आवाज बंद है तुम कमजोर हो ये वो तो ये जानते है पित्रसत्ता को पता है तुम बौखला सकती हो कुछ कर नहीं सकती इसी लिये आज तम्हारा शोषण हो रहा है ।

जो स्त्री अपने बारे में जानती नहीं वो स्त्रियों के लिये आवाज़ उठाती है कमाल है इस बनाबटी और दोहरी भूमिका का ..

जो स्त्रियाँ अपनी आवाज़ तक नहीं निकाल पाती अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ वो स्त्रीसत्ता को बडाने की बात करती है एक करने की बात करती है सच तो ये है स्त्री एकता के नाम पर केवल अपना सपना हल करना चहाती है जब सामने शोषण हो रहा होता है तो ये स्त्रियाँ भी नही बोलती कि अपनी एकता का प्रदर्शन तक कर पाये सदियों लगजायेगे तुम्हें तुम्हारे हक मिलने में इसी तरह अगर अपना इलाज पित्रसत्ता को करने देती रही तो तुम स्त्रियों के नाम पर कलंक हो मरती हो रोज और बांसुरी भी बाजाती हो मतलब की इससे अच्छा है अपनी आवाज़ बंद कर लो और चापलूसी में ही रहो कम से कम कल्याण तो होता ही रहेगा तुम्हारा और हो क्या सकता है ।

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