इतिहास

विरासत : अवध के नवाब वाजिद अली शाह की कहानी!!

वाजिद अली शाह, अवध के आखिरी नवाब का नाम सुनते ही दिमाग में पहली प्रतिक्रिया क्या आती है? वहीं न, जो अपनी जूतियां खुद न पहन पाने के चलते अंग्रेज़ों के हाथों गिरफ्तार हो गए. इसके बाद उनके नाच-गानों और नवाबी शौक़ के चर्चे हो जाते हैं. इतिहास में कई बार कुछ किरदार गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं. वाजिद अली शाह भी ऐसे ही एक किरदार हैं. जिनकी शख्सियत के कई दूसरे पहलुओं पर उनकी कुछ एक ‘आदतें’ भारी पड़ी हैं.

1857 का गदर और नवाब की जूतियां

वाजिद अली शाह के बारे में कहा जाता है कि वो जूतियां न पहन पाने के चक्कर में भाग नहीं पाए. इतिहास इस कहानी की सच्चाई पर शक करने के कई वाजिब कारण देता है. पहली बात वाजिद अली शाह को 1856 में ही कलकत्ता निष्कासित कर दिया गया था. जब 1857 का गदर हुआ तब वे मटियाबुर्ज में थे. जहां ऐहतियातन उन्हें नज़रबंद कर दिया गया. ऐसे में गदर के दौरान भागने की कोई संभावना नजर नहीं आती. 1856 में भी शासन की स्थिति ऐसी थी कि वाजिद अली शाह को अंग्रेज़ों का कहना मानना ही पड़ता, वह जूतियां पहनते या न पहनते उनके हाथ से सब कुछ जाना तय था.

दरअसल 9 साल तक अवध के शासक रहे वाजिद अली शाह को विरासत में एक कमजोर राज्य मिला था. उनके पहले के नवाब अंग्रेज़ों से (प्लासी, बक्सर के समय) भिड़ चुके थे और हार चुके थे. अवध को इसके चलते अंग्रेज़ों को भारी जुर्माना देते रहना पड़ता था. शाह ने शासन संभाला और रोज़ दोपहर लखनऊ में अपनी पलटनों की परेड की सलामी लेना शुरू किया.

अंग्रेज़ इतिहासकार मैटकॉफ़ के मुताबिक अंग्रेज अधिकारियों ने तमाम तरीकों से दवाब बनाकर नवाब का इस परेड में जाना रुकवाया. इसके तुरंत बाद लॉर्ड डलहौज़ी भारत आया और सितंबर 1848 में अवध के लिए उसने एक खत में लिखा, ‘ये (अवध) वो चेरी है जो पेड़ हिलाते ही मुंह में आ गिरेगी.’ डलहौज़ी का अनुमान गलत था. अवध अंग्रेज़ों के कब्जे़ में आया तो, मगर 1857 के विद्रोह में सबसे आखिर में. वो भी लखनऊ शहर में 20 हज़ार मौतों के बाद.

परीखाना, महल और कत्थक

वाजिद अली शाह की जिंदगी के तीन पहलू हैं. उनका नवाब होना, उनका संगीत प्रेम और उनकी मोहब्बतों की दास्तान. तीनों को एक दूसरे से अलग करना बहुत मुश्किल है, मगर पहले बात उनकी मोहब्बत की. आज लखनऊ में जिस इमारत में भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय है. वाजिद अली शाह के समय उसे परीखाना कहते थे. इस इमारत में शाह की परियां रहती थीं. परी मतलब वो बांदियां जो नवाब को पसंद आ जाती थीं. इनमें से अगर कोई बांदी नवाब के बच्चे की मां बनती तो उसे महल कहा जाता. बेग़म हज़रत महल ने बांदी से बेगम होने का सफर महल के रास्ते ही तय किया था.

आगे बढ़ने से पहले बेगम हज़रत महल के बारे में कुछ बातें कहना और जानना ज़रूरी है. अवध 1857 के गदर में सबसे आखिर में कब्ज़े में आया. 10 मई 1857 को गदर बिना किसी योजना के शुरू हो गया. सितंबर 1857 में दिल्ली से बागियों को पूरी तरह खाली कर दिया गया. 18 जून 1858 को झांसी की रानी शहीद हुईं. 1 नवंबर 1858 को महारानी विक्टोरिया ने हिंदुस्तान को अपने हाथ में ले लिया. लेकिन अवध को बाग़ियों से खाली कराने में 7 जनवरी 1859 तक का समय लगा.

वाजिद अली शाह की गैर मौजूदगी में बेगम हज़रत महल मौलवी अहमद शाह और तमाम ‘नाचने-गानेवालों’ ने फिरंगी फौजों को शहर में घुसने नहीं दिया. आखिरी मोर्चा टूटने के बाद अंग्रेज़ों ने सबसे वीभत्स कत्लेआम भी लखनऊ में किया. सिकंदरबाग़ के बाहर सजाए गए कंकालों की तस्वीरें आज भी इसकी गवाह है.

बेगम हज़रत महल की दास्तान किसी और मौके के लिए छोड़कर वापस आते हैं वाजिद अली शाह पर. वाजिद अली शाह को औरत और मर्द के रिश्ते का पहला अहसास 8 साल की उम्र में रहीमन नाम की अधेड़ औरत ने करवाया. ये बात खुद नवाब ने अपनी किताब ‘इश्कनामा’ में लिखी है. इस किताब को कुछ और चीज़ों के साथ राजपाल प्रकाशन ने ‘परीखाना’ नाम से छापा है. वाजिद अली शाह ने कुल 60 किताबें लिखीं जिनमें से से ज़्यादातर अब नहीं मिलती हैं. हालांकि उनकी ‘बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए’ जैसी रचनाएं उनके मुकम्मल लेखक होने की तस्दीक करती हैं.

नवाब ने लगभग 300 शादियां कीं और तलाक़ भी खूब दिए. इनमें से कुछ निकाह थे. कुछ (112 से ज्यादा) मुताह थे. मुताह कुछ समय के लिए की जाने वाली शादी होती थी. हालांकि निकाह कब तक चलेगा और मुताह कब तक चलेगा इसकी कोई तय सीमा नहीं थी. लॉस्ट जनरेशन की लेखिका निधि दुग्गर अपने एक लेख में बताती हैं कि शाह की सबसे प्रिय बेग़म एक हिंदू, सरफराज़ महल थीं, 10 साल की शादी के बाद सरफराज़ ने इस्लाम कबूल कर लिया. इसके कुछ ही समय बाद नवाब से उनका तलाक हो गया. दूसरी तरफ नवाब की पहली मुताह वाली बीवी माशूक महल से उनका संबंध 30 साल चला. तलाक की सबसे बड़ी वजह बेगमों और उनके बच्चों के बढ़ते खर्चे और समय न देने के चलते होने वाले झगड़े होते थे.

नवाब के बारे में एक खास बात है. दुनिया जब गोरे रंग की दीवानी थी, वाजिद अली शाह गहरे रंग की चमड़ी के कद्रदान थे. उन्होंने अरब व्यापारियों की अफ्रीकी गुलाम औरतों से भी निकाह किए, इनमें से कुछ उनकी बॉडीगार्ड की तरह रहती थीं. इन्हीं में से एक बेगम का नाम अजायब खातून रखा गया.

अवध से मटियाबुर्ज और विरासत

इसमें कोई दो राय नहीं कि वाजिद अली शाह की पसंदीदा औरतों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है. इसमें समय-समय पर बदलाव भी होते रहे. मगर नवाब ने अपनी ‘परियों’ के लिए कई इंतज़ामात भी किए. उन्होंने ‘इश्कनामा’ में अपने प्रेम के अनुभवों को काफी खुल के लिखा है साथ ही यह भी बताया है कि परीखाना में 180 से ज्यादा औरतों को संगीत सिखाने के लिए नौकरी पर रखा गया था.

कत्थक का जो विस्तार उनके समय में हुआ उसके पहले और बाद में कभी नहीं हुआ. परीखाना की बेगमों, महलों और परियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी भी महिलाओं की थी. इसके लिए उन्हें हथियार चलाने जैसी चीज़ें भी सिखाई गईं. इसी का नतीजा था कि लखनऊ शहर की तवायफों, बेगमों और उनके साजिंदों से निपटने में अंग्रेजों को 10 महीने का समय लग गया.

कत्थक में नवाब खुद कृष्ण बनते और उनकी हूर परी और यास्मीन परी गोपियां बनतीं. कत्थक सिखाने वालों को महाराज कहा जाता. बिंदादीन महाराज से शुरू हुई विरासत बिरजू महाराज के ज़रिए आज भी जिंदा है. नवाब वाजिद अली शाह का ये सिलसिला कलकत्ता के मटिया बुर्ज में भी चला. वहां जाकर इसमें उनके भोजन प्रेम को वहां जाकर और विस्तार मिला.

अवध के नवाब खाने के सबसे बड़े जानकारों में थे. वाजिद अली शाह भी इसका अपवाद नहीं हैं. कहते हैं कि एक बार उन्होंने शहजादे आस्मां कद्र को खाने पर बुलाया. खाने के मेन कोर्स में मांस की जगह मुरब्बा रखा हुआ था. शहजादे को समझ नहीं आया कि खाने की मुख्य चीज़ मुरब्बा कैसे हो सकती है. उन्होंने जब उसे चखा तो पता चला कि वो मुरब्बा नहीं कोरमा था. शहजादे को बुरा लगा कि वो कोरमे और मुरब्बे का फर्क नहीं पहचान पाए. बाद में उन्होंने भी एक दावत रखी जिसमें सारी चीज़ें यहां तक की बर्तन भी चीनी के बने हुए थे. कोलकाता पहुंचकर नवाब की रसोई में बहुत प्रयोग हुए और एक नया क्वीज़ीन बना. मसलन कलकत्ता बिरयानी में आलू का इस्तेमाल शुरू हुआ.

वैसे खाने पर इतना ध्यान देने का एक विशेष कारण था. नवाब का बड़ा समय अपनी 300 ‘परियों’ को संतुष्ट करने में गुज़रता था. ऐसे में कई मसालों वाले कबाब, कुश्ते और तमाम चीज़ों के ज़रिए उन्हें ‘ताकत’ मिलती थी. कहते हैं असली गलावटी कबाब में 160 मसाले पड़ते थे.

जब मुसलमानों ने खेली होली

लोकप्रिय हल्कों में वाजिद अली शाह को सिर्फ एक रंगीन मिज़ाज और जनता के दुखों से दूर रहकर अपने शौक पूरे करने वाले नवाब की है. मगर इतिहास कई बार इसे ग़लत साबित करता है. लखनऊ शियाओं की भरमार वाला शहर रहा है. लेखिका सलमा हुसैन एक किस्से का ज़िक्र करती है. वाजिद अली शाह के समय में एक बार होली और मुहर्रम एक साथ पड़ा. मुहर्रम पर लखनऊ मातम में डूबा रहता है. लिहाजा हिंदुओं ने तय किया कि मुहर्रम के चलते होली पर रंग नहीं खेला जाएगा. मातम के बाद नवाब वाजिद अली शाह ने पूछा कि होली क्यों नहीं खेली जा रही? बताया गया कि हिंदू मोहर्रम के चलते जश्न नहीं मना रहे. नवाब ने हुक्म दिया कि मुसलमान भी हिंदुओं के सम्मान में होली खेलें. इसके बाद जमकर होली खेली गई. उनकी प्रसिद्ध ठुमरी भी है- मोरे कान्हा जो आए पलट के, अब के होली मैं खेलूंगी डट के…

वाजिद अली शाह के इस किस्से में मुमकिन है कि वक्त के साथ कुछ नमक मिर्च मिला दिया गया हो. फिर भी उनका व्यक्तित्व इसके सच होने की तस्दीक करता है. वाजिद अली शाह ने हारी हुई बाजी में भरकस अपने रंगढंग से कुछ निशान छोड़ने की कोशिश की. उनकी हर तस्वीर में आपको उनकी छाती का बायां हिस्सा बेढंगे तरीके से खुला मिलेगा. ये उनका तरीका था. दुनिया को चाहे जैसा लगे, मगर नवाब की चीज़ें नवाब के तरीके से ही होती थीं. इसीलिए जब राज्य, दौलत और रुतबा सब कुछ छूट रहा था तो बस एक ही बात उनके दिल से निकली- बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए.

सोर्स : (अनिमेष मुखर्जी)
(लेखक स्वतंत्र रूप से लेखन करते हैं)

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