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शोएब आफ़ताब को नीट परीक्षा में 720 में से 720 अंक मिले हैं!

Arif Kamal
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शोएब आफताब ने 720/720 मार्क्स नीट में प्राप्त करके इतिहास रच दिया।फेसबुक पर बधाइयों की भरमार है।मुस्लिम होना सबसे बड़ी वजह है।इसमे कोई शक नही की ये एक काबिले तारीफ कामयाबी है पर इसको मज़हबी एंगल से ही नही देखिये।जब मुस्लिम होने के नाते उसपर फक्र करें तो साथ ही इस सवालों पर भी विचार कीजिये।

1.क्या उसको तैयारी कराने वाले सभी टीचर मुस्लिम थे?
2.क्या उसके अंदर कामयाबी पाने को उत्सुकता पैदा करने वाले सभी मुस्लिम थे?
3.क्या उसकी हेल्प करने वाले उसके साथी सभी मुस्लिम थे?
4.क्या उसके मुस्लिम होने पर जो गर्व हम महसूस कर रहे है वही गर्व वो बच्चा भी महसूस कर रहा है या वो बस अबोध बालक की तरह बस अपनी कामयाबी में मग्न है बिना सोचे कि वो मुस्लिम है ?
5.सबसे आखीर में हमारा परीक्षा तंत्र जिसमे पारदर्शिता है और जो सांप्रदायिकता से मुक्त है।

हमारा समाज इतना गुथा हुआ है कि इसमे किसी भी कामयाबी नाकामयाबी को सम्प्रदाय में बाटना नामुमकिन है।कोई भी कामयाबी सर्वसमाज की कामयाबी है।कोई भी नाकामयाबी सर्वसमाज की नाकामयाबी है।

नीट परीक्षा का रिजल्ट आ चुका है. शोएब आफताब ने इस परीक्षा में टॉप किया है. उन्हें 720 में से 720 अंक मिले हैं. उनके अलावा आकांक्षा सिंह को भी 720 नंबर मिले हैं. इसको लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं. लोग जानना चाहते हैं कि जब दोनों को ही 720 नंबर मिले हैं तो शोएब को टॉपर क्यों घोषित किया गया है. चलिए बताते हैं, लेकिन उससे पहले दोनों के बारे में जान लीजिए.

शोएब आफताब

शोएब, उड़ीसा के राउरकेला के रहने वाले हैं. पिता बिजनेस करते हैं और मां गृहणी हैं. शोएब बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहते थे. लिहाजा तैयारी के लिए पहुंच गए राजस्थान के कोटा शहर. लगातार ढाई साल तक पढ़ते रहे. ना छुट्टी ली और ना ही एक भी बार अपने घर गए. केवल पढ़ाई को ही लक्ष्य बना लिया. वो कहते हैं-

“मेरे परिवार में कोई डॉक्टर नहीं है. मैं बचपन से ही डॉक्टर बनना चाहता था. मुझे मेरे परिवार का बहुत सपोर्ट मिला, खास तौर पर मम्मी जो मेरे साथ हर परिस्थिति में खड़ी रहीं.”

आकांक्षा सिंह

आकांक्षा वैसे तो यूपी के कुशीनगर की रहने वाली हैं लेकिन उन्होंने नीट की तैयारी दिल्ली से की थी. उन्होंने 10वीं तक की पढ़ाई गांव से की और उसके बाद दिल्ली आ गईं, ताकि डॉक्टर बनने का सपना पूरा कर सकें. उनके पिता एयरफोर्स से रिटायर डॉक्टर हैं और उनकी मां टीचर हैं. आकांक्षा कहती हैं-

“दिल्ली में मेरे पिता मेरे साथ रहते थे, ताकि मैं स्कूल की पढ़ाई के साथ साथ नीट की तैयारी भी कर सकूं और डॉक्टर बन पाऊं.”

शोएब कैसे बने टॉपर?

चलिए अब आपको बताते हैं कि दोनों के ही नंबर जब 720 थे तो शोएब टॉपर कैसे बन गए. इस सवाल के जवाब को समझने के लिए आपको नीट रिजल्ट की प्रणाली को थोड़ा सा समझना होगा. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की टाई ब्रेकर नीति की मदद से इसका निर्धारण किया जाता है.

होता ये है कि अगर दो छात्रों के एक जैसे नंबर आते हैं तो उस छात्र को वरीयता मिलती है जिसके बायोलॉजी में अधिक नंबर होते हैं. लेकिन यदि बायो में भी एक जैसे नंबर हों तो केमिस्ट्री में अधिक नंबर वाले को वरीयता दी जाती है. इसके बाद भी अगर टाई की स्थिति बनती है तो फिर ये देखा जाता है कि किसने कम गलत सवाल किए हैं.

और आखिर में यहां भी मामला फंस जाए तो जिस छात्र की उम्र अधिक होती है उसे रैंकिंग में वरीयता दी जाती है. शोएब और आकांक्षा वाला मामला भी कुछ ऐसा ही है. यानि शोएब और आकांक्षा हर पैमाने पर एक जैसे साबित हुए जिसके बाद उम्र वाले फैक्टर के चलते शोएब टॉपर बन गए.

कुछ और मामलों में भी यही हुआ

जानकारी के मुताबिक इसी नीति को तेलंगाना की तूम्मला स्निकिथा, राजस्थान के विनीत शर्मा, हरियाणा की अमरिशा खैतान और आंध्र प्रदेश की गुत्थी चैतन्य सिंधू की रैंकिग के लिए इस्तेमाल किया गया. इनको 720 में से 715 नंबर मिले थे और टाई ब्रेकर नीति के चलते क्रमश: तीसरी, चौथी, पांचवीं और छठी रैंक दी गई.

इसी तरह 8 से लेकर 20 नंबर तक रहने वाले बच्चों ने 710 नंबर हासिल किए हैं, जबकि 25 से 50 नंबर तक रहने वाले छात्रों को 705 नंबर मिले हैं.

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