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फ़क़ीर ने कहा है, रोम रोम रस पीजिए….

Ishani Sinh
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एक मित्र ने पूछा है: सत्संग क्या है? कैसे किया

अब तक सत्संग के केंद्र में सदगुरु, कोई संत, कोई महात्मा रहा है; सत्संग के केंद्र में गुरु रहा है; कहीं जहां सत्य मिल सके वहां जाना चाहिए, ऐसा भाव रहा है। लेकिन मेरी दृष्टि में, सत्संग के केंद्र में गुरु नहीं, वरन शिष्य ही है। यह सवाल नहीं है कि किससे आप सीखने जाएं, सवाल यही है कि क्या आपमें सीखने की क्षमता विकसित हुई? यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि आप कहां जाएं, यह महत्वपूर्ण है कि आपके भीतर सीखने का दृष्टिकोण, एटिटयूड ऑफ लर्निंग है या नहीं?

यदि आपके भीतर सीखने की क्षमता है, तो सारा जीवन ही सत्संग हो जाता है। उठना-बैठना, पक्षी और पौधे भी सत्संग बन जाते हैं, सामान्य मनुष्य भी सत्संग बन जाते हैं। लेकिन सीखने की दृष्टि न हो और आप स्वयं परमात्मा के साथ भी निवास करें, तो भी स्मरण रखें, सत्संग नहीं होगा। सत्संग किसी और पर नहीं, आपके होने पर निर्भर है, आपके जीवन के ढंग पर। खुली हुई आंख होनी चाहिए तो पूरा जीवन ही सत्संग है, पूरा जीवन एक शिक्षण है। जन्म से लेकर मृत्यु तक अबाध चारों तरफ जो जीवन का सागर है, वही, वही बहुत-बहुत अर्थों में, बहुत-बहुत रूपों में, बहुत सी दिशाओं से उपस्थित होता है; और अगर हमारे भीतर द्वार हो, हृदय खुला हो, तो सब भांति उसकी लहरें हमारे जीवन को कुछ दे जाती हैं।


लेकिन मैं तो यह देखता हूं कि सत्संग का यही खयाल है कि किसी गुरु के पास जाकर आप बैठें और उससे सीखें। इस धारणा के कारण सीखने वाला तो कम महत्वपूर्ण हो गया और सिखाने वाला बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। सारी गुरुडम इसी बात से पैदा हुई है। और वे जो गुरु हैं वे भी यही सिखाते हैं कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं होगा, इसलिए आओ और हमें गुरु बनाओ। जब कि सचाई यह है कि जिस आदमी को सत्य का अनुभव हुआ हो, उसे तो खयाल भी न होगा कि वह आपका गुरु बन जाए। और अगर आप उससे कहें भी तो उसे हैरानी ही होगी। क्योंकि गुरु बनने की जो दौड़ है, वह कोई सत्य का साक्षात किसी को हुआ हो, किसी के जीवन में प्रकाश उतरा हो, उसके चित्त में नहीं हो सकती है।

यह गुरु होने की दौड़ भी अधिकार की और शक्ति पाने की दौड़ है। और इसीलिए तो एक गुरु दूसरे गुरु के विरोध में खड़ा है। एक गुरु अपना घेरा बनाए हुए है, दूसरा गुरु अपना घेरा बनाए हुए है। और वे गुरु यह भी समझाते हैं कि हम ही सदगुरु हैं, और किसी के पास मत जाना, और सब मिथ्या गुरु हैं। यह सारा का सारा एक व्यवसाय और धंधा बन गया। और इस धंधे के केंद्र पर मनुष्य-जाति को बहुत हानि झेलनी पड़ी है।

तो मैं उस केंद्र को ही बदल देने के लिए उत्सुक हूं। गुरु महत्वपूर्ण नहीं है सत्संग में, सत्संग में महत्वपूर्ण हैं आप, आपकी सीखने और देखने की दृष्टि, आपका खुला हुआ मन। और तब फिर किसी व्यक्ति का सवाल नहीं है, जीवन में जहां भी आप हैं, सब तरफ सीखने को बहुत है।
एक मुसलमान फकीर मरने को था। किसी ने उससे पूछा मरते वक्त कि तुमने किससे सीखा ज्ञान?


उसने कहा, बड़ा कठिन है। किस-किस के नाम लूं? जीवन में एक भी क्षण ऐसा नहीं बीता जब मैंने किसी से कुछ न सीखा हो। एक बार रास्ते से निकलता था, एक छोटा सा बच्चा हाथ में दीया जलाए हुए कहीं जा रहा था। मैंने उस बच्चे से पूछा कि क्या बेटे तुम बता सकते हो कि दीये में जो ज्योति है यह कहां से आई है? मैंने सोचा था कि छोटा बच्चा है, चकित होकर रह जाएगा, उत्तर न दे पाएगा। लेकिन उस बच्चे ने क्या किया? उसने फूंक मार दी और दीये को बुझा दिया और मुझसे कहा कि अब तुम ही बताओ कि ज्योति कहां चली गई है? मैंने उस बच्चे के पैर पड़ लिए, मुझे एक गुरु मिल गया था। और मैंने जाना कि छोटे से बच्चे के प्रति भी यह भाव लेना कि वह छोटा है, गलत है। वहां भी कुछ रहस्यपूर्ण मौजूद हुआ है, वहां भी कुछ जन्मा है। केवल उम्र में पीछे होने से उसे छोटा मान लेना भूल है। मेरे पास कोई उत्तर न था। तब मैंने जाना कि जो मैंने पूछा था वह बड़ा अज्ञानपूर्ण था। और तब मैंने जाना कि जहां तक उस प्रश्न के उत्तर का संबंध है, मैं भी उतना ही बच्चा हूं जितना वह बच्चा है। मेरे बुजुर्ग होने का भ्रम टूट गया। और यह भ्रम टूट जाना एक अदभुत शिक्षा थी जो एक छोटे से बच्चे ने मुझे दी थी, वह मेरा गुरु हो गया था।

और एक बार, उस फकीर ने कहा कि मैं एक गांव में ठहरा हुआ था। और एक औरत भागी हुई आई, उसके कपड़े अस्तव्यस्त थे, उसने बुर्का न ओढ़ रखा था। उसने आकर मुझसे पूछा कि क्या आपने किसी आदमी को यहां से निकलते देखा है? तो मैंने उससे कहा कि बदतमीज औरत, पहले अपने कपड़े ठीक कर और फिर मुझसे कुछ पूछ। उस स्त्री ने कहा, माफ करें, मैं तो समझी कि आप परमात्मा के दीवाने और प्यारे हैं। मेरा प्रेमी इस रास्ते से निकलने वाला है, मैं उसे खोजने निकली हूं, वर्षों के बाद इधर से वह आने को है। तो मैं तो उसके प्रेम में इतनी दीवानी हो गई कि वस्त्रों की कौन कहे, मुझे अपनी देह की भी कोई सुध नहीं! लेकिन तुम परमात्मा के प्रेम में इतने भी दीवाने न हो सके कि दूसरे के वस्त्र तुम्हें दिखाई न पड़ें!


उस फकीर ने कहा, मैंने उसके पैर पड़ लिए और मैंने कहा, तेरा प्रेम मुझसे ज्यादा गहरा है। और मैं सोचता था कि मैं परमात्मा का प्रेमी हूं, तूने बता दिया कि नहीं हूं। जिसे अभी दूसरों के वस्त्र भी दिखाई पड़ते हैं, वह क्या परमात्मा का प्रेमी होगा? जो प्रेम में इतना भी नहीं, इतना भी नहीं डूब पाया जितना कि एक सामान्य स्त्री अपने प्रेमी के खयाल में डूब जाती है! तो वह स्त्री मेरी गुरु हो गई।

और उस फकीर ने कहा, एक बार एक गांव में मैं आधी रात भटका हुआ पहुंचा। गांव के सारे लोग सो गए थे, सिर्फ एक आदमी एक मकान के पास, दीवाल के पास बैठा हुआ मुझे मिला। मेरे मन में खयाल हुआ कि हो न हो यह कोई चोर होना चाहिए। इतनी रात किसी दूसरे के मकान की दीवाल से यह कौन टिका है? मेरे मन में यही खयाल उठा कि कोई चोर होना चाहिए। लेकिन उस आदमी ने मुझसे पूछा, राहगीर, भटक गए हो? चलो, कृपा करो, मेरे घर में ठहर जाओ, अब तो रात बहुत गहरी हो गई और सरायों के दरवाजे भी बंद हो चुके हैं। वह मुझे अपने घर ले गया और मुझे सुला कर उसने कहा कि मैं जाऊं, रात्रि में ही मेरा व्यवसाय चलता है। तो मैंने पूछा, क्या है तुम्हारा व्यवसाय? उसने कहा कि परमात्मा के एक फकीर से झूठ न बोल सकूंगा, मैं एक गरीब चोर हूं।

वह चोर चला गया। और उस फकीर ने कहा कि मैं बहुत हैरान रह गया, इतनी सचाई तो मैं भी नहीं बोल सकता था। मेरे मन में भी कितनी बार चोरी के खयाल नहीं उठे! और मेरे मन में भी कौन-कौन सी बुराइयां नहीं पाली हैं! लेकिन मैंने कभी किसी को नहीं कहीं। इतना सरल तो मैं भी न था जितना वह चोर था। और रात जब पूरी बीत गई तो वह चोर वापस लौटा, धीरे-धीरे कदमों से घर के भीतर प्रवेश किया ताकि मेरी नींद न खुल जाए। मैंने उससे पूछा, कुछ मिला? कुछ लाए? उस चोर ने कहा, नहीं, आज तो नहीं, लेकिन कल फिर कोशिश करेंगे। वह खुश था, निराश नहीं था।

फिर तीस दिन मैं उसके घर में मेहमान रहा और वह तीस दिन ही घर के बाहर रोज रात को गया और हर रोज खाली हाथ लौटा और सुबह जब मैंने उससे पूछा कि कुछ मिला? तो उसने कहा, नहीं, आज तो नहीं, लेकिन कल जरूर मिलेगा, कल फिर कोशिश करेंगे। फिर महीने भर के बाद मैं चला आया। और जब मैं परमात्मा की खोज में गहरा डूबने लगा और परमात्मा का मुझे कोई कोर-किनारा न मिलता था और मैं थक जाता था और हताश हो जाता था और सोचने लगता था कि छोड़ दूं इस दौड़ को, खोज को, तब मुझे उस चोर का खयाल आता था जो रोज खाली हाथ लौटा, लेकिन कभी निराश न हुआ और उसने कहा कि कल फिर कोशिश करेंगे। और उसी चोर के बार-बार खयाल ने मुझे निराश होने से बचाया। जिस दिन, जिस दिन मुझे परमात्मा की ज्योति मिली, उस दिन मैंने अपने हाथ जोड़े और उस चोर के लिए प्रणाम किया, अगर वह उस रात मुझे न मिला होता तो शायद मैं कभी का निराश हो गया था।

ऐसे उस फकीर ने बहुत सी बातें कहीं जिनसे उसने सीखा।

जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ी शिक्षा है। जिंदगी चारों तरफ बहुत बड़ा सत्य है। जिंदगी चारों तरफ रोज-रोज खड़ी है द्वार पर। हमारी आंखें बंद हैं और हम पूछते हैं: सत्संग करने कहां जाएं? और हम पूछते हैं: किसके चरण पकड़ें, किसको गुरु बनाएं? और जिंदगी चारों तरफ खड़ी है सब कुछ लुटा देने को, सब कुछ खोल देने को, और उसके प्रति हमारी आंखें बंद हैं और हृदय बंद है।

तो मैं नहीं कहता कि सत्संग करने कहीं जाएं। वैसा हृदय बनाएं अपना कि चौबीस घंटे सत्संग हो जाए। जिंदगी में सब कुछ ऐसा है कि जिससे सीखा जा सके, पाया जा सके, जाना जा सके। कोई दृष्टि खुल जाए, कोई अंतर्दृष्टि खुल जाए।


लेकिन ये सत्संग करने वाले लोग, जो कहीं और खोजने चले जाते हैं, ये कभी न पा सकेंगे, कभी न पा सकेंगे, इनके पास बंद आंखें थीं। अन्यथा ये जीवन से ही पा लेते। और बंद आंखें लेकर ये कहीं भी चले जाएं, क्या फर्क पड़ेगा? कहीं भी जाएं, कहीं भी खोजें, कुछ भी इन्हें नहीं मिलेगा। क्योंकि जो द्वार खुले चाहिए वे द्वार तो बंद हैं।

तो मैं नहीं कहता कि सत्संग करने कहीं जाएं। मैं तो यह कहता हूं कि वह दृष्टि बनाएं खुली हुई जो सीख सकती है। अपने बच्चे से सीखें, अपने नौकर से, अपने घर के बाहर खड़े हुए भिखारी से, चारों तरफ…दरख्तों से, पौधों से…जो सीख सकते हैं, जो जान सकते हैं, वे कहीं से भी जान लेते हैं। एक दरख्त से सूखा गिरा हुआ पत्ता भी दृष्टि को खोल सकता है; आंख खुल सकती है। लेकिन उसकी तैयारी चाहिए। और इस तैयारी में गुरु का कोई भी मूल्य नहीं है, इस तैयारी में हमेशा उसका मूल्य है जो खोज पर निकला है।


तो मैं नहीं कहता कि गुरु जरूरी है ज्ञान के लिए। मैं कहता हूं, सीखने की क्षमता जरूरी है। आध्यात्मिक जीवन में गुरु नहीं होते, केवल शिष्य होते हैं। गुरु नहीं होते, टीचर्स नहीं होते, केवल डिसाइपल्स होते हैं। और जहां गुरु भी होते हों, समझना कि वहां धंधा होता होगा धर्म के नाम पर।
लेकिन आज तो हालतें उलटी हो गई हैं। शिष्य तो कोई भी नहीं है, गुरु करीब-करीब सभी हैं।

एक युवक एक आश्रम में पहुंचा था। उसने आश्रम के प्रधान से जाकर कहा, मैं भी इस आश्रम में आया हूं सीखने, सत्संग करने, सत्य की खोज करने, साधना करने।

तो उस गुरु ने कहा, उस प्रधान ने कहा, हमारे आश्रम में दो तरह के लोग हैं: एक तो शिष्य हैं सीखने वाले और एक गुरुजन हैं सिखाने वाले। लेकिन शिष्य होना बहुत कठिन है, सीखना बड़ी तपश्चर्या है, सीखना बड़ा श्रम है, बहुत कठिनाई होगी। क्या तुम शिष्य बनना चाहते हो?
उसने सारी कठिनाइयां बताईं कि ये-ये कठिनाइयां हैं। उस युवक ने कहा कि नहीं, ये तो बहुत ज्यादा कठिनाइयां हैं। अब कृपा करके यह बताइए कि गुरु होने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?


उस प्रधान ने कहा, गुरु होने के लिए कोई विशेष काम नहीं करना पड़ता, गुरु बनने की तरकीब आनी चाहिए, तो कोई भी गुरु बन सकता है। बोलना आना चाहिए, समझाना आना चाहिए, तो कोई भी गुरु बन सकता है।

वह युवक बोला, तो फिर मुझे गुरु ही बना लीजिए। बोलना भी मुझे आता है, समझाना भी मुझे आता है।
वह गया था सत्य की खोज में, लेकिन गुरु बन गया। अक्सर लोग सत्य की खोज में जाते हैं सत्संग करने और धीरे-धीरे दूसरों को सत्संग करवाने लगते हैं और यह भूल ही जाते हैं कि वे सत्संग करने आए थे। असल में सीखने की तो कोई दृष्टि नहीं है, सीखने के लिए जो सरल खुला हुआ हृदय चाहिए वह नहीं है।

-OSHO_रोम रोम रस पीजिए

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