साहित्य

2020 का साहित्य का नोबेल अमेरिकी कवयित्री लुईस ग्लूक को दिया गया : प्रस्तुत है उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद

Sawai Singh Shekhawat
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इस बार का साहित्य-नोबेल
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दोस्तो वर्ष 2020 का साहित्य का प्रतिष्ठित नोबेल सम्मान इस बार अमेरिकी कवयित्री लुईस ग्लूक को दिया गया है।प्रस्तुत है उनकी एक कविता का हिंदी अनुवाद।यह त्वरित और जिंदा अनुवाद बेहद संवेदनशील वरिष्ठ कवि-कथाकार मित्र गोपाल माथुर ने किया है।

एक कपोल कल्पना
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मैं आपको कुछ बताती हूँ
रोजाना लोग मर रहे हैं
और यह सिर्फ शुरुआत है
प्रतिदिन कब्रिस्तान में जन्म लेती हैं नई विधवाएँ
और नए अनाथ
वे घुटनों पर हाथ बाँध कर बैठ जाते हैं,
और इस नए जीवन के बारे में
कुछ निर्णय करने की कोशिश करते हैं
वे कब्रिस्तान जाते हैं
उनमें से कुछ तो पहली बार
वे रोने से डरते हैं
कभी नहीं रोने से
कोई विनम्रतापूूर्वक उन्हें समझाता है
कि उन्हें आगे क्या करना है,
उसके कहने का अर्थ हो सकता है
कि वह कुछ कह रहा है,
कोई कब्र की मिट्टी में मिट्टी डालता है
और उसके बाद सब घर चले जाते हैं
जो अचानक आगंतुकों से भरा गया होता है
विधवा सोफे पर बैठी है, बहुत शालीन ढंग से
लोग उस तक पहुँचने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े हुए हैं
कोई उसका हाथ स्पर्श करता है
तो कोई उसे गले लगा लेता है
वह प्रत्येक व्यक्ति से कुछ न कुछ कहती है
धन्यवाद जैसे कुछ शब्द
दुःख की इस घड़ी में आने के लिए धन्यवाद
पर मन से वह चाहती है
कि अब वे सब लोग चले जाएँ
वह कब्रिस्तान वापस जाना चाहती है
और उस अस्पताल के कमरे में भी
वह जानती है यह संभव नहीं है
लेकिन यही उसकी एकमात्र आशा है
विगत में जाने की इच्छा
बस थोड़ा सा और पीछे
विवाह की स्मृतियों तक ही नहीं,
अपने पहले चुंबन तक!

अनुवाद : गोपाल माथुर

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