दुनिया

21वीं शताब्दी इस्राईल की बेहद भयानक साज़िश की शताब्दी है, निशाने पर है पूरा इस्लामी जगत : रिपोर्ट

पहले विश्व युद्ध के विजेता देशों ने 1920 में इटली के सैनिक रीमो में बैठक की जहां पश्चिमी एशिया के इलाक़े के बारे में पहले से तैयार हो चुके दस्तावेज़ को लागू करने के लिए कई समझौतों को अंतिम रूप दिया गया।

सन रीमो सम्मेलन

इस बैठक में ब्रिटेन, फ़्रांस और इटली के प्रधानमंत्रियों ने हिस्सा लिया था। इस बैठक में कई यहूदी नेता भी शामिल हुए जिनमें एक हाईहीम वाइज़मैन और दूसरे नाहूम सोकोलोफ़ थे। ब्रितानी ज़ायोनी नेता हर्बर्ट सैमुएल भी उन मशहूर नेताओं में थे जो इस बैठक में शामिल हुए। उन्होंने बेलफ़ोर समझौते की स्क्रिप्ट तैयार की थी। इस बैठक में पूरे पश्चिमी एशिया के इलाक़ों को फ़्रांस और ब्रिटेन ने आपस में बांट लिया।

रोचक बात यह है कि अरब व इस्लामी इलाक़े को बांटने के लिए आयोजित होने वाली बैठक में तीन यहूदी नेता तो शामिल हुए लेकिन एक भी अरब नेता वहां मौजूद नहीं था। हालांकि कई अरब नेता थे जिन्होंने अंग्रेज़ों का बहुत साथ दिया था।

क़ाहेरा सम्मेलन

बाद में 1921 में चर्चिल कुछ अधिकारियों के साथ क़ाहेरा आए और वहां हुई बैठक में अरब नेताओं और क़बायली सरदारों को अलग अलग इलाक़ों की ज़िम्मेदारियां दी गईं। बेलफ़ोर समझौते की स्क्रिप्ट लिखने वाले हर्बर्ट सैम्युएल को फ़िलिस्तीन के लिए विशेष यहूदी दूत नियुक्त किया गया था जिनकी ज़िम्मेदारी फ़िलिस्तीन की ओर यहूदियों के पलायन का रास्ता तैयार करना और यहूदी सरकार के गठन के लिए बुनियादें मज़बूत करना था।

जिन क़बायली सरदारों को ज़िम्मेदारियां सौंपी गई थीं उन्होंने अपने अपने इलाक़े में बड़ी कर्तव्य परायणता से काम किया। स्थिति यह हो गई कि इन नेताओं ने अपने अपने इलाक़ों में अपने पश्चिमी आक़ाओं के इशारे पर काम किया।

सौ साल गुज़र जाने के बाद अब फिर तीन यहूदी नेता सक्रिय नज़र आ रहे हैं। इनमें एक यहूदी नेता वाइट हाउस में है जिसका नाम जेर्ड कुशनर है दूसरा यहूदी नेता वह है जिसने फ़िलिस्तीनी इलाक़ों में बसाई गई यहूदी बस्तियों में बड़े पैमाने पर पूंजीनिवेश किया है, तीसरा यहूदी नेता अमरीकी राजदूत है जो अब जार्डन में है। जेर्ड कुशनर ने डील आफ़ सेंचुरी के नाम से जो मसौदा तैयार करवाया है वह इस्राईल की स्थापना वाले मसौदे का ही अपडेटेड वर्जन लगता है। इस वर्जन में आर्थिक हथियारों की मदद से लक्ष्यों को पूरा करने की कोशिश की जा रही है।

इस समय यहूदी विचारक जो सक्रिय हैं वह जार्डन में अमरीकी राजदूत हेनरी वोस्टर है। लंबे समय तक इंतेज़ार के बाद 13 नवम्बर 2019 को वोस्टर को राजदूत नियुक्त करके उनका नाम स्वीकृति के लिए कांग्रेस में भेजा गया। वोस्टर के जार्डन आने की पूरी प्रक्रिया को देखा जाए तो साफ़ नज़र आएगा कि उनको जार्डन भेजने के फ़ैसले को बार बार इसलिए टाला गया कि डील आफ़ सेंचुरी को लागू करने के अनुकूल हालात तैयार हो जाएं।

इमारात के अलख़लीज आनलाइन अख़बार में 26 अगस्त 2020 को एक लेख लिखा गया जिसका शीर्षक था हैफ़ा और गल्फ़ रेलवे लाइन परियोजना अब कहां पहुंची?

इस्राईल एक रेलवे लाइन की परियोजना पर काम कर रहा है जो भूमध्यसागर को फ़ार्स खाड़ी से जोड़े। इस बारे में इस्राईली मंत्री काट्ज़ ने भी बयान दिया कि यह रेलवे लाइन इमारात को भूमध्यसागर से जोड़ देगी। इस्राईली मंत्री के अनुसार यह रेलवे लाइन हैफ़ा से बीसान, वहां से जार्डन को जोड़ने वाले शैख़ हुसैन ब्रिज तक और वहां से इरबद शहर और फिर दोहा क़तर और सऊदी अरब पहुंचेगी।

लेख के अनुसार यह रेलवे लाइन इस्राईल को ट्रांज़िट का केन्द्र बना देगी और जार्डन की स्थिति भी बहुत ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी। इसकी मदद से यूरोप और अमरीका के साथ इमरात, सऊदी अरब और इराक़ व्यापार कर सकेंगे।

इस्राईली मंत्री के अनुसार इस रास्ते से होने वाला व्यापार 2030 तक ढाई सौ अरब डालर तक पहुंच जाएगा।

इस परियोजना का यह मतलब होगा कि कई अरब देशों की अर्थ व्यवस्था इस्राईल की मुट्ठी में होगी।

यहां मेरे दो सवाल हैं। पहला सवाल यह है कि इस्राईल की हैफ़ा बंदरगाह की प्रतिद्वंद्वी बंदरगाह कौन सी हो सकती है? जवाब यह है कि लेबनान की बैरूत बंदरगाह। इसलिए हम यह कहते हैं कि बैरूत बंदरगाह में धमाके से मची तबाही का सबसे ज़्यादा फ़ायदा इस्राईल को मिला है। दूसरा सवाल यह है कि जब ज़ायोनियों की यह योजना हमें नज़र आ रही है तो क्या हमें अरब सरकारों के स्तर पर यह कोशिश नहीं करना चाहिए कि अरब देशों को एक परियोजना के ज़रिए एक दूसरे से जोड़ दें और इस प्रकार की सारी परियोजनाओं को नाकाम करने की इस्राईली कोशिशों को नाकाम बनाएं।

हमें यह भी समझना होगा कि अमरीका की हर परियोजना सही और सफल नहीं होती। इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ अमरीकी युद्धों से साबित हो गया कि अमरीका अपनी दूरगामी परियोजनाओं में बुरी तरह नाकाम हुआ।

जहां तक अरब सरकारों के इस्राईल से समझौते की बात है तो हमने पहले ही बताया कि साम्राज्यवादी शक्तियों ने इन सरकारों का गठन किया था और उन्हें ज़िम्मेदारियां सौंपी थीं तो समझौता कोई नई बात नहीं है इससे कुछ भी बदला नहीं है इस्राईल से अरब सरकारों का संबंध तो बहुत पुरानी सच्चाई है। नई सच्चाई यह है कि इस्राईल इस समय आंतरिक रूप से कमज़ोर और विभाजित है। तीन चुनाव हो चुके हैं मगर सरकार नहीं बन पा रही है।

इस्राईल से समझौते करने वाली सरकारों को एक दिन पता चलेगा कि उन्होंने अंतिम सांसे ले रहे घोड़े पर दावं लगाया है।

अब्दुल हय ज़लूम

वरिष्ठ फ़िलिस्तीनी लेखक और ऊर्जा मामलों के सलाहकार

सऊदी अरब इस्राईल से हाथ मिलाने की तैयारी में, क्या फिलिस्तीनियों की मदद बंद करने वाला है सऊदी अरब ?

अलखलीज आनलाइन में मुहम्मद अबू रिज़्क़ का एक आलेख छपा है जिसमें सऊदी अरब और पीड़ित फिलिस्तीनियों की दशा का जायज़ा लिया गया है।

एक सुनियोजित योजना के तहत सऊदी अरब ने, शाही परिवार के एक सदस्य और शाही परिवार से निकट एक समाचार पत्र की मदद से फिलिस्तीनियों पर धावा बोल दिया है और अब यह प्रचार किया जा रहा है कि सऊदी अरब, फिलिस्तीन को जो आर्थिक मदद देता है उसे रोक देगा।

फिलिस्तीनियों पर सऊदियों का ताज़ा धावा, ओकाज़ समाचार पत्र के संपादक, जमील अज़्ज़ेयाबी की ज़बान से किया गया। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब ने फिलिस्तीनी मुद्दे का बहुत समर्थन किया है लेकिन अब सऊदी शासकों को निराशा हो रही है और औपचारिकता व शिष्टाचार का समय बीत चुका है।

इस से पहले वाशिंग्टन में सऊदी अरब के पूर्व राजदूत और सऊदी खुफिया एजेन्सी के भूतपूर्व प्रमुख प्रिंस बंदर बिन सुल्तान ने कहा था कि फिलिस्तीनी प्रशासन ने , फिलिस्तीन को टुकड़े टुकड़े कर दिया और फिलिस्तीनी मुद्दे को ही खत्म कर दिया।

बंदर बिन सुल्तान ने फिलिस्तीनी सरकार और उसके प्रमुख महमूद अब्बास की आलोचना पर ही संतोष नहीं किया बल्कि उन्होंने यूएई और बहरैन द्वारा इस्राईल से हाथ मिलाने के विरोधी फिलिस्तीन के सशस्त्र गुटों पर भी धावा बोला। सऊदी शाही घराने के इस सदस्य ने सऊदी अरब की ओर से फिलिस्तीन की जाने वाली आर्थिक सहायता का भी उल्लेख किया जिसके बाद विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह सऊदी अरब की ओर से फिलिस्तीन को दी जाने वाली मदद को पूरी तरह से खत्म करने की भूमिका हो सकती है।

सन 2017 में जब बिन सलमान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बने तभी से फिलिस्तीन के बारे में सऊदी अरब का रुख बदलने लगा था क्योंकि इस्राईली, सऊदी अरब के निकट हो चुके थे। सऊदी अरब से इस्राईल के निकट होने के बाद नंवबर 2016 में सऊदी अरब ने फिलिस्तीन को मदद की रक़म देने से इन्कार कर दिया जो लगभग 140 मिलयन डालर थी।

यह एसी दशा में है कि आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ नस्र अब्दुलकरीम का मानना है कि सन 2019 से पहले तक सऊदी अरब फिलिस्तीन को हर साल 100 मिलयन डालर की मदद करता था लेकिन जारी वर्ष में सऊदी अरब ने अब तक फिलिस्तीन को एक डालर भी नहीं दिया है। उनका मानना है कि सऊदी अरब की ओर से फिलिस्तीनियों की मदद रोके जाने की मुख्य वजह, सऊदी अरब के राजनीतिक रुख में परिवर्तन है लेकिन अभी तक उसमें इसका खुल कर एलान करने की हिम्मत नहीं है क्योंकि उसे डर है कि इस प्रकार की घोषणा से इस्लामी जगत के अलावा स्वंय सऊदी अरब में भी जनता में आक्रोश फैल जाएगा। यही वजह है कि सऊदी अरब ने चुपचाप आर्थिक मदद रोक दी है।

रिपोर्टों के अनुसार सन 2020 में सऊदी अरब ने फिलिस्तीन को दी जाने वाली आर्थिक मदद पूरी तरह से रोक दी है जैसा कि फिलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने भी इस बारे में खुल कर बात की है।

सऊदी अरब की आर्थिक मदद रुक जाने से फिलिस्तीनी सरकार पर क्या प्रभाव पड़ सकता है? इस सवाल का जवाब देते हुए अब्दुलकरीम कहते हैं कि इस से फिलिस्तीनी सरकार पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ेगा लेकिन फिर भी 350 मिलयन महीने की आमदनी वाली फिलिस्तीनी सरकार 100 मिलयन महीने की आमदनी पर भी रह सकती है।

फिलिस्तीनी प्रशासन बजट में कमी को लोन लेकर पूरा कर सकती है। याद रहे सऊदी अरब ने हांलाकि यूएई और बहरैन द्वारा इस्राईल से संबंध बनाने को अरब शांति योजना का विरोध बताया है लेकिन उसने इस दोस्ताना की आलोचना में ज़बान नहीं खोली है। अरब शांति योजना में इस्राईल के साथ संबंध बनाने के लिए यह शर्त है कि इस्राईल सभी अवैध अधिकृत इलाक़ों को छोड़ दे और बैतुलमुक़द्दस की राजधानी के साथ एक फिलिस्तीनी देश बनाने पर सहमत हो।

इस्राईल के साथ यूएई और बहरैन के संबंधों के बाद फिलिस्तीनी प्रशासन ने अबूधाबी और मनामा से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया था क्योंकि फिलिस्तीनियों की नज़र में इस्राईल से संबंध बनाना , फिलिस्तीन के साथ गद्दारी है।

बेशक ईरान, सीरिया, वेनेज़ोएला और उत्तरी कोरिया के ख़िलाफ़ अमरीका के प्रतिबंध कोरोना महामारी के दौर में निंनदीय यातना है, नुक़सान उठाने वाले राष्ट्र क्या कभी यह अपराध भूल पाएंगे?

ब्रितानी अख़बार इंडिपेंडेंट ने ईरान के सभी क्षेत्रों पर लगाए गए अमरीकी प्रतिबंधों को अगर भयानक यातना और सरकारी आतंकवाद का नाम दिया है तो ग़लत नहीं किया है, यह वाक़ई मानवता के ख़िलाफ़ अपराध है।

इन प्रतिबंधों से जो पिछले चालीस साल से लगातार बढ़ते जा रहे हैं केवल ईरान की आम जनता को नुक़सान पहुंच रहा है। यही हाल वेनेज़ोएला, लीबिया, उत्तरी कतरिया, सीरिया, फ़िलिस्तीन और लेबनान के खिलाफ़ लगाए गए अमरीकी प्रतिबंधों का है।

अमरीकी प्रतिबंध ईरान की शासन व्यवस्था को ध्वस्त करने में नाकाम रहे और सीरिया में भी सत्ता परिवर्तन नहीं करवा सके। वेनेज़ोएला में तो राष्ट्रपति निकोलस मादोरो की लोकप्रियता और बढ़ गई जिन्होंने इन प्रतिबंधों का साहस के साथ डट कर मुक़ाबला किया जबकि उनके विरोधी ख़्वान ग्वाइडो को जनता भूलती जा रही है। उन पर देश से ग़द्दारी और विदेशों के मोहरे के रूप में काम करने के आरोप लग रहे हैं।

बिल्कुल यह प्रतिबंध अमानवीय यातना है जिनसे 8 करोड़ से अधिक ईरानी जनता को निशाना बनाया गया है जो इस समय कोरोना महामारी के दौर से गुज़र रही है।

नस्लवादी और मानसिक रूप से बीमार ट्रम्प जब यह ख़बरें सुनते हैं कि ईरान में कोरोना महामारी से तबाही हो रही है और मरने वालों की संख्या बढ़ रही है तो उन्हें आनंद आता है। ट्रम्प दावा करते हैं कि कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि इस वायरस से संक्रमित होने का क्या मतलब है? मगर वह संवेदनहीन व्यक्ति हैं और मानवता और मानवीय मूल्यों से उनका कोई लेना देना नहीं है, उन पर तो जातिवाद और नस्लवाद छाया हुआ है।

हमें ट्रम्प के इस फ़ैसले पर कोई हैरत नहीं है क्योंकि हम ट्रम्प की वह वीडियो देख चुके हैं जिसमें वह पूर्व अमरीकी सरकार की इसलिए आलोचना कर रहे हैं कि उसने इराक़ की तेल की दौलत को लूटने में कुछ कसर रखी। ट्रम्प ने इराक़ से दो ट्रिलियन डालर के हर्जाने की मांग की। ट्रम्प की समझ में तो यह बात आई ही नहीं कि इराक़ में जनता रहती है और अमरीका ने अपनी योजना से इराक़ को तबाह करके रख दिया।

हमारे लिए कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि अगला चुनाव ट्रम्प जीतेंगे या हारेंगे लेकिन यह अमानवीय हरकतें ट्रम्प के नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ जाएंगी।

स्रोतः रायुल यौम

क्या अरब लीग की मौत का समय आ गया है?

अब तक छः देश अरब लीग की अध्यक्षता स्वीकार करने से इन्कार कर चुके हैं और फ़िलिस्तीनी अधिकारियों का कहना है कि अब इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है।

फमिस्र, सऊदी अरब, इराक़, सीरिया, लेबनान व जाॅर्डन द्वारा सन 1945 में गठित अरब लीग का मूल उद्देश्य अरब देशों के बीच एकता व एकजुटता स्थापित करना था। आज यह संगठन, अपनी पहचान और अपने मूल उद्देश्य के ही संकट में ग्रस्त है और इसका कोई स्पष्ट भविष्य दिखाई नहीं देता। आजकी दुनिया में क्षेत्रवाद और क्षेत्रीय सहयोग, अनेक सरकारों विशेष कर विकासशील देशों के एजेंडे में शामिल है क्योंकि क्षेत्रीय संगठन देशों की अर्थव्यवस्था के विकास और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसके जुड़ने की राह समतल करते हैं।

इस क्षेत्रीय संगठन के गठन को 75 साल गुज़रने के बाद कहा जा सकता है कि न केवल यह कि इसके लक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं बल्कि यह कभी कभी तो यह स्वयं अपने लक्ष्यों से दूर होने का कारण बना है। फ़िलिस्तीन समस्या, सीरिया के संकट, यमन के युद्ध, लीबिया के गृह युद्ध और अरब देशों की क्रांतियों में पूरी दुनिया ने वैचारिक व व्यवहारिक दोनों मैदानों में अरब लीग की ढिलाई को देख लिया। मंगलवार को लीबिया की राष्ट्रीय एकता की सरकार ने घोषणा कर दी कि वह अरब संघ की अध्यक्षता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। इस संघ में लीबिया के प्रतिनिधि ने कहा कि उनका देश किसी बेहतर समय में अरब लीग की अध्यक्षता स्वीकार करने को प्राथमिकता देता है। अरब लीग की अध्यक्षता हर साल वर्णमाला के हिसाब से हस्तांतरित होती रहती है और अगर कोई देश अध्यक्षता स्वीकार नहीं करता तो अगले देश का नंबर आ जाता है।

पिछले दो हफ़्ते में लीबिया छठा देश है जिसने अरब संघ की अध्यक्षता स्वीकार करने से इन्कार किया है। पहली बार फ़िलिस्तीनी प्रशासन ने इस्राईल के साथ संयुक्त अरब इमारात और बहरैन के संबंध स्थापना के समझौते पर अरब संघ के सचिवालय के व्यवहार पर आपत्ति स्वरूप इस संघ की अध्यक्षता स्वीकार करने से इन्कार किया था। फ़िलिस्तीन के बाद क़तर ने भी अरब लीग का अध्यक्ष बनने से इन्कार कर दिया। फिर कोमोर द्वीप की बारी आई और वह भी किनारे हो गया। इसके बाद कुवैत और लेबनान का नंबर था लेकिन उन्होंने भी कहा कि वे बेहतर परिस्थितियों में अरब संघ का अध्यक्ष बनना पसंद करेंगे।

फ़िलिस्तीन में अरब लीग का जनाज़ा उठाए हुए युवा

पिछले 75 बरसों में फ़िलिस्तीन की समस्या, अरब संघ की सबसे बड़ी पहचान थी और इसकी सभी बैठकों में उस पर बल दिया जाता था लेकिन अब फ़िलिस्तीनी काॅज़ ही इस संघ में विवाद और बिखराव का कारण बन गया है। वैसे अरब संघ अब तक अरब देशों के बीच मतभेदों को हल करने में सफल नहीं रहा है बल्कि इसके विपरीत मतभेद, इस संघ के अंदर तक पहुंच चुके हैं। इन सारी बातों ने अरब लीग को एक ऐसे संगठन में बदल दिया है जिसे 75 साल बाद, अरब सोशल मीडियाकर्मियों के शब्दों में दफ़्न कर दिया जाना चाहिए ताकि वह इतिहास का हिस्सा बन जाए। यह संघ, अरब दुनिया के लिए एक प्रभावी तत्व होने के बजाए, ख़ुद ही अरब देशों के बीच पाए जाने वाले मतभेदों से प्रभावित है। फ़िलिस्तीन समस्या के संबंध में इस संगठन पर जो ज़िम्मेदारी थी, उसे भुला कर अरब लीग ने अपने ताबूत में आख़री कील ठोंक ली है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *