विशेष

इस प्रकार योगी वस्तु से होने वाले हानि-लाभ को समझ लेता है

मुदित मिश्र

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#अध्यात्म_समाधिज_प्रसाद_है
*निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः।।४७।।*
{पातंजल योगसूत्र}
निर्विचार समाधि के अत्यंत निर्मल होने पर *’अध्यात्म प्रसाद’* प्राप्त होता है.
इस निर्विचार समाधि के निरंतर अभ्यास से जब यह पूर्ण शुद्ध हो जाती है तो साधक को ‘अध्यात्म प्रसाद’ अर्थात परमात्मा का अनुग्रह प्राप्त होता है. तब निर्बीज समाधि भी उसी की कृपा से वह उपलब्ध कर पाता है. ईश्वर कृपा से ही रही-सही मलिनता का बीज भी नष्ट हो जाता है. इसी को ‘सम्यक ज्ञान’, ‘सच्चा साक्षात्कार’, ‘अध्यात्म प्रसाद’ कहते हैं. इस अवस्था में योगी की बुद्धि अत्यंत निर्मल हो जाती है.

यही निर्बीजता योग साधक का अंतिम लक्ष्य है.अंतर्यात्रा विज्ञान अस्तित्व में क्रियाशील रहे तो यह अध्यात्म प्रसाद मिले बिना नहीं रहता. व्यवहार में परिस्थितियों से गहरा सामंजस्य, शरीर की स्थिरता, प्राणों की सुमधुर लय, अंतर्यात्रा विज्ञान के प्रयोगों की पृष्ठभूमि तैयार करती है. मन की एकाग्र, स्थिर एवं शांत स्थिति में पवित्र धारणाओं के पुष्प मुस्कुराते हैं और तब शुरू होता है चित्त के संस्कारों का परिशोधन.

गहरे में अनुभव करें तो यही संस्कार बीज हमारे जीवन में प्रवृत्ति और परिस्थितियों की फसल रचते हैं. इसलिए सभी अध्यात्मवेत्ता अपने मार्गों की भिन्नता के बावजूद चित्त के परिशोधन की साधना जीवन का मुख्य कर्तव्य बताते रहे हैं. चित्त को समझना एवं संँवारना ही तप है, और इसकी आत्मतत्व में विलीनता ही योग है.
महर्षि पतंजलि के शब्दों में, समाधि की निर्विचार अवस्था की परमशुद्धता उपलब्ध होने पर प्रकट होता है ‘अध्यात्म प्रसाद’. उन्होने अपने सूत्रों में,अध्यात्म विज्ञान के गहरे निष्कर्ष गूँथे हैं. यह निष्कर्ष भी बड़ा गहन है. इसमें निर्विचार समाधि के तत्व को उन्होंने प्रकट किया है.
महर्षि ने योग दर्शन में बड़ी स्पष्ट रीति से समझाया है कि योग की यथार्थता-सार्थकता ध्यान में फलित होती है. इसके पूर्व जो भी है वह सब तैयारी है, ध्यान की. यह ध्यान गाढ़ा हुआ तो समाधि फलती है.

और समाधि की विविध अवस्थाओं में सबसे पहले आती हैं, संप्रज्ञात समाधियाँ. ये संप्रज्ञात समाधियाँ हालांँकि सबीज हैं, फिर भी इनमें निर्विचार का मोल है.
इनमें विचारों की लहर से चित्त मुक्त होता है. बुद्धि के भ्रम दूर होते हैं, कर्म क्लेश भी शिथिल होते हैं. इसकी प्रगाढ़ता में चित्त स्वच्छ हो जाता है दर्पण की भांति. और तब इसमें झलक उठती है आत्मा की छवि. यही तो ‘अध्यात्म का प्रसाद’ है

इस सूत्र का सार कहें या फिर योग सूत्र के सभी सूत्रों का सार, महर्षि पतंजलि के प्रतिपादन की मुख्य विषय वस्तु चित्त ही है. चित्त की अवस्थाएं, इस में आने वाले उतार-चढ़ाव, इसमें जमा होने वाले कर्मबीज, इन्हीं की तो शुद्धि करनी है.

व्यवहार के रूपांतरण,परिवर्तन से करें या फिर ध्यान की तल्लीनता से, कार्य एक ही है, चित्त का शोधन.
चित्त की अशुद्धि के यूं तो कई रूप हैं, पर मूल रूप एक ही है संस्कार बीज. इन्हीं को चित्त की गहराई में जाकर खोजना है, खोदना है,बाहर निकालना है, जलाना है और अंततोगत्वा इन्हें संपूर्णतया समाप्त करके चित्त को शुद्ध करना है.

सूत्र में, ‘वैशारद्ये’ से तात्पर्य है स्पष्टता, शुभ्रता, पवित्रता. निर्विचार समाधि में मन की निर्मलता के कारण ‘अध्यात्म प्रसाद’ प्राप्त होता है. काम क्रोध लोभ मोह अहंकार,अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष, अभिनिवेश इन क्लेशों के कारण मन में अशुद्धि रहती है.

अशुद्धि दो प्रकार की है पहली है अविद्या और दूसरी है रजोगुण तमोगुण का अधिक होना.मन सत्व प्रधान है लेकिन व्यक्ति सांसारिक क्रियाकलापों में रत रहकर रजोगुण एवं तमोगुण में ही उलझा रहता है और मन शुद्ध नहीं रह पाता. विवेक-वैराग्य से पुनः सत्य को उभार कर मन को निर्मल किया जा सकता है.
निर्विचार समाधि में मन की निर्मलता के कारण प्राप्त होने वाले ‘अध्यात्म प्रसाद’ के रूप में वस्तु के यथार्थ को जानने वाला ज्ञान प्रकट होता है. यहां एकाग्रता की पराकाष्ठा होती है वस्तु के सभी गुण एक साथ प्रकट होते हैं.

अध्यात्म प्रसाद’ की तीन विशेषताएँ है, पहली है *पदार्थ का यथार्थ ज्ञान,* दूसरी *ज्ञान के प्रकाश का प्रादुर्भाव* और तीसरी *वस्तु के सभी गुणों का एक साथ प्रत्यक्ष होना*. वस्तु के बोध में क्रम तो होता है लेकिन प्रज्ञालोक में आत्यंतिक सूक्ष्मता के कारण योगी को वस्तु की समग्रता का बोध तत्क्षण होता है.

इस प्रकार योगी वस्तु से होने वाले हानि-लाभ को समझ लेता है. यदि वस्तु उसे ईश्वर की ओर प्रवृत्त करती है, तो लाभदायक है. योगी लौकिक उपलब्धि की क्षुद्रता को समझ लेता है. वह संसार के प्रलोभन से दूर रहकर अपने आत्मिक विकास में रत रहता है.

वह ज्ञानरूपी महल पर चढ़कर स्वयं शोकरहित रहता है, और शोकग्रस्त लोगों के शोक को दूर करने के लिए प्रयासरत रहता है. वह जैसे पर्वत की चोटी से पर्वत की तलहटी में स्थित लोगों को क्षुद्रता में पड़ा देख कर शोकग्रस्त लोगों को, शोकरहित होने का संदेश देता है.
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