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चीनी अख़बार का सुझाव : भारत को अब ज़रूरत है कि अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारना बंद करे और ज़रा अक़्ल से काम ले!

चीन की सत्ताधारी पार्टी के अख़बार ग्लोबल टाइम्ज़ ने शिनहुआ युनिवर्सिटी में रणनैतिक मामलों के विशेषज्ञ कियान फ़ेंग का एक संपादकीय लेख प्रकाशित किया है जिसमें भारत को यह सुझाव दिया गया है कि वह ख़ुद को नुक़सान पहुंचाना बंद करे और कुछ समझदारी दिखाए।

लेखक ने लिखा है कि भारतीय मीडिया के अनुसार भारतीय गृह मंत्रालय और वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय की संयुक्त कमेटी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है कि वह एफ़डीआई की पुनरसमीक्षा के प्रस्ताव पर नए सिरे से विचार करें और भारत के साथ संयुक्त ज़मीनी सीमा रखने वाले देशों को 26 प्रतिशत एफ़डीआई की अनमति दें। रिपोर्टें कहती हैं कि इस प्रस्ताव पर जल्द ही फ़ैसला किया जाएगा।

इससे लगता है कि नई दिल्ली सरकार अब कुछ विवेक से काम ले रही है और चीन सहित पड़ोसी देशों के भारत में निवेश के मामले में राष्ट्रवादी जुनून से हटकर सोच रही है।

मई में भारत चीन सीमा पर विवाद पैदा हो जाने के बाद भारत ने चीन के ख़िलाफ़ कई आर्थिक क़दम उठाए थे। इनमें भारतीय बंदरगाहों पर चीनी कार्गो कंटेनरों के कस्टम क्लेयरेंस पर रोक लगाना, बहुत सारे चीनी एप्लीकेशनों पर प्रतिबंध और चीनी कंपनियों के साथ इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में जारी परियोजनाओं पर रोक लगाना शामिल था। यहां तक कि भारत रीजनल काम्प्रीहेन्सिव इकानामिक पार्टनरशिप समझौते में भी शामिल नहीं हुआ। भारत में यह आवाज़ उठ रही थी कि जिस व्यापार समझौते में चीन शामिल होगा भारत उसमें शामिल न हो।

भारत ने चीन को ख़तरा समझने की थ्योरी के तहत चीन के ख़िलाफ़ प्रतिशोध की कार्यवाही करते हुए एकपक्षीय रूप से चीन से अपने आर्थिक संबंधों को सीमित कर लिया। इससे चीनी निवेशकों का विश्वास कम हुआ जिसके नतीजे में चीन और भारत के बीच तेज़ी से बढ़ रहे व्यापारिक रिश्तों पर अंकुश लग गया। वरना 2013 से 2018 तक चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर था और यह व्यापार 100 अरब डालर तक जा पहुंचा था।

वर्ष 2019 में चीन की 1000 से अधिक कंपनियों ने भारत के इंडस्ट्रियल पार्क्स में ई-कामर्स जैसे क्षेत्रों में 8 अरब डालर से ज़्यादा का निवेश किया।

मगर जब भारत में चीन विरोधी लहर चली तो चीनी निवेश भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। एफ़डीआई के बारे में भारत सरकार की ओर से लगाई गई रोक, कोरोना वायरस की महामारी और आर्थिक विकास की बहाली में आने वाली समस्याओं का नतीजा यह हुआ कि भारत की अर्थ व्यवस्था की हालत बहुत ख़राब हो गई। भारत की विकास दर पिछले 11 साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई।

भारत को उम्मीद थी कि अमरीकी और यूरोपीय कंपनियों से निवेश आएगा मगर नतीजा बहुत सीमित रहा। भारत अगले पांच साल में इंफ़्रास्ट्रक्चर में 1.4 ट्रिलियन डालर का निवेश करना चाहता है और इस क्षेत्र में चीनी कंपनियां काफ़ी रूचि रखती हैं मगर वर्तमान नियमों और परिस्थितियों में यह संभव नहीं लग रहा है।

भारत के एक रणनीतिक विशेषज्ञ ज़ोरआवर सिंह ने हिंदुस्तान टाइम्ज़ में अपने लेख में सचेत किया था कि भारत के लिए अपनी अर्थ व्यवस्था को चीन से काटना अच्छा नहीं होगा। मोदी सरकार के लिए उचित होगा कि इस प्रकार की विवेकपूर्ण आवाज़ों को ज़्यादा ध्यान से सुने और चीनी निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए ठोस क़दम उठाए। अब भी वर्तमान स्थिति को संभालने के लिए ज़्यादा देर नहीं हुई है।

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