साहित्य

तब तक तुम्हें अपना बड़ा सा मुंह बन्द रखना चाहिए

Jay Gupt
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🙂#अराजनैतिक_लघुकथा —
बहुत समय पहले की बात है । लम्बी दूरी की यात्रा करने वाली एक सुंदर सी नन्हीं चिड़िया, अपने झुंड से बिछड़ कर, वर्फीले बादलों से उडती हुई, तेज़ ठंढ से बेहोश हो, जम कर जमीन पर आ गिरी ।

कुछ ही पलों बाद, वहां से एक गाय गुजरी, उसने उस जमी हुई नन्हीं चिड़िया को देखा, टटोला, फिर उस पर गोबर कर के चली गई ।
नन्हीं चिड़िया ठंढ से बेहोश थी, गोबर की गर्माहट से उसे होश आ गया, उसकी जान बच गई, पर वह पंखों में चिपके, लिसलिसे गोबर से परेशान थी, उसके कारण उसके सुंदर पंख जो गंदे हो गये थे ।

वह सडक पर जोर जोर से फुदक फुदक कर चिखती हुई, गोबर को साफ करने के प्रयास में लग गयी ।
तभी वहां से एक बिल्ली गुजरी, उसने नन्हीं चिड़िया को देखा, बिल्ली ने उसे उठाया, साफ पानी से नहलाया, धूप में रख कर सूखने तक, खूब सारी मीठी मीठी बातें कीं और फिर गप्प करके खा गयी ।

तो, सोचने वाली बात यह है, हमें इस कहानी से क्या सबक मिलता है ।

पहला सबक है – जरूरी नहीं की जो तुम पर गोबर करे वो तुम्हारा दुश्मन हो, और यह भी जरूरी नहीं कि जो तुम्हें गोबर से बाहर निकाले वह तुम्हारा दोस्त हो ।

दूसरा सबक है – जब तक कोई बात या मामला समझ में ना आ जाये, तब तक तुम्हें अपना बड़ा सा मुंह बन्द रखना चाहिए ।

(इसे राजनैतिक द्रष्टि से ना देखा जाये, खासकर अमरीका व उसके चमचों से जोड़कर तो बिल्कुल भी नहीं)
✍जयगुप्त ।

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