साहित्य

पूरा समाज ही एक लम्बी उदास रात से हो कर गुज़र रहा है, लोग भीड़ में अकेले हैं, थके और उदास!

Kavita Krishnapallavi

एक लम्बी, उदास रात से गुजरते हुए
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(मेरा यह लेख ‘रविवार डाइजेस्ट’ के नवंबर,2017 अंक में प्रकाशित हुआ था । आज इसकी प्रासंगिकता उस समय से भी अधिक प्रतीत हो रही है ।)
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चारों ओर अवसाद का अँधेरा छाया हुआ है। खोखली हँसी, मोबाइल पर बतियाते, इंटरनेट पर चैटिंग करते, मशीनों की तरह भागते-दौड़ते, अकेलेपन के रौरव नरक में जीते लोग। आत्मनिर्वासित आत्माएँ। चमकदार चीजों के बीच बुझे हुए चेहरे। इस अँधेरे से कैसे निकलें?

ग़ज़ल का साज़, उठाओ बड़ी उदास है रात
नवा-ए-मीर सुनाओ बड़ी उदास है रात
कहें न तुम से तो फिर और किससे जाके कहें
सियाह ज़ुल्फ के सायो बड़ी उदास है रात
सुना है पहले भी ऐसे में बुझ गये हैं चिराग़
दिलों की ख़ैर मनाओ बड़ी उदास है रात
दिये रहो यूँ ही कुछ देर और हाथ में हाथ
अभी न पास से जाओ बड़ी उदास है रात

– फ़िराक़ गोरखपुरी

यह पूरा समाज ही जैसे एक लम्बी उदास रात से हो कर गुजर रहा है। लोग भीड़ में अकेले हैं, अपने आप में खोये हुए, खुद से बातें करते हुए, जिन्दगी की जद्दोजहद से थके हुए, उचाट और उदास। अपने आसपास निगाहें दौड़ाइए, आप को ऐसा ही कुछ देखने को मिलेगा। प्रेम की बीस कविताओं पर उदासी का एक गीत हावी है (सन्दर्भ : पाब्लो नेरूदा का पहला कविता संकलन)। ज्यादा लोगों के पास कहने को मुख्तसर- सी बातें हैं और हैं ढेरों चुप्पियाँ, पर आसपास के भागते-दौड़ते अजनबी चेहरों के बीच ऐसा कोई नजर नहीं आता, जिससे दिल की चन्द बातें की जायें और हाथ में हाथ दिये कुछ देर तक चुपचाप बैठा जाये।
चेखव की एक कहानी में अपने इकलौते युवा बेटे की मौत से गमजदा बूढ़े कोचवान की रामकहानी सुनने और दुख बाँटने में जब दिन भर के दौरान उसका कोई मुसाफिर दिलचस्पी नहीं लेता तो रात में दिल हल्का करने के लिए वह अपने घोड़े से बातें करता है और अपनी दुख भरी कहानी सुनाता है। कुछ दुखी और अवसादग्रस्त लोग तो हर समाज में हर समय में होते हैं, लेकिन अगर ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक हो, और लगातार तेजी से बढ़ती जा रही हो, तो लोग नहीं, वह समाज बीमार है। रोगाणु कहीं सामाजिक ढाँचे के तानेबाने में गहरे तक पैठे हुए हैं और अन्दर ही अन्दर उसे जर्जर, खोखला करते जा रहे हैं। संवादहीनता इस हद तक बढ़ चुकी है कि लोगों को अपना दुख और उदासी बाँटने के लिए घोड़े तक नहीं मिलते।

बात शायद स्पष्ट हो गयी होगी। मैं समाज में तेजी से फैलते-पसरते डिप्रेशन या अवसाद की असामान्य मानसिक अवस्था या मानसिक अव्यवस्था (मेण्टल डिसऑर्डर) की बात कर रही हूँ। बहुसंख्यक कामगार आबादी तो आज भी विकास के तमाम दावों के बावजूद दो जून की रोटी और जिन्दगी की न्यूनतम जरूरतें पूरी करने के लिए सुबह से शाम तक खटती और जूझती है और रात में सारी परेशानियों-तनावों को देसी दारू के गिलास में डुबो कर हलक के नीचे उतार लेती है और थोड़ी चीख-पुकार, गाली-गलौज और मारपीट के बाद उनकी झोपड़ियाँ नींद और अँधेरे में डूब जाती हैं। अवसाद की समस्या उनसे कहीं बहुत अधिक मध्य वर्गीय आबादी के बीच दीखती है और इसमें निम्न-मध्य वर्ग से ले कर खाते-पीते खुशहाल परिवार तक शामिल हैं। कहीं न कहीं जैसे लोगों के जीवन का कुतुबनुमा खो गया है और वे अँधेरे समुद्र में भटके हुए नाविक जैसा व्यवहार कर रहे हैं। पाब्लो नेरूदा की एक शुरुआती कविता ‘उदासी का एक गीत’ की अंतिम पंक्तियाँ हैं :

निस्तेज अंधे नाविक, भटके हुए खोजी, डूब गया सबकुछ तुममें
यह घड़ी है विदाई की मुश्किल और सर्द
बाँध देती है रात जिसमें सभी समय-सूचियाँ
सरसराहट भरा इलाका समुद्र का घेरे है किनारे को
लहराते हैं सर्द सितारे काली चिड़ियाँ कर जातीं प्रवास
उजाड़ जैसे घाट पौ फटने पर
बस काँपती छायाएँ ऐंठ रहीं मेरे हाथों के बीच
ओह किसी भी चीज की बनिस्बत बहुत-बहुत दूर
ओह बहुत-बहुत दूर किसी की भी बनिस्बत
यह घड़ी है चल पड़ने की ओ चल देने वाले!

अवसादग्रस्त व्यक्ति कई बार एकाकी जीवन वाली अपनी उदास दुनिया से बाहर निकल किसी सार्थक दिशा में चल पड़ने का फैसला लेता है और कई बार दोस्तों, काउंसिलिंग और मनोचिकित्सा तथा अपनी संकल्प शक्ति और तर्क शक्ति के सहारे सफल भी हो जाता हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि बार-बार विफल होने के बाद अपने उदास एकान्त को ही वह अपनी नियति मान लेता है। कई मामलों में ऐसा भी होता है कि वह अपने घुटन -भरे अलगाव से बाहर लिकलने का फैसला लेता है, यह तय करता है कि चल पड़ने की घड़ी आ गयी है और मौत की अंधी खाई की तरफ चल पड़ता है।
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हिन्दी के सुविख्यात और मेधावी जनवादी कवि गोरख पाण्डेय लम्बे समय तक अवसाद का शिकार रहे और फिर एक दिन उन्होंने अपने जीवन का अन्त कर लिया। प्रसिद्ध कथाकार-नाटककार स्वदेश दीपक के अवसाद और मानसिक अव्यवस्था का बरसों इलाज चला। बीच-बीच में वे उबरते भी रहे। फिर एक दिन वे गायब हो गये और बरसों बीत गये आज तक उनका कुछ पता नहीं चला। आनन्द कुशवाहा सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध और अस्सी के दशक के पूर्वार्द्ध में जेएनयू में थे। जानकारों के मुताबिक जर्मन भाषा और मार्क्सवाद के गहन अध्येता और दुर्दान्त विद्वान। फिर वे अवसाद की चपेट में आये और तीस-पैंतीस वर्षों का समय बीत गया, उससे बाहर नहीं आ सके। आज भी जेएनयू, आईआईटी, मुनीरका, बेरसराय, लाडो सराय के आसपास फटे-पुराने कपड़े पहने, सुकरात जैसे सिर वाला, कंकाल सरीखा व्यक्ति घूमता-भटकता मिल जाता है। वह आनन्द कुशवाहा हैं।

ऐसे लोग होते हैं जो बेहद संवेदनशील और भावप्रवण हुआ करते हैं, लेकिन प्रतिकूल स्थितियों से लड़ने के लिए अपेक्षित संकल्पशक्ति और चीमड़पन तथा तर्कणा का उनमें अभाव होता है। पुराने दिनों में, ऐसे ही लोग विपरीत परिस्थितियों से टकराने और असफल होने पर अवसाद की गिरफ्त में आ जाते थे। लेकिन, विशेषकर 1990 के बाद, नवउदारवाद के घटाटोप में हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, यह सिर्फ धार्मिक उन्माद, चरम पतनशील निरंकुश दमन की राजनीति और अपराध, भ्रष्टाचार, मँहगाई, बेरोजगारी आदि में अभूतपूर्व रफ्तार से बढ़ोत्तरी की दुनिया ही नहीं है, बल्कि साथ ही, यह भयंकर आत्मिक-सांस्कृतिक क्षरण और समाज में गहराते अलगाव, एकाकीपन, व्यक्तित्व के विघटन और दमघोंटू अवसाद की भी दुनिया है। ऐसे में आम नागरिकों के बीच, विशेषकर मध्य वर्ग के लोगों के बीच अवसाद और मानसिक अव्यवस्था की समस्या बड़े पैमाने पर और बहुत तेजी से फैली है। कई शोध-अध्ययन इस बात की गवाही देते हैं और मेरे परिचित कई मनोचिकित्सकों और काउंसिलिंग करने वालों ने भी इसकी तस्दीक की। सामाजिक कामों के दौरान मैं सैकड़ों ऐसी स्त्रियों और पुरुषों से मिल चुकी हूँ जो महीनों से लगातार ‘लो फील’ करते हैं, अन्यमनस्क रहते हैं, किसी चीज से उन्हें खुश होने को दिल नहीं करता, या तो सोते रहते हैं या फिर सोते ही नहीं, पूर्वप्रकृति के विपरीत बहुत कम बोलते हैं, जीवन में उनकी दिलचस्पी खतम हो जाती है और जीने को दिल नहीं चाहता। कई संगठनों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक को मैंने डिप्रेशन का क्रॉनिक पेशेंट पाया है।

तब, जैसा कि मैंने पहले ही इंगित किया है, मानसिक अवसाद के कारण, मूलत: और मुख्यत:, अलग-अलग लोगों के व्यक्तिगत जीवन के और व्यक्तिगत पारिवारिक इतिहास में न होकर इस सामाजिक ढाँचे या व्यवस्था के भीतर निहित हैं। यह रुग्ण पूँजीवादी सामाजिक व्यवस्था है जो लोगों को मानसिक रोगी बना रही है। इस बात को सुसंगत रूप में समझने के लिए एलियनेशन या अलगाव की मनो-सामाजिक परिघटना के बारे में हमें जानना-समझना होगा। सब से पहले इसकी चर्चा हमें कार्ल मार्क्स की कृति ‘1844 की आर्थिक और दार्शनिक पाण्डुलिपियाँ’ में मिलती है। फिर इसके अलग-अलग पक्षों पर ग्योर्गी लुकाच, इस्तेवान मेस्जारोस, शैफ, शाक्तेल, ओलमान, व्रैनिकी, जोसेफसन आदि विद्वानों ने विस्तार से लिखा। मार्क्स की बुनियादी स्थापना यह थी कि पूँजीवादी समाज में उत्पादन प्रक्रिया में जो श्रम-विभाजन होता है उसमें पृथक्कृत या वियोजित श्रम किसी व्यक्ति, समूह, संस्था या समाज को उसकी उत्पादक कार्रवाई के उत्पाद या गतिविधि के नतीजे से काट कर अलग कर देता है, फिर उस प्रकृति से काट कर अलग कर देता है जिसमें वह रहता है, फिर अन्य इंसानों से काट कर अलग कर देता है, फिर मानवीय गुणों और ऐतिहासिक रूप से सृजित मानवीय सम्भावनाओं से काट देता है और अंतत: खुद अपने आप से बेगाना बना देता है (सेल्फ-एलियनेशन)। थोड़े में कहें, तो पूँजीवाद मनुष्य को अधिशेष (सरप्लस) पैदा करने वाली मशीन में तब्दील कर उसके मानवीय गुणों, सामूहिकता, साहचर्य-भावना और सृजनात्मकता का अपहरण कर लेता है। जन-समुदाय सामूहिक तौर पर संगठित हो कर जब पूँजीवाद की आपदाओं का प्रतिकार करता है तो प्रकारान्तर से वह अलगाव या एलियनेशन का भी प्रतिकार करता है। जब यह प्रतिकार पराजय और बिखराव का शिकार होता है और समाज ठहराव और उलटाव के दौर से गुजरने लगता है तो लोगों का अलगाव और अकेलापन बढ़ने लगता है, जिसकी तार्किक परिणतिसमाज में बढ़ते मानसिक अवसाद और मानसिक अव्यवस्था के रुझान के रूप में होता है। मक्सिम गोर्की ने अपने लेख ‘व्यक्तित्व का विघटन’ में इस परिघटना की अलग कोण से व्याख्या की है। उनके अनुसार, पूँजीवाद के युग में, और विशेषकर साम्राज्यवाद की चरम अवस्था में पहुँच कर, मनुष्य के समष्टिगत, सामाजिक व्यक्ति के विघटन की प्रक्रिया अपने चरम पर जा पहुँचती है जो रुग्ण व्यक्तिवाद, जनवाद-विरोधी प्रवृत्तियों, विविध सांस्कृतिक व्याधियों और मनोरोगों से समाज को भर देती है।
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पूँजीवादी समाज में जब तक कुछ गति और ऊर्जस्विता बची हुई थी, तब तक समाज में अलगाव का घटाटोप इतना गहरा नहीं था। बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक तक का समय साम्राज्यवाद के साथ ही क्रांतियों का भी कालखण्ड था। संघर्षों का वह दौर सपनों, उम्मीदों, सामूहिकता और सामाजिक सरगर्मियों का दौर था। इसलिए, तब अलगाव की परिणति इतने बड़े पैमाने पर समाज में मानसिक अवसाद के घटाटोप के रूप में नहीं आ सकता था। विशेषकर पिछले तीन दशकों का समय क्रांतियों की पराजय और ऐतिहासिक गतिरोध का वह दौर रहा है, जब पूँजी के अश्वमेध का घोड़ा नवउदारवाद का परचम लहराते हुए पूरी दुनिया को रौंद रहा है। गतिरोध की स्थिति ने लोगों को जकड़ लिया है। उन्होंने शोषणमुक्त, न्यायपूर्ण समाज और सामाजिक मुक्ति-परियोजना के बारे में फिलहाली तौर पर सोचना बन्द कर दिया है। ऐसे में, लाजिमी तौर पर, पूरे समाज में सघन उदासी और मायूसी का दमघोंटू धुआँ भरा कोहरा छा गया है और मानसिक अवसाद की बीमारी में व्यापक बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। जाहिर है कि जो रुग्ण सामाजिक ढाँचा इसके लिए जिम्मेदार है, उसे नष्ट किये बिना इस समस्या से निजात पाना सम्भव नहीं। हमें मानवता की मुक्ति-परियोजना फिर से गढ़ने और अमल में लाने के उपक्रम शुरू करने होंगे। इस प्रक्रिया में संघर्ष की सामूहिकता के साथ ही निर्माण की सामूहिकता की भी स्पिरिट पैदा करनी होगी, मानवद्रोही शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक-शैक्षिक दायरे में आम लोगों की पहलकदमी के बल पर विभिन्न वैकल्पिक संस्थाएँ खड़ा करनी होंगी और इस प्रक्रिया में पस्त पड़े समाज की रूह में हरककत पैदा करनी होगी।

मानसिक अवसाद की बीमारी का फौरी इलाज भले ही मनोचिकित्सा और काउंसिलिंग के द्वारा हो, पर इसका मुकम्मिल इलाज तो सामाजिक-राजनीतिक धरातल पर ही सम्भव है। यूँ इस विषय पर काफी विस्तार से बातें की जा सकती हैं, और इसकी जरूरत भी है, पर इस लेख के कलेवर की सीमा है। इसलिए अपनी बात का समापन मैं अपनी डायरी में 17 जुलाई 2011 को दर्ज ‘उदास नस्लों की तैयार फसलें’ शीर्षक टिप्पणी से करना चाहूँगी, जिसमें समस्या से निपटने के लिए कुछ फौरी कार्यभारों की भी चर्चा है:

‘वयोवृद्ध पूँजीवाद ने समाज की जमीन को भाँति-भाँति के जहरीले रसायनों से पाट कर इंसानों की तरह-तरह के उदास नस्लों की फसलें तैयार की हैं। ये फसलें खुद भी अपनी जमीन को तबाह कर रही हैं, ऊसर बना रही हैं। चारो ओर अवसाद का अँधेरा छाया हुआ है। खोखली हँसी, मोबाइल पर बतियाते, इण्टरनेट पर चैटिंग करते, मशीनों की तरह भागते-दौड़ते, अकेलेपन के रौरव नरक में जीते लोग। आत्मनिर्वासित आत्माएँ। चमकदार चीजों के बीच बुझे हुए चेहरे।

‘पूँजीवाद की शायद यह सब से बड़ी ताक़त है कि लोग चीजों की भीड़ में अकेले हो गये हैं। वे व्यस्त हैं, वे तमाम अपने जैसे लोगों के बीच हैं, लेकिन अकेले हैं। मन की शांति के लिए वे हास्ययोग कर रहे हैं, पर चतुर्दिक उदासी का सामूहिक अट्टहास गूँज रहा है।

‘अरे भाई, यह अकेलापन आप को मार रहा है। अकेलापन एक जेल है। इस जेल में जीने की आदत मत डालिए। इससे बाहर निकलने की तरकीबें ईजाद कीजिए। टीवी का रिमोट रख दीजिए। कम्प्यूटर के सामने बैठ कर आँखें फोड़ना बंद कीजिए। किचेन में जा कर कुछ पकाइए। एक कप बढ़िया चाय पीजिए। आस-पास कुछ पेड़-पौधे लगाइए। मामूली लोगों से इतनी दूरी क्यों बरतते हैं? पास वाली मजदूर बस्ती के चाय वाले की बेंच पर जा कर अड्डा जमाइए और गप्पें मारिए। वहीं फुटपाथ वाले नाई से दाढ़ी बनवाइए। मजजदूरों से उनकी जिंन्दगी के बारे में बातें कीजिए। उन्हें दोस्त बनाइए। इसमें कुछ समय लगेगा, पर यह मुमकिन है। इस तरह धीरे-धीरे अवसाद का जहर उतर जायेगा। अकेलेपन के दंश की पीड़ा कम हो जायेगी। आप एक बार फिर सहज-सामान्य मानवीय गुणों को अपने भीतर महसूस करने लगेंगे। जब आप इंसान की तरह जीना सीख जायेंगे, तो उन तमाम लोगों की लड़ाई में शामिल होने की जरूरत शिद्दत के साथ महसूस करने लगेंगे जो इंसान की तरह जीना चाहते हैं, लेकिन हाड़-तोड़ मेहनत वाली दिहाड़ी गुलामी, अभाव और अनिश्चितता के कारण ऐसा कर नहीं पाते। उनके लिए जीने की शर्त है विद्रोह करना। उनके विद्रोह में भागीदार बन कर आप भी अपनी जिन्दगी के नये मायने ढूँढ़ सकते हैं, उसकी खूबसूरती को नये सिरे से पहचान सकते हैं और उसकी सार्थकता एवं सृजनशीलता का नये सिरे से संधान कर सकते हैं।’

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