बिहार राज्य

बिहार का चुनाव और तेजस्वी यादव का बढ़ता क़द : मुद्दा विहीन, घबराया हुआ विपक्ष : रिपोर्ट

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव 1977 के लोकसभा चुनाव में 29 साल की उम्र में छपरा से सांसद चुने गए थे। लालू यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव 26 साल की उम्र में राघोपुर से 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में विधायक चुने गए।

तेजस्वी पहली बार विधायक बने और बिहार के उपमुख्यमंत्री बन गए। लालू यादव राजनीति में कॉलेज के दिनों में ही आ गए थे। 1973 में लालू यादव पटना यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष बने थे और उसके बाद से उनकी राजनीति बिहार में कभी थमी नहीं। तेजस्वी यादव ने क्रिकेट मोह में नौंवीं क्लास के बाद पढ़ाई नहीं की लेकिन छात्र राजनीति की उम्र में ही उन्होंने चुनावी राजनीति में न केवल दस्तक दी बल्कि चुनाव भी जीते और उपमुख्यमंत्री भी बने। अभी तेजस्वी 31 साल के हैं और मुख्यमंत्री के दावेदार हैं। अगर नीतीश कुमार पर तेजस्वी भारी पड़ते हैं तो भारत के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनेंगे। तेजस्वी यादव की राजनीति में एंट्री तब हुई जब उनके पिता लालू प्रसाद यादव भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद चुनावी राजनीति से बेदख़ल हो गए। अक्टूबर 2013 में लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में जेल की सज़ा मिली और चुनाव लड़ने से भी उन्हें रोक दिया गया।

1997 में भी जब लालू को चारा घोटाले में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था तब मुख्यमंत्री की कुर्सी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को सौंप दी थी। 2013 में लालू यादव के सामने एक बार फिर से वह संकट आया। इस बार उन्होंने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव को आगे किया। इसी बीच 2014 में आम चुनाव हुआ और आरजेडी केवल चार सीटों पर सिमट गई। यहां तक कि राबड़ी देवी सारण और लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती पाटलीपुत्र लोकसभा सीट से चुनाव हार गईं। 2014 के लोकसभा चुनाव तक तेजस्वी उतना मुखर नहीं थे। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव ने दोनों बेटों को चुनावी मैदान में उतार दिया। तेजस्वी को लालू ने अपनी पारंपरिक सीट राघोपुर से उतारा जबकि बड़े बेटे तेज प्रताप को महुआ विधानसभा क्षेत्र से। दोनों बेटों को चुनाव में जीत मिली। 2015 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी क़रीब दो दशक बाद फिर से साथ में आई थी और इस जोड़ी को शानदार जीत मिली थी। हालांकि आरजेडी 2015 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने। तेजस्वी उपमुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश के मातहत 16 महीने तक रहे। 16 महीने बाद नीतीश कुमार फिर से बीजेपी के साथ चले गए।

तेजस्वी यादव की असली राजनीति 2017 से शुरू होती है। वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बने। नेता प्रतिपक्ष रहते हुए तेजस्वी ने सदन में नीतीश कुमार पर जनादेश का अपमान करने का आरोप लगाया तो नीतीश कुमार ने जवाब में कहा था कि आरजेडी के साथ रहते हुए सरकार में काम करना मुश्किल था। लेकिन तेजस्वी यादव के लिए यह मौक़ा था कि वह अपनी राजनीतिक पहचान को पिता की राजनीतिक छाया से अलग करें। इसी बीच 2019 का आम चुनाव आ गया। पूरा कैंपेन तेजस्वी यादव ने संभाला। अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक भी वही थे। 2019 के आम चुनाव में तेजस्वी यादव ने धुआंधार रैलियां कीं। वह अपनी रैलियों में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर रोज़गार और नोटबंदी को लेकर ख़ूब हमला करते थे। अपने पिता की कथित सामाजिक न्याय की राजनीति की बात करते थे। तेजस्वी बताते थे कि उनके पिता ने बिहार में मनुवाद और सामंतवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी और ग़रीबों को इंसाफ़ दिलाया। 2019 के लोकसभा चुनाव में तेजस्वी नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री मोदी को आड़े हाथों लेते थे। लेकिन 2020 में तेजस्वी की राजनीति 2019 से बिल्कुल अलग हो गई है। अब तेजस्वी की जनसभाओं में भारी भीड़ जुट रही है। युवाओं की तादाद सबसे ज़्यादा है और भीड़ बहुत ही आक्रामक तरीक़े से तेजस्वी का स्वागत कर रही है। तेजस्वी का भाषण भी बदल गया है। अब वह रोज़गार, शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य की बात कर रहे हैं। तेजस्वी लॉकडाउन में बिहारियों को हुई भारी परेशानी का मुद्दा उठा रहे हैं। वह सरकार बनते ही बिहार में 10 लाख सरकारी नौकरी देने की बात कर रहे हैं।


पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, ”कोरोना महामारी को लेकर लगे लॉकडाउन से बिहार की राजनीति बदल गई है। लॉकडाउन के दौरान बिहारियों ने सबसे ज़्यादा मुश्किलें झेली हैं और बिहार सरकार उन्हें मदद करने में बिल्कुल नाकाम रही है। लाखों की तादाद में प्रवासी बिहारी अपने गाँव लौटे और सब बदहाली में रह रहे हैं। इस बार जाति और मज़हब पर रोज़ी-रोटी का सवाल भारी पड़ रहा है। तेजस्वी की टीम ने इस चीज़ को समझा है और रोज़ी-रोटी को ही चुनावी एजेंडा बनाया। सरकारी नौकरी में ख़ाली रिक्तियों को भरने का वादा भी बिहारियों को हिट किया है। यहां युवा पढ़ाई कर तैयारी करते हैं लेकिन वेकेंसी को लटकाए रखा जाता है।” डीएम दिवाकर कहते हैं कि इस बार कोरोना नीतीश कुमार को सत्ता से बेदख़ल कर सकता है। बिहार चुनाव को कवर करने वाले कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का भी मानना है कि तेजस्वी की रैलियों में एकत्रित होने वाली भीड़ और उनका भाषण पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में बिल्कुल अलग है। लोगों की भीड़ अनियंत्रित है। युवाओं की तादाद सबसे ज़्यादा है। भीड़ में इस क़दर उत्साह है कि देखते बनता है। ऐसा स्वागत देख 31 साल के तेजस्वी ऊर्जा से भर जाते हैं। तेजस्वी अपने भाषण में बिल्कुल फोकस्ड हैं। वह रोज़गार और बुनियादी मुद्दों की बात करते हैं। तेजस्वी ऐसा कुछ भी नहीं बोलते हैं जिनसे विवाद पैदा हो या विपक्ष को उन्हें घेरने का मौक़ा मिल जाए। वहीं पत्रकारों का कहना है कि इस बार नीतीश कुमार की रैलियों इतनी भीड़ देखने को नहीं मिल रही है।

वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव के पूरे चुनावी कैंपेन में लालू यादव की तस्वीर इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसे लेकर तेजस्वी से सवाल भी पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वह गठबंधन का चेहरा हैं इसीलिए तस्वीर भी उन्हीं की है। आरजेडी के एक नेता से पूछा कि आख़िर तेजस्वी के कैंपेन में लालू यादव की तस्वीर क्यों नहीं इस्तेमाल की जा रही है तो उन्होंने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ”बिहार की बड़ी आबादी में लालू जी की छवि बहुत अच्छी नहीं है। लोगों को लग सकता था कि कहीं वह नैरेटिव चर्चा में न आ जाए कि शासन लालू काल वाला ही होगा जब क़ानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए जाते थे। तेजस्वी भले लालू प्रसाद के बेटे हैं लेकिन इस चुनाव में उन्हें बिहार के युवा के तौर पर आगे किया गया है। बिहार चुनाव पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि, इस बार बिहार में यादव मतदाता तेजस्वी को लेकर एकजुट हैं। लेकिन ग़ैर-यादव ओबीसी नीतीश से नाराज़गी के बावजूद तेजस्वी को स्वीकार करने में असमंजस की स्थिति में हैं। कोईरी और कुर्मी यादवों को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते हैं। नौकरी और रोज़गार का मुद्दा ज़रूर हिट है लेकिन सवर्णों और ग़ैर-यादव ओबीसी के मन में लालू यादव के शासनकाल की यादें मिट नहीं गई हैं।

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