दुनिया

यमन को बड़ी भयानक भुखमरी का सामना है : सऊदी अरब के गले की फांस!

सऊदी नरेश सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ शनिवार को जी-20 शिखर सम्मेलन का उद्घाटन कर रहे हैं। इस वर्चुअल समिट में इस प्रभावशाली गुट के राष्ट्राध्यक्षों को भाग लेना है लेकिन सम्मिलित के स्तर को लेकर संदेह के बादल छा गए हैं।

सऊदी अरब को इस शिखर सम्मेलन को लेकर बड़ी आशाएं थीं, उसे अपेक्षा थी कि संगठन की अध्यक्षता के नतीजे में सऊदी अरब को बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश मिल जाएगा जिसे वह पर्यटन और टेक्नालोजी के क्षेत्र में लगाकर नियोम सिटी जैसी बड़ी परियोजनाओं को सपने से हक़ीक़त का रूप दे सकेगा। मगर कोरोना वायरस की महामारी, यमन युद्ध, पत्रकार जमाल ख़ाशुक़जी की हत्या, बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की गिरफ़तारी और रिट्ज़ कार्लटन होटल में राजकुमारों और व्यापारियों की क़ैद, उन्हें दी जाने वाली यातनाएं और उनसे एक अरब डालर से ज़्यादा की रक़म का ज़ब्त किया जाना यह सारे वह बड़े मुद्दे हैं जो सऊदी अरब के सपनों के पूरे होने में रुकावट ही नहीं हैं बल्कि इनके चलते यह सपने बिखरते जा रहे हैं।

सऊदी नेतृत्व की यह बदक़िस्मती ही है कि उसके सबसे बड़े समर्थक अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प चुनाव हार गए और अब तो ख़ुद उन्हें मदद की ज़रूरत है। दूसरी ओर मानवाधिकार संगठनों ने ठीक इस समिट के समय सऊदी अरब में जेलों में बंद और यातनाएं झेल रहे कार्यकर्ताओं के मुद्दे पर अपनी समानान्तर बैठक करने का फ़ैसला किया है।

एक और बड़ा मुद्दा यह है कि इन्हीं हालात में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने शुक्रवार को बयान दे दिया कि यमन को बड़ी भयानक भुखमरी का सामना है जिसके नतीजे में दसियों लाख यमनियों का जीवन ख़तरे में पड़ गया है और इस त्रासदी की वजह वह युद्ध और नाकाबंदी है जो इस देश पर सऊदी अरब और इमारात ने पांच साल से अधिक समय से थोप रखी है।

सऊदी अरब की तो तमन्ना थी कि यह शिखर सम्मेलन वर्चुअल न होता बल्कि दुनिया के नेता इसमें भाग लेने के लिए सऊदी अरब जाते और अपनी आंख से देखते कि किस तरह महिलाओं को गाड़ी चलाने और विभिन्न क्षेत्रों में काम करने की अनुमति मिल गई है और कट्टरपंथी वहाबी धड़ों के पर कतर दिए गए हैं। मगर मानवाधिकारों के व्यापक हनन और आज़ादी के अभाव के मामलों के कारण बड़े देशों ने सऊदी अरब की मेज़बानी में होने वाली बैठकों के बहिष्कार और उसमें निचले स्तर पर भाग लेने का रास्ता चुना है। जब बड़े शहरों के मेयरों की बैठक हुई तो लंदन, पेरिस, लास एंजेलेस, न्यूयार्क जैसे शहरों के मेयरों ने उसका बहिष्कार किया। यह संभावना है कि कुछ राष्ट्राध्यक्ष भी इसी तरह जी-20 का बहिष्कार करें या इसमें निचले स्तर पर भाग लें।

सऊदी अरब के पास एक साल का समय था जिसमें वह मानवाधिकार और आज़ादी जैसे मुद्दों पर अपनी छवि सुधार सकता था मगर उसने न तो कुछ किया और न करने जा रहा है क्योंकि इसके कोई संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं।

जब लंदन में सऊदी अरब के राजदूत ख़ालिद बिन बंदर ने ब्रितानी अख़बार के साथ इंटरव्यू में यह कहा कि उनका देश जेलों में बंद कार्यकर्ताओं की रिहाई के बारे में विचार कर रहा है तो यह आशा बनी थी कि सऊदी सरकार कुछ सार्थक क़दम उठाने जा रही है लेकिन फिर ख़ालिद बिन बंदर पर भारी दबाव पड़ा और उन्होंने अपने बयान का खंडन करना शुरू कर दिया। इससे यह अंदाज़ा हुआ कि सऊदी अरब में बड़े फ़ैसलों और नीतियों का निर्धारण करने वाले बंद कमरों में गहरे आपसी मतभेद है।

स्रोतः रायुल यौम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *