धर्म

शरीयत क़ानून इंसानी समाज का सबसे बेहतर क़ानून है : रिपोर्ट

Zia Imtiyaz
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….. कुछ भाइयों का सवाल है कि शरिया लॉ की बाकी सख़्त सज़ाएं तो फिर भी ठीक हैं, क्योंकि वो क़त्ल या बलात्कार जैसे गम्भीर अपराधों पर दी जाती हैं, लेकिन चोरी जैसे छोटे जुर्म पर चोर का हाथ ही काट डालना, बहुत ज़ुल्म की बात साबित हो सकती है, अक्सर ये होता है कि कोई इंसान अपनी ग़रीबी या भूख से मजबूर हो कर चोरी करता है, न कि पेशेवर चोर होता है, तो क्या ये शरिया लॉ का ज़ुल्म नही कहलायेगा कि इन मजबूर लोगों के भी हाथ काट दिए जाएंगे
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जवाब : सबसे पहले तो इस बात को भी अपने दिमाग़ में जगह दे दें कि चोर केवल मजबूर बेचारा नही बल्कि सुनसान जगहों पर लोगों को हथियार दिखाकर लूट लेने वाला व्यक्ति भी उसी चोर की कैटेगरी में आता है जिसको शरीयत के मुताबिक पकड़कर उसके हाथ काटे जाने की सज़ा दी जाएगी, इन पेशेवर लुटेरों को भी अपने दिमाग़ में जगह दें तो इनके हाथ काटने की सज़ा आपको ज़ुल्म नही लगेगी…..

…. ख़ैर जिस किस्म के मजबूर चोरों से सबको हमदर्दी महसूस होती है, उनके बारे में शरीयत क़ानून क्या कहता है देख लेते हैं !!
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…. किसी भी देश में अमन और खुशहाली के लिए अपराधियों पर सख्त कानून लागू रहना ज़रूरी है, लेकिन साथ ही साथ ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून अंधा न हो, यानी किसी ने मजबूरी या किसी दबाव के तहत अपराध किया हो तो उसको सख्त तरीक़े से सज़ा न दी जाए बल्कि उसके साथ रहम और इंसाफ का मामला किया जाए, शरीयत इस बात का खास खयाल रखती है

इस्लाम सबसे पहले तो देश के शासक से अपेक्षा करता है कि वो देश में बराबरी, अमन शांति का माहौल बनाएगा किसी को किसी पे गलत तरीके से तरजीह नही दी जाएगी, न हुकूमत किसी गरीब का हक मार के किसी और को फ़ायदा पहुचायेगी, माहौल ये बनाया जाएगा कि अमीर लोग, गरीबों से मोहब्बत और हमदर्दी का सुलूक करेंगे, साथ ही सक्षम लोग गरीबों की मदद के लिए ज़कात वक़्त पर निकालेंगे, ये भी सुनिश्चित किया जाएगा….

अगर शासक ऐसा समाज बना लेगा तो ज़ाहिर है कि पैसे की ज़रूरत पड़ने पर कोई भी गरीब किसी से भी पैसे सदक़ा या उधार के तौर पर ही मांग लेगा और उसे पैसे दिये जाएंगे, फिर किसी गरीब पे वो वक़्त ही नहीं आएगा कि उसे चोरी करने के लिए मजबूर होना पड़े

लेकिन अगर शासक अपने देश में गरीबों की आर्थिक मदद के लिए ज़कात और सदके का सही प्रबन्धन भी न बना पाए, तो उस शासक को ये हक़ नही कि किसी गरीब को चोरी करने पर वो हद्द की सज़ा दे, इस मामले में हज़रत अली रज़ि० का बहुत मशहूर क़ौल बता देना काफ़ी रहेगा कि इस्लाम देश के शासक पर देश में आर्थिक समानता बनाने की कितनी बड़ी जिम्मेदारी रखता है, आप रज़ि० ने फरमाया कि “अगर कोई शख्स अपनी भूख मिटाने के लिए मजबूर हो कर रोटी चोरी करे तो चोर के हाथ काटने के बजाए बादशाह के हाथ काटे जाने चाहिये”

एक बहुत मशहूर रिवायत है कि एक बार हज़रत उमर फारूक रज़ि० की खिलाफत के समय देश में अकाल पड़ गया, उस समय हज़रत उमर ने चोरी करने पर हाथ काटने की सज़ा स्थगित कर दी थी कि इस समय खाने पीने के सामानों की मारामारी है, ऐसे में हो सकता है उपलब्ध भोजन को ऊंचे दामों पर खरीदा बेचा जाने लगे, और भूख से व्याकुल होकर कोई गरीब चोरी कर बैठे…..

इस रिवायत से स्पष्ट है कि चोरी पर हद्द की सज़ा उसी वक्त लागू होगी जब राज्य में अमूमन खुशहाली का माहौल हो, कमाई के मौके मौजूद हों, गरीबों को आसान आर्थिक सहायता मिलने का राज्य की ओर से भी सही प्रबन्ध हो,

….. फिर जब राज्य में हर तरह से खुशहाली, नागरिकों में ईमानदारी, और सरकार द्वारा ज़रूरतमंद लोगों को आसान आर्थिक सहायता देने का माहौल बना होगा उसके बाद भी कोई बालिग़ और अक्लमन्द व्यक्ति बिना किसी दूसरे व्यक्ति के दबाव के चोरी करेगा तो उसकी वजह यही समझी जाएगी कि वो खुद मेहनत करके कमाने की बजाय दूसरों के खून पसीने की कमाई चोरी कर के रातोंरात अमीर बनने के सपने देख रहा है….

…. ऐसे ही इंसान को चोरी से बाज़ रखने के लिए उसको हाथ काटने की सज़ा का डर दिखाया जाता है, जैसा कि मैं पहले भी कई बार बता चुका हूं कि शरीयत मे कुछ विशेष अपराधों के लिए सख्त सज़ाओं का प्रावधान इसलिए नहीं कि अल्लाह अपने बंदो को कष्ट देना चाहता है, बल्कि ये प्रावधान इसलिए है ताकि जो इंसान थोड़े से आनन्द के लिए कोई अपराध करना चाहता हो, तो वो उस अपराध की भयंकर सजा के बारे मे सोचकर बुरी तरह से डर जाए, और अपराध करने की सोच ही न पाए …. फिर जब अपराध ही न होगा तो सज़ा किसे दी जाएगी ??

….. फिर एक सवाल रह जाता है कि सज़ा जुर्म के बराबर होनी चाहिए, ऐसा न हो कि कोई शख्स किसी बेहद अमीर के घर से एक हज़ार रुपये चुरा ले, तो इससे अमीर व्यक्ति को तो नाम भर का नुकसान होगा, पर इस चोरी की सज़ा में रुपये चुराने वाले का हाथ काट दिया जाएगा तो उस व्यक्ति की ज़िंदगी ही खराब हो जाएगी !!
नही भाइयों, ऐसा कभी नहीं होगा, इस सवाल का जवाब शरीयत में बताई गई “निसाब की कीमत” में छिपा है…. निसाब सम्पत्ति की एक सीमा है, जिससे कम क़ीमत की चीज़ को यदि एक व्यक्ति चोरी करता है तो उसे हाथ काटने की गम्भीर सज़ा नही दी जाएगी, बल्कि कोई और छोटी सज़ा दी जा सकती है…!!

निसाब की क़ीमत अलग अलग रिवायतों में अलग अलग बताई गई है सही बुख़ारी शरीफ में चौथाई दीनार यानी एक ग्राम सोने की क़ीमत से लेकर मुसनद अहमद में एक दीनार यानी चार ग्राम सोने की कीमत तक है, (हदीसों को संकलित किये जाने के समय एक दीनार चार ग्राम सोने का होता था)

…… भारतीय उपमहाद्वीप में और दुनिया के बड़े हिस्से में इमाम अबू हनीफ़ा रह० द्वारा संगठित इस्लामी कानूनों का पालन किया जाता है, हनफ़ी विचारधारा के मुताबिक निसाब की क़ीमत 10 दिरहम या एक दीनार (चार ग्राम सोना) है जिसकी कीमत आज हमारे देश में लगभग 20 हज़ार रुपये बैठती है, यानी शरीया कानून के अनुसार हमारे देश में अगर कोई व्यक्ति 20 हज़ार रुपए से कम की चोरी करता है, तो उसका हाथ नहीं काटा जाएगा, बल्कि जेल या जुर्माने जैसी कोई सज़ा दी जाएगी, जिससे उस अपराधी का जीवन भी खराब न हो और वो व्यक्ति आइंदा के लिए अपराध से भी खुद को बचाये….
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……. यानी चोर का हाथ, बेहद गम्भीर चोरी पर ही काटा जाएगा जब वो किसी की जीवन भर की जमापूंजी को चुरा ले…. या फ़र्ज़ कीजिये किसी मौत से जूझ रहे मरीज़ का परिजन अस्पताल में उसके ऑपरेशन के लिए जमा करने को पैसे ले जा रहा हो और बीच में कोई झपटमार उसके वो पैसे छीन ले, और इलाज के अभाव में मरीज़ मर जाये, तो सभी यही कहेंगे कि ऐसे चोर के लिए हाथ काटने की सज़ा भी छोटी है….

….. कब किस स्थिति में जनता की सहानुभूति चोर के साथ हो जाए और कब पीड़ित के साथ हो, उन स्थितियों में भी शरीयत कानून में बेहतर इंसाफ़ के रास्ते खुले हैं…. मान लीजिये कि किसी व्यक्ति ने किसी अमीर के घर से निसाब की क़ीमत से अधिक की चोरी कर ली, अब जब ये मामला शरीयत आधारित कोर्ट में जाए तो कोर्ट को मुक़दमे के तमाम मानवीय पहलुओं पर गौर करना ज़रूरी है, अगर राज्य में समाज की व्यवस्था आदर्श रूप में स्थापित नही है, अगर जिसके यहां चोरी हुई, उसे इस चोरी से बड़ा नुकसान नहीं हुआ, अगर चोरी करने वाला आदतन अपराधी नही है… तो कोर्ट चोर से चोरी की गई रक़म की भरपाई पीड़ित को करने का, मामले को देखते हुए हल्की सज़ा या फिर पीड़ित के चोर को माफ कर देने की अवस्था में चेतावनी या जुर्माना देकर छोड़ देने का आदेश भी दे सकता है….!!!
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…. तो मेरे भाइयों, आइंदा जब भी आप इस मामले में शरीयत क़ानून पर सोचें तो ये जान लें कि इस क़ानून में सख़्ती पेशेवर लुटेरों, झपटमारों पर है, जिनमें सुधार की उम्मीद नहीं रही है, लेकिन किसी गैर पेशेवराना चोरी के मामले में तमाम मानवीय पहलूओं को मद्देनजर रखने और अपराधी को सुधार करने का मौका देने की अपेक्षा शरीयत कानून में की गई है !!

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